इस नये वर्ष की नव उदित चाँदनी, आपके नैन में स्वप्न आँजे नये
उद्यमों की उगी भोर अँगनाई में आ भरे आपकी, स्वर्ण से अल्पना
दिन ढले सांझ श्रून्गार करती हुई,, बन के शामे अवध मुस्कुराती रहे
यह नया वर्ष पूरी करे कामना, आपने जिन की की हो कभी कल्पना.

सारी धरा ही आज प्यासी



घिर रहे आश्वासनों के मेघ  अम्बर में निरंतर
कल सुबह आ जाएगी फलती हुई आशाएं लेकर
ये अँधेरे बस घड़ी भर के लिए मेहमान है अब
कल उगेगा दिन सुनहरी धुप के संग में चमक कर

दे नहीं पाती दिलासा  बात अब  कोई ज़रा भी
प्राण से  अतृप्त है, सारी धरा ही आज प्यासी

वायदों के सिंधु आकर रोज ही तट पर उमड़ते
और बहती जाह्नवी में हाथ भी कितने पखरते
रेत  के पगचिह्न जैसी प्राप्ति की सीमाएं सारी
शंख के या सीपियों के शेष बस अवशेष मिलते

ज़िंदगी इस व्यूह में घिर हो गई रह कर धुँआ सी
एक कण मांगे   सुध , सारी धरा ही आज प्यासी

घेरते अभिमन्युओं को, जयद्रथों के व्यूह निशिदिन 
पार्थसारथि  हो भ्रमित खुद ढूंढता है राह के चिह्न 
हाथ हैं अक्षम उठा पाएं तनिक गांडीव अपना 
आर  ढलता  सूर्य  मांगे प्रतिज्ञाओं   से बंधा ऋण 

आज का यह दौर लगता गल्प की फिर से कथा सी
बूँद की आशा लिए सारी धारा ही आज प्यासी 

पास आये हैं सुखद पल तो सदा यायावरों से 
पीर जन्मों से पसारे पाँव , ना जाती घरों से 
जो किये बंदी बहारों की खिली हर मुस्कराहट 
मांगती अँगनाई पुषिप्त छाँह केवल पतझरों से 
 
किन्तु हर अनुनय विवशता से घिरी लौटी पिपासी
प्यास योन बढ़ने लगी, सारी धारा है आज प्यासी 

प्रभु अनुग्रह अपना दिखलाओ


जीवन के पथ पर जब जब भी ट्रेफ़िक लगता जाम हो गया
तब तब तुमने अधिकारी बन राहों के अवरोध मिटाये
गर्मी में जब कंस बन गया बिजलीघर का हर इक कर्मी
तुमने तब तब इनवर्टर बन झरे पसीने सभी सुखाये

प्रभुवर तुम दर्शन देते हो, शुक्रवार को चैक रूप में
अर्जी स्वीकारो मेरी तुम वही रूप धर प्रतिदिन आओ

पांव ्तुम्हारे  पल पल पूजें, तुम ही इक साकार ब्रह्म हो
 महिमा ओ आराध्य हमारे, कौन बखाने किसकी क्षमता
निशा दिवस अनुकूल जहाँ तुम हो कर चलते अन्तर्यामी
वहाँ  तुम्हारी कृपा किये है पाँच गुना वेतन से भत्ता

एक वर्ष में चार प्रमोशन मिल जायें लल्लो चप्पो कर
ओ त्रिपुरारी अपनी माया से कुछ ऐसा चक्र चलाओ

जहाँ तुम्हारा अनुग्रह होता वहाँ देवसलिलायें बहतीं
उद्गम हो स्काटलेंड का या पटियाले का बहाव हो
उसकी संध्यायें सजती है वेगासी कैसीनो जैसी
संभव नहीं कभी संचय में उसके थोड़ा भी अभाव हो

करते हैं दिन रात स्तवन हम, ओ रोलेटटेबल के स्वामी
नहीं चाह है निन्निनवें की, बस छत्तीस  गुणित करवाओ

निकला कितना दूर

कोई दे आवाज़ पार्श्व से 
साध यही  बस एक थाम के 
 निकला कितना दूर 

स्वप्नलोक में जीते जीते गुजरे कितने दिन
हुई अपरिचित मुस्कानें,नयनों की हर चितवन 
लगता है बरबस जैसे  हो
कांधों पर बोझा ढोते हो 
जीने को मज़बूर  

परिचय के धागों में उलझे अजनबियत के बीज 
चढ़ते दिन के साथ उगी सुरसा मुख बन कर खीज 
कोशिश की किरचों को चुनते 
दोपहरी में सपने बुनते 
तन मन  थक कर चूर 

स्वर्णकलश  के लिए ढूंढते इन्द्रधनुष का छोर 
भटकन में ही दिवस गुजारे क्या संध्या क्या भोर 
बीती हुई याद में जीते 
संचित करते घट में रीते 
पछतावे  भरपूर 

अब शब्द में अमरत्व देदें


गीत ये कहने लगा है आज कुछ ऐसा लिखें हम
लीक से हट कर ज़रा तो गीत को नव अर्थ दे दें

आज लिख दें दीप  के मन की व्यथा  जो प्राण देकर
दूर कर पाया नहीं था तम बसा उसकी तली  में
और पीड़ा फूल की जो देव के सर तो चढ़ा पर 
गंध का छिड़काव कर पाया नहीं अपनी गली में

कर रही हैं वर्तिकाएँ नित्य ही   बलिदान प्रतिपल
क्यों नहीं उनको पिरो अब शब्द में अमरत्व देदें 

प्रवृत्ति हम आसुरी  पर रह गए उंगली उठाये 
किंतु प्रेरित हो नहीं पाये करें हम नाश उनका 
आज लिख कर चेतना जो सो गई झकझोर दें हम
और परिवतन  बुलाएं  सही मानों में खुशी का 

तीर की हिचकोलियों में जो उलझ कर रह गई है 
आज हम उस नाव को मंझधार का अपनत्व दे   दें 

लिख रहे हैं जो समय के पृष्ठ पर विध्वंस के स्वर
कृष्ण बन संहार कर दें तोड़ कर अपनी प्रतिज्ञा
इक महाभारत सुनिश्चित वक्त की अंगड़ाइयां में
पूर्ण कर दें पार्थ बन कर द्रोण की पूरी अपेक्षा

कर चुकी श्रृंगार कितना  लेखनी कहने लगी है
अब शिराओं के रूधिर को युद्ध का कटु सत्य  दे दे

पलकों पर किसे बिठाऊँ मैं

तुम तो बसी हुई सांसों में सहचर हो धड़कन की मेरी
शतरूपे फ़िर सपनों की पलकों पर किसे बिठाऊँ मैं

एक प्रतीक्षा पलक बिछाये रहती है लम्बी राहों पर 
चरण पुष्प की खिली पांखुरी हौले से आकर के छू ले
कनक तुली काया से झरते गन्धों के झरने में भीगे
मादकता से ओत प्रोत झोंकों में लेते पैंगे झूले

गिरती हुई ओस सी पग की आहट के मद्दम सुर लेकर
राग तुम्हारा मिले तभी फिर गीत बना कर गाऊँ मैं

नभ में उड़ते पाखी लाते सन्देसे केवक वे ही जो
पाकर  के आभास तुम्हारा अनायास ही संवर गये हैं
मेघदूत कलसी में भरकर ढुलकाता है सुधा कणों को
जोकि तुम्हारे कुन्तल की अलगनियों पर से बिखर गये हैं

तन की द्युतियाँ, मन की गतियाँ बन्दी होकर रहीं तुम्हारी
कलासाधिके , पृष्ठ खोल दो तो संभव पढ़ पाऊँ मैं

करवट लेकर आंख खोलती प्राची  के आंगन में किरणें
और पखारें अपने मुख को ढलती हुई ज्योत्सनाओं में
उगता हैं तब चित्र तुम्हारा बिछे क्षितिज के कैनवास पर
साँझ  आँजने लग जाती हैं , तब से मीत तुम्हारे सपने

इन्द्रधनुष के रंग तुम्हारे  इक  इंगित के अनुयायी है 
बंधी हथेली तनिक खुले   तो चित्र कोई रंग पाऊँ  मैं 

जब खुली थी प्रथम, होंठ की पाँखुरी

नव ग्रहों ने किया आज गठजोड़ यूँ
सब के सब आज नौ  वर्ष में ढल गए
इक रजत पर्व की जो थी प्रतिमा सजी
उसमें आकर सभी एक संग  मिल  गए

फिर से इतिहास के पृष्ठ कुछ खुल गए
याद में सात रंगी उमंगें घिरी
फिर से जीवंत होने लगे वे निमिष
जब खुली थी प्रथम, होंठ की पाँखुरी
दृष्टी की रश्मियाँ थी रिसी ओट से
पार करते हुए कुछ अवनिकाओं को
तंत्रियों में बजी सरगमों की धुनें
साज करते हुए मन की धाराओं को

वह घड़ी जब हृदय से हृदय के सिरे
बिन प्रयासों के सहसा गले मिल गए
इक रजत पर्व की जो थी प्रतिमा सजीं
आज उसमें बरस पूर्ण  नौ  मिल गए

एक वह मोड़ जिस पर भटकती हुई
वीथियां दो अचानक निकट आ गई 
एक वह पल कि जिसमें समाहित हुई
प्रेम गाथाएं खुद को थी दुहरा गई
जो शची से पुरंदर का नाता रहा
उर्वशी से पुरू का था सम्बन्ध जो
एक पल में नया रूप धरते हुए 
सामने आ खड़ा अवतरित हो के वो 

झोंके बहती हवा के लिए गंध को
तन को मन को भिगोने को ज्यों तुल  गए
इक रजत पर्व की जो थी प्रतिमा सजीं
आज उसमें बरस पूर्ण  नौ  मिल गए

अग्नि के साक्ष्य में जो हुए थे ध्वनित 
मन्त्र के स्वर लगे आज फिर गूंजने 
शिल्प का एक, श्रृंगार आकर किया 
रूप की चमचमाती हुई धूप  ने 
स्वस्ति चिह्नित भरे जलकलश सामने 
एक चादर बना व्योम तारों भरी 
मन ने दुहराई फिर आज अनुबंध के
सत्य सौगंध की इक नै पंखुरी 

इक नए वर्ष की सज रही राह में 
कामना के सुमन और कुछ खिल गए
इक रजत पर्व की जो थी प्रतिमा सजीं
आज उसमें बरस पूर्ण  नौ  मिल गए  

खुली हवा की पगडंडी पर चलते हुये गन्ध के राही


पंक्ति बना कर शब्द अनगिनत होठों पर आ बस तो जाते
मन ये माने नहीं गीत हैं, सुर चाहे सज कर गाते हैं
 
सन्ध्या आ लिखने लगती है बीते दिन के इतिहासों को
दीप हजारों जल जाते हैं अर्जित पीड़ा की बाती के
अवरोघों के अवगुंठन में उलझ आह के सिसकी के सुर
सन्नाटे की प्रतिध्वनियों के रह जाते हैं साथी बन के
 
सीढ़ी पर धर पांव उतरती रजनी के पग की आहट पा
सोई हुई पीर के पाखी फ़िर से पंख फ़ड़फ़ड़ाते हैं
 
फ़ैली हुई हथेली असफ़ल रह जाती कुछ संचय कर ले
खुलती नहीं दृष्टि द्वारे पर लटकी आगल और साँकलें
अभिलाषा के वातायन पर जड़ी हुईं अनगिनत सलाखें
कर देती हैं पूर्ण असंभव नील गगन में जरा झाँक लें

खुली हवा की पगडंडी पर चलते हुए गंध के राही
कभी कभी तो जानबूझ कर अपनी गठरी खो जाते हैं

गीला करता आंजुरि को आ जब जब नव संकल्पों का जल
तब तब विधना की कलमों से रच जाते हैं नूतन अक्षर
आशाओं के चन्द्रमहल सब, सिन्धु तीर पर बालू वाले
एक घरोंदे जैसे पाकर परस लहर का रहे बिखर  कर

उलझी हुई हाथ की रेखाओं से नक्षत्रों के रिश्ते
जोड़ घटाने, भाग गुणित करने पर सुलझ नहीं पाते हैं

दीप दीपावली के सजें न सजें

दीप दीपावली के सजें न सजें
ये अंधेरे नहीं शेष रह पायेंगे
तुम जरा मुस्कुरा दो प्रिये एक पल
दीप अँगनाई में खुद ही जल जायेंगे

भोर नित ही उगाती रही सूर्य को
सांझ ढलते अंधेरा मगर आ घिरे
अनवरत चल रहे चक्र के आज तक
कोई भी थाम पाया नहीं है सिरे
आओ अब इक नई रीत को जन्म दें
फ़िर न रह पाये मावस अंधेरी यहाँ
मुस्कुराती रहे चाँदनी से सजी
दोपहर सी गली हो सजे नित जहाँ

नागिनी नृत्य से ये निशा के चिकुर
चाँद की रश्मियाँ बन सँवर जायेंगे
तुम जरा मुस्कुरा दो प्रिये एक पल
दीप अंगनाई में खुद ही जल जायेंगे

रोशनी की किरन एक पल न थकी
तम की सत्ताओं से युद्ध करते हुये
तम कुचलता हुआ सिर उठाता रहा
आदि से आज तक यूँ ही चलते हुये
आज रच लें नई नीतियां कर जतन 
जो अंधेरे का बाकी नहीं शेष हो
एक क्षण के लिये भी नहीं रुक सके
शंख से  गूँजकर अब जो जयघोष हो

ये तुम्हारे ही इंगित से संभव प्रिये
पृष्ठ इतिहास के सब बदल जायेंगे
तुम जरा मुस्कुरा दो प्रिये एक पल
दीप अंगनाई में खुद ही जल जायेंगे

कार्तिकी एक तिथि की प्रतीक्षा बिना
दीप के पर्व हर रोज मनता रहे
भोर दीपक जलाये जो कल आ यहाँ
काल के अंत तक यूँ ही जलता रहे
शब्दकोशों से मिट कर तिमिर अब रहे
आओ ऐसे प्रयासों को मिल कर करें
मिट्टियों के नहीं ज्ञान के दीप हम
देहरी पर हर इक ज़िन्दगी की धरें

आंजुरि में सजे आज  संकल्प तो
कुछ असंभव नहीं शेष रह पायेंगे
तुम जरा मुस्कुरा दो प्रिये एक पल
दीप अंगनाई में खुद ही जल जायेंगे

इक गीत नया होने को है

अलसाई सांझ ओढ़ लेती इन दिनों नया ही इक घूँघट
झरते पत्तों में धीमे से बोता रागिनियाँ वंशीवट
अभिसारित अभिलाषायें ले कह उठता है शरदीला पल
ये रात कहाँ सोने को है
इक गीत कोई होने को है.

आता है दूर कहीं गिरती बर्फीली फुहियों का ये  सुर 
सीढ़ी से नीचे उतर रही, पुरबाई के पग के नूपुर 
इनको लेकर के साथ चला आवारा मौसम का पटुवा 
सरगम लगता पोने को है
 इक गीत नया होने को है 

दिन सिकुड़ा सकुचा सिमटा सा ,निशि यौवन की ले अंगड़ाई 
शिंजिनियाँ घोल शिरा में दे, भुजपाशों की ये गरमाई 
पुष्पित शर लिए खड़ा धन्वा , इक  लक्ष्य भेद संधाने है 
अब ध्यान भंग होने को है 
इक गीत नया होने को है 

चंदियाई गोटे का जोड़ा, पहने रजनी की नवल वधू
हाथों की मेहँदी के बूटे, महकाते संदलिया खुशबू
नजरें उठ्ती हैं बार बार वापिस आती हैं पथ को छू
आतुर अपने गौने को है
------------------फ़िर कलम किस तरह मौन रहे
इक नया गीत होने को है.

कुछ आड़ी तिरछी रेखायें

जीवन के कोरे पृष्ठों पर
लिये हाथ में एक पेंसिल
रोजाना खींचा करते हैं
हम सम्बन्धों की रेखायें
कोई आड़ी,कोई तिरछी,
कोई वर्तुल,कोई तिर्यक
कुह लगती हैं निकट,और
कुछ दृष्टि परस भी कर न पायें
 
जाने किस उंगली की थिरकन
खींचेगी रेखायें कैसी
कौन रंग भरता जायेगा
कुछ होंगी खींचे बिन जैसी
कौन उतर जायेगी मन के
कागज़ पर आकर के गहरे
किसकी परिणति होगी केवल
प्रथम बिन्दु पर ही जा ठहरे
 
करता कोई और नियंत्रित
अनदेखे अनजाने इनको
अक्सर यह सोचा करते हैं
कभी पार उसकी पा जायें
 
धुंधलाई सी दिखीं कभी कुछ
कुछ दिखतीं  दर्पण सी उजली
कुछ को घेरे हुए कुहासे
कुछ कौंधी बन बन कर बिजली
कुछ सहसा मिल गईं हथेली
की रेखाओं से अनचाहे
और कई की रही अपेक्षा
हर पल कोई उन्हें सराहे
 
त्रिभुज चतुर्भुज के कोणों से
जुड़ीं, उलझती ज्यामितियों में
लगता है हर बार नया इक
समीकरण ये रचती जायें
 
बान्धे हुए लगा रखती हैं
बनी डोर यह उजियारे की
करती सदा नियंत्रित गतियाँ
सूरज चन्दा की तारों की
उगी   भोर से ढली सांझ तक
जकड़े हुए पलों की गठरी
कभी लगे ये द्रुतगतिमय हैं
कभी कहीं  पर रुक कर ठहरी
 
जब भी हुई अपेक्षा विधु की
बनें विभायें कुछ रेखायें
तब तब अम्बर के कागज़ पर
खिंच  जाती बन कर शम्पायें

अनुबन्ध थे परछाईयों के

सांस का ऋण बढ़ रहा है सूत्र कुछ नूतन बना कर
कम नहीं होता तनिक भी चाहे जितना भी घटायें
 
एक प्रतिध्वनि कान में आकर निरन्तर गूँजती है
चेतना जब चीन्ह न पाती तो परिचय पूछती है
उत्तरों के पृष्ठ कोरे, सामने आकर उभरते
और गुत्थी, गुत्थियों से ही पहेली बूझती है
 
प्रश्न के जब उत्तरों में प्रश्न ही मिलते रहे हों
उत्तरों को उत्तरों की हैं कहाँ संभावनायें
 
गल्प सी लगने लगी हर इक कथा सौगंध वाली
टोकरी, संबंध के धागों बुनी है आज खाली
जो हुए अनुबन्ध, वे अनुबन्ध थे परछाईयों के
उड़ गई कर्पूर बन कर आस ने जो आस पाली
 
रेत के कण आ सजाते हाथ के रेखागणित को
बिन्दुओं के बीच उलझी रह गई हैं कल्पनायें
 
दॄष्टि  को सीमित किये अपराधिनी बाधायें आकर
सरगमों की तान पकड़े मौन हँसता खिलखिलाकर
कक्ष की घड़ियाँ थकीं, विश्रान्तो ओढ़े सो गई हैं
रक्तवर्णी हो रहा एकान्त  का मुख तमतमाकर
 
पंथ पर फ़ैले हुए हैं केश बस तम के  घनेरे
भूल जाते राह सपने, नयन आ कैसे सजायें
 

मेरी आतुर आंखों में हैं

मेरी आतुर आंखों में हैं, रेखाचित्र उन्हीं सपनो के
जिनमें उगते हुये दिवस की धूप खिली रहती सोनहली

अम्बर में तिरते बादल से प्रतिबिम्बित होती कुछ किरणें
रच देती हैं दूर क्षितिज पर सतरंगी इक मधुर अल्पना
जिनमें अंकित हुई बूटियाँ नई कथाये जन्मा करती
उस स्थल से आगे हो जाती जहाँ सहज अवरुद्ध कल्पना

वे अनकहे कथानक मेरी सुधियों के द्वारे पर आकर
अकसर बन जाया करते हैं पंक्ति गीत की मेरे पहली

बदल रहे  मौसम की करवट परिवर्तित करने लगती है
पुरबाई को छूकर, उत्तर दिशि से आती सर्द हवायें
उस पल सिहरे भुजपाशों में  एक सुखद अनुभूति सहज आ
जिसकी अँगड़ाई से जागा करती है< सहस्त्र शम्पायें

मेरी आतुर आंखों में है  चित्र  उसी  की  परछाई  के
जिसके दृष्टि परस की खातिर रहती व्यग्र आस इक पगली

चलते चलते घिरी भीड़ में बढ़ने लगा एकाकीपन
गूंजा करते हैं उस क्षण में मौन हुये सन्नाते के सुर
उनसे बन्धी हुई सरगम की लहरी में अठखेली करते
आरोहों की अवरोहों की सीढ़ी पर चढ़ते दो नूपुर

मेरी आतुर आंखों में हैं झिलमिल करते वे ही नूपुर
जिनको छूते ही मावस की रंगत भी होती रोपहली

चित्र थे जितने

घुल गए परछाइयों में चित्र थे जितने

प्रार्थना में उंगलियाँ जुडती रहीं
आस की पौधें उगी तुड्ती रहीं
नैन छोड़े हीरकनियाँ स्वप्न की
जुगनुओं सी सामने उड़ती रहीं

उंगलियाँ गिनने न पाईं  दर्द थे कितने


फिर हथेली एक फ़ैली रह गई
आ कपोलों पर नदी इक बह गई
टिक नहीं पाते घरोंदे रेत  के
इक लहर आकर दुबारा कह गई


थे विमुख पल प्राप्ति के सब,रुष्ट थे इतने


इक अपेक्षा फिर उपेक्षित हो गई
भोर में ही दोपहर थी सो गई
सावनों को लिख रखे सन्देश को
मरुथली अंगड़ाई आई धो गई

फिर अभावों में लगे संचित दिवस बंटने 

एक गरिमा भरो गीत में

सरगमों की गली से गुजरते हुये रागिनी बो लो संगीत में
शब्द होठों से खुद ही झरें, एक गरिमा भरो गीत में

दिन के अख़बार की सुर्खियाँ
काव्य होती नहीं जान लो
व्यंग से तंत्र के बन्ध को
ध्यान देकर के पहचान लो
दूर कितना चलेंगी कहो
सामने आई तुकबन्दियाँ
काव्य होती नहीं जान लो
राजनीतिक कसी फ़ब्तियाअँ

शब्द अनुप्रासमय छन्द के हों नहाये हुये प्रीत में
मन के तारों को छू ले तनिक, एक गरिमा भरो गीत में

दिन ढला पीर मन में उगी
ओढ़नी सांझ की ओढ़कर
रात नींदे चुरा ले गई
पास एकाकियत छोड़कर
ये व्यथा कितनी दुहरा चुके
अब सँवारो वे अनुभूतियाँ
शून्य से झांकती जो रहीं
कोई दे पाये अभिव्यक्तियाँ

कुछ मिलन, कुछ विरह, अश्रु कुछ, फिर ना उलझो इसी रीत में
शब्द होठों से खुद ही झरें, एक गरिमा भरो गीत में

शब्द जो ढालते छन्द में
अर्थ उनके समझ कर लिखो
दर्पणों में बने बिम्ब से
अक्षरों में उतर कर दिखो
तब ही संप्रेषणा के सिरे
खुद ब खुद सारे जुड़ जायेंगे
गाऒ तुम जो खुले कंठ से
स्वर सभी उसको दुहरायेंगे

चीर  देखो  भरम  दृष्टि के  फर्क दाधि और नवनीत में
स्वर स्वयं आके जुड़ जाएंगे. एक गरिमा भरो गीत में

पल वे असमंजसों के रहे जो कभी

शेख चिश्ती की दरगाह की जालियां
जिनपे लटकी हैं मन्नत भरी डोरियां
रंगभरती हुई आंख के चित्र में
आस को नित्य झूला झुलाती हुई
 
एक चंचल हवा का झकोरा पकड़
करतीं अठखेलियाँ मुस्कुराती हुई
कामना के संवरते हुए पृष्ठ ्पर
शब्द लिखती हैं कुछ गुनगुनाती हुई
 
कर रही प्रज्ज्वलित नैन के गांव में
स्वप्न के दीप ला ला के चौपाल पर
कुछ्ग अपेक्षायें पंकज बनाती हुई
ज़िन्दगी के पड़े शान्त स्थिर ताल पर
 
बरगदों पर बँधे सूत में गुंथ गईं
हाथ की कोई रेखा बनी अजनबी
और शंकाओं से ग्रस्त होने लगे
पल वे असमंजसों के रहे जो कभी

द्वार अजमेर की बुर्जियों के तले  
दे रही दस्तकें चंद  कव्वालियां 
बज रहीं सरगमों से लगा होड़ कुछ 
ताल पर उठ रहे हाथ की तालियां 

एक अरसा हुआ आस के व्योम में 
योन दिलासों की उड़ती पतंगें रही 
आज बीता भले घिर के नैराश्य में 
कल का सूरज खिलायेगा कलियाँ सभी 

रखा एक सिंदूरी पत्थर

 
शहर की उस वीरान गली में जहां हमारा बचपन बीता
अभी तलक  पीपल के नीचे  रखा एक सिंदूरी पत्थर 
 
वो पीपल जिसने सौंपी थी उलझी हुई पतंगें हमको 
जिसकी छाया में संध्या में रंग भरे कंचे ढुलके थे 
जिसकी शाखा ने सावन की पैंगों को नभ तक पहुंचाया 
जिसके पत्रों की साक्षी में शपथों के लेखे संवरे थे 
 
उसकी आंखें अभी तलक भी बिछी हुई हैं सूने पथ पर
शहर की उस वीरान गली में नहीं गूंजते  हैं अब पद स्वर 
 
उस पीपल की बूढ़ी दाढ़ी में उलझी सूतों की डोरी 
जिन्हें मन्नतों ने मावस की छतरी के नीचे बांधा था 
तन पर टके हुए लगते हैं धूमिल वे सब स्वस्ति चिह्न अब
नत  होते शीशों ने जिनको साँझ सवेरे आराधा था
 
 
शेष नहीं है आज किन्तु अब चावल भी आधी चुटकी भर 
किंकर्तव्यविमूढ़ा  है मन  दिन की इस बदली करवट पर 
 
शहर की उस वीरान गली का नक्शे में भे एचिह्न न बाकी
जिसमें फ़ागुन की फ़गुनाहट गाती थी निशिदिन चंगों पर
संझवाती का दिया जहाँ से निशि को दीपित कर देता था
मंत्रों के स्वर लहराते थे मंदिर के गुंजित शंखों पर
 
शह्र की उस वीरान गले एकी याद अचानक यों घिर आई
बिना पते का पत्र डाकिया लाया हो जैसे लौटा कर

ओस की बूँद आ पंखुरी से मिले

यूँ लगा जैसे कल की परीक्षाओं के
प्रश्नपत्रों के उत्तर सभी मिल गये
बीज बोया नहीं एक भी, साध की
क्यारियों में सुमन आप ही खिल गये
साधना के बिना कोई वर मिल गया
प्रार्थना के बिना पूर्ण पूजा हुई
रात की श्यामला चूनरी का सिरा
जड़ सितारे स्वयं आज झिलमिल हुआ
 
आप ऐसे मिले ज्यों मिले ओस की
बूँद आकर किसी पंखुरी से गले
आप ऐसे मिले पूर्व की गोख में
रश्मियाँ ज्यों क्षितिज से मिली हों गले
 
कल्पना ने कभी कल्पना की नहीं
चित्र से आप जीवन्त हो जायेंगे
शब्द जितने बिखर रह गये पृष्ठ पर
आप ही गीत के छन्द हो जायेंगे
नैन की वीथियों में भटकते हुए
दृश्य बन जायेंगे स्वप्न की बाँसुरी
साध यायावरी के किसी लक्ष्य से
जुड़ गई एक अनुबंध की पाँखुरी 
 
दृष्टि के पाटलों पर घिरे जो हुए
वे कुहासे सभी एक पल में ढले
आप ऐसे मिले ज्यों मिले ओस की
बूँद आकर किसी पंखुरी से गले
 
द्वार देवालयों के खुले आप ही
एक प्रतिमा स्वयं अवतरित हो गई
स्वप्न ने स्वप्न में जो संजोई कभी
एक घटना सुखद वह घटित हो गई
बिन तपस्या उतर आई भागीरथी
बिन अपेक्षा दिया सिन्धु ने रत्न ला
शतगुणित सत्य बन सामने आ गया
कल्पना का तनिक जोकि अनुमान था
 
यूं लगा पूर्व के संचयित पुण्य सब 
सामने आ गए एक पल में फले 
आप ऐसे मिले ज्यों मिले ओस की
बूँद आकर किसी पंखुरी से गले
 
लोह का एक टुकड़ा परस पारसी
पा अनायास जैसे कि कंचन हुआ
एक सूखा हुआ तॄण पड़ा भूमि पर 
गंध में डूब कर जैसे चन्दन हुआ
मौसमों की हुई चूनरी फागुनी
दोपहर में गगन दीप जलने लगे
दक्षिणांगी हुए नभ के नक्षत्र सब 
साँझ की चौघड़ी में संवरने लहे 

हर लहर हो गई यूं तरंगित तनिक 
जैसे डोली किसी नवदुल्हन की चले
आप ऐसे मिले ज्यों मिले ओस की
बूँद आकर किसी पंखुरी से गले 

एक अनपढ़ी किताब


जीवन का जो अर्थ सिखाती रही एक अनपढ़ी किताब
इसीलिये मुर्झाये खिलने से पहले ही सभी गुलाब

पांखुर पांखुर हो छितराये हाथों में थामे गुलदस्ते
रही टूटती उंगली छूकर उड़ती हर पतंग की डोरी
राहें रहीं बिछाती पग पग पर लाकर के भूलभुलैय्या
मावस की रातें किस्मत में लिये आस की रही चकोरी

होकर प्रश्न उगे क्यारी में सभी अंकुरित किये जबाब
जीवन के जो अर्थ सिखाती रही वही अनपढ़ी किताब

जितनी पढ़ी किताबें सब थी केवल गल्प कथाओं वाली
सपनों वाले राज कुंवर थे निश्चित किये हुये शहजादी
बंधे हथेली की रेखाओं से  सूरज  चन्द्रमा  सितारे
हो जाती मलयजी जहां पर उठती हुई भयंकर आंधी

निशि  वासर के चक्र जहां पर डाल सकें न कोई दबाब
ऐसे स्वप्न नहीं दिखलाती रही एक अनपढ़ी किताब

हम हैं क्या, है चाह हमारी क्या ये नहीं जानने पाये
रहे खोजते सिर्फ़ उसी को जिसका न मिल पाना तय था
कफ़न ओढ़ कर सोई पूनम के आने का स्वप्न सजा कर
आंजुरि में भर ली वे रातें जिनमें स्वाद पराजय का था

चाह दिखें शफ़्फ़ाक सूरतें ओढ़े रहते किन्तु नकाब
छुई नहीं पर करें शिकायत, रही एक अनपढ़ी किताब

परछाइयों भ्रम बन हमें बहका रही हैं

अब नहीं उपलब्धियों के वृक्ष पर आती बहारें
अब नहीं पौधें प्रयासों की पनपती क्यारियों में
भीगती है अब नहीं संकल्प के जल से हथेली
आस बोई पल्लवित होती नहीं फुलावारियों में
 
बढ़ रहा है  धुंध की परछाई का विस्तार केवल
और निष्क्रियता,घटाएं व्योम से बरसा रहीं हैं
 
छाप जो भी पंथ पर छोडी कहीं भी थी पगों ने
उग रहे उनमें अगिनाती झाड़ियों के वन कंटीले
जिस किसी भी नीड़ से आशीष आश्रय का मिला था
हम उसी को ध्वस्त करते खिलखिलाते हैं हठीले
 
हो पराश्रित हम रहे, स्वीकारते लेकिन नहीं हैं
दंभ की भ्रामक ऋचायें बस हमें उलझा रही हैं
 
हम बने बैठे स्वयं ही तीसरा वह नेत्र शिव का
ध्वंस के ही चित्र बनते आये जिसके पाटलों पर
चक्रवातों की परिधि पर कांपते रहते सदा हम
चाहते हैं नाम बरखा के सुहाने बादलों पर
 
हम कभी  सद्भाव की चूमे नहीं हैं गंध फ़ैली
किन्तु कहते हैं हमें अनूभूतियाँ तरसा रही हैं
 
थरथराते हैं परस यदि चांदनी का मृदु मिले तो
और यदि पुरबाइयों का छोर कोई बांह छू ले  
तारकों की छांह आ भुजपाश में हमको भरे जब
होंठ पर आ जाएँ जब भी  आप ही कुछ गीत भूले 

हम स्वयं पहने अनिश्चय के घने लम्बे लबादे
कह रहे परछाइयों भ्रम बन  हमें बहका रही  हैं 

कब संभव है

आशाओं के अवशेषों से सजे हुए खँडहर के वासी
कब संभव है चन्द्रमहल के जा कर द्वारों को छू आयें

घिस घिस कर हाथों की धुंधली होने लग जाए रेखाएं
दिन उगते ही रातों के हाथों की कठपुतली हो जाएँ
कंगूरों पर जा कर अटकीं अभिलाषा की चढ़ती  बेलें
पलक झपकते हरी दूब की अंकशायिनी आ बन जाएँ
 
जब नाविक की पतवारें ही ले जायें मंझधार नाव को
तब कब संभव थके पथिक के पांव नीड़  को छूने पायें
 
जब सूरज का रथ रातों के जंगल में जाकर के खोये
माली खुद गुलाब की क्यारी में लाकर बबूल को बोये
सगर वंशजों की विनती पर अम्बर से उतरी धारायें
भूल अपेक्षित, बहती गंगा में अपने हाथों को धोयें
 
जिन होठों पर चढ़ते चढ़ते शब्द स्वयं ताले जड़ता हो
उन अधरों पर कब संभव है गीत नये आकर सज पायें
 
कान्हा के कर की बांसुरिया अपनी ही सरगम को निगले
आगत के पृष्ठों पर अंकित हो जायें आकर सब पिछले
विक्रेता बन कर मेले में लिये खोमचा जाने वाला
क्रेता के हाथों अपने सौदे के सँग सँग खुद भी बिक ले
 
तब कब संभव अंगारों  के पथ पर चलती हुई मोम की
गुड़ियायें अपना पूरा कद, पहले के जैसा रख पायें

तुम पर निर्भर

मैंने तो शब्दों में अपने मन के भाव पिरोये सारे
तुम पर निर्भर, तुम जो चाहो वो ही इनका अर्थ निकालो
 
लिखता हूँ मैं शब्द हवा के झीलों में ठहरे पानी के
और पलों के जिनमें पाखी उड़ने को अपने पर तोले
तुम सोचो तो संभव वे पल होलें किसी प्रतीक्षा वाले
तुम चाहो तो हवा कुन्तलों की झीलें नयनों कि होलें
 
शब्द उच्छ्रुन्खल आवारा हैं इधर उधर भटका करते हैं
तुम पर निर्भर तुम चाहो तो गीत बना कर इनको गालो
 
मेरे शब्द गुंथे माला में फूलों की लिख रहे कहानी
तुमको उनमें पीर चुभन की दिखी और हो जाती गहरी
शब्दों ने था लिखा झुका है मस्तक कोई देवद्वार पर
तुमने ढूंढा करूँ प्रार्थना सुनती नहीं मूर्तियाँ बहरी
 
शब्द शब्द में प्रश्न छुपे हैं शब्द शब्द में उनके उत्तर
तुम पर निर्भर उत्तर ढूंढों या प्रश्नों को कल पर टालो
 
मेरे स्वर की,अभिव्यक्ति की  सीमाएं कुछ तुमसे कम हैं 
मैं अपने खींचे वृत्तों में रह  जाता  हूँ होकर बंदी
तुम पर निर्भर, तुम मेरी अभिव्यक्ति उड़ा ले जाओ नभ में
तुम चाहो तो शब्द न रहें तनिक भावना के सम्बन्धी
 
अधरों पर मेरे जो आईं बातें, तुम चाहो तो फिसलें
तुम पर निर्भर, तुम चाहो तो सरगम देकर इन्हें सजा लो

बढ़ती रहीं नित्य बस यही अपेक्षाएं

मुझे विदित हैं अपनी सारी सीमाएं
और तुम्हारी बढ़ती हुई अपेक्षाएं

बच्चे सी जिद चन्दा मुट्ठी में पकड़ें
आसमान को अपनी बाहों में जकड़ें
बहती नदिया पार करें जल पर चल कर
उड़ें क्षितिज के पार  समय को पल पल कर

मरुथल पर बादल बन बरखा बरसायें
यही तुम्हारी मुझसे रही अपेक्षाएं

दूरी के प्रतिमान परों में बंध जाएँ
भंवरे बात तुम्हारी ही बस दोहरायें
कलियों की मुस्कानों से सज रहती हों
हम दोनों की दूरी में आ संध्याएँ

निशा सदा ही चंद्रज्योत्सना बिखराएँ
बढ़ती रहीं नित्य बस यही अपेक्षाएं

जो कि असंभव रहा वही हो ले संभव
दिखने से पहले सपने हो जायें सच
अभिलाषा  का द्वार स्पर्श हो पारस का
चले इशारे ही पाकर सूरज का रथ

हवा करे संचय, ना कुछ भी बिखरायें
रही ज़िन्दगी से भी यही अपेक्षायें

रहा खींचता रह रह परदे

जोवन के इस रंगमंच पर हम  थे रहे व्यस्त अभिनय में
कोई डोरी थाम पार्श्व से रहा खींचता रह रह परदे

यद्यपि बतलाई हमको थी गई भूमिका विस्तारों में
और रटाये गए वाक्य वे, जो सब हमको दुहराने थे
एक एक पग नपा तुला था बँधा मंच की सीमाओं में
और भंगिमायें व्याख्यित थीं जिनमें शब्द रंगे जाने थे

रहा खेलता सूत्रधार पर लिए हाथ में अपने पासे
उसकी मर्जी जिस मोहरे को जैसे चाहा वैसे धर दे

देता था संकेत हमें कोई नेपथ्य खडा  तो होकर
रहा  निगलता बढ़ता हुआ शोर लेकिन सारी आवाजें
द्रश्य  दीर्घा से ओझल हो रहे मंच के तले पंक्ति में
रही  मौन की सरगम बजती सजे हुए  सारे साजों में

अंक बदलते रहे किन्तु हम परिवर्तन को समझ न पाए
रहे ताकते निर्देशक कोई फिर आकर नूतन स्वर दे

प्रक्षेपण से जहां हुआ तय ज्योतिकिरण होना संकेंद्रित
वहां परावर्तन करने को प्रिज्मों ने आकार ले लिया
बिखरी हुई पटकथाओं के मध्य एक गति दे देने का
निर्देशक ने नूतन निर्णय बिना किसी को कहे ले लिया

आतुर होकर रहे ताकते, फिर से जो अभिनीत हो सके
ऐसा कोई नया कथानक फिर लाकर हाथों में धर दे

सिकता छूने में असमर्थ रह गई

झाड़े लगवाये,मजार पर चादर नित्य चढ़ाईं जाकर
गंडॆ मंतर ताबीजों से सारे देवी देव साध कर
तुलसी चौरे दीप जलाये, बरगद की देकर परिक्रमा
दरगाहों की जाली पर रेशम के डोरे कई बाँध कर

थे निश्चिन्त मंज़िलें पथ के मोड़ों तक खुद आ जायेंगी
पर पगतली राह की सिकता छूने में असमर्थ रह गई

उमड़े हुए मेघ जितने भी आये थे चल चल कर नभ में
उनकी गागर रीती की रीती ही भेज सका  रत्नाकर   
तॄष्णाओं को रही सींचती जलती हुई तृषा अधरों की
आता हुआ सावनी  मौसम गया प्यास फ़िर से दहका कर

हवा वारुणी आईं थी तो लेकर लुटी हुई इक गठरी
जली हुई कंदीलें सारी आशाओं की व्यर्थ रह गईं.

सपनों के अंकुर उग आयें बोये बीज एक क्यारी में
मन की, सौगन्धों के सम्मुख सम्बन्धों से रखा सींच कर
लेकिन उगीं नागफ़नियाँ ही  सभी अपेक्षायें ठुकरा कर
दृश्य न बदला चाहे जितना देखा हमने पलक मींच कर

था मतभेद सारथी-अश्वों में बासन्ती मौसम रथ के
सभी चेष्टायें सहमति की करते करते तर्क रह गईं

खुलते हुए दिवस की खिड़की नहीं कर सकी कुछ परिवर्तित
चुरा ले गया किरणें सारी, जाता हुआ भोर का तारा
संध्या ने छत पर रांगोली लेकर काजल जो पूरी थी
उसका रंग बदल न पाया.चढ़ कर कोई रंग दुबारा

खिंची हुईं रेखा हाथों की  हर संभव कोशिश ठुकरा कर
समय पृष्ठ पर शिला लेख बन,बिन बदले कुछ अर्थ रह गईं

किस इंतजार में


खोया  है किस इंतजार में असमंजस में उलझ रहे मन
तू है नहीं शिला कोई भी जिस पर पड़ें चरण रज आकर
 
विश्वामित्री साधें लेकर तूने कितना अलख जगाया
अभिलाषा का दीप द्वार पर निशि वासर बिन थके जलाया
यज्ञ धूम्र ने पार कर लिया छोर सातवें नभ का जाकर
आस शिल्प को रहा सींचता, पल पल तूने नीर चढ़ाया
 
डोला नहीं किन्तु इन्द्रासन सुन  कर अनुनय भरी पुकारें
आई नहीं मेनका कोई तुझ पर होने को न्यौछावर
 
अपने आप बदलती कब हैं खिंची हुई हाथों की रेखा
बैठा है किस इंतजार में, होगा नहीं कोई परिवर्तन
करना तुझको अनुष्ठान से आज असंभव को भी संभव
तेरे द्वारे आये चल कर खुद ब खुद जय का सिंहासन
 
लड़ कर ही अधिकार मिला करता, समझाया इतिहासों ने
थक जायेगा मीत कौरवी साधों को समझा समझा कर
 
अपनी तंद्रा तोड़ याद कर तू कितना सामर्थ्यवान है
तू निश्चय करता है, सागर आकर के कदमों में झुकता
तेरे विक्रम की गाथायें स्वर्णाक्षर में दीप्तिमयी हैं
महाकाल का रथ भी तेरा शौर्य देखने पल भर रुकता
 
नभ के सुमन सजाने को आ जायेंगे तेरी अँगनाई

उन्हें तोड़ने को संकल्पित ज्यों ही हो तू हाथ बढ़ाकर

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...