वाशिंगटन में २३ अप्रेल की सुबह



आज  तेईस अप्रेल   की ये सुबह
ओढ़ कर जनवरी थरथराने लगी
सर्द झोंकों की उंगली पकड़ आ गई
याद इक अजनबी मुस्कुराने लगी 

बादलों की रजाई लपेटे हुये
रश्मियां धूप की कुनमुनाती रहीं
भाप काफ़ी के मग से उमड़ती हुई
चित्र सा इक हवा में बनाती रही
हाथ की उंगलियां एक दूजे से जुड़
इक मधुर स्पर्श महसूस करती रहीं
और हल्की फ़ुहारें बरसती हुईं
कँपकँपी ला के तन में थी भरती

 
गाड़ियों की चमकती हुई रोशनी
कुमकुमे से सड़क पे बिछाने लगी

 

रात सोये थे जो चाँदनी चूम कर
फूल जागे नहीं नींद गहरी हुई
दिन चढ़ा ये तो आकर घड़ी ने कहा
धुप लेकिन न पल भी फरहरी हुई हुई
एक ही चित्र प्राची ने खींचा था जो
वो प्रतीची तलक था बिखर तन गया
सांझ के नैन की काजरी रेख में
क्या धरा क्या गगन, सब का सब रँग गया

 

एक महीना हुआ आये ऋतुराज को
कहते  तारीख थी मुँह चिढ़ाने लगी

 

याद आने लगे शाल स्वेटर सभी
पिछले वीकऎंड पर थे उठा रख दिये
द्वार को खोल पेपर उठाया जरा
शीत ने मुख पे चुम्बन कई जड़ दिये
जल तरंगों सी धुन दांत ने छेड़ दी
रोम सब सिहरनों ने लगा भर दिये
कल का सूरज जरा गर्म हो जायेगा
आस बस एक ये ही सजा चल दिये

 

मेरे इंगित पे बस है तुम्हारा नहीं
बोल कर ये प्रकृति खिलखिलाने लगी



 

शब्द अधर से परे रह गये

जितने भी थे शब्द अधर के गलियारे से परे रह गये
लहरों के सँग बहे नहीं सब दीप किनारे खड़े रह गये
 
सुर ने तो सरगम को भेजा सांझ सवेर स्नेह निमंत्रण
किन्तु हठी रागिनियों के था हुआ नहीं मन का परिवर्तन
बिना टिकट वाले पत्रों से, सब सन्देश लौट कर आये
सुर को सम्भव हो सका वह शब्द राग में बोकर गाये
 
ले सका नव पल्लव सूखी शाखा पर फिर से अँगड़ाई
एक बार जो फ़िसल गिरे वे पत्र झरे के झरे रह गये
 
अभिलाषित रह गया तिमिर के घने घिरे व्यूहों में बन्दी
गिरा लड़खड़ा भाव वही जिसने चाहा होना स्वच्छन्दी
बन्धी हुई माला के मनके एक एक कर सारे बिखरे
और व्याकरण नित्य कलम से कहती रही और मत लिख रे
 
उठे हाथ थे लिये कामना अक्षयता का वर पाने को
लेकिन आराधित के आगे सिर्फ़ जुड़े के जुड़े रह गये
 
रही तूलिका बंदी कर में छुअन कैनवास की पाई
रंगपट्ट को निगल चुकी है कोई धुंधली सी परछाई
चित्र नयन की दीवारों ने टांका नहीं एक भी अब तक
अंधियारे ने निगल रख लिया इन्द्रधनुष का पूरा सप्तक
 
शब्द , रंग, चित्र सभी ने रखी बढाये मन से दूरी
और फ्रेम में कोरे कागज़ ही बस केवल मढे रह गए

तुम सपनो मे आये क्यों थे

बहती हुई भावनाओं के
प्रश्नो की इक भूलभुलैय्या
असमन्जस के तागे बुनती
रह रह कर ये पूछ रही है
अगर ना साथ भोर तक का था
तुम सपनो मे आये क्यों थे
 


बैसाखी से जोड़ जोड़ कर
पाले हुये रखी अधरों पर
कंठहार कलशी के अटकी
टँक कर रही हुई ईंडुर पर
प्यास धार के तृषित अधर की
सावन से यह पूछ रही है
अगर कोष नीर का था ्सँग
नभ पर बादल छाये क्यो थे

 
मन की गंगोत्री से उमड़ा
हुआ भावनाओं का निर्झर
शब्दों में ढल जाया करता
संप्रेषण की आशा लेकर
छन्दों की धारा में बहता
शुर के तट से पूछ रहा है
अगर नहीं अनुभूत किये तो
गीत कहो ये गाये क्यों थे

 
अरुणाई के रंगों से रँग
भोर सांझ के दो वातायन
राग असावर से जयवन्ती
का वंसी पर होता गायन
सर्गम की उंगली को छोड़े हुये
स्वरों सेपूछ रहा है
अगर नहीं अवरोह ग्राह्य तो
फिर आरोह सजाये क्यों थे

भोर हो गई

संध्या के बस्ते से पीली
दो नम्बर की पेन्सिल लेकर
किया गगन के नीले पन को
श्यामल उसका सुरमा घिस कर


और शरारत से मुस्का कर
रजनी हौले से यों बोली
देखूँ कैसे जीते मुझसे
ऊषा खेले आँख मिचौली


लेकिन ऊषा ने पेंसिल के
पीछे लगे रबर को लेकर
मिटा दिया सुरमाये पन को
प्राची की चौखट से घिस कर


दरवाजे की झिरी खोल कर
किरण झाँकती इक यह बोली
जीतेगी हर बार उषा ही
कितनी खेलो आँखमिचौली


कुहनी के धक्के से लुढ़की
मेज रखी पानी की छागल
छितराई बन ओस भोर की
खोल निशा की मोटी साँकल


हार मान रजनी ले गठरी
अपनी फिर कर गयी पलायन
भोर हो गई लगा गूँजने
नदिया तट पाखी का गायन.

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...