मदिरा भरती है सुधियाँ की साकी

 कहने को तो सब कुछ ही है फिर भी मन रहता एकाकी
सुबह शाम पीड़ा की मदिरा भरती है सुधियाँ की साकी

आइना जो दिखे सामने उसके चित्र   मनोहर   सारे
पार्श्व पुता है किस कालिख से दिखता नहीं किसी को पूरा
कौन देखता सूख सूख कर प्रक्रिया दर्द सहन करने की
ध्यान रहा सरगम बिखराती धुन पर बजता हुआ तम्बूरा

कितनी है मरीचिका सन्मुख उपलब्धि का नाम ओढ़कर
लेकिन सच है स्थूल रूप में कोई एक नहीं है बाकी

सूखे हुए धतूरे पाये सुधा कलश का लिए आवरण
राजपथो से विस्तृत मन पर चिह्न नहीं कदमो का कोई
रही मुस्कुराती कलियां तो शोभा बनी वाटिकाओं  की
जान सका पर कौन पास की गंध कहाँ पर उनकी खोई

रिमझिम को आनंदित होकर रहे देखते देहरी अंगना
सोचा नहीं किसी ने प्राची से ना किरण अभी तक झांकी

इतिहासों में भी अतीत के अंकित नहीं शब्द कोई भी
जिसके लिए बना सीढ़ी मन, वो बढ़ चुका शीर्ष से आगे
संचित जितना रहा पास की छार छार होती गठरी में
दिन के हो गतिमान निमिष सब साथ उसे ले लेकर भागे

सूनी पगडंडी के जैसे बिखरी हुई उमर की डोरी  
कहीं नहीं है दूर दूर तक पगतालियों की छाप जरा भी
२६ अगस्त २०१८ 

हम बिल्कुल स्वच्छन्द नहीं है

कहने को तो लगा कहीं पर कोई भी प्रतिबन्ध नहीं है
लेकिन जाने क्यों लगता है हम बिल्कुल स्वच्छन्द नहीं है
 
घेरे हुए अदेखी जाने कितनी है लक्ष्मण रेखायें
पथ में पसरी पड़ी हुईं हैं पग पग पर अनगिन झंझायें
पंखुरियों की कोरों पर से फ़िसली हुई ओस की बून्दें
अकस्मात ही बन जाती हैं राह रोक उमड़ी धारायें
 
हँस देता है देख विवशता मनमानी करता सा मौसम
कहता सुखद पलों ने तुमसे किया कोई अनुबन्ध नहीं है
 
बोते बीज निरन्तर,नभ में सूरज चाँद नहीं उग पाते
यह तिमिराँगन बंजर ही है,रहे सितारे यह समझाते
मुट्ठी की झिरियों से निश्चय रिस रिस कर बहता जाता है
भग्न हो चुकी प्रतिमा वाले मंदिर जाते तो क्या पाते
 
जो पल रहे सफ़लता वाले, खड़े दूर ही कह देते हैं
पास तुम्हारे आयें क्योंकर,जब तुमसे सम्बन्ध नहीं है
 
परिभाषित शब्दों ने जोड़े नहीं तनिक परिचय के धागे
जो था विगत बदल कर चेहरे आकर खड़ा हो गया आगे
विद्रोही हो गये खिंचे 
थे 
 आयत में जो बारह खाने
और द्वार को रही खटखटा,सांस सांस मजदूरी मांगे

बगिया में रोपे थे हमने बेला जूही और चमेली
पर उग पाये फूल वही बस जिनमें कोई गंध नहीं है
 

ज्यों ज्यों होती जाती शाम

मन की कस्तूरी भटकाती तृष्णा को गति में आभिराम

सिसका करती किन्तु अपेक्षा ज्यों ज्यों  होती जाती शाम

चातक सी अभिलाषा हर दिन फैलाती है अपने डैने 
सावन के मेघों के जैसी छा जाती है दॄष्टि  गगन पर 
सहज नकारा करती अपने क्षमताओं की सीमित मुट्ठी 
दिवास्वप्न बुनती है, रखती पाँव एक भी  तो न भू पर 

इक मरीचिका में उलझे ही पूरा दिन तो कट जाता है 
मन मसोस अभिलाषा  रहती ज्यों ज्यों होती जाती शाम 

सम्बन्धो की छार छार चूनर के टुकड़े चुनते चुनते
सोचा करती  शायद फिर  से कल लहराये खुली हवा में
चित्र विगत की परछाई का नही उतरता दीवारों से
अटका रहता ध्यान उसी में धूमिल रेखाओं को थामे

तोड़ दम गिरी आशाओ को करता  नही कोई सम्मानित 
बुझने लगती सकल अपेक्षा ज्यो ज्यो होती जाती शाम 

हो अधीर अकुलाहट बढ़ती जाती दिन के चढ़ते चढ़ते
लेकिन चाहत के ख़ाकों में रंग नहीं भर पाता कोई 
चाहत तो बढ़ती है पर क्या चाहत है ये समझ न आता
बनती हुई रूपरेखाएँ रह जाती है ख़ुद में खोई 

कटते जाते जीवन के पल हर दिन ऐसे ही गुमनाम
और निराशा गहराती है ज्यों ज्यों होती जाती शाम 

आज का din

चलो आज का दिन भी बीता

कुछ परिवर्तन हुआ नही था
जैसा कल था आज वही था
चित्र बना इक टंगा हुआ था

कल जैसे
आशा का घट फिर रहा आज भी रीता

रही ताकती डगर राह को
भूली भटकी एक निगाह को
साथ लिये इक बुझी चाह को 

रही प्रतीक्षा 
लिए आज फिर से वनवासिन सीता

वही धूप बीमार अलसती
नीरवता रह रह कर हंसती
पत्ती तक भी एक न हिलती

इतिहासों का
अंकित घटनाक्रम था फिर से जीता
चलो आज का दिन भी बीता


कितनी बार जलाए

  कितनी बार जलाए हमने अपनी आशाओं के दीपक   सोचे बिना तिमिर का खुद ही हमने ओढ़ा हुआ आवरण   कल की धूप बनाएगी अपने आँगन में रांगोली ...