तीर लगता आज सूना

इस समय के सिन्धु का क्यों तीर लगता आज सूना
हर लहर परिचय समेटे साथ अपने बह गई है

दूर तक उच्छल तरंगो की छिड़ीआलोड़नायें
हर घड़ी पर कर रहीं झंझाओं का सर्जन निरन्तर
चक्रवातों से घिरे अनगिन भंवर चिंघाड़ते हैं
रोष का विस्तार बढ़ता जा रहा नीले गगन पर

पर यहां तट पर बिछी हैं शून्य की सिकतायें केवल
जो कि चर्चा क्षेत्र से अब हाशियों सी कट गई है.

फेनिली अंगडाइयो में थम गए जो पल सिमट कर
आइना बन कर दिखाते घिर गया एकांत दूना
सीपियों के साथ कितने शंख  सौपे ला लहर ने
किन्तु सब का साथ पा भी तीर लगता आज सूना 

अब करीलों   के सरीखी  नग्न हैं सारी दिशाएँ ​
​रोशनी करती कभी जो पत्तियां  वे झर  गई हैं ​

वर्ष बीते है अगिनती सिंधु के इस तीर पर से
धूल चुके है पर पगों के स्पर्श। के भी चिह्न सारे
ना विगत, ना आगतों का दीप कोई बालता अब
इक अधूरी सी प्रतीक्षा कर रहे सूने किनारे

साँझ की बढ़ती हुई निस्तब्धता आ मौन स्वर में
तीर लगता आज सूना गुनगुना कर कह गई है 

अर्पित है गीतों का चन्दन

नतमस्तक हूँ मात शारदे
स्वीकारो मेरा कर वंदन
तुमसे पा आशीष ,तुम्हे ही
अर्पित है गीतों का चन्दन

उदित सूर्य की प्रखर रश्मियाँ
माँ,
भर ​
दो मानस में मेरे
जागे भाव ह्रदय में, उगते
गहन निशाको चीर सवेरे
ज्योतिकलश को छलका दे दो
नूतन शब्द मुझे आंजुरि भर
स्वर के दीपक बालो,छंट लें
अज्ञानों के घने अँधेरे



मनसा वाचा और कर्मणा
अंतस करता है अभिनन्दन
तुमसे पा आशीष तुम्हे ही
है अर्पित गीतों का चन्दन

आदि स्वरों की अधिष्ठात्री
अपनी वीणा को झनकारो
नए भाव दो नए शब्द दो
नवल ऊर्जा को संचारो
सौप कल्पना को परवाज़
उड़ने को नूतन  वितान दो
कहा अनकहा व्यक्त हो सके
अनुभूति कुछ और निखारो

हंसवाहिनी बिखराकर स्मित
दीपित कर दो जन गण का मन
तुमसे पा आशीष समर्पित
तुमको ही गीतों का चन्दन

शतदल कमल पाटलों पर जो
अंकित कविता की परिभाषा
करो प्रकाशित उसे, बुझ सके
आतुर मन की ज्ञान पिपासा
करमाला में हुई अनुस्युत
मंत्रसू्क्तियों को बिखरा दो
पुस्तकधारिणी पृष्ठ खोल कर
पूरी कर दो हर जिज्ञासा


भाषा स्वरा अक्षरा माते
स्वीकारो अनुग्रहिती अर्चन
तुमसे पा आशीष समर्पित
तुमको गीतों का
व्रुन्दावन

ढूँढती मुस्कान मेरी

नींद में भी जाग में भी रात में या हो उजाला
 जानता हूँ एक तू थी  ढूँढती मुस्कान मेरी

उम्र के इस मोड़ पर मैं हो रहा खुद से अपरिचित
रह गया हूँ वृक्ष में उलझी पतंगों के सरीखा
‘कौंधती हैं दामिनी बन कर वही बातें पुन: अब
थी सिखातीं ज़िन्दगी में राह चुनने का सलीका

तू सखा थी, तू गुरू थी, तू रही आराध्य मेरी
दूर तुझसे खो गई इस मोड़ पर पहचान मेरी

जानता है कौन उसका मोल जो उपलब्ध हर पल
दूरियों से बोध होती कीमतें सान्निध्य पल की
आज पूरी भौतिकी है एक उस पल पर निछावर
जिस घड़ी में गोद तेरी सहज मेरे पास में थी 

आज उस मृदु छाँह से वंचित हुई सुधियाँ तरसती
दूर तक फ़ैली हुई हर राह है सुनसान मेरी

खींचती बीते पलों की उंगलियां वापिस ह्रदय को
फिर उन्ही खोई हुई अमराइयों में लौट जाये
और फ़िर ममता भरे आकाश की ओड़े दुशाला
लोरियों की सरगमों में जाये फिर डुबकी लगाये

ज़िन्दगी को फिर रदीफ़ो-काफ़िये का मिल सके क्रम    
चाह  है  फिर  से  बने  तू  गज़ल का उन्वान मेरी


साधना संकल्प श्रद्धा और निष्ठा के सुमन पल
उग गए जो क्यारियों में उम्र की रंग आस्था से
प्रेम और सौहार्द में डूबा हुआ आदर परस्पर
और सीमाये जुडी संतुष्टि की हर कामना से

संस्कृतियों की प्रणेता और शिक्षक ज्ञान की तू
गीतमय  गोविन्द तू ही आन  तू ही  शान मेरी


माँ ! अशेष है वन्दन तेरा

अनुमति मिले तुम्हारी तो मैं


अनुमति मिले तुम्हारी तो मैं शब्दों को सीमा के आगे
सन्दर्भों में ले कर जाऊं, तुम पर नया गीत लिख डालूं

जुड़ा चेतना का हर इक क्षण रक्त-पीत वर्णी आभा से
ज्वालामुखियों के लावे सी तन की कांति बिखेरे जिसको
अनुबन्धों की जड़ें अंकुरित हो जाती जब अकस्मात ही
मैं अन्वेषित करूं आज उन भावों की कुछ व्याख्याओं को

सौगन्धें जोड़ा करती हैं मानस के जो कच्चे धागे
उनको मैं जंजीर बना कर एक नई ही रीत बना लूँ

पुष्प, ओस, पुरबाई मधुबन या बहती नदिया का धारे
इन सबके   आगे भी तो हैं उपमायें जो रहीं अनछुई
सोच रहा विस्तार बढ़ा दूं आज लेखनी की थिरकन का
और शिल्प दूं उसको कह ना पाई जो कुछ घड़ी संशयी

चलते हुये वक्त की सुईयों की टिक टिक की पदचापों को
गतिमय हुआ निरन्तर अपने जीवन का संगीत बना लूं

दोपहरी हो या कि रात का ढलता हुआ आखिरी हो पल
एकाकीपन को परिभाषित करूं मिलन की कुछ घड़ियों में
सूनेपन के सन्नाटे को दर्पण कर के कभी निहारूँ
अनगिन चित्र नजर आते हैं बिखराई इन वल्लरियों में

अर्थ शब्द के बदला करते करवट लेते हुये समय मे

इसीलिये मं आज अपरिचय को ही मन की प्रीत बना लूं

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...