श्वास जन्म भर महके


मौसम की फगुनाहट  बिखरी
चैती ने छेड़ी सारंगी
धानी चूनर उड़े हवा में
मन पाखी बन चहके

झूम उठी पूरी फुलवारी करते अगवानी मधुपों की
कलियों ने लज्जा का घूँघट हौले हौले खोला
बासंती साड़ी में लिपटी पुरवा ने पायल खनकाई
मद्दम स्वर में कचनारों से बेला खुसपुस बोला

झुरमुट में बोगनबलिया​ ​के
खुलकर के निशिगंध यूँ हंसी
सम्मोहित गतिमान समय की
श्वास जन्म भर महके

नन्हे अंकुर हरी दूब  के पलक मिचमिचा जागे
गौरेय्या ने पंख फड़फड़ा रह रह इन्हें दुलारा
फुनगी ने आवाज लगा कर अपने पास बुलाया
लगा गूंजने दूर कहीं पर भोपा का इकतारा

जमना की रेती में चमके
फागुन की पूनम के तारे
संदल की सुवास लहराई
आज हवा में बह के

खलिहानों में पके धान की स्वर्णिम झाँझर खनके
अभिलाषा के बादल उमड़े हुए व्योम पर छा​ये ​
चौपालों पर थाप चंग की, सारंगी  से मिल कर
उड़ी उमंगो की सरगम से झूम झूम बतियाए 

​जड़ी उमंगों​ की ​चूनर में
रक्तिम आभा गुलमोहर की
और आँच यौवन की लेकर
हैं पलाश वन दहके 

अनहोनी कुछ हुई

 

  

अनहोनी कुछ हुई 

 

उषा ने लिख दिया शब्द इक

नील गगन के कोरे पट पर 

प्राची का अध्याय खुला इक 

पीत रक्त से वर्ण सजा कर 

 

आँख मसलते हुये  भोर ने

जल तरंग से हाथ पखारे

कुछ बूँदें उड़ चली हवा में

खुले देव मंदिर के दवारे

 

लगी गूंजने शंखों की ध्वनि 

दीपशिखा में ज्योति भर गई 

आकर फूलों की पंखुरियाँ 

प्रतिमा पग पर आप चढ़ गईं  

 

मलय गंध की साड़ी पहने

इठला कर चल दी पुरवाई 

अनहोनी कुछ हुई लजा कर

अपने में सिकुड़ी अरुणाई

 

एक वृक्ष के वातायन से 

नन्हे पाखी ने नभ देखा

और उड़ चला पंख पसारे

पढ़ लेने को दिन का लेखा 

 

पीछे पीछे चले धूप के

सोनहली रंगों के धागे

पगडंडी से राजपथों तक 

पदचापों के स्वर फिर जागे 

 

चढ़ते हुए दिवस के संग संग 

जीवन की गति तीव्र हो गई

पता नहीं चल पाया किस पल

धूप उतरते हुए ढल गयी

 

संध्या के साजों पर थिरकी

चँदियाई रजनी की पायल

अनहोनी यूँ हुई आज का 

दिन, सहसा  हो बैठा है कल 

कोई भी गंध नहीं उमड़ी

  कोई भी गंध नहीं उमड़ी  साँसों की डोरमें हमने, नित गूँथे गजरे बेलकर लेकिन रजनी की बाहों में कोई भी गंध नहीं साँवरी नयनों में आंज गई सपने ज...