घिरता है अंधियारा







उषा की डोली के संग संग घिरता है अँधियारा 
संध्या तक बेचारा सूरज फिरता मारा मारा 

किससे करे शिकायत, सत्ताधीश हुए हैं बहरे 
राजमहल के राजमार्ग पर लगे हुए हैं पहरे 
आश्वासन के मेघ बरसते, बिन पल भर डैम साढ़े 
और कुमकुमे सारे ही उनके बंगलों में ठहरे 

बरस बीतने पर बदले ऋतु , आशा दिए सहारा 
अभी आजकल दोपहरी में भी घिरता अँधियारा 

राजनीति के दांव पेंच में सत्य नकारा जाता 
बढ़ाते विश्व तापक्रम को भी अब झुठलाया जाता 
घिरते हुए प्रभंजन, चक्रवात  एवं अति वृष्टि 
प्राकृतिक विपदाएं  कह  कह कर समझाया जाता 

आने वाली पीढ़ी की किस्मत मेम है जल खारा 
उनकी जन्मकुंडली पर यों घिरता है अंधियारा 

बरसो बीते राह जोहते भोर नई कल आए 
मेघाच्छादित अम्बर में सूरज किरणें बिखराए
दर्पण पर जम गई धूल को पौंछे आ पूरबाइ
देश विदेश भटकता कोई घर वापिस आ जाए

किंतु बुझा हर दीप आस का स्नेह चूक गया सारा
शंनैः: शनै: हर एक दिशा में घिरता ही अंधियारा 






पत्थरों पर गीत लिखे

पत्थरों पर गीत लिक्खे आज तक जो शिल्पियों ने
है तुम्हारे रूप की आराधना का एक उपक्रम

बन गए है ताज कितने रंग गई कितनी अजंता
और फिर कोणार्क ने कितनी सुनाई है कहानी
शिल्प खजूराइ निरंतर गढ़ रहा प्रतिमाएँ जितनी
रूप के सागर,कथा के एक पन्ने की निशानी

कर समाहित शब्दकोशों की सभी उपमाए लिखा
किंतु कर पाए नहीं इक अंश का भी पूर्ण वर्णन

गीत लिक्खे पत्थरों पे रच अहल्याए युगों ने
शिल्प ने बन राम की पदरज उन्हें आकर सँवारा
वह तनिक संशोधनों का ही परस था गीत तन को
संतुलित कर मात्राएँगेयता को था निखरा

लिख रही है जान्हवी जो घाट पर वाराणसी के
रूप के शत लक्ष जो आयाम उन से एक वंदन 

पत्थरों पर गीत लिक्खे जो समय की करवटों ने 
वे अमिट हैं लेख संस्कृति के शिलाओं पर थिरकते 
जल प्रपातों ने कलम बन कर लिखे हैं घाटियों में
वे सुबह से साँझ तक गाती हुई धुन में संवरते 

शब्द शिल्पी ! आज जब तुम हाथ में थामो कलम तो 
इस तरह लिखना रहे इतिहास में बन शैल अंकन 

जो खुला आकाश

जो खुला आकाश स्वर में है तुम्हारे ओ बटोही देखना उस पर घिरें ना आ कहासे संशयों के उग रहे कितने प्रभंजन हर दिशा की वीथियों में राजनीति. धर्म...