नए एक संवत्सर

 


लगी गूंजने यहाँ वहाँ अब चैती की शहनाई 
चीर कुहासा आज धूप की दुल्हन चल कर आई 

देने लगीं नदी की लहरें तट पर Iआ कर दस्तक 
कलियों ने जल के दर्पण में आँखीं मलते झांका 
चंचल एक हवा के झोंका  ने चुपके से आकर 
जगती हुई कोपलों के मुख पर इक चुम्बन टांका 

किया शिशिर को विदा , फागुनी डोली में बिठलाकर 
नए एक सम्वत ने द्वारे की सांकल खड़काई  

पोटोमक के तट,  चेरी के तीन सहस पेड़ों पर
श्वेत गुलाबी फूलों ने अपनी पलकों को खोला 
रखी उठाकर धवल चादरें, मौसम ने सब अपनी
पीली पीली धूप बिछाकर बाहर रखा खटोला

बासंती पाहन के कदमों की आहट को सुनकर
हरी दूब के कालीनों की बूटी अब मुस्काई

जैकेट काट और दस्ताने, मफ़लर लिए साथ में
वार्डरोब के ऊपर के खाने में जाकर सिमटे 
खुले खिड़कियों के दरवाज़े, पुरवा के स्वागत में 
नए उमंगों के गुलदस्ते आ बाहों में लिपटे

ऋतुओं की संधि पर सम्वतसर ने कर हस्ताक्षर
नयी भोर के लिए बिखेरी है नूतन अरूणा

अनुभूतियों का दर्द

 


साथ सुइयों के घड़ी की बढ़ रही हैं उलझनें
भोर से संध्या तलक के प्रहर सारे अन मने
बाढ़ में उफनी नदी सी है उच्छ्रूंखल ज़िंदगी
आफ़तें सी काटती है साँस के संग धड़कनें

एक चेहरा आइने से प्रश्न लेकर झाँकता है
शब्द में अनुभूतियों का दर्द कुछ हो, माँगता है

हैं अपरिचित राह जिस पर पाँव चलते
हैअगोचर  वह, की जिस पर हम मचलते
चाहिए क्या यह हमें निश्चय नहीं है
किंतु असमंजस  लिए नित हाथ मलते

लक्ष्यहीना पंथ  केवल वृत्त में ही घूमता है
यह सचाई है जिसे अपना ह्रदय भी जानता है

वक्त है गतिमान, पल रुकता नहीं है
उम्र का पथ अग्रसर, मुड़ता नहीं है
क़ैद है दायित्व में जो प्राण पाखी
फड़फड़ाता पंख पर उड़ता नहीं है

कुछ नहीं अपना, कोई है और जो पूनी सम्भाले
उँगलियों की थिरकनीं से, सूत निशिदिन कातता है

जो सृजन का हो समय, हड़ताल पर है
साज का संगीत बस चौताल पर है
यज्ञ की सम्पूर्ण आहुति, हो या न हो
प्रश्न का उत्तर टिका, वेताल पर है

कश्मकश के जाल में उलझा थका दिन साँझ ढलते
रिक्त अपनी झोलियों को खूँटियों पर टाँकता है

होली २०२२ ले गुलाबी दुआ

 

आइ बासंतिया ऋतु मचलती हुई
रंगतें पीली सरसों की  चढ़ती हुई
अब दहकने लगी टेसुओं की अग़न
एक उल्लास में मन हुआ है मगन
सारे संशय घिरे, आज मिटने लगे 
जो बिछुड़ थे गए ,फिर से मिलने लगे 
आज तन मन सभी फाग़ूनी हो गया
रंग तुझ पे भी मस्ती का आये ज़रा 
इश्क़ जो तू करे हो गुलाबी सदा 
जा तुझे इश्क़ हो ले गुलाबी दुआ 

रंग बिखरे फ़िज़ाओं में ले कत्थई
जामुनी, नीला, पीला, हरा चंपई 
रंग नयनों। में कुछ आसमानी घिरे
और धानी लिपट चूनरी से उड़े 
रंग नारंगियों का भरे  बाँह में
लाल बिखरे तेरे पंथ में , राह में 
रंग बादल में भर कर उड़ा व्योम में
रंग भर ले बदन के हर इक रोम में 
फाग बस डूब कर मस्तियों में उड़ा 
हो गुलाबी तेरा इश्क़ ले ले दुआ 

छोड़ अपना नगर, आज   ब्रजधाम चल
होली होने लगी है वहीं आजकल
नंद के गाँव से ढाल अपनी उठा 
देख ले चल के बसानियों की अदा 
नाँद में घोल कर शिव की बूटी हरी 
कर ले तू रूप से कुछ ज़रा मसखरी
भरके पिचकारियाँ यो सराबोर हो
तन  बदन मन सब रंगे कुछ अछूता न हो 
रंग भाभी के साली के मुख पर लगा 
रंग हो प्रीत का है गुलाबी दुआ 



विस्मृति के दराज में

 


विस्मृति के दराज में कितने दस्तावेज रखे जीवन के
आज खुले वातायन सुधि के, तो कुछ सम्मुख आ कर बिखरे 

एक पत्र हाथों में आया लगता जाना पहचाना सा
छपी हुई थी एकि छोर पर मेहंदी से रंगीन हथेली
चारों ओर बूटियाँ अंकित सजा रही थी चारदिवारी
जैसे आभूषण से सज्जित, कोई दुल्हन नयी नवेली

 वह था पहला पत्र मुझे जो भेजा था तुमने शतरूपे
इतिहासों से निकल मधुर क्षण पुनः सामने आकर संवरे

सम्बोधन की जगह बना था एक चिह्न जो रहा अपरिचित
खोया रहा देर तक उस पर मैं ऊहापोहों में उलझा 
पड़े दिखाई कलियों के दो पाटल अंकित वहाँ अंत में
चुम्बन के हस्ताक्षर देखे तब सारा असमंजस सुलझा 

एक शब्द भी लिखा नहीं था, फिर भी एक कहानी पूरी
एक एक उसके घटनाक्रम दृष्टि पटल पर आकर उभरे 

एक अनलिखा पत्र मिला फिर, जिस पर उत्तर लिखना चाहा
किंतु लिखे जो अक्षर, सजते एक  नाम में सिर्फ़ तुम्हारे
कलम बनी तूलिका। खींचने आकृतियाँ, कुछ संदेशे की
लेकिन जो भी रेखा बनती ढली चित्र में एक तुम्हारे

मन वातायन से निकला तो नभ पर एक बिंदु पर अटका 
वर्तमान, आगत के पल सब , उस अतीत में घिर कर निखरे

मार्च २०२२ 








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होली २०२२

 चला विदा ले शिशिर लौट कर उत्तर दिशि में अपने घर को
धीमे धीमे पग धरती आती है पुरवा की दुल्हनिया 
घूँघट के परदे से छनती हुई रूप की स्वर्णिम आभा
राहों में संगीत बिखेरे, कोमल पाँवों की पैंजनिया 


ख़ुशियों के गुलाल बिखराकर मंगल गान सुनाने के दिन
नई उमंगें सजा हृदय में ,हैं त्योहार मनाने के दिन 


बासंती ये धूप उतर कर लगी नहाने नील झील में
पिघला सूर्य सुनहरा करते हुए किनारे प्रतिबिम्बों में 
खलिहानों में रखी धान  की बाली से हैं होड़ लगाती 
लहराती अम्बर तक चूनर बिखरे हुए सात रंगों में 


चंगों पर दे दे कर थापें बम  लहरी को गाने के दिन
सारंगी पर गोरा-बादल की गाथा दुहराने के दिन 


लाल, हरे, नारंगी, पीले नीले कत्थई और जामनी 
रंग बिखेर ला मौसम ने भोर दुपहरी संध्या कितने 
इनकी रंगत  में डूबा मन निर्निमेष हो ताक  रहा है 
उड़ उड़ कर उल्लास सजाता, खुली आँख में मीठे सपने 
 
 फगुनाहट को ओढ़ बदन पर खुल कर फाग लुटाने के दिन 
जमनाजी के तट पर अब हैं शिव बूटी घुटवाने के दिन 


होली के हुरियारों की लो, ब्रज में फिरने लगी टोलियां 
लगे जमा होने कीकर के झाड़, नगर के चौराहों पर 
गुलरी, कते सूत के धागे, उपले, और गाँठ हल्दी की 
गेहूं। चना, मूँग, जौ चावल, उड़द मसूरे आलावों पर


 नंदगगाँव से बरसाने तक लट्ठ और ढालों वाले दिन 
कल को भुला आज को  बढ़ कर अपने गले लगाने के दिन 
 


कोई भी गंध नहीं उमड़ी

  कोई भी गंध नहीं उमड़ी  साँसों की डोरमें हमने, नित गूँथे गजरे बेलकर लेकिन रजनी की बाहों में कोई भी गंध नहीं साँवरी नयनों में आंज गई सपने ज...