केवल पीर रहा बरसाता

अँगनाई में किसी राशि की जाकर ठहरे सूरज चाहे
कैलेन्डर निज  व्यवहारों में कोई अंतर नहीं दिखाता
चौघड़िये दिन के हों चाहे संध्या भोर निशा के हों या
सभी आँकड़े षड़यंत्री हैं, उत्तर नहीं भिन्न मिल पाता
 
सावन भादों क्वार पौष हो या मौसम हो कभी चैतिया
अम्बर  तो बिन बादल के भी केवल पीर रहा बरसाता
 
जितनी बार उगाईं मन ने अपनी क्यारी में मंजरियां
उतनी बार अंकुरित होते रहे नागफ़नियों के काँटे
नयनों के गंगाजल ने जिन पौधों को सींचा था प्रतिपल
उगी हुई विषबेलों ने वे एक एक कर कर के बाँटे
 
बीज मोतिया बेला के हों या गुलाब की रेपें कलमें
बागीचा पर आक धतूरा ही केवल वापिस लौटाता
 
गतियाँ हर इक बार घड़ी की छूते दृष्टि हुईं हैं द्रुत ही
इसीलिये हर बार प्राप्ति का पल पोरों से परे रह गया
पग के उठ पाने से पहले दिशा राह ने अपनी बदली
निर्णय का पल असमंजस में घिरा ह्रदय से दूर रह गया
 
यद्यपि भोर नित्य भर देती है संकल्पों से आंजुर को
बदला हुआ धूप का तेवर सहज सोख उसको ले जाता
 
ओढ़ी हुई अवनिकाओं से छुपता नहीं सत्य चेहरे का
मुस्कानें बतला देती हैं कितना पिया अश्रु का क्रन्दन
रहती हो अदृश्य भले ही नयनों से तरी पगडंडी
उसके चिह्न बता देती है विद्रुप हुई अधर की थिरकन
 
सरगम ने हर बार बिलम्बित करके ही लौटाया है सुर
और तार पर चढ़ने की कोशिश करते ही वह गिर जाता

वही प्रश्न दस्तक देते हैं

जिन प्रश्नों का उत्तर कोई मिला नहीं हैं कभी कहीं से
वही प्रश्न दस्तक देते हैं आज पुन: द्वारे पर आकर
 
किसने किसके लिये लगी थी कल के पट पर सांकल खोली
कौन खेलता गै हाथों की रेखाओं से आंख मिचौली
कहाँछुपे हैं इतिहासों में वर्णित स्वर्णमयी रजनी दिन
किधर वाटिकायें गूँजे है जिनमें प्रीत भरी बस बोली
 
यद्यपि ज्ञातन उत्तर का रथ मुडन सकेगा इन गलियों को 
बार बार कर रहीं प्रतीक्षा आँखें मोड्क्ष गली के जाकर 
 
क्या कारण था क्या कारण है परिवर्तन की नींद न टूटे 
किसने खींचे राज पथों पर ही क्यों आ बहुरंगी बूते
भला किसलिए सावन चलता रहा पुराणी ही लीकों पर 
कटते रहे एकलव्यों के ही क्यों कोई कहे अंगूठे 
 
कब से नियमावलिया  क्यों हम आँख मूड कर रहे अनुसरण 
कोई भेद नहीं बतला पाया है यह हमको समझा कर 
 
 
किये अनकिये प्रश्नों में ही दिवस निशा नित उलझे रहते .
क्यों विपरीत दिशाओं में ही गंधों वाले झोंके बहते 
क्यों लुटती हैं विकच प्रसूनों की पांखुर ही वन उपवन में 
क्यों कांटे भी नहीं सहायिकाओं पर जा कर सजाते रहते 
 
प्रश्नाचिहं की  झुकी कमर पर प्रश्नों का बोझा है भारी 
आशा यही कोई उत्तर आ बोझ तनिक जाए हल्का कर 
 

रोयें हम या मुस्कुराएँ

ज़िंदगी में हैं हजारों एक तो पहले व्यथाएं    
आपकी फिर बात सुन कर रोयें हम या मुस्कुराएँ 
 
भावना के प्रकरणों की पूर्व निर्धारित समस्या 
एक मन को छू रखें औ दूसरे से बच  निकलते 
एक के घर पर छिटकती चांदनी सी चंद  किरणें 
दूसरे को अग्नि देते दीप जब भी जल पिघलते 
हो नहीं पातीं सभी की एक जैसी मान्यताएं
 रोयें हम या मुस्कुराएँ 
 
कल्पना की जब उड़ानें बाँधती पूर्वाग्रही पर 
तो सहज विस्तार उनका एक मुट्ठी में सिमटता 
दृष्टि के ही कोण पर निर्भर रहा है दृश्य सारे
कौन उसको किस तरह से देखता है या समझता 
 
कौन से आकाश में हम पंख अपने फ़डफ़डाये 
रोयें हम या मुस्कुरायें
 
शब्दकोशों में नहीं सीमित रहा है ज्ञान केवल
माँगता है चेतना की सार्थकतायें निरन्तर
जो विनय सिखला नहीं सकती हुई विद्या निरर्थक
प्राण में पाषाण में करता यही बस एक अन्तर
 
शोर में इक भीड़ के सारंगियाँ कब तक बजायें
रोयें हम या मुस्कुरायें

भोर की अलगनी पे टँका रह गया

भोर की अलगनी पे टँका रह गया
कल उगा था दिवस सांझ के गाँव में
रात फिर से सफ़र में रुकी रहगयी
गिनते गिनते जो छाले पड़े पाँव में
 
चांदनी ने प्रहर ताकते रह गए 
उंगलियाँ थामने के लिए हाथ में 
दृश्य की सब दिशाएँ बदल चल पडी 
रुष्ट होते हुए बात ही बात में 
 
नभ की मंदाकिनी के परे गा रही
 एक नीहारिका लोरियां अनवरत 
पर किसी और धुन पे थिरकता हुआ 
आज को भूल कर दिन हुआ था विगत 

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...