सूरज को तहखानों में

दीवाने हो भटक रहे हो मस्जिद में बुतखानों में
ढूंढ़ रहे हो सूरज को तुम अंधियारे तहखानों में

राजमुकुट ने कब चूमा है आम आदमी को आकर
ऐसी बातें मिलती केवल माजी के अफ़सानों में

जनसत्ता है नारे बाजी, प्रजातंत्र है बहलावा
सिमटी हुई देश की सत्ता, केवल चंद घरानों में

राजनीति के जटिल गणित का सीधा साधा समीकरण
सारे उत्तर साम दाम में , साकी के यारानों में

देश-प्रेम की जन सेवा की उम्मीदें बेकार हुईं
टके सेर भी दाम न मिलता अब इनका दूकानों में

ये उबाल भी दो छींटे खाकर ठंडा हो जायेगा
कहां आंधियाँ होती काफ़ी हाउस के तूफ़ानों में

कैसे ख्वाब सजाये हो तुम रजनीगंधा महकेगी
नागफ़नी के बीज तुम्ही ने बोये हैं उद्यानों में

यह बेजी की कारस्तानी

चिट्ठा लिख कर गया फ़ंसाया, यह बेजी की कारस्तानी
सोचा, मुझको लिखनी होगी इसी बहाने एक कहानी
लेकिन गद्य नहीं लिखता मैं, सीमाओं से अपनी परिचित
अब बतलाओ सही लिखा या फिर लिख कर की है नादानी




१.आपकी सबसे प्रिय पिक्चर कौन सी है? क्यों?

पिछले पच्चीस वर्षों में कोई फ़िलम, मैने गंभीर होकर के देखी नहीं
आप विश्वास चाहे करें न करें, किन्तु सच कह रहा, है हकीकत यही
देती आनंद, चेतन को झकझोर कर,तात्कालिक परिस्थिति बताती हुई
होके मज़बूर मुझको भुलाया गया, गीत गाता हूँ मैं आज भी बस वही

साथ इसके,किसी से न कहना कभी, बात अभिमान की मैं नहीं कह रहा
ए रिवर रन थ्रू इट, तुम्हें है पता, एक निर्झर कभी था यहाँ बह रहा
और ज्यादा नहीं मैं बता पाऊंगा, देखता हूँ तभी, जब समय मिल सके
और टीवी दिखाता है जो आजकल यों लगा है कि बस यातना सह रहा



२.आपके जीवन की सबसे उल्लेखनीय खुशनुमा घटना कौन सी है ?

पहली बार मंच पर नीरज ने मुझको आशीष दिया जब
उम्र यही थी तेरह चौदह, , और सराहा श्री व्यास ने
लगभग चार दशक बीते हैं, लेकिन याद अभी हैं ताजा
सांझ सवेरे, चित्र आज तक, आँखों के है रहा सामने



३.आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते/करती हैं?

कविता, लेख, कहानी सब ही पढ़ता, जितना समय मिल सके
मनपसंद मंतव्य, साथ में फ़ुरसतिया के लंबे चिट्ठे
कभी बताशे पानी वाले, उड़न तश्तरी औ' प्रत्यक्षा
कविता वाले लिखूँ अगर सब मेरे ही छूटेंगे छक्के

किन्तु साफ़ यह बतलाता हूँ सीमित समय पास है मेरे
दफ़्तर में रहती सदैव ही गहन व्यस्तता मुझको घेरे
घर आकर बाकी कामों से जो बचता, उसमें पढ़ता हूँ
शेष समय यों कटा लेखनी टूटे फ़ूटे शब्द चितेरे

४.क्या हिन्दी चिट्ठेकारी ने आपके व्यक्तिव में कुछ परिवर्तन या निखार किया?

यही कहूँगा परिचय की सीमायें और अधिक फैलीं हैं
यहाँ कनाडा से लेकर के गुड़गांवा, रांची देहली है
इधर कुवैत और यू ए ई, कम्पाला भी जुड़ा आजकल
निखर रही हैं गज़ल देख कर नई नई निशि दिन शैली है

५.यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे/चाहेंगी?

नीति प्रदूषित आरक्षण की सबसे ज्यादा मुझे अखरती
ऐसे परिवेशों में प्रतिभा, जाति भेद के बोझों दबती
मुझे विदित है सहमत मुझसे शायद अधिक लोग न होंवे
पर यह मेरी एक धारणा, जो समाज को सत्य बदलती

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अब जैसे परिपाटी है मैं यह श्रंखला बढ़ाता आगे
कुंअर भावना जी, निनाद के अभिनव को देता आवाज़ें
प्रभात टंडन जी तीजे,, चौथे पर रंजू लिख देंगी
फिर दिव्याभ छेड़ दें आकर सरगम के स्वर सज्जित बाजे


प्रश्न पाँच यह- क्यों लिखते हो, क्या लिखने को प्रेरित करता
कला पक्ष से भाव पक्ष का कितनी दूर रहा है रिश्ता
कितना तुम्हें जरूरी लगता,लिखने से ज्यादा पढ़ पाना
मनपसंद क्यों विधा तुम्हारी, और किताबों का गुलदस्ता.

चाँदनी रात के

ढूँढ़ते ढूँढ़ते थक गई भोर पर
मिल न पाये निमिष चाँदनी रात के

डायरी के प्रथम पॄष्ठ पर था लिखा
नाम जो, याद में झिलमिलाया नहीं
तट पे जमुना के जो थी कटी दोपहर
चित्र उसका नजर कोई आया नहीं
बूटे रूमाल के इत्र की शीशियाँ
फूल सूखे किताबों की अँगनाई में
चिन्ह उनका नहीं दीख पाता कोई
ढल रहे एक धुंधली सी परछाईं में

उंगलियों से हिना पूछती रह गई
कुछ भी बोले नहीं कंगना हाथ के

पॄष्ठ इतिहास के फड़फड़ाते रहे
कोई गाथा न आई निकल सामने
तट समय सिन्धु का पूर्ण निर्जन रहा
चिन्ह छोड़े नहीं हैं किसी पांव ने
ओढ़नी से गगन की सितारे झड़े
और कोहरा क्षितिज पर उमड़ता रहा
भाग्य शिल्पी लिये भौंथरी छैनियां
एक प्रतिमा का आकार गढ़ता रहा

और बुनती अमावस रही फिर निशा
दीप की बातियों पर धुआं कात के

क्यारियों में दिशाओं की बोते रहे
बीज, उग आयेंगी रंग की कोंपलें
साध सिन्दूर सी, केसरी कामना
सुरमई कल्पनाओं की कलिया खिलें
सींचे थी भावनाओं की मंदाकिनी
पर दिशा जोकि बंजर थी बंजर रही
रेख पतली सी संशय की जो एक थी
ऐसी उमड़ी कि बन कर समन्दर बही

नागफ़नियों के छोरों पे टिक रह गये
जितने सन्दर्भ थे सन्दली गात के

और बस ढूँढ़ती रह गई भोर नित
खो गये मित्र सब चाँदनी रात के

सर्दी, चाय की केतली और प्रत्यक्षा की टिप्पणी

नहीं छोड़ती स्याही चौखट कलम की
नहीं स्वर उमड़ता गले की गली में
लिखूँ कैसे कविता तुम्ही अब बताओ
घुले भाव सब चाय की केतली में

ठिठुर कँपकँपाती हुई उंगलियां अब
न कागज़ ही छूती, न छूती कलम ही
यही हाल कल था, यही आज भी है
है संभव रहेगा यही हाल कल भी

गये दिन सभी गांव में कंबलों के
छुपीं रात जाकर लिहाफ़ों के कोटर
खड़ीं कोट कोहरे का पहने दिशायें
हँसे धुंध, बाहों में नभ को समोकर

न परवाज़ है पाखियों की कहीं भी
न मिलता कबूतर का कोई कहीं पर
शिथिलता है छाई, लगा रुक गया सब
न कटती है सुबह, न खिसके है दुपहर

निकल घर के बाहर कदम जो रखा तो
बजीं सरगमें दाँत से झनझनाकर
हवा उस पे सन सन मजीरे बजाती
जो लाई है उत्तर के ध्रुव से उठाकर

न दफ़्तर में कोई करे काम, चर्चा
यही आज कितना ये पारा गिरेगा
पिये कितने काफ़ी के प्याले अभी तक
भला कितने दिन और ऐसा चलेगा

न लिखने का दम है न पढ़ने की इच्छा
ये सुईयाँ घड़ी की लगे थम गई हैं
मिलें आपसे अब तो सप्ताह दस में
ये कविता मेरी आजकल जम गई है

१००वीं प्रस्तुति --अंतरे खो गये

जब भी चाहा है मैने लिखूँ गीत मैं
शिल्प मुखडे हुए, अंतरे खो गये

मन की गहराईयों से उठी भावना
पर अधर की सतह तक नहीं आ सकी
कुनमुनाती हुई मेरी सुधियाँ रहीं'
ताल पर सरगमों की नहीं गा सकी
नैन की प्यालियों में उफ़नते रहे
स्वप्न संवरे नहीं एक पल के लिये
आग थी तेल था और बाती भी थी
पर नहीं जल सके रास्ते में दिये

द्वार जब खटखटाया मेरा भोर ने
थक के सारे के सारे प्रहर सो गये

भोज पत्रों पे लिक्खी कहानी थी जो
आईं इतिहास से वे निकल सामने
मैथिली होके तत्पर प्रतीक्षित रही
ली न अग्नि-परीक्षा मगर राम ने
मुद्रिका ढूँढ पाई न शाकुन्तले

और दुष्यन्त जलता अकेला रहा
प्रश्न हर युग में दमयंतियों ने किये
किन्तु उत्तर में कुछ न नलों ने कहा

साक्ष्यदर्शी समझते जिन्हें हम रहे
वे सभी गुम अंधेरों में हैं हो गये

पंचतन्त्री कथाओं में उलझे रहे
किन्तु जाने नहीं आज तक नीतियाँ
बंद पलकें किये अनुसरण कर रहे
जो बना कर गये पूर्वज रीतियाँ
नींव रखते रहे हैं कई बार, पर
कोई निर्माण पूरा नहीं कर सके
चाहतों के चषक रिक्त थे सामने
किन्तु इक बूँद भी हम नहीं भर सके

सावनी मेघ आये तो थे घिर मगर
बरसे बिन ही हवा में विलय हो गये

चाँदनी की गली में सितारे उगे
कोई पहचान अपनी नहीं पा सके
सरगमों की तराई में खिलते हुए
राग नूतन कोई स्वर नहीं गा सके
धूप की कामनायें किये जा रहे
छोड पाये घटाओं का साया नहीं
हम प्रतीक्षा बहारों की करते रहे
जिनको हमने कभी था बुलाया नहीं

राह की शून्यता देखते, सोचते
इस डगर के पथिक सब, कहाँ खो गये.

पूर्णिमा की बहन

ज्योत्सना का पहन कर हिमानी वसन
आई है पूर्णिमा की ये छोटी बहन
ओढ़ मुस्कान की चम्पई चूनरी
मेरी अँगनाई को आज महका रही

एक नीहारिका से पता पूछती
आई कर पार नभ की ये मंदाकिनी
व्क पुच्छल सितारे को कर साज,थी
राह भर गुनगुनाती रही रागिनी
तारकों में जगा रोशनी झिलमिली
मोड़ पर उनके कंदील रखती हुई
मुट्ठियों की झिरी से फिसलती हुई
रेत सी, हर दिशा में बिखरती हुई

गंध की ओस बन कर हवा में घुली
अर्थ मुझको बहारों का समझा रही

वो अजन्ता के दर्पण के प्रतिबिम्ब सी
भित्तिचित्रों से उतरी एलोरा लगे
बन प्रणेता रँगे फिर से मीनाक्षी
प्रेरणा शिल्प कोणार्क की, बन सजे
पारिजातों की कलियों की अँगड़ाई सी
रश्मि के चुम्बनों से उठी जागकर
चित्रलेखा की ओढ़ी हुई ओढ़नी
सोम लाया हो उससे जिसे माँगकर

उर्वशी मेनका और रंभा सभी
एक ही यष्टि में ढल,लगा आ रहीं

मन की आराधना के प्रथम मंत्र सी
हो प्रथम स्वप्न ज्यों प्रीत के गांव का
ब्रह्म-बेला तपोभूमि की पुण्य हो
हो या पर्याय रति के हर इक नाम का
भावनायें उमड़ती ह्रदय में मगर,
न विदित आदि क्या है, कहाँ अंत है
शब्द्कोषों में उपमायें वर्णित नहीं
कल्पना आज सॄष्टा की जीवंत है

आज भाषा, स्वरा,अक्षरा मूर्त हो
लग रहा सामने आ खड़ी गा रहीं

सर्दी का मौसम

सहमे झरने खड़े, सो गईं झील भी
देह के साज पर सर्दियाँ गा रहीं

ओढ़ मोटी रजाई को लेटे रही
धूप, लाये कोई चाय की प्यालियाँ
हाथ की उंगलियों को मिले उष्णता
इसलिये थी बजाती रही तालियाँ
भोर कोहरे का कंबल लपेटे हुए
आँख मलती हुई आई अलसाई सी
ठिठुरनों में सिमटती हुई रह गई
झांक पाई न पूरब से अरुणाई भी

और हिमवान के घर से आई हवा
ऐसा लगता नहीं अब कहीं जा रही

पूर्णिमा वादियों में पिघल बह रही
रात पहने हुए शुभ्र हिम का वसन
कुमकुमों से टपकती हुई रोशनी
को लपेटे हुए धुंध का आवरण
राह निस्तब्ध, एकाकियत को पकड़
आस पदचिन्ह की इक लगाये हुए
पेड़ चुप हैं खड़े, शत दिवस हो गये
पत्तियों को यहाँ सरसराये हुए

शीत की ले समाधी नदी सो गई
तट पे ,अलसी शिथिलता लगा छा रही

तार बिजली के दिखते हैं मोती जड़े
स्तंभ पर चिपके फ़ाहे रुई के मिलें
देहरी चौखटें सब तुषारी हुईं
कोशिशें कर थके द्वार पर न खुलें
लान, फ़ुटपाथ,सड़कें सभी एक हैं
क्या कहाँ पर शुरू, क्या कहां पर खतम
एक मन ,इक बदन, एक जाँ हो गये
सब पहन कर खड़े श्वेत हिम का वसन

और हम थरथरा देखते रह गये
कहता टीवी कि लो गर्मियां आ रहीं

गाँव का व्यवहार क्या हो

( गीत सुनने के लिये कॄपया ध्वनि चालू कर लें )

प्रश्न तो कर लूं
मगर फिर प्रश्न उठता है
कि मेरे प्रश्न का आधार क्या हो
पार वाली झोंपड़ी से गांव का व्यवहार क्या हो ?

भावना के दायरे में जो सिमट बैठीं अचानक
दूरियों के मापने का कौन सा प्रतिमान मानें
अजनबियत की गहन गहरी बिछी इन घाटियों में
पार जाने का सही है कौन सा पथ आज जानें
व्योम से लेकर धरा तक, स्वप्न के सेतु बनाकर
चल रहे जो खींच कर हम आस के खाके सुनहरी
उन पथों पर भोर कर लें या कि संध्या कोई बोले
क्या भरें आलाप, छेड़ें बाँसुरी की याकि तानें

छिन्न मस्ता आस्था ने सौंप रखे ज़िन्दगी को
दर्द के बोझिल पलों का आखिरी उपचार क्या हो ?

टूटते अनुबंध की कड़ियाँ पिरोते रात बीती
शेष जो सौगंध के मानी रहे वो हाशियों पर
बीज बो नित जो उगाईं चाहतों के रश्मिरथ पर
किस गगन के जलद चल कर आ सकेंगे रास्तों पर
चल रहे जिन उंगलियों को थाम कर हम इस सफ़र में
है सुनिश्चित क्या, कि मंज़िल तक हमारा साथ देंगी
छटपटातीं ताकतीं सुधियाँ दिशाओं के झरोखे
नाम किसका लिख सकेगा बिन पते की पातियों पर

ज़िन्दगी के मंच पर बिखरीं हजारों पटकथायें
कशमकश है इन सभी का एक उपसंहार क्या हो ?

हो गई विस्मॄत शपथ जो अग्नि के सन्मुख उठी थीं
हमकदम सब राह के थक दूर पीछे रह गये हैं
क्षुद्र टुकड़ों में बंटी है संस्कॄतियों की धरोहर
श्वास के अवलंब सारे आंधियों में बह गये हैं
मान कर जिन पत्थरों को देवता पूजा किये हम
प्राण उनमें क्या कभी कोई पुजारी पा सकेगा
कल्पना के इन्द्रधनुषों को तलाशें सात अंबर
रंग थे जिनमें बसे, वे महल सारे ढह गये हैं

रूठ कर बैठे पलों को ज़िन्दगी के जो मना ले
प्रश्न लेकर घूमता हूँ एक वो मनुहार क्या हो ?

पार वाली झोंपड़ी से गांव का व्यवहार क्या हो.



यादों के दीपक

सिरहाने के तकिये में जब ओस कमल की खो जाती है
राह भटक कर कोई बदली, बिस्तर की छत पर छाती है
लोरी के सुर खिडकी की चौखट के बाहर अटके रहते
और रात की ज़ुल्फ़ें काली रह रह कर बिखरा जाती हैं

तब सपने आवारा होकर अम्बर में उडते रहते है
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं

बिम्ब उलझ कर जब संध्या में, सूरज के संग संग ढलते हैं
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं

पनघट की सूनी देहरी पर जब न उतरती गागर कोई
राह ढूँढती इक पगडन्डी रह जाती है पथ में खोई
सुधियों की अमराई में जब कोई बौर नहीं आ पाती
बरगद की फ़ुनगी पर बौठी बुलबुल गीत नहीं जब गाती

और हथेली में किस्मत के लेखे जब बनते मिटते हैं
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं

इतिहासों के पन्नों में से चित्र निकल जब कोई आता
रिश्तों की कोरी चूनर से जुड जाता है कोई नाता
पुरबाई जब सावन को ले भुजपाशों में गीत सुनाये
रजनीगन्धा की खुशबू जब दबे पाँव कमरे तक आये

और क्षितिज पर घिरे कुहासे में जब इन्द्रधनुष दिखते हैं
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...