सम्भव अभिव्यक्ति नहीं अब

जीवन पथ पर पग पग संचित होती हुई घनी पीड़ा की
ढलती हुई साँझ में होती है सम्भव अभिव्यक्ति नहीं अब

उगती हुई भोर में गूंजित होती हुई आरती के स्वर
से लेकर के सूर्या नमन तक के मंत्रित पल की आहुतियाँ
बिन सोचे बस अंध अनुकरण में खोना साँसों की निधि को
और बाद में पीछे मूड कर चुनना झरी हुई मंजरियाँ

संस्कृति के पश्चातापों के असमंजस से निकल गया जो
अपना पंथ बना लेता है इन राहों में व्यक्ति वही बस

बना त्रिशंकु लटका कोई कभी किसी के हठधर्मी से
पूरब पश्चिम के अनुपातों, आज-विगत के समीकरण से
उसे नियति भी अनदेखा कर बढ़ती रही काल के पथ पर
ओझल ही रह जाया करता किसी ध्येय के स्वयमवरों से

असफलताओं को ढकने की प्रवृतियों का एक रूप है
चाहत नहीं शेष कोई भी और कोई आसक्ति नहीं अब

जिसे समेटा किये निशा दिन केवल दिवास्वप्न ही निकले
और पकड़ में नहीं आ सकी दृष्टिभ्रमों  की परछाई भी
जंगल पर्वत घाटी नदियाँ के तट तक भटके कदमों को
नहीं सांत्वना देने पाई अपनी जो थी अंगनाई भी

अभिलाषा के विस्तारों को करता रहा गुणित जो हर दिन
उसको दे संतोष शेष है कोई भी सम्पत्ति नहीं अब

राकेश खंडेलवाल

अनजाने ही संवर गया है

आवाज़ों के प्रतिबिम्बों में जब जब भाव घुल गए मेरे
तब तब नया गीत  आ कोई अनजाने ही संवर गया है

मन के बुककेसों में रक्खी हुई किताबों ने खुल खुल कर
अक्सर ध्यान दिलाया मेरा रही अंनापढ़ी गाथाओं पर
और डायरी के पन्नों पर लिखे हुए वे छंद अधूरे
जिनका था आधार प्रीत में डूबी मादक संध्याओं पर

उनकी किसी पंक्ति ने जब भी मेरे अधर छुए हौले से
सरगम का सुर गीत समूचा बन कर तब तब निखर  गया है

यादों की पगडण्डी पर कुछ धूमिल से आकार् उभरते
प्रश्नचिह्न में ढलकर आँखों के पर्दो पर लहराते हैं
कौतूहल की ओढ़ दुशाला देते अनुभूति पर दस्तक
तो सहसा ही बिसरे सपने फिर संजीवित हो जाते है

उन सपनो का केंद्र बिंदु जब मन पोखर में हलचल करता
जलतरंग की कंपन में  तब गीत कोई आ बिखर गया है

जले प्रतीक्षाओं के दीपक नयनों की देहरी पर जब भी
अकुलाहट बिछ गई गली के जाकर के दोनों छोरो पर
बढ़ी और संभावनाये आ भुजबंधंन में सिहर सिहर कर
रुके भाव शब्दों में ढलकर आकर् अधरों की कोरो पर


फिसली है जब भी स्वर लहरी उन शब्दों की उंगली थामे
शब्दशिल्प इक नया गीत में तब आकर के उभर गया है

स्वागत है नव वर्ष



नए वर्ष की प्रथम भोर की पहली पहली किरण सुनहरी
अब इस बार खोल दें गाँठे बंधी हुई अरुणिम आँचल की

वर्ष वर्ष गुज़रे आशा की टूटी किरचे चुनते चुनते
नए वर्ष की अगवानी में नई नई आशाएँ बुनते
लेकिन सदा फिसलती डोरी हाथों से उड़ती पतंग की
बीत गई हर एक घड़ी बस प्रतिध्वनियो को सुनते सुनते

नए वर्ष का दीप जलाकर लाई देहरी किरण आज तू
अब इस  बार स्वरों की सरगम घोल कंठ में हलकी हलकी 

आँधी आती रही गली में पथ के सारे दिए बुझाकर
सुनी नहीं अम्बर ने भेजी सारी आवाज़ें लौटाकर
सूरज के रथ के पहियों की खिंची लीक पर चलते चलते
परिवर्तन को ढूँढ रही है दृष्टि आज रह रह अकुलाकर

हुई अपेक्षाओं में वृद्धि  वातायन पर नज़रें केंद्रित
नया वर्ष ये दुहराये न, बीती हुई कहानी कल की

तय हो चुका अभीतक जितना वो सारा ही सफ़र भला है
अब तेरे संग चमक रहा ये गगन और कुछ धुला धुला है
जागी नई नई निष्ठाएँ जीवन के बाव संकल्पों पर
साँसों की बगिया में आकर संदल जैसे घुला घुला है

नए वर्ष की। किरण खोल दे अब प्रकाश के स्रोत बंद जो
खिलती रहें पाँखुरी जिससे यहाँ ज्ञान के श्वेत कमल की 


१ जनवरी २०२०


संशय

नव चेतना दे नया स्वर ये प्रार्थना हर वर्ष थी
इस बार भी रीती रहेगी, क्या ये फैली अँजुरी

हर रात में सजते सपन को भोर नित आ तोड़ती
हर साधना की रीत को चंचल हवा झकझोरती
मंज़िल डगर बिछती सदा ही मानचित्रों पर मगर
विपरीत हो नियति की रबर, उनको मिटा कर छोड़ती

लेकर चले हैं फूल हर इक बार पूजा के लिए 
देहलीज तक आते हुए, हर एक पाँखुर थी झरी 

विश्वास प्राणो का लिये हर रोज़ दीपक से जले
मिलते रहे पथ में हमें झंझाओं के ही सिलसिले 
पर आस्था की डोर हमने हाथ से छोड़ी नहीं
इक मोड़ पर आकर कभी मंज़िल स्वयं हमसे मिले 

हर बार  टूटीं आस के टुकड़े उठाते हम चले 
पर धारणा ये पतझरी शाखाओं सी सूनी रही 

करते रहे थे कामना सबके दिवस हों सुख भरे
अपना नहीं तो आपका पथ, चाँदनी ज्योतित करे 
पर रह गई हर बार पुस्तक बिन खुले विश्वास की 
अब कामना भी सोचती है कामना क्योंकर करे

इक कल्पना है साथ बस, जिसके सहारे पर चले
 वो अज रही है आज भी केकिं तनिक सहमी डरीं




बीते बरस अलविदा


बीते बरस अलविदा तुझुको  जाते जाते इतना करना
अपने अर्जित संचय की निधि नए वर्ष को मत दे देना

तूने सदा इंद्रप्रस्थों को  खांडवप्रस्थ बना कर छोड़ा
और संजोए अपने कोषों में दिन रात नए दावानल
अश्वत्थामा बना खड़ा ब्रह्मास्त्र चढ़ाए प्रत्यंचा पर
कलुषित मन से दूषित करता रहा प्रगति  का झीना आँचल

चल समेट कर अपना डेरा अब अतीत के पथ पर बढ़ जा
तुझे शपथ अब पीछे मुड़ कर इन राहों को नहीं देखना

तूने अपनी अंगनाई में रोपी नित्य नई विष  बेलें
जाति धर्म की, रंग भेद की और नए अलगावबाद की
रची झूठ की नव प्रतिमाएँ  सत्य सुलाया शरशैय्या पर
आत्म मुग्ध तू रहा भुलाकर सुधियाँ कल की और आज की

नए वर्ष को इन बातों से दूर नया ही पंथ बनाना
इसीलिए अपनी परछाई भी उस पर पड़ने मत देना

आने वाले नए वर्ष से जुड़ी हमारी नव। आशाएँ
रहे हवा जल दूर प्रदूषण की तेरी अभिशप्त प्रथा से
तूने ख़ुद को मनमानी से इतिहासों में क़ैद कर लिया
नए वर्ष को अब लिखने है नव प्रकरण इक नई कथा के

बीते बरस याद के पन्ने तुझे मिटाने को आतुर है
कलम कह रही आगत का अब स्वागत गीत नया रच देना 

चढ़ाए मैंने जब कुछ स्वर

  कहती है एकाकी संध्या गुम सुम  होकर बैठ न पगले पीड़ित बीन बजा प्राणों की कुछ न कुछ तो ख़ुद से कहलें जलतरंग पर सजा चढ़ाए मैंने जब कुछ स्वर ...