बूँद भर जल

बूँद भर जल बन गया आशीष, तेरा स्पर्श पाकर
चल दिया मैं आचमन कर तेरी स्तुतियाँ की डगर पर

मैं अजाना था कहाँ पर शब्द की जागीर फैली
और स्वर की सरग़मों की वीथियों की क्या दिशाये
दूर तक कोई नहीं था जो मुझे  निर्देश  देता
किस तरह से शब्द चुन कर राग में उनको सजायें

बूँद भर जल बन गया शतदल कमल के पत्र से झर
एक वह पथ का प्रदर्शक जो दिशा करता उजागर

स्वाति के नक्षत्र की इक बूँद का जल बन गया था
भिन्न गुण वाला परिस्थिति साथ जैसी मिल गई थी
उड़ गया कार्पूर बन कर याकि मोती बन गया था
हो गया विष जब कि संगत शेषनागी  हो गई थी

किंतु तेरी वीण के इक तार की झंकार छू कर
ज्ञान का भंडार होकर छा गया पूरे जगत पर

बूँद भर जल मेघगृह में जा हुआ है शत सहस्त्रित
और फिर बरखा बना है भूमि की तृष्णा बुझाने
ईश का वरदान बन कर जब सज़ा नत भाल पर तो
कालिदासों के मुखों से लग गया कविता बहाने


बूँद भर जल बह शिरा में ज़िंदगी को प्राण देता 
और संभव कर रहा हम गीत गायें गुनगुनाकर 

कल जहाँ से लौट कर

 कल जहाँ से लौट कर हम आ गए सब कुछ भुला कर
आज फिर से याद की वे पुस्तकें खुलने लगी हैं 

फिर लगी है तैरने इस साँझ में धुन बाँसुरी की 
भग्न मंदिर में जला कर रख गया है दीप कोई 
पनघटोंकी राह पर झंकारती है पैंजनी फिर 
पीपलों की छाँह में फिर जागती चौपाल सोई

कल जहाँ से लौट कर हम आ गए, सूनी  कुटी वह
गूँजते शहनाई स्वर के साथ फिर सजने लगी है 

भोर में नदिय किनारे सूर्य वंदन आज फिर से 
और फिर तैरे प्रभाती गीत कुछ बहती हवा में 
गुरुकुलों का शंखवादन जो अपरिचित हो गया था 
खींचता नूतन सिरे से चंचलता मन आस्था में 

कल जहाँ पर बह रही थी रात दिन पछुआ निरंतर 
आज फिर पूरबाइ की मद्दम गति बहने लगी है 

कल जहाँ से लौट आए गीत लेकर के निराशा 
मंच पर बैठे विदूषक, हाथ में कासा सम्भाले
आज फिर से छा रही हैं संस्कृतियाँ मेघदूती 
काव्य में में आने लगे, साकेत दिनकर के हवाले 

कल जहाँ पर राग -सरगम मुँह ढक कर सो गए थे
आज रंगीनियाँ वही पर निशिदिवस बजने लगी है  

आज उतरा है धरा पर

आज उतरा है धरा पर अवतरित जो रूप होकर मेनका भी उर्वशी भी देख कर हैरान होते चाँदनी की झील से उभरा हुआ यह संदली तन पाँव  में रचती  ​म​ हावर ला...