मृग तृष्णाओं के जंगल में

 मृग तृष्णाओं केजंगल में 

इक मरीचिका के कोहरे में
लिपटे हुए बिताई हमने
हर सुबहा हर शाम

हाँ ये तो था ज्ञात हमारी
दृष्टि भरम में डूबी
फिर भी सपनों में उलझाता 
जीवन की है खूबी 
उगती रही प्यास होंठों पर 
बढ़ते पग के साथ
दिवास्वप्न शिल्पित होने का
पला एक  विश्वास 

उठ यथार्थ के धरातलों से 
बहे हवाओं की लहरों पर
पतझर की नंगी शाख़ों के
तले किया विश्राम 

झूठे दम्भों, छलनाओं  का 
शून्य रहा अंतर में
नैतिकता का अर्थ तलाशा
विध्वंसित जर्जर में 
मिलते विष को पीकर अपने
मन को था बहलाया
जिसने दंश दिए, उसका भी
है आभार चुकाया 

क्रूर समय का खड़ा महाजन
निज बहियाँ ले द्वार
साँसों की मोहरों के ऋण का
चुकता किया छदाम

रात उजाले की चंदनिया
मिली नित्य  बेस्वाद 
सपनों से जो भरी अंजुरी
रिस जाती  हर बार 
दो घूँट चाँदनी के आकर
होंठों तक, फ़िस्कल गए
हम टूटी नौकायें लेकर
सागर में निकल गए

टूटी प्रतिमा के खंडहर सा
छिन्न भिन्न इतिहास 
पंगु हुए इस वर्तमान पर
अब लिखना है नाम

राकेश खंडेलवाल 
फ़रवरी २०२१ 

यौवन को दोषों की

 शब्द है कृशकाय

अपने कक्ष की एकाकियत में 

पक्ष पूरा एक

फिर एकांत में घिर रह गया


बंद हैं वातायनों के

पट, न दस्तक दें हवाएँ

हर दिशा बिखरा रही

अवरोध के संग वर्जनाएँ 

यौवन को दोषों की

कथाएँ सुनाने में 

जीवन का तारतम्य

शून्य में घिर रह गया


मोड़ सूने फिर हुए 

पगडंडियों की यात्रा के 

शब्द औंधे मुँह पड़े

यों हाथ छूटे मात्रा के

कंठ से गूंजा  स्वर

होंठों की देहरी पर 

कुछ कहे बिन

आज फिर चुप रह गया 


बिंदु  पर रेखाओं के

अब दिग्भ्रमित हो पाँव ठहरे

धुँध में डूबे हुये सब

परिचयों के आज चेहरे

धड़कन से साँसों को 

अनुपाती करने में

पास का योग भी

घट कर ही रह गया 

धागा उलझ उलझ रह जाए

 

​कटी फटी  सपनों की चादर को जब भी चाहा तुरपाऊँ
धागा उलझ उलझ रह  जाए टाँका लगने से पहले ही

सूरज ने समेट कर रख ली जब अपनी किरणो की गठरी
और निशा के पग की पायल कहीं दूर लग पड़ी खनकने
मन  की अकुलाहट घर वापिस जाते पाखी के पर थामे
खिड़की के पल्लों को पकड़े दूर क्षितिज पर लगी अटकने 

दृष्टि खींचती है आकृतियाँ खुले गगन पर सूरमा लेकर 
धुआँ धुआँ होकर रह  जातीं खाका बनने से पहले ही 

शनैः  शनैः  होती विलीन जब राहों की ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियां 
जुगनू आकर ढली सांझ की दहलीजों पर दीप  जलाते 
सुधि के संदूकों के ताले जो बरसों से बंद पड़े थे 
अनायास ही बिन कुंजी के एक एक कर खुलते जाते 

चाहा जब जब उन्हें  खोल कर एक बार फिर से संगवाऊं 
छीर छीर होकर रह जाते, तह के खुलने से पहले ही 

कमरे की दीवारों पर आ प्रश्न बुना करते हैं जाले 
किन्तु थरथराकर  रह  जाते, संभावित सारे ही उत्तर 
अंकगणित के समीकरण को बीजगणित से सुलझाने  की 
कोशिश में मिटने लगते हैं लिखे हुए सारे ही अक्षर 

बिछी ज़िंदगी की चौसर पर रही सुनिश्चित हार सदा ही
मोहरे  सारे  पिट जाते हैं, पासा गिरने से पहले ही 

सतरंगी आँच से


जीवन की बगिया में आज फिर दहक उठे
कुछ पलाश रूपभरी सतरंगी आँच से
एक गात उभर रहा सामने नयन के आ
जब भी निहारा है प्रिज़्म वाले  काँच से

शतरूपे दृष्टि के वितान पर दिशाओं में
चित्र एक तेरा ही हर घड़ी उभरता है

थरथराती पाँखुरों से फिसलता हुआ तुहिन
द्रवित हुआ लगता है कुहसाइ भोर में
सरसराहटें झरी जो चूनरी के कोरों से
चूमती हैं कलियों को मधुपों के शोर में

मधुलके प्रभावित है मधुवन समूचा ही
पवन भी यहाँ आ के लड़खड़ाता चलता है

गूंजता है अलगोजा आप ही हवाओं  में
जल तरंग  छेड़ती है नव धुने सितार पर
बादलों के झुंड  नृत्य करते हैं व्योम में
फगुनाहट। छाती है गाती मल्हार पर

साधिके कलाओं का एक अंश पा तेरा
पुष्प धन्व सतरंगे रंग में संवरता है

2021 नव वर्ष ( गीत कलश पर ९०१वीं प्रस्तुति )

 


आशाओं के नए सूर्य को अब दिशिबोध लिखें
नई नीति के संकल्पों का हम संबोध लिखें

बीता बरस साथ लाया था पृष्ठ सियाही के
जो था लेखा जोखा सारा अंधकार में खोया
दिन की धूप चुरा ले जाती रही, भरी दोपहरी
और रात का एकाकीपन रिस नयनों से रोया
उगी भोर हाथों में लेकर प्रश्नपत्र थी भटकी
कोई सुलझा सकने वाला उसको मिला नहीं था
संध्या घर लौटी राहों में पूरा दिवस गँवा कर
रीता हाथों का कासा आख़िर तक  भी रीता  था

नव आशा​ ​के दीप जला अगवानी को थाली में
बिखरे कल के कलुषों   का मिल कर प्रतिरोध लिखें

गया बरस बीता उजाड़ कर सपनों की फ़सलो को
बड़े चाव से जो साधों ने आँखो में बोई थी 
आगे बढ़ते हुए कदम पीछे को वापिस लौटे 
बिछी सामने राह स्वयं में ही जैसे खोई थी 
पीछे छोड़ा जिसे हुआ वो घर भी अब अनजाना 
रिश्ते फिर से जुड़े नहीं सब परिचित चहरे खोये 
चुगता रहा वक्त का पाखी अपने पर फैलाकर 
बीज दिलासों के जितने भी मन ने मन में बोये 

कोरा नया कैनवास अब यह नया वर्ष लाया है 
आओ हम तुम मिल कर इस पार्ट नव अनुरोध लिखें 

स्वस्ति मंत्र अधरों पर लेकर हम सब करें प्रतीक्षा
अभिलाषाएँ नवल अल्पना से रच दें दहलीज़ें 
मानचित्र से गए वर्ष के सब पदचिह्न मिटाकर
नए पंथ अब चित्रित कर दे पौष कृष्ण की तीजें
नई आस के नव स्वप्नों में इंद्रधनुष की आभें
भर कर, सुरमा करके अपनी आँखों में फिर आँजें
उगते हुए दिवस की अरुणाई से सुबह संवारें
और सिंदूरी चूनर से सज्जित कर रख लें साँचें

कुंठा, क्षोभ, हताशा,हतप्रभता को आज भुलाकर
नए पृष्ठ पर नई उमंगों का नव शोध लिखें 

सपनों का अपराध नहीं है

 

अपनी झोली में बगिया के शब्द सुमन तो चुन न पाया 
लेकिन चाहा लिखा कथानक चर्चित हो, मंचित हो जाना 

सपनों का अपराध नहीं है जिन्हें आँजती आँखें दिन में 
दोषी है मन, महल बनाता रखकर नींवें बही हवा की 
आगत की मरीचिकाओं के भ्रम में डूबा बिखरा देता 
वर्त्तमान के मरुथल में जो छागल भरी हुई है आधी 

पहली सीढी पर पग रखने का विश्वास संजो ना पाया 
चाहे एक साथ ही पल में चार पांच मंज़िल चढ़ जाना 

चढ़ती हुई रात का हो या सपना उगती हुई भोर का
सपना तो अभियुक्त नहीं, वादी प्रतिवादी अवचेतन ही
आकांक्षाओं के व्यूहों में घिर कर रहता साँझ सकारे
औ यथार्थ के दर्पण में छवि देख नहीं पाता अपनी भी 

सीखा नहीं राह से गुज़रे हुए पंथियों के अनुभव से 
लेकिन चाहे जीवन पथ की हर उलझी गुत्थी सुलझाना 

चुटकी भर शब्दों की चाहत कोई विशद ग्रंथ हो जाना 
रहे व्याकरण से अनजाने संज्ञा क्या है और क्रिया क्या
क्या सम्भव है परिणति उनकी,किसने देखे नयन संजोए
जिन सपनों को कोई परिचय अपना भी मिल नहीं सका था 

सावन के मेघों से आते रहे नयन में उमड़ उमड़ कर
सपनों का अपराध नहीं है उनका छिन्न भिन्न हो जाना 

प्राण न होते कभी प्रतिष्ठित

अक्षत चन्दन धूप जलाकर, किसे पूजता है अनुरागी 
हर सिन्दूर पुते पत्थर में प्राण न होते कभी प्रतिष्ठित 

अपनी जगा आस्था तूने जिस मंदिर के द्वार बुहारे 
सीढ़ी सीढ़ी  से कंकर चुन पांखुरियों से राह सजाई 
कलश आस्थाओं के भर कर सींची थी जिस की फुलवारी 
संध्या में अपराह्न भोर में स्तुतियाँ और  आरतियां गाई 

उस मंदिर की खंडित प्रतिमा, व्यर्थ चढ़ाता रहा सुमन तू 
बधिर मूर्तियों पर कब होते स्वर कंठों के जाकर गुंजित 

जो मूरत  आधार शिला को स्वयं ढहाती कब पूजती है 
उसकी नियति नहीं बन पाए वह आराध्य किसी साधक का 
टूट चुके गुम्बद के साये से निहारता सूने पथ को 
शायद इधर कोई आ जाए अपने पथ से भूला भटका 

लेकिन मुरझाये फूलों को चुनता नहीं कोई पूजन को 
अभिलाषाएं बन मरीचिका होती रहें नयन में अंकित 

सिंहासन पर बैठ सोचता जो हर कोई उसको पूजे 
उसे जगह कब मिल पाती हैं कल परसों के इतिहासों में 
उसको तो नकार देते हैं याचक के फैले कासे भी 
अनुनय कितना करे, नाम भी शेष नहीं रहता साँसों में 

पाकर के नैराश्य, जलाना आशादीप नियति जीवन की 
देव गिर गया जो नजरों ने ,फिर से न हो पाता पूजित .  

पुरखों के देवालय में

 दुविधाओं में घिरा हुआ मन चाहे  वहीं लौटना फिर फिर

जहाँ शांति मिलती आइ है उस पुरखों के देवालय में 


बदले हुए समय की गतियाँ ,बदलें  नित्य प्राथमिकताएँ

पंथ स्वयं ही कदम कदम पर अवरोधों के फ़न फैलाए

मंज़िल के मोड़ों से पहले दिशा बदलती रही दिशा भी

भटकावों के चक्रव्यूह का बिंदु कौन गंतव्य बनाएँ


ऊहापोहों में जकड़ा हर निश्चय हुआ अनिश्चय चाहे

निर्देशन जो जीवन दे दे सच को जीने के आशय में


रहे उगाते नभ की अंगनाई में सूरज चाँद सितारे 

पुष्प पाटलों से सज्जित कर रखे सदा ही देहरी द्वारे 

जो था रहा कल्पनाओं के परे  उसी को वर्त्तमान कह

अपने को अपने ही भ्रम में उलझाते थे साँझ सकारे 


असमंजस में घिरे हुए हम कोशिश में है भूले अपनी

भूले, हर ढलती संध्या को जाकर के इक मदिरालय में 


नित्य छला करते हम अपने स्वयं प्रतिष्ठित विश्वासों को 

दिवा स्वप्न से कर देते हैं अपने संचित अहसासों को 

बसंती मनुहारों को हम ओढ़ा कर पतझर की चूनर

मन के स्पंदन में बोते  हैं टूट टूट बिखरी  साँसों को 


फिर से जीवन जीने का क्रम समझ सकें हम, इसीलिए ही

उगी भोर के साथ निकल कर जाते है फिर विद्यालय में 



21 November 2020



समय की तीव्र गति में चन्द पल वे रह गये थम कर
सिमट कर आये थे तुम जिस घड़ी भुजपाश में मेरे
 
बजे जब वायलिन कोई नदी के मौन से तट पर
सुरों की सरगमों के साथ लहरें नृत्य करती हौं
बुढ़ाई सांझ की धुंधला गई सी एनकों पर से
लड़ी सी जुगनुओं की यों लगे बुझती दमकती है
 
तुम्हारा नाम ही बस तैरता है वाटिकाओं में
कहीं पर दूर लगता बांसुरी धुन कोई है टेरे
 
लिखे हों श्याम पृष्ठों पर गगन के दूधिया अक्षर
उन्हीं में हैं अनुस्युत पत्र जो तुम लिख नहीं पाये
परस ने ओस के छेड़ी जो सिहरन पुष्प पाटल पर
उसी में गूँजते हैं गीत  हमने साथ जो गाये
 
धन्क के रंग में अंकित सपन समवेत नयनों के
हवा की गंध को रहते हमारे साये ही घेरे


शरद योवन की सीढ़ी पर प्रथम पग रख रहा उस पल
पिघल करचाँदनी टपकी निशा की शुभ्र चूनर से
स्वयं आकर टंके थे फूल नभ के ओढ़नी में आ
चमक  चंदा चुराता था तुम्हारे कर्ण झूमर से

हुआ है पंथ जो यह उननचालिस मीलों का
मेरी सुधियों में लेते हैं वही पगचिह्न। बस फेरे 

दिवाली २०२०

 


एक अदेखे भय से जकड़ी हुई गली से पगडंडी 
हर चौराहे पर हर दिशि में लटकी हुई लाल झंडी 
पग झिझक करते हैं करने पार द्वार को देहरी को 
होता है प्रतीत मोड़ों के पार खड़ी आकर चण्डी 
बीते हुए बरस आँखों में आने दूभर होते हैं 
आँखो पर दस्तक देते हैं सपने बीती चुके कल के 
“दीवाली पर जगमग जगमग जब सारे घर होते थे 

रही थरथराती दीपों में प्रज्ज्वलित हुई वर्तिकाएँ
क्या जाने किस खुली डगर से आएँ उमड़ी झंझाएँ
खील बताशे खाँड़ खिलौने बाज़ारों में नहीं दिखे
हलवाई की दूक़ानों पर गिफ़्ट बाकस भी नहीं चिने
होंठों तक आते आते शुभ के स्वर पत्थर होते हैं 
गल्प समझते हैं बच्चे भी सिमट रह गए कैमरों में
दीवाली पर जगमग जगमग जब सारे घर होते थे 

बुझी हुई आशाओं के सारे ही स्पंदन रुके लगे 
लेकिन फिर भी मन की अंगनाएँ में। इक विश्वास जगे
तिमिर हटाने को काफ़ी है एक दीप की जाली शिखा
एक किरण से दीपित होती है कोहरे में घिरी दिशा
 यही आस्था लिए आज हम गति को तत्पर होते हैं
खींचें स्याह कैनवस पर हम चित्र आज वे बहुरंगी
दीवाली पर जगमग जगमग जब सारे घर होते हैं 

मृग तृष्णाओं के जंगल में

  मृग तृष्णाओं केजंगल में   इक मरीचिका के कोहरे में लिपटे हुए बिताई हमने हर सुबहा हर शाम हाँ ये तो था ज्ञात हमारी दृष्टि भरम में डूबी फिर भी...