जो खुला आकाश

जो खुला आकाश स्वर में है तुम्हारे ओ बटोही
देखना उस पर घिरें ना आ कहासे संशयों के

उग रहे कितने प्रभंजन हर दिशा की वीथियों में
राजनीति. धर्म, भाषा, जाती की चादर लपेटे
चक्रवातों से, उमड़ कर चाहते अस्तित्व घेरें
हो रहे आतुर , बवंडर साथ में अपने लपेटे

आज के इस दौर में स्वाधीन स्वर सुनता न कोई
सोच यह, पड़ने न देना अक्स अपने निश्चयों पे

जो खुला आकाश स्वर में है, धारा पर गूंजता है
सरगामे बारादरी पर हो खड़ी पथ को निहारें
एक उठती गूंज अद्भुत खुल रहे स्वर में बटोही
साथ उसके भाव के पाखी उड़ें बन कर क़तारें

लालसाएँ व्यूह रच कर दे रही आवाज़ तुमको
भेदना तुम जाल उनके नयन लेकर संजयों के 

ज़िंदगी है हमसफ़र दरवेश बन कर ओ बटोही
राह में गतिमान रहना है नियति उसकी तुम्हारी 
दूर रह कर बन्धनो से तुम रहो स्वच्छंद  नभ में 
फिर समय की चॉसरों पर जीत हो हर पल तुम्हारी 

ये खुला स्वर जो खुले आकाश में गुंजित रहा है 
वह उभरता नित रहेगा, साज में से निर्भयो के 

राकेश खंडेलवाल 

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जाल सन्नाटे निरंतर बुन रहे हैं

सभ्यता के कौन से इस मोड़ पर है आ खड़े हम
बढ़ रही यूँ भीड़, काँधे हर कदम पर छिल रहे है
कान तो बंधक हमारे हेडफ़ोनो की जकड़ में
होंठ हैं चुप, जाल सन्नाटे निरंतर बुन रहे हैं

रीतियाँ अब संस्कृतियों की उपेक्षित हो रही हैं
रह गए सम्बंध सीमित कुंजियों की खटखटों पर
कोई भी त्योहार हो या पर्व हो वार्षिक दिवस का
आश्रित हो कर खड़े सब वहाट्सेप्प की चौखटों पर

खा चुके हैं ठोकरें जिन पत्थरों से राह में हम
पथ हमें फिर से दिखाने को उन्ही को चुन रहे हैं

अजनबियत की घटाए ओढ़ बैठी हैं दिशाएँ 
आइने के बिम्ब। ही पहचान में आते नहीं है
भोर की आ अलगानी पर बैठते जितने पखेरू
देखते हैं प्रश्न लेकर , कोई सुर गाते नहीं है

सोच बिन छीना हमीं ने कंठ स्वर कल पाखियों के
आज इनको मौन पाकर, हम सरों को धुन रहे हैं

उग रहे कितने प्रभंजन भेजते हम ही निमंत्रण
राह को झंझाएँ कितनी द्वार तक आकर। बुहारें
स्वार्थ की लिप्साओं में लिपटे हुए एकाक्षी हम
एक ही प्रतिबिम्ब अपना सिर्फ, दृश्यों में निहारें 

भेजती चेतावनी नित, भोर, संध्या और दुपहरी 
पर पलक को मूँद कर हम, कब कहाँ कुछ सुन रहे हैं 

वहीं जाकर माना लेंगे

  चले ये सोच कर भारत, वहाँ छुट्टी मना लेंगे
पुरानी याद जो छूटी हैं गलियों में उठा लेंगे

वहाँ पर पाँव रखते ही नयन के स्वप्न सब टूटे
जो कल परसों की छवियाँ थी सभी इतिहास में खोई
कहीं दिखता न पअपनापन उमड़ती बेरुख़ी हर सू
नई इक सभ्यता के तरजुमे में हर ख़ुशी खोई

वो होली हो दिवाली हो , कहें हैप्पी मना लेंगे
मिलेंगे वहात्सेप्प संदेश तो आगे बढ़ा देंगे

कहीं भी गाँव क़सबे में ,न परचूनी दुकानों पर
खिलौने खाँड़ वाले साथ बचपन के ,नहीं दिखते
न  पूए हैं मलाई के ,न ताजा ही इमारती हैं
जिधर देखा मिठाई के चिने डिब्बे ही बस सजते

यहाँ जो मिल रहा उसको वहीं फ्रिज से उठा लेंगे
चलें मन हम ये दीवाली  जा अपने घर  मना लेंगे

हमारे पास हैं मूरत महा लक्ष्मी गजानन की
घिसेंगे सिल पे हम चंदन, सज़ा कर फूल अक्षत भी
बना लेंगे वहीं पूरी कचौड़ी और हम गुझिया
बुला कर इष्ट मित्रों को  मनेगी  अपनी दिवाली

पुरानी रीतियाँ को हम पुनः अपनी निभा लेंगे
उजालों के लिए मिट्टी के फिर दीये तलाशेंगे
पुराने बाक्स से लेकर उन्हें फिर से जला लेंगेवही

उजालों के लिए मिट्टी के फिर दीये तलाशेंगे

कभी संध्या में जलते हैं किसी की याद के दीपक
कभी  विरहा में जलते हैं किसी के नाम के दीपक
कभी राहों के खंडहर में कभी इक भग्न मंदिर में
कोई आकर जला जाता किशन के राम के दीपक 
मगर जो राज राहों पर घिरे बादल अँधेरे के 
कोई भी  रख नहीं पाता उजाले को कोई दीपक 
चलो निश्चित करें हम आज, गहरा तम मिटा देंगे 
उजालों के लिए मिट्टी के फिर दीये तलाशेंगे 

जले हैं कुमकमे अनगिन कहीं  बुर्जों  मूँडेरो पर
उधारी रोशनी लेकर, जली जो कर्ज ले ले कर  
कहीं से बल्ब आए हैं कहीं से ऊर्जा आई 
चुकाई क़ीमतें जितनी बहुत ज्यादा  हैं दुखदाई 
किसे मालूम लड़ पाएँ ये कितनी देर तक तम से
टिके बैसाखियों पर बोझ ये कितना उठा लेंगे
चलें लौटें जड़ों की ओर, हमें विश्वास है जिन पर
उजालों के लिए मिट्टी के फिर दीये तलाशेंगे

बहत्तर वर्ष बीते हैं मनाते यूं ही दीवाली 
न खीलें हैं बताशे हैं रही फिर जेब भी खाली 
कहानी फिर सूनी वो ही, कि कल आ जाएगी लक्ष्मी 
बसन्ती दूज फिर होगी सुनहरे रंग की नवमी  
सजेगा रूप चौदस को, त्रयोदश लाए आभूषण 
खनकते पायलों - कंगन के सपने कितने पालेंगे 
चलें बस लौट घर अपने, वहीँ बीतेंगे अपने दिन 
उजाले के लिए मिट्टी के फिर दीपक जला लेंगे 

राकेश खंडेलवाल 



फिर दीपक जला लेंगे

करेंगे मेजवानी कब तलक छाए अंधेरों की
भला कब रूढ़ियों के चक्र से ख़ुद को निकालेंगे
भले ही भूल बैठा हो दिशा इस ओर की सूरज
उजालों के लिए मिट्टी के फिर दीये तलाशेंगे

नए फिर थाम  कर निश्चय कमर कस कर के तत्पर हो
नए संकल्प हम लेकर बना लेंगे दिशा अपनी
नहीं है शेष आशा की अपेक्षा हुक्मरानों से
हुए जो खोखले वायदे न बनते नींव सपनों की

नए निश्चयहमारे हैं नयीं राहें बना लेंगे
उजालों के लिए मिट्टी का फिर दीपक जला लेंगे

सहारा ढूँढने की जो हमें अब तक बिमारी ही
उसी को तो भुनाते हैं हमारे ही चुने शासक
शिकायत, हाथ फैलाना, कोई दे दे मदद हमको
हमारी उन्नति  में हो गया सबसे  बड़ा बाधक

अगर हम तोड़ कर रेखा, क़दम अपने बढ़ा लेंगे
उजाले तब स्वयं आकर हमारा पथ सज़ा देंगे

बहुत दिन हो चुके, इक नींद में संवाद सेवा थी
उठी अँगड़ाइयाँ लेकर अमावस के अंधेरों में
अगर ये व्यस्तताओं का कलेवर जो तनिक उतरे
 नहीं फिर देर लग पाए,  नए  उगते सवेरों में

यहाँ आ गीत-ग़ज़लें नित नई शमअ जला लेंगे
उजालों के लिए मिट्टी के फिर दीये तलाशेंगे।




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आज तुम मुझको जगाकर जगमगाओ


खो गया  हूँ धुँध से घिर कर अंधेरों के शहर में
दीप मेरे आज तुम मुझको जगा कर जगमगाओ

सूर्य तो बंदी हुआ है राजमहली तलघरों में
औरकिरणो की गति पर लग रहे पहरे निरंतर

हम बहलते रह गए है देख कर बस चित्र धुंधले
आइनों पर धूल की परतें जमी है इंचियों भर

प्रार्थना में हुआ रत मन माँगता प्रतिदान इतना
इन अंधेरों से मुझे अब मुक्ति थोड़ी तो दिलाओ

पार तक बिखरी क्षितिज के अब तिमिर की राजधानी
कोई भी सम्भावना अब रोशनी की दिख न पातीं
कब तलक देंगे दिलासा है अँधेरा रात भर का
रात ढलने की कोई सूरत नजर में आ न पाती 

तुम अमावस की निशा से लड़ रहे दीपक अकेले
मैं तुम्हारा साथ दूँगा आओ पग से पग मिलाओ 

एक तुम पर ही टिकी है आस्था परिवर्तनों की
युद्ध में तुमसे पराजित हो हटेंगे यह अंधेरे
मैं उठा संकल्प नूतन साथ चलता हूँ तुम्हारे
हम बुला कर लाएँगे इस ओर फिर खिलते सवेरे

दीप मेरे जोड़ तुमसे मैं नई संभावनायें
हो रहा तत्पर चलो अब इक नए दिन को बुलाओ 

राकेश खंडेलवाल 












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आज उतरा है धरा पर


आज उतरा है धरा पर अवतरित जो रूप होकर
मेनका भी उर्वशी भी देख कर हैरान होते

चाँदनी की झील से उभरा हुआ यह संदली तन
पाँव  में रचती ​म​हावर ला​लि​माएँ आ उषा की
गंध के बादल उड़ाती  कुन्तलों की एक थिरकन
नैन की परछाइयों से कालिमा सजती निशा की

मदभरी इक​ दॄष्टि  के इंगित-भ्रमों  का स्पर्श पाकर
इंद्र​ ​के मधु के कलश भी  ​मुंह ​ छुपा हलकान होते

विश्व​कर्मा ​के सपन की एक छवि जो हाथ में ले
कूँचियाँ, उसने ज​तन ​ से शिल्प में जैसे चितेरी
​रंग​पट्टों के ख़ज़ाने खोल कर अपने समूचे
विश्व की सम्मोहिनी ले एक प्रतिमा में उँडे​री ​

देवता, गंधर्व, किन्नर और मानव, ऋषि मुनि सब
एकटक बस देखते है , देखकर हैरान होते

पाँव को छू पंथ की भी धूल में आ फूल खिलते
पड़ रही परछायों से सैकड़ों ​सँवरी अजंता
ओस में निखरे ​हुये ​प्रतिबिम्ब से बँनती एलोरा
और ​तन ​की कांति छूकर स्वर्ण का पर्वत पिघलता

देख कर सौंदर्य का यह रूप अद्भुत और अलौकिक
शायरों के होंठ पर हर पल नए दीवान होते

जो खुला आकाश

जो खुला आकाश स्वर में है तुम्हारे ओ बटोही देखना उस पर घिरें ना आ कहासे संशयों के उग रहे कितने प्रभंजन हर दिशा की वीथियों में राजनीति. धर्म...