अनायास ही गीत बुन गये


मैने चाहा नहीं लिखूं मैं कभी गज़ल या कविता कोई
शब्द स्वयं ही मुझ तक आये, अनायास ही गीत बुन गये

मैं अनजान काव्य के नियमों से, छन्दों की परिभाषा से
बहर काफ़िये औ रदीफ़ की मेरे शब्द कोश से दूरी
नहीं व्याकरण की गलियों का पता मिला मुझको नक्शे मे
 दोहे,चौपाइ ​कवित्त से, मिली नहीं मुझको मंजूरी

फिर भी भाव भटकते आय्र अनजाने मेरी देहरी पर
और सफ़र में पग धरने को मेरा आकर साथ चुन गये

लय गति और मात्राओं की गिनती मुझको तनिक ना आई
छन्द भेद की सारिणियों का मुझको कोई ज्ञान नहीं है
कहां अन्तरा रुकता, होती कहाँ वाक्य की पुनरावृत्तियां
इनका भेद किस तरह जानूँ, ये मुझको अनुमान नहीं है

 जितनी बार कंठ की खिड़की से बाहर ​मेरे स्वर झांके
सरगम ने चूमा फ़िर लय के साथ सजा कत उन्हे सुन गये

मन अम्बर में भाव विचरते रहते बिना किसी अंकुश में
बांधा करती है शब्दों की डोरी कोई कलाकार की
मेरी झोली रही कृपण ही शब्दों से भी भावों से भी
और कभी संप्रेषणता सेहो न सकासाक्षात्कार भी

यों बस हुआ शब्द जितने भी चढ़े भाव के करघे पर आ
थे चाहे अनगढ़ लेकिन सब किसी छन्द की राह धुन गये

फूल सूखे किताबों में मिलते नहीं


शैल्फ में ही रखी पुस्तकें रह गईउंगलियां छू के अब पृष्ठ खुलते नहीं 
आज करने शिकायत लगी है हवाफूल सूखे किताबों में मिलते नहीं 

वे ज़माने हुए अजनबी आज जबसाँझ तन्हा  सितारों से बातें करे
 इत्र में भीगे रूमाल से गंध उड़ याद की वीथियों में निरंतर झरे 
दॄष्टि  की कूचियों से नयन कैनवस पर उकेरे कोई चित्र आकर नया 
मौन की स्याहियाँ ले कलम पगनखीभूमि पर अपने हस्ताक्षरों को करे 

ढूँढती है नजर भोर से सांझ तककोई चूनर कही भी लहरती नहीं
ना ही शाने से रह रह फ़िसलते हुयेउंगलियों पे वे पल्लू लिपटते नहीं

कुन्तलों की रहा अलगनी पे टँगा फूल मुस्का रहा था गई  शाम से
मोगरे का महकता हुआ बांकपन भेजता था निमंत्रण कोई नाम ले
कंगनों में उलझती रही वेणियां  आज की है नहींबात कल की रही
लग रहे चित्र सार ​महज  अजनबीदूर इतने हुये याद के गांव से

तोड़ कर रख लिए एक गुलदान मेंमेज की शोभा चाहे बने चार दिन
कल के टूटे हुए फूल वासी हुएदेव के शीश पर जाके सजते नहीं 

​दॄष्टि उठ कर झुके फिर से  गिर कर उठे और कहती रहे शब्द बिन बात को 
देह के नभ पे बिखरे हुए हों चिकुर, नित्य लज्जित करें मावसी रात को 
कितनी नदियों के उठ कर चले हों भंवर, चाह लेकर समाहित हों त्रिवली में आ 
गंध पूरबाइयों से झरे आतुरा थामने के लिए संदली हाथ को

चित्र नयनों के ये है दिवास्वप्न जो  भोर आने तलक 
​तो
 ठहरते नही
कल्पना के वि
​हग 
फड़फड़ाते हुए आज के 
​व्योम पर ​
आ विचरते नहीं 

दिये जलाकर ढूंढ रहे

तमस राह में
दिया जला कर
ढूंढ रहै तकदीर
जिन हाथो में
शेष न कोई
बाकी रही लकीर

कबिरा की 
​विकलांग ​ लुकाठी
 हाथों में थामें 
सांस भिखारिन उस
द्वारे पर
आ भिक्षा मांगे

जिस द्वारे पर
पंक्ति बना कर
सत्तर खड़े फ़कीर

बिना सुई की
घड़ियां पहने
इठलाती दीवार
टिका हुआ है
कैलेंडर सा
परसों का अखबार

​खबर छपी कल
​लुटने वाली
धड़कन की जागीर 

​रही रिक्त 
सन्देश बिना 
इक काँधे की झोली 
सूनी  छत पर
कोई चिरैय्या 
आकर न बोली 

लक्ष्मण रेखा 
खींच खड़ा खुद 
जमनाजी का तीर  ​


मंजिल

जीवन पथ पर पल पल उगती रही लालसा इक मंज़िल की
इस मंज़िल पर आकर पाया मन्ज़िल ढूंढ रही खुद मंज़िल

थी मरीचिकाओं में लिपटी इस मंज़िल पर आती राहें
 झंझाओ की भूलभुलैया पल पल पर डाले थी डेरे
यात्रा में पाथेय नीङ का कोई अंतर  शेष नही था
पता नही था सांझ ढली कब और किस घड़ी उगे सवेरे

इस मंज़िल पर आकर यह मन प्रश्न स्वयं से ये करता है
इस मअंजिल की बहॉग दौड़ में क्या कुछ तुझे हुआ है हासिल

मोड़  मोड़ पर झंझाओ से जूझा एकाकी यायावर
बोता रहा कदमतलियों  में लाकर सूरज चांद सितारे
पार  किये अनगिन कंटक  वन फूल सजाने को इस पथ पर
यज्ञ परीक्षा की आहुति में होम किये सब स्वप्न सँवारे

थी असाध्य जो और असंभव करते रहे तपस्याएं वे
किंतु एक बादल का टुकड़ा भी छाया को न पाया मिल

इस मंज़िल पर आकर जाना, हर इक मंज़िल दिवास्वप्न है
धुँधलाये दर्पण में तिरती किसी धुंये की परछाई सी
 करती है सम्मोहित  मन को सुखद सुनहरे सपने  दर्शा
मौन किसी निर्जन  में बजती हो प्रतीत एक शहनाई सी

मंज़िल की राहों पर चलकर पा जाता हर कोई मंज़िल
कोई पाए मनचाही तो बने किसे की भटकन मंज़िल

 

में इस मंज़िल पर




जीवन के पथ पर अनगिनती मंज़िल मिलती यायावर को
में इस मंज़िल पर आकर हूँ एक नई मन्ज़िल  तलाशता

मोड़ मोड़ पर मिली मन्ज़िलें स्वागत में बाँहें फ़ैलाये
आमंत्रण देती, सन्ध्या का नीड़ वहीं अंतिम बन जाये
पथ की बाधाओ को सहकर जो परिणाम अपेक्षित पाया
कर संतोष उसी में, यात्रा वहीं पूर्ण तय कर दी जाये

 पर मन का उतावलापन तो ​नये क्षितिज की खिड़की खोले
​ दूर नजर की सीमाओं  से रहे ध्येय को फिर पुकारता


संचय की प्रवृत्ति तो जीवन का प्राकृतिक ही स्वभाव है
पूर्ण पूर्णता पा लेने पर भी लगता कुछ तो अभाव है
इस मन्ज़िल पर आकर ऐसी ही अनुभूति जगी है मन में
यह मन्ज़िल है बस मरीचिका, दूर अभी मेरा पड़ाव है

रिक्त हो गई गठरी की  में खोल तहे सीधी कर लेता
और भोर में पाथेयों की निधियां फिर नूतन निखारता ​


मन्ज़िल की परिभाषाये टी हर मंज़िल पर आकर बदलीं  
नई भोर के साथ डगर के अम्बर पर छाई नव बदली
झंझाओ से पथचिह्नों को मील सदा आयाम नए ही
कदम कदम पर संकल्पो को देख देख बाधाएं सम्भली

इस मंज़िल पर, मंज़िल ही अब दिखा रही है दूजी मंज़िल
मैं नव मंज़िल का नूतन पथ मानचित्र में हूँ संवारता 

संस्कार तो बंदी लोक कथाओं मर


संस्कार तो बन्दी लोक कथाओं में
रिश्ते नातों का निभना लाचारी है

जन्मदिनों से वर्षगांठ तक सब उत्सव
वाट्सएप की एक पंक्ति में निपट गये
तीज और त्योहार, अमावस पूनम भी
एक शब्द "हैप्पी" में जाकर सिमट गये

सुनता कोई नही, लगी है सीडी पर
कथा सत्यनारायण कब से जारी है

तुलसी का चौरा अंगनाई नहीँ रहे
अब पहले से ब​हना भाई नहीं रहे
रिश्ते जिनकी छुअन छेड़ती थी मन में
मधुर भावना की शहनाई, नहीं रहै

दुआ सलाम रही है केवल शब्दो में
​और औपचारिकता सी  व्यवहारी हैं

जितने भी थे फेसबुकी संबंध हुए
कीकर से मन में छाए मकरंद हुये 
भाषा के सब शब्द अधर की गलियों से
फिसले, जाकर कुंजीपट में बंद हुए

बातचीत की डोर उलझ कर टूट गई
एक भयावह मौन हर तरफ तारी है 

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उम्र ढलते ही

छंट गई है गर्द सारी आइने से यकबयक ही
उम्र ढलते ही दिखा है सत्य हर परदा हटा कट

दम्भ अपने बाजुओं का कर समर्पण चुप खड़ा है
धुंध में डूबी नजर रह रह पलक को 
​मि​
​मि​
चाती
कान का 
​है 
ध्यान सारा द्वार की चुप सांकलों पर
डाकिया आ खटखटाये हाथ 
​में 
 
​ले 
 
​को
ई पाती

तोड़ परिचय राह चल दी उम्र के इस मोड़ से
​,​
 अब
दृष्टि  में उभरे नहीं है कोई चेहरा मुस्कुराकर 

​मंज़िलों की सीढ़ियां भी मांगती विश्राम प्रतिपल 
दिन निकलते पूछता है सांझ कितनी दूर है अब 
दोपहर रखकर हथेली आँख पर ताके दिशाएँ 
बादलों की पालकी ले छाँह को, आ पाएगी कब

हर कदम आगे बढा  है इक असीमित बोझ लेकर 
कोई शायद नाम ले ले  ​दूर से उसको बुलाकर 

उम्र ढलते ही हुये  हैं स्वप्न सारे पतझड़ी वे
जो सजे चढ़ती उमर के नयन में आ गुलमोहर से
प्रश्नचिह्नों की लगी है अनवरत लम्बी कतारें
औऱ उत्तर है तिरोहित जिंदगी की पुस्तको से

 ग्रीष्म के इक मरुथली नभ सा तिरा है शून्य केवल 
स्पर्श कुछ देती हैं हैं अब हवा भी गुनगुनाकर 

अनायास ही गीत बुन गये

मैने चाहा नहीं लिखूं मैं कभी गज़ल या कविता कोई शब्द स्वयं ही मुझ तक आये , अनायास ही गीत बुन गये मैं अनजान काव्य के नियमों से , छन्दों...