कितनी बार जलाए

 
कितनी बार जलाए हमने अपनी आशाओं के दीपक 
सोचे बिना तिमिर का खुद ही हमने ओढ़ा हुआ आवरण 

कल की धूप बनाएगी अपने आँगन में रांगोली
इंद्रधनुष की बंदनवारें लटकेंगीं द्वारे पर आकर
आन बुहारेंगी गलियों को सावन की मदमस्त फुहारें
मलयानिल बाँहों में भरना चाहेगी हमको अकुलाकर 

कितनी बार आँजते आए हम यूँ दिवास्वप्न आँखों में
ज्ञात भले थादिन के सपनों का हो पाता नहीं संवरण

कितनी बार जलाए हमने धूप अगरबत्ती मंदिर में
अभिलाषित हो उठा धूम्र यह नील गगन तक जा पहुँचेगा 
ले आएगा अपने संग मेंकल्प वृक्ष की कुछ शाखाएँ
पारिजात की गंधों से तन का मन का आँगन महकेगा 

कितनी बार कल्पना को निर्बाध उड़ाया किये व्योम में
कर्मक्षेत्र के नियमों का तो कर न पाये कभी अनुसरण 

कितनी बार जलाए टूटे हुए स्वप्न आलाव बिठाकर
और सुबह के होते होते गुल दस्तों में पुनः सजाया
रहा विदित परिणति क्या होगी डाली से टूटे फूलों की 
फिर भी हमने भ्रम के झूलों में ख़ुद को हर बार झुलाया

कितनी बार हुई है खंडित अपनी आराधित प्रतिमाएँ
और सोचते अगले पल हो, इनमें आकर ईश अवतरण

राकेश खंडेलवाल








ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे

शरद की पूर्णिमा से हो शुरू यह
सुधाये है टपकती व्योम पर से
जड़े है प्रीत के अनुराग चुम्बन
लपेटे गंध अनुपम,पाटलों पे
किरण खोलेगी पट जब भोर के आ
नई इक प्रेरणा ले हंस पड़ेंगे
नयी परिपाटियों की रोशनी ले
ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे

यही पल हैं कि जब धन्वन्तरि के
चषक से तृप्त हो लेंगी त्रशाए
“नरक” के बंधनों से मुक्त होकर
खिलेंगी रूप की अपरिमित विभागों
भारत की पूर्ण हो लेगी प्रतीक्षा
वियोगि पादुका से पग मिलेंगे
नए इतिहास के अब पृष्ठ लिखने
ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे

मिटाकर इंद्र के अभिमान को जब
हुआ गिरिराज फिर  स्थिर धरा पर
बना छत्तीस व्यंजन भोग छप्पन
लगाएँ भोग उसका  सिर झुकाकर
मिलेंगे भाई जाकर के बहन से
नदी यमुना का तट। शोभित करेंगे
मनाएँगे उमंगों के पलों को
ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे


घटता नहीं किन्तु सूनापन

संचारों के नए माध्ययम नित्य जुटा कर रखता है मन 
घटता नहीं किन्तु सूनापन 

ट्विटर फेसबुक वॉट्सऐप के साथ वायबर स्काइप है 
लेकिन अपनापन महकाए, वो ही इन सबसे गायब  है 
बढ़ा और भी एकाकीपन
 घटा नहीं घिरता सूनापन 

इंटरनेट उंगलियों पर है, जेब रखा ये स्मार्टफोन है 
जिसका स्वर कानों में मिस्री घोल सके बस वही मौन है 
गौरय्या   न फुदके   आँगन 
बढता और अधिक सूनापन 

मिलती बीस ट्वीट, मिल जाती सौ दोसौ रोजाना लाइक 
लेकिन रहता स्नेह संदेसा होकर एक तिलिस्मी, गायब 
महके नहीं हवा ला चन्दन
बढता है बस एकाकीपन 

तुम ही

तुम ही क्रिया तुम्ही संज्ञा हो,
सर्वनाम भी मीत तुम्ही
तुम ही भाषा तुम्ही व्याकरण
साज तुम्ही संगोत तुम्ही

खड़िया पट्टी, बुदकी तख्ती
आ ओलम सारे अक्षर
कंठ कंठ से मुखर गूंजता
शब्द शब्द व्यंजन औ स्वर 
बारहखाडियो की संरचना
का जो ध्येय तुम्ही तो हो
अधरों की कंपन में उतरा
जो वह तुम ही हो सत्वर+

चंद्रबिंदु तुम, तुम विराम हो 
शब्द संधि की रीत  तुम्हीं 

गुणा भाग के समीकरण का 
हासिल जो  परिणाम तुम्हीं
जोडा और घटा कर देखा 
शेष रहा जो नाम तुम्हीं 
बीजगणित के अंकगणित के
सूत्र तुम्हीं से प्रतिपादित
रेखाओं में बँधे सितारे
ग्रह तुम ही नक्षत्र तुम्हीं 

तुम ही इक कल आने वाला
और गया जो बीत तुम्हीं 

वर्णन सिर्फ तुम्हारा ही है
युग युग के इतिहासों में
तुम ही रहे साथ में प्रतिपल
मरुथल में, मधुमासों में
चेतन और अचेतन का हो
अवचेतन का केंद्र तुम्ही
 बंद पलक का तम हो तुम ही
मुदित तुम्ही उजियासों में

तुम ही मैं हो, मैं भी तुम हो
जीवन की हो प्रीत तुम्ही
तुम ही क्रिया, विशेषण तुम ही
सर्वनाम भी मीत तुम्ही




क्या करोगे अब बनाकर

क्या करोगे अब बनाकर स्वप्न के फिर से घरोंडे
रात के ढलते पलों तक जब कोई टिकता नही है

कब तलक दोगे दिलाए है अँधेरा रात भर का
एक युग बीता ,तिमिर जो घिर गया छंटता नहीं है
सुन रखा था दस बरस में भाग्य भी करवट बदलता
पर यहाँ का , ​अंगदी है पाँव जो टलता नहीं है


फायदा क्या बीज बो​ने ​का पठारी बंजरो में
जब यहां पर दूब का तिनका तलक  उगता नही है

वक्त की अंगड़ाइयाँ ने रख दिया सब कुछ बदलकर
पर तुम्हारी ही गली में समय थम कर रह गया है
उड़ चुके पाखी प्रवासी फिर पलट कर नीड अप​ने ​
तुम अभी भी सोचते हो कौन कल क्या कह गया है 

क्या करोगे तुम बनाकर एक वह इतिहास फिर से
पृष्ठ तिमिराये हुए जिसके कोई पढ़ता नही है

युग बदलता  जा रहा पर तुम खड़े अब तक वहीं हो 
जिस जगह पर कोई पाँखुर उड़ कहीं से आ गई थी 
सारिणी में ढल रहे दिन की अभी भी खोजते हो 
भोर में जिन सरगमों को सोन चिड़िया गा गई थी 

क्या करोगे अब बनाकर, चित्र झालर पर हवा की
कोई झोंका इक निमिष भी जब कहीं रुकता नहीं है 

राकेश खण्डेलवाल

याद की आज फिर से किताबे खुली

याद की आज फिर से किताबे खुली
सामने आ गई एक उजड़ी गली
जिसकी खिड़की के टूटे हुए कांच में
झाँकती चंद परछाइयां मनचली

हो परावर्तिता चित्र धुंधले दिखे
सामने खंडहर हो चुकी भीत पर
एक कंचा रहा धूल से झांकता
झुंड से गिर गया बाजियां जीत कर
सामने नीम पर शाख में झूलती
कुछ पतंगे लिए कट चुकी डोरियां
एक झोंका हवा का सु​नाता  हुआ
सरगमो में वो भूली हुई लोरियां

यों लगा झनझनाती हुई पैंजनी
फिर से पनघट से लौटी इधर को चली
सामने थी रही वो ही ​सूनी  गली

खेल का सामने वो ही मैदान था
जिसमे अक्सर कबड्डी के खेले हुए
गेंद की चोट खा बिखरी ​पंढरियाँ 
चूड़ियों और गुटको के मेले हुए
आज भी लग रहा उड़ रहीं गिल्लियां
छूके डंडे, किन्ही पाखियों की तरह
एक पल भी कभी होवे ​विश्राम  का
उन दिनों कोई इसकी नही थी वजह

जिस का सान्निध्य था बस समय के परे
चाहे राते घिरी या कि शामें ढली
सामने वस रही वो ही उजड़ी गली

नीम का पेड़ वो इक घनी छाँह का
जिसके नीचे कथाएँ गई थी बुनी
कोई आल्हा कहे छेड़ सारंगियाँ
कोई रामायणी के अधर से सुनी
आज भी उसके आँगन में दीपक रखा
और तुलसी के चौरे के अवशेष थे
पर सभी वे हुए गुम शहर में कहीं
इस तरफ़ आया करते जो दरवेश थे

कोशिशों में भुलाने की तल्लीन् है
आज के पल लुभाते हुए ये छली
भूलती ही नहीं आज भी वह गली


आज निकले गली के उसी मोड़ से
आ गए दूर कितने पता ना चला 
एक पल पार जो था किया एक दिन 
मार खा वक्त की शेष अब न रहा 
है शशोपंज क्या उसका सतीत्व भी 
है अभी तक बदलते हुए दौर में 
याद के पाखियों का बने नीड फिर 
लौट कर के कभी एक उस ठौर में 

जानते हैं असंभव है ये बात पर 
चाह तो उड़ती  फिर फिर वही को चली 
 भूलती ही नहीं  एक संकरी गली  ​

मैंने उसको छुपा के


मैंने उसको  छुपा के अपनी अनुभूति इक पत्र लिखा था
कुशल क्षेम के शब्दों तक ही सीमित करके बात कही थी

लेकिन पता नहीं था मुझको उसकी गहन परख की नज़रें
अक्षर की आकृति में गुँथ जाते भावों को यूँ पढ़ लेंगी
शब्द शब्द के मध्य बिछी है अर्थ लिए जो कतिपय दूरी
उसको सहज भूमिका कर के इक नूतन गाथा गढ़ लेंगी

सम्भव है उसकी स्मृतियों में शिलालेख होंगे वे पल जब
मेरी मूक दृष्टि ने चुपके चुपके उसकी बाँह गही थी

जितने भी संदर्भ पत्र की पृष्ठ भूमि में छुपे हुए थे
उसे विदित थे जाने कैसे, जोकि किसी ने नहीं बताए
उसके अधर गुनगुनाते थे सरगम पर उन ही गीतों को
एकाकी संध्या में मैंने पूरबा को इक रोज  सुनाए

सूनेपन की चादर ओढ़े था उस दिन वह तीर नदी का
जब कि किसी की गंध मलयजी छू मुझको चुपचाप गयी थी

ये  भी तो सोचा था मैंने उसे पत्र लिखने से पहले
क्या संबोधन देकर अपने संदेशे को शुरू करूं मैं
नाम लिखा था केवल उसने भांप लिया ये जाने कैसे
किन भावों का एक नाम की सीमितता में हुआ समन्वय


मैंने उसको छुपाके मन की बातों को सन्देश लिखा था 
लेकिन उसको छिपी हुई हर अनुभूति, अभिव्यक्त रही थी 


कितनी बार जलाए

  कितनी बार जलाए हमने अपनी आशाओं के दीपक   सोचे बिना तिमिर का खुद ही हमने ओढ़ा हुआ आवरण   कल की धूप बनाएगी अपने आँगन में रांगोली ...