कोई संकेत देता रहा

 कौन संकेत देता रहा साँझ से

आँजने के लिए
चंद  मधुरिम सपन 

ज्यों ही अंतिम चरण
आ गया मंच पर 
दिन के अभिनीत
होते हुए दृश्य का
और तैयार होती 
हुई साँझ ने 
फिर से दुहराई 
अपनी चुनी भूमिका

एक तीली उठी आँख
मलते हुए
जागने लग पड़ी
वर्तिका में अग़न

कौन संकेत देता रहा 

झाड़ियों में घिरे 
झूटपटे में कहीं 
बूँद बन गिर रही
यों लगा चंद्रिका 
स्वर उमड़ते हुए
बादलों से घिरे
देते आभास 
गूंजित हुए गीत का 

मोड़ से देखते 
मुस्कुराते हुए
सुरमई रात के 
काजरी  दो नयन 

कौन संकेत देता रहा 

सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते
रुकी रात जब
छत के विस्तार को
नापने के लिए
कुछ सितारे रहे
इक प्रतीक्षा लिए
चूनरी का सिरा 
थामने के लिए 

पाँव लेकिन थमे 
उठ न पाए तनिक 
उनको जकड़े रही
एक वासी थकन 

कोई संकेत देता रहा 



फिर आइन चैतिया हवाएँ

 

पूनम की चंदियाई साड़ी धुली ओस के झांझर पहने
स्वर्णकलश से धूप उँडेले आती हैं चैतिया हवायें

मिला भोर का स्पर्श गुनगुना
हुई बालियों में कुछ सिहरन
होने लगी फरफ़ूरी न में
पात पात ने छेड़ीं सरगम 
ट्यूब वेल की ताल ताल पर
थिरक रहां है खलिहानों पथ
पगडंडी पर लगी क़तारें
मंडी तक मनता है उत्सव 

होली मना, विदाई लेकर लौट चुका है शिशिर गाँव से 
तालाबों  के तट पर आकर जल तरंग पायल खनकाएँ 

होड़ पतंगो से करती सी
उड़े गगन तक धानी चूनर 
चौपालों से मुँडेरों तक
लगे झनकने पग के नूपुर
पड़ी ढोलकी पर थापे तो
मुखरित हुई कंठ की सरगम
और गूंज लौटी है वापिस
दिशा दिशा से होती पंचम 

फिर अधरों के मधुर स्पर्श ने फूंके प्राण मौन बांसुर में
कई अनूठी सी स्वर लहरी लगा गगन से उतरी आएँ 

घर आँगन खिड़की चौबारा
लगे अल्पना नई सजाने
सरसा पिंजरे में हीरामन 
रामधुनी फिर लगा सुनाने
प्रकट कृपाला के छंदों की
आवाजें घर बाहर उभरी
छत पर पापड़ बड़ी सुखाने
को तत्पर हो गई दपहरी

बतियाने लग गई मुँडेरें इक दूजे से धीरे धीरे 
नव सम्वत् की शुभ्र ऋचाएँ अगरु धूम्र में लिपटी आएँ 





श्वास जन्म भर महके


मौसम की फगुनाहट  बिखरी
चैती ने छेड़ी सारंगी
धानी चूनर उड़े हवा में
मन पाखी बन चहके

झूम उठी पूरी फुलवारी करते अगवानी मधुपों की
कलियों ने लज्जा का घूँघट हौले हौले खोला
बासंती साड़ी में लिपटी पुरवा ने पायल खनकाई
मद्दम स्वर में कचनारों से बेला खुसपुस बोला

झुरमुट में बोगनबलिया​ ​के
खुलकर के निशिगंध यूँ हंसी
सम्मोहित गतिमान समय की
श्वास जन्म भर महके

नन्हे अंकुर हरी दूब  के पलक मिचमिचा जागे
गौरेय्या ने पंख फड़फड़ा रह रह इन्हें दुलारा
फुनगी ने आवाज लगा कर अपने पास बुलाया
लगा गूंजने दूर कहीं पर भोपा का इकतारा

जमना की रेती में चमके
फागुन की पूनम के तारे
संदल की सुवास लहराई
आज हवा में बह के

खलिहानों में पके धान की स्वर्णिम झाँझर खनके
अभिलाषा के बादल उमड़े हुए व्योम पर छा​ये ​
चौपालों पर थाप चंग की, सारंगी  से मिल कर
उड़ी उमंगो की सरगम से झूम झूम बतियाए 

​जड़ी उमंगों​ की ​चूनर में
रक्तिम आभा गुलमोहर की
और आँच यौवन की लेकर
हैं पलाश वन दहके 

अनहोनी कुछ हुई

 

  

अनहोनी कुछ हुई 

 

उषा ने लिख दिया शब्द इक

नील गगन के कोरे पट पर 

प्राची का अध्याय खुला इक 

पीत रक्त से वर्ण सजा कर 

 

आँख मसलते हुये  भोर ने

जल तरंग से हाथ पखारे

कुछ बूँदें उड़ चली हवा में

खुले देव मंदिर के दवारे

 

लगी गूंजने शंखों की ध्वनि 

दीपशिखा में ज्योति भर गई 

आकर फूलों की पंखुरियाँ 

प्रतिमा पग पर आप चढ़ गईं  

 

मलय गंध की साड़ी पहने

इठला कर चल दी पुरवाई 

अनहोनी कुछ हुई लजा कर

अपने में सिकुड़ी अरुणाई

 

एक वृक्ष के वातायन से 

नन्हे पाखी ने नभ देखा

और उड़ चला पंख पसारे

पढ़ लेने को दिन का लेखा 

 

पीछे पीछे चले धूप के

सोनहली रंगों के धागे

पगडंडी से राजपथों तक 

पदचापों के स्वर फिर जागे 

 

चढ़ते हुए दिवस के संग संग 

जीवन की गति तीव्र हो गई

पता नहीं चल पाया किस पल

धूप उतरते हुए ढल गयी

 

संध्या के साजों पर थिरकी

चँदियाई रजनी की पायल

अनहोनी यूँ हुई आज का 

दिन, सहसा  हो बैठा है कल 

मृग तृष्णाओं के जंगल में

 मृग तृष्णाओं केजंगल में 

इक मरीचिका के कोहरे में
लिपटे हुए बिताई हमने
हर सुबहा हर शाम

हाँ ये तो था ज्ञात हमारी
दृष्टि भरम में डूबी
फिर भी सपनों में उलझाता 
जीवन की है खूबी 
उगती रही प्यास होंठों पर 
बढ़ते पग के साथ
दिवास्वप्न शिल्पित होने का
पला एक  विश्वास 

उठ यथार्थ के धरातलों से 
बहे हवाओं की लहरों पर
पतझर की नंगी शाख़ों के
तले किया विश्राम 

झूठे दम्भों, छलनाओं  का 
शून्य रहा अंतर में
नैतिकता का अर्थ तलाशा
विध्वंसित जर्जर में 
मिलते विष को पीकर अपने
मन को था बहलाया
जिसने दंश दिए, उसका भी
है आभार चुकाया 

क्रूर समय का खड़ा महाजन
निज बहियाँ ले द्वार
साँसों की मोहरों के ऋण का
चुकता किया छदाम

रात उजाले की चंदनिया
मिली नित्य  बेस्वाद 
सपनों से जो भरी अंजुरी
रिस जाती  हर बार 
दो घूँट चाँदनी के आकर
होंठों तक, फ़िस्कल गए
हम टूटी नौकायें लेकर
सागर में निकल गए

टूटी प्रतिमा के खंडहर सा
छिन्न भिन्न इतिहास 
पंगु हुए इस वर्तमान पर
अब लिखना है नाम

राकेश खंडेलवाल 
फ़रवरी २०२१ 

यौवन को दोषों की

 शब्द है कृशकाय

अपने कक्ष की एकाकियत में 

पक्ष पूरा एक

फिर एकांत में घिर रह गया


बंद हैं वातायनों के

पट, न दस्तक दें हवाएँ

हर दिशा बिखरा रही

अवरोध के संग वर्जनाएँ 

यौवन को दोषों की

कथाएँ सुनाने में 

जीवन का तारतम्य

शून्य में घिर रह गया


मोड़ सूने फिर हुए 

पगडंडियों की यात्रा के 

शब्द औंधे मुँह पड़े

यों हाथ छूटे मात्रा के

कंठ से गूंजा  स्वर

होंठों की देहरी पर 

कुछ कहे बिन

आज फिर चुप रह गया 


बिंदु  पर रेखाओं के

अब दिग्भ्रमित हो पाँव ठहरे

धुँध में डूबे हुये सब

परिचयों के आज चेहरे

धड़कन से साँसों को 

अनुपाती करने में

पास का योग भी

घट कर ही रह गया 

धागा उलझ उलझ रह जाए

 

​कटी फटी  सपनों की चादर को जब भी चाहा तुरपाऊँ
धागा उलझ उलझ रह  जाए टाँका लगने से पहले ही

सूरज ने समेट कर रख ली जब अपनी किरणो की गठरी
और निशा के पग की पायल कहीं दूर लग पड़ी खनकने
मन  की अकुलाहट घर वापिस जाते पाखी के पर थामे
खिड़की के पल्लों को पकड़े दूर क्षितिज पर लगी अटकने 

दृष्टि खींचती है आकृतियाँ खुले गगन पर सूरमा लेकर 
धुआँ धुआँ होकर रह  जातीं खाका बनने से पहले ही 

शनैः  शनैः  होती विलीन जब राहों की ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियां 
जुगनू आकर ढली सांझ की दहलीजों पर दीप  जलाते 
सुधि के संदूकों के ताले जो बरसों से बंद पड़े थे 
अनायास ही बिन कुंजी के एक एक कर खुलते जाते 

चाहा जब जब उन्हें  खोल कर एक बार फिर से संगवाऊं 
छीर छीर होकर रह जाते, तह के खुलने से पहले ही 

कमरे की दीवारों पर आ प्रश्न बुना करते हैं जाले 
किन्तु थरथराकर  रह  जाते, संभावित सारे ही उत्तर 
अंकगणित के समीकरण को बीजगणित से सुलझाने  की 
कोशिश में मिटने लगते हैं लिखे हुए सारे ही अक्षर 

बिछी ज़िंदगी की चौसर पर रही सुनिश्चित हार सदा ही
मोहरे  सारे  पिट जाते हैं, पासा गिरने से पहले ही 

सतरंगी आँच से


जीवन की बगिया में आज फिर दहक उठे
कुछ पलाश रूपभरी सतरंगी आँच से
एक गात उभर रहा सामने नयन के आ
जब भी निहारा है प्रिज़्म वाले  काँच से

शतरूपे दृष्टि के वितान पर दिशाओं में
चित्र एक तेरा ही हर घड़ी उभरता है

थरथराती पाँखुरों से फिसलता हुआ तुहिन
द्रवित हुआ लगता है कुहसाइ भोर में
सरसराहटें झरी जो चूनरी के कोरों से
चूमती हैं कलियों को मधुपों के शोर में

मधुलके प्रभावित है मधुवन समूचा ही
पवन भी यहाँ आ के लड़खड़ाता चलता है

गूंजता है अलगोजा आप ही हवाओं  में
जल तरंग  छेड़ती है नव धुने सितार पर
बादलों के झुंड  नृत्य करते हैं व्योम में
फगुनाहट। छाती है गाती मल्हार पर

साधिके कलाओं का एक अंश पा तेरा
पुष्प धन्व सतरंगे रंग में संवरता है

2021 नव वर्ष ( गीत कलश पर ९०१वीं प्रस्तुति )

 


आशाओं के नए सूर्य को अब दिशिबोध लिखें
नई नीति के संकल्पों का हम संबोध लिखें

बीता बरस साथ लाया था पृष्ठ सियाही के
जो था लेखा जोखा सारा अंधकार में खोया
दिन की धूप चुरा ले जाती रही, भरी दोपहरी
और रात का एकाकीपन रिस नयनों से रोया
उगी भोर हाथों में लेकर प्रश्नपत्र थी भटकी
कोई सुलझा सकने वाला उसको मिला नहीं था
संध्या घर लौटी राहों में पूरा दिवस गँवा कर
रीता हाथों का कासा आख़िर तक  भी रीता  था

नव आशा​ ​के दीप जला अगवानी को थाली में
बिखरे कल के कलुषों   का मिल कर प्रतिरोध लिखें

गया बरस बीता उजाड़ कर सपनों की फ़सलो को
बड़े चाव से जो साधों ने आँखो में बोई थी 
आगे बढ़ते हुए कदम पीछे को वापिस लौटे 
बिछी सामने राह स्वयं में ही जैसे खोई थी 
पीछे छोड़ा जिसे हुआ वो घर भी अब अनजाना 
रिश्ते फिर से जुड़े नहीं सब परिचित चहरे खोये 
चुगता रहा वक्त का पाखी अपने पर फैलाकर 
बीज दिलासों के जितने भी मन ने मन में बोये 

कोरा नया कैनवास अब यह नया वर्ष लाया है 
आओ हम तुम मिल कर इस पार्ट नव अनुरोध लिखें 

स्वस्ति मंत्र अधरों पर लेकर हम सब करें प्रतीक्षा
अभिलाषाएँ नवल अल्पना से रच दें दहलीज़ें 
मानचित्र से गए वर्ष के सब पदचिह्न मिटाकर
नए पंथ अब चित्रित कर दे पौष कृष्ण की तीजें
नई आस के नव स्वप्नों में इंद्रधनुष की आभें
भर कर, सुरमा करके अपनी आँखों में फिर आँजें
उगते हुए दिवस की अरुणाई से सुबह संवारें
और सिंदूरी चूनर से सज्जित कर रख लें साँचें

कुंठा, क्षोभ, हताशा,हतप्रभता को आज भुलाकर
नए पृष्ठ पर नई उमंगों का नव शोध लिखें 

सपनों का अपराध नहीं है

 

अपनी झोली में बगिया के शब्द सुमन तो चुन न पाया 
लेकिन चाहा लिखा कथानक चर्चित हो, मंचित हो जाना 

सपनों का अपराध नहीं है जिन्हें आँजती आँखें दिन में 
दोषी है मन, महल बनाता रखकर नींवें बही हवा की 
आगत की मरीचिकाओं के भ्रम में डूबा बिखरा देता 
वर्त्तमान के मरुथल में जो छागल भरी हुई है आधी 

पहली सीढी पर पग रखने का विश्वास संजो ना पाया 
चाहे एक साथ ही पल में चार पांच मंज़िल चढ़ जाना 

चढ़ती हुई रात का हो या सपना उगती हुई भोर का
सपना तो अभियुक्त नहीं, वादी प्रतिवादी अवचेतन ही
आकांक्षाओं के व्यूहों में घिर कर रहता साँझ सकारे
औ यथार्थ के दर्पण में छवि देख नहीं पाता अपनी भी 

सीखा नहीं राह से गुज़रे हुए पंथियों के अनुभव से 
लेकिन चाहे जीवन पथ की हर उलझी गुत्थी सुलझाना 

चुटकी भर शब्दों की चाहत कोई विशद ग्रंथ हो जाना 
रहे व्याकरण से अनजाने संज्ञा क्या है और क्रिया क्या
क्या सम्भव है परिणति उनकी,किसने देखे नयन संजोए
जिन सपनों को कोई परिचय अपना भी मिल नहीं सका था 

सावन के मेघों से आते रहे नयन में उमड़ उमड़ कर
सपनों का अपराध नहीं है उनका छिन्न भिन्न हो जाना 

कोई संकेत देता रहा

  कौन संकेत देता रहा साँझ से आँजने के लिए चंद  मधुरिम सपन  ज्यों ही अंतिम चरण आ गया मंच पर  दिन के अभिनीत होते हुए दृश्य का और तैयार होती  ...