पत्थरों पर गीत लिखे

पत्थरों पर गीत लिक्खे आज तक जो शिल्पियों ने
है तुम्हारे रूप की आराधना का एक उपक्रम

बन गए है ताज कितने रंग गई कितनी अजंता
और फिर कोणार्क ने कितनी सुनाई है कहानी
शिल्प खजूराइ निरंतर गढ़ रहा प्रतिमाएँ जितनी
रूप के सागर,कथा के एक पन्ने की निशानी

कर समाहित शब्दकोशों की सभी उपमाए लिखा
किंतु कर पाए नहीं इक अंश का भी पूर्ण वर्णन

गीत लिक्खे पत्थरों पे रच अहल्याए युगों ने
शिल्प ने बन राम की पदरज उन्हें आकर सँवारा
वह तनिक संशोधनों का ही परस था गीत तन को
संतुलित कर मात्राएँगेयता को था निखरा

लिख रही है जान्हवी जो घाट पर वाराणसी के
रूप के शत लक्ष जो आयाम उन से एक वंदन 

पत्थरों पर गीत लिक्खे जो समय की करवटों ने 
वे अमिट हैं लेख संस्कृति के शिलाओं पर थिरकते 
जल प्रपातों ने कलम बन कर लिखे हैं घाटियों में
वे सुबह से साँझ तक गाती हुई धुन में संवरते 

शब्द शिल्पी ! आज जब तुम हाथ में थामो कलम तो 
इस तरह लिखना रहे इतिहास में बन शैल अंकन 

धूप की अनगिन शिखाएं



रात का श्रृंगार करती चाँद की उजली विभाएँ 
और दिन को आ सजाती धूप की अनगिन शिखाएं 

फागुनी रसगन्ध में डूबी हुई हर इक दिशा है 
चेतिया धुन में हवाएं लग रही हैं गीत गाने 
मोरपंखी साध छेड़े सांस में शहनाईयो  को 
लग रहीं हैं धड़कनों पर पैंजनी अब गुनगुनाने 

मौसमी इन करवटों पर आओ सुधबुध भूल जाएँ 
कर रहीं श्रृंगार दिन का धूप की अनगिन शिखाएं 

खेत की पगडंडियों पर फिर लगी चूनर लहरने
दृष्टि के आकाश पर आकर बिछी चादर बसंती
झूमती अंगनाइयों के संग पनघट पर उमंगें
भावनाओं की गली में प्रीत की बंसी सरसती

कल तलक निर्जनसजीं हैं दुल्हनों सी आज राहें 
और दिन को रँग रही हैं धूप की अनगिन शिखाएँ 

लग गई हैं कोंपलें शाखाओं पर फिर सुगबुगाने 
भोर को देते निमंत्रण आ पखेरू चहचहाते 
चल पड़े निर्झर बिछौना छोड़  कर गिरिश्रृंग वाला
और  लहरों पर बिखरते मांझियों के बोले गाते 

जो बिखेरे रंग इन्द्रधनुषीदिशाओं में प्रक्रुति ने
हम उन्हीं में डूब कर नूतन उमंगों को सजायें

अपने बियावान सन्नाटे


तुमको, मुझको, सब को  घेरे अपने बियावान सन्नाटे
दूर दूर तक पत्ता तक भी हिलता नजर  नहीं आता है

उगी भोर से संध्या के ढलने तक बढ़ती आपाधापी
बाहर भीड़ें छील रही है राहों पर चलते कांधो को
अधरों पर चिपकी मुस्कानों के परदे से झाँके कुंठा
और विषमताए गहराती है मन पर छाये अवसादों को

बुझी आस पर मौन कलपती टूटे सपनो की बाँसुरिया
कोई सिसकी का स्वर भी तो आकर नहीं सँवर पाता ही

आवारा राहों पर ख़ुद को छलते छलते चलते है सब
ज्ञात भले है सारी राहें एक वृत्त में बँधी हुई है
दिशाहीन गंतव्य हीन बस गतिमय रहना ही निश्चित है
कठपुतले हैं, डोर न जाने किन हाथों में सधी हुई है

चाहत एक लुभाती प्रतिपल  एक अदेखी उस मंज़िल की
जिसका ज़िक्र नहीं दरवेशो से भी कोई सुन पता है

लौटी वापस सूनी नज़रें द्वार खटखटा दिशा दिशा के
कोई चेहरा नहीं जड़ी हो जिस पर चिप्पी पहचानो की
तथाकथित परिचय की सीमा, है मरीचिका अपनेपन की
अर्थहीनता बतलाती है कृत्रिमतायें मुस्कानों की

शायद कल का सूरज कोई परिवर्तन का अवसार लाए
इसी आस को ढोते ढोते पूरा समय गुज़र जात। है

बसंत ऋतु

जो बसन्ती चादरों का स्वप्न था
बर्फ़ की इस शुभ्रता में खो गया
आपने दे दी शिशिर को जो विदा
आ यहाँ उसका बसेरा हो गया
राह पर, पगडंडिय्पं-दालान में
है असंभव पां टिक पायें कहीं
शून्य से जब अंश नीचे दस गिरा
तापमापी यंत्र हो चुप रह गया. 

और हम पंचांग में अंकित रहे 
पंचमी के ज़िक्र को पढ़ते रहे 

शारदे के हाथ से वीणा मिली 
उंगलियां झंकार लें, असफल रही  
हाथ को जकड़े शिथिलतायेँ रहीं 
कोई अक्षर लिख नहीं पाए कहीं 
देह पर  तह बन रहे अटके कई 
कोट,स्वेटर और मफलर टोपियां 
ओढ़ कर हस्त्राण भी, ठिठुरा करी 
कंपकंपाती हाथ की सब उंगलियां 

है बसन्ती ऋतु कलेण्डर कह रहा 
दिन मगर सब शीत में जकड़े रहे 

नील अम्बर बादलों में खो गया
बूँद गिरते भूमि पर जमती रही
पीत आभा फूल कलियों की गुमी
बर्फ़ की तह के  तले जमती रही 
सूर्य रथ की है तितर वल्गाएँ सब
 भूल प्राची की प्रतीची की दिशा 
देख नभ को जानना सम्भव नहीं 
नाम मौसम का ,समझ पाना पता

और मौसम की ठिठोली देखते 
दाँत में बस उँगलियंधरते rahe

सूरज की छवियाँ दिखलाने


जो कल तक छलते थे हमको सपनो के आश्वासं देकर
आए है इस बार हमें वे सूरज की छवियाँ दिखलाने

वायदों की कजराई  ने थे रोज  साँझ नयनों में आँजे
देते हुए  दिलासा उगती हुई भोर में सच हो लेंगे
किन्तु भोर की प्रथम रश्मि के आते आते हुए तिरोहित
संभव रहा नहीं फिर वे इक अंश मात्र भी शिल्पित फोगे

कितने बरस बीतते आये, एक इसी धुन को दोहराते
वे आये हैं उन्ही धुनों को नए राग में फिर सिखलाने

ढलते हुए और नव उदिता सूरज की छवियों का अंतर
कब कर पाई है अभाव की ऎनक के पीछे से नज़रें
इश्क़ मोहब्बत की ग़ज़लों की हों या बासी अख़बारों की
तरसी हुई आस को लगती एक सरीखी सारी सतरें

महीने भर के रोजे रख कर जो आतुर है इफ़्तारी को
वे लाए है उसको मीनू अगले महीने  का समझाने

सूरज की छवियाँ बदली कब, बदले मौसम की करवट से
नयनी की मरीचिकाओं ने ही हर बार रखा भरमाकर
रंग रश्मियों ने तो बदला नहीं कभी भी ऋतु हो कोई
कुछ रंगीन काँच के टुकड़े भ्रमित करें उनको छितराकर

उतर चुकी है चढ़ी कलाई की एक एक कर सारी परतें
वे लाये हैं  खोटे सिक्के एक बार फिर  यहाँ भुनाने

उसमें कोई छंद नहीं था

गीतों से अनबन थी मेरी 
कविता से अनुबंध अँहीं था 
इसीलिये जो लिख पाया मैं 
उसमें कोई छंद नहीं था 

​लय ​ की गति से अनजाना मैं 
कैसे लिखता कोई कहानी 
क्रमश​:ता ​ की बहती धारा
लेशमात्र सुधि ने न जानी 
रहे कथानक सभी अधूरे 
शब्द नहीं क्रम से लग पाये 
सरगम से थे रहे अपरिचित 
अधरों ने जो स्वर दुहराये 

मन में उठे विचारों में से 
कोई भी स्वच्छंद नहीं था 
इसीलिये जो लिख पाया मैं 
उसमें कोई छंद नहीं था 

ग़ज़लों में ​बहरों की ​बंदीश 
औ' रदीफ़ से जुड़े काफिये 
नहीं समझ ये तनिक आ सका 
रुक कर कब मु​ड़ गए काफिये 
नहीं संतुलन होने पाया 
मिसरा उला और सानी ​ में 
तितर बितर अहसास समूचे 
उलझ रह गए मनमानी में 

बन न  सका मधुपर्क बूँद भर 
क्योंकि पास मकरंद नहीं था 
लिख पाई जो कलम आज तक 
उसमें कोई छंद नहीं था 

नवगीतों ने किया न आकर
कभी लेखनी का आलिंगन
दोहों और सवैय्यों से भी
रहा अनछुआ मेरा आँगन
 कविता को समझूँ इस में ही
दिवस निशा हो जाते हैं गुम
झरते जाते कैलेन्डर से
यूँ ही दिनमानों के विद्रुम

जोड़ तोड़ में, तुकबन्दी में
किंचित भी आनन्द नहीं था
इसीलिये मेरे लिखने में
जो कुछ था वह छन्द नहीं था

पृष्ठ बिखरे संहिताओं के

आप जो बदले शिकायत है नहीं कुछ भी
आजकल बदले नज़रिए देवताओं के

इंद्र को गिरिधारियों का
अब नहीं है भय
बाँटता ही है नहीं
वो काश का संचय
हो गए दिन ज्येष्ठ वाली प्रतिपदाओं से

अब नहीं धन्वन्तरि की
आज कल गिनती
द्रोण गिरि पर अब
नहीं संजीवनी उगती
पृष्ठ बिखरे चरम-सुश्रुत संहिताओं के

है नहीं सम्भावना कुछ,
आस हो पूरी
याकि मिट पाए तनिक
भी, मध्य की दूरी
पाँव डिगते कब जुड़ी कुछ आस्थाओं के

पत्थरों पर गीत लिखे

पत्थरों पर गीत  लिक्खे  आज तक जो शिल्पियों ने है तुम्हारे रूप की आराधना का एक उपक्रम बन गए है ताज कितने रंग गई कितनी अजंता और फिर कोणार्क ...