उसमें कोई छंद नहीं था

गीतों से अनबन थी मेरी 
कविता से अनुबंध अँहीं था 
इसीलिये जो लिख पाया मैं 
उसमें कोई छंद नहीं था 

​लय ​ की गति से अनजाना मैं 
कैसे लिखता कोई कहानी 
क्रमश​:ता ​ की बहती धारा
लेशमात्र सुधि ने न जानी 
रहे कथानक सभी अधूरे 
शब्द नहीं क्रम से लग पाये 
सरगम से थे रहे अपरिचित 
अधरों ने जो स्वर दुहराये 

मन में उठे विचारों में से 
कोई भी स्वच्छंद नहीं था 
इसीलिये जो लिख पाया मैं 
उसमें कोई छंद नहीं था 

ग़ज़लों में ​बहरों की ​बंदीश 
औ' रदीफ़ से जुड़े काफिये 
नहीं समझ ये तनिक आ सका 
रुक कर कब मु​ड़ गए काफिये 
नहीं संतुलन होने पाया 
मिसरा उला और सानी ​ में 
तितर बितर अहसास समूचे 
उलझ रह गए मनमानी में 

बन न  सका मधुपर्क बूँद भर 
क्योंकि पास मकरंद नहीं था 
लिख पाई जो कलम आज तक 
उसमें कोई छंद नहीं था 

नवगीतों ने किया न आकर
कभी लेखनी का आलिंगन
दोहों और सवैय्यों से भी
रहा अनछुआ मेरा आँगन
 कविता को समझूँ इस में ही
दिवस निशा हो जाते हैं गुम
झरते जाते कैलेन्डर से
यूँ ही दिनमानों के विद्रुम

जोड़ तोड़ में, तुकबन्दी में
किंचित भी आनन्द नहीं था
इसीलिये मेरे लिखने में
जो कुछ था वह छन्द नहीं था

पृष्ठ बिखरे संहिताओं के

आप जो बदले शिकायत है नहीं कुछ भी
आजकल बदले नज़रिए देवताओं के

इंद्र को गिरिधारियों का
अब नहीं है भय
बाँटता ही है नहीं
वो काश का संचय
हो गए दिन ज्येष्ठ वाली प्रतिपदाओं से

अब नहीं धन्वन्तरि की
आज कल गिनती
द्रोण गिरि पर अब
नहीं संजीवनी उगती
पृष्ठ बिखरे चरम-सुश्रुत संहिताओं के

है नहीं सम्भावना कुछ,
आस हो पूरी
याकि मिट पाए तनिक
भी, मध्य की दूरी
पाँव डिगते कब जुड़ी कुछ आस्थाओं के

नए वर्ष के नये सूर्य

हे नए वर्ष के नये सूर्य 
इस बार उगो ले परिवर्तन

कुछ प्रखर करो धुँधली  किरने
हो नवल ऊर्जा कुछ भरने
ये बरस बरस का गहराता 
तम लगे इस बरस कुछ छँटने
मन के अँधियारे कोनो में
इक नई ज्योति फिर से जागे
सूखी नयनों की झीलों में
नव  स्वप्न लगे फिर से तिरने

यूँ करो कि कैलेंडर कर ले 
हर रोक तुम्हारा अभिनंदन 

इस बार बदल कर पंथ चलो 
उन रहीं उपेक्षित राहों पर 
जिन पर विश्रांति चिह्न अंकित 
बस सिसकी,क्रंदन , आहों पर   
उनकी तिमिराई अंगनाइ
फिर नहाए पा उज्ज्वल प्रकाश
कुछ नई अंकुरित हों कलियाँ
उनकी मुरझाई चाहों पर

बरसों से सूने मस्तक पर
खिलता हो अक्षत अरु चंदन 

बदलो इस वर्ष दिशा अपनी
चल दो दक्षिण या उत्तर को 
महलों के साये में खोते
देखो उस टूटे छप्पर को 
समदशा हो दो संप्रकाश 
फुनगी  से लेकर के जड़ तक
उतरो नीचे कंगूरों से 
करने रोशन अब घर घर को 

तब बिखरे अधरों पर सबके 
उषा से संध्या सूर्या नमन 

ओ  चित्रकार खींचो नूतन 
कुछ इंद्रधनुष वातायन में 
कुछ शान्ति चैन की बेलों को 
बो दो सन्मुख नीराजन में 
मन से मन तक की दूरी को 
नापो किरणों की डोरी से 
बाँधो अपने संचय के पल
नव  हर्षों के प्रतिपादन में 

इस बार मिटा दो हर मन में 
पलते संत्रास और कुंठन 
 

नयी सुबह के लिए

नयी सुबह के लिए निरंतर अकुलाती है निशिभर पलकें 
नयी सुबह के लिए किन्तु है संभव ना परिवर्तन कोई 

पीढ़ी दर पीढ़ी आशा के अंकुर बोये हैं क्यारी में 
नयी सुबह जब आएगी तो धूप अधिक चमकीली होगी 
तरल उष्णता की पुरबाई भर लेगी निज आलिंगन में
और पौंछ  देगी वह मोती  जिनसे आँखें गीली होंगी 

लेकिन प्राची ने जब जब भी खोला अपना द्वार हुलस कर 
आई भोर लड़खड़ाती सी,  हो न बरसों से ज्यों सोई  

कल के दिन जैसे ही लिख कर लाई इबारत। सुबह आज की 
कल आई  थी परसों वाला बिम्ब लिए,  तारीख़ बदल कर 
मौसम बदले, ऋतुए बदली , रहा सुबह का यही रवैया 
वासी थकन रही थी ओढ़े बस आ जाती थी मुँह धो कर 

बरसों से आश्वासन की परछाइयों की उंगली थामे 
रही हृदय की सभी  उमंगें  झूठे दिवास्वप्न में खोई 

नए वर्ष में नई सुबह के लिए  हाथ में लिए कटोरा 
अभिलाषाएँ मन्नत माँगा करीं देव के द्वारा जाकर 
बरसों से ख़ाली झोली को देख रहे मन को समझाती
पूर्व जन्म का संचय कुछ भी शेष न था , जो मिलता आकर 

नई सुबह के लिए  प्रतीक्षित कितने युग इतिहास बन गए 
हुई नहीं पर कभी अंकुरित, कितनी बार अपेक्षा बोई 

 

बस मधुघट रीते

दो अक्षर भी उतर न सँवरे कागज़ पर आकर
हाथों में लेखनी उठाये कितने दिन बीते

डांवाडोल  ह्रदय चुन पाया नहीं एक पगडंडी
जिन पर ले जाये वो अपने उद्गारों की डोली
चौरस्ते की भूलभुलैया में उलझे सारे पथ
अम्बर पर घिर रही घटा ने कोई न खिड़की खोली

शुभ शकुनों के लिये प्रतीक्षित नजरें ढूँढें पनघट
ढुलक रहे हैं पर हर पथ पर बस मधुघट रीते

हर अनुभूति  शब्द को छूने से पहले बिखरी
मन के राजघाट पर छाई गहरी खामोशी
अमराई से उठी न मन को छूने वाली कूकें
पुरबाई बैठी दम साधेजैसे हो दोषी

असमंजन में धनंजयी मन हो उत्सुक ताके
लेकिन श्याम अधर से झर कर बही नहीं गीते

सद्यस्नाता पल से टपकी बरखा की बून्दें
अलकों की अलगनियों पर आकर न ठहर पाई
सिमटी रही आवरण की सीमाओं के अंदर
छिटकी नहीं चन्द्रमा से मुट्ठी भर जुन्हाई

भेज न पाया सिन्धु भाव काआंजुरि भर स्याही
तृषित रह गई कलम आज फ़िरउगी प्यास पीते

उसमें कोई छंद नहीं था

गीतों से अनबन थी मेरी  कविता से अनुबंध अँहीं था  इसीलिये जो लिख पाया मैं  उसमें कोई छंद नहीं था  ​लय ​  की गति से अनजाना मैं  ...