सन्नाटे का शासन है

 


होठों पर ताले जड़ कर के बैठ रहो
केवल सुनो। स्वरों से कुछ भी नहीं कहो
आवाज़ों पर लगा हुआ प्रतिबंध यहाँ
इस नगरी में सन्नाटे का शासन है 

भोर यहां पर आती है लंगड़ा लंगड़ा 
दोपहरी आकर उबासियाँ लेती है 
संध्या का आना न आना, एक रहा 
आकर भी बस तान चदरिया सोती है

गालियां सड़कें पगडंडी, सब सूने है 
शाखाओं पर पत्ता एक नहीं हिलता 
दूर क्षितिज तक सिर्फ़ शून्य ही फ़ेला  है
गतिमयता का कोई चिह्न नहीं मिलता 

जलती धूप तलाशे कोई छाँव दिखे
सहमी हुई हवा जैसे अपराधी हो
यायावर के पगचिह्नो की दुर्लभता
जैसे इधर न आ पाने के आदी हो 

सारे चेहरे इक साँचे में ढले हुए
धुली पुंछी  जैसे स्लेट हो शब्द बिना
ख़ाली ख़ाली आँखें है अंतर तल तक
प्रश्नो की बुनियादों पर है प्रश्न चिना

दरबारी है टंगे चित्र दीवारों पर
राजा की नजरों में  हरियल सावन है
शब्द हो चुके बंदी सभी, किताबों में
इस नगरी पर सन्नाटे का शासन है 

पुराने ढंग से फिर पत्र कोई

 


मैं सोचता हूँ तुम्हें लिखूँ अब
पुराने ढंग से फिर पत्र कोई
औ जोड़ दूँ सब बिखरते धागे
तितर बितर हो गए समय में

वे भाव मन के जो पुनकेसरों के पराग कण में लिपट रहे हैं
जो गंध में डूबती हवा की मधुर धुनों में हुए हैं गुंजित
बुने हैं सपने हज़ार रंग के  निखारते शिल्प अक्षरों का
उतार रखते जिन्हें कलम से हुआ है हर एक रोम पुलकित।

गुलाब पाँखुर कलम बना कर
भिगो सुवासों की स्याहियों में
करूँ प्रकाशित वे भाव अपने
जो उमड़े अक्सर ही संधिवय में

गगन के विस्तृत पटल पे अंकित करूँ सितारों से शब्द अपने
या राजहंसों  के फैले पर पर लिखूँ निवेदन सतत प्रणय का
मैं चाहता हूँ सितार तारों की झनझनाहट अभिव्यक्त कर दूँ
उन्हें बना कर पर्याय अपने लगन में भीगे हुए हृदय  का

मैं गुलमोहर के ले पाटलों को
चितेरू मेंहदी की बूटियों में
औ फिर रंगूँ अल्पनाएँ पथ पर
जो साथ चल कर सका था तय मैं

कब टेक्स्ट में आ ह्रदय उमड़ता न फ़ेसटाइम में बात वो है
जो पत्र में ला उकेर देती है तूलिकाएँ रंग अक्षरों से
कब व्हाटसेप्प में हुआ तरंगित वह राग धड़कन की सरगमों का
जो नृत्य करता हुआ बजा है गुँथे शब्द के सहज स्वरों में

मैं सोनजूही के फूल लेकर
दूँ गूँथ वेणी के मोगरे में
औ सिक्त होकर विभोर हो लूँ
तुम्हारे तन से उड़ी मलय में

प्रार्थना के ये अधूरे गान



 प्राण की वट वर्तिकाएँ दीप तो निशि दिन जलाए

वाटिका से पुष्प चुन कर साथ श्रद्धा के चढ़ाए 

सर्व यामी मान कर आराधना करता रहा मैं 

द्वार पर आकर नमन में, शीष था अपना झुकाए


आज जाना वाक् हीना श्रव्य हीना मूर्तियाँ  है
प्रार्थना में फिर निरर्थक गान गाकर क्या करूँगा 

तुम कहे जाते रहे करुणानिधानी , तो बताओ
आर्त्त नादों से घिरे तुम, है कहाँ करुणा तुम्हारी
तुम बने थे कर्मयोगी और योगेश्वर कहाए
हो कहाँ तुम? आज कल योगी बने हैं बस मदारी 

व्यर्थ लगती हैं सभी सम्बोधनों की पदवियाँ तब
मैं तुम्हारे नाम को देकर विशेषण क्या करूँगा 

डिग रही है आस्था, बैसाखियों पर बोझ डाले 
और नैतिकता समूची टैंक रही है खूँटियों पर
स्याह काले कैनवस पर दृष्टि को अपनी टिकाए
मानवीयता है प्रतीक्षित रंग आए कूँचियों पर

मरुथली झंझाओं ने घेरे हुए हैं द्वार गालियाँ
बध रहे इस शोर में मल्हार गाकर क्या करूँगा 

जो थी शोणित में घुली निष्ठाएँ पहली धड़कनों  से
टूटती हर साँस के पथ पर तिरोहित हो रही हैं 
मान्यताओं की धरोहर जो विरासत में मिली थी
इस समय के मोड़ पर आ, मुट्ठियों से रिस रही हैं 

जब कसौटी कह रही है पास के। विश्वास खोटे
मैं अधूरी आस के प्रासाद रच कर क्या करूँगा












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एक झूठी ज़िंदगी के बोल

एक झूठी ज़िंदगी के बोल तिरते हैं हवा में
न्यूज़ चैनल हो कि  हों अख़बार की खबरें  यहाँ पर


राजनीतिक लाभ को अब दांव पर है जिंदागनी
और फिर फिर से यही दुहराई जाती है कहानी
एक ही किरदार प्यादों का लिखा है चौसरों पर
प्राण की आहुति चढ़ा रख लें सुरक्षित राजधानी

होड़ में डूबी हुई निष्ठाये रक्खी ताक पर अब
क्या पता किसको कसौटी सत्य की खोई कहाँ पर

कुर्सियों की चाह रखती आँख पर पट्टी चढ़ा कर
राजसिंहासन। चढ़े धृतराष्ट्र, हक़ अपना बता कर
राज्य की वल्गाएँ थामे, अनुभवी शातिर खिलाड़ी
शेष दरबारी मगन हैं बांसुरी अपनी बजा कर

और जन  गण   मन भटकता पर्वतों पर घाटियों में
ज़िंदगी के यक्ष प्रश्नो का मिले उत्तर जहां पर

जो चुने आशाओं ने, वे सब हुए अज्ञात वासी
दूर तक दिखती नहीं परछाईं भी कोई ज़रा भी
हाट में अब मोल साँसों का नहीं कौड़ी बराबर
भीर संध्या दोपहर  सब धुँध में लिपटी धुआँसी

एक झूठी ज़िंदगी का मोल क्या है, बोल क्या है
प्रश्न पर चर्चा सदी की, आज भी होती वहाँ पर

आज की आधी कथा सी



 घिर रहे आश्वासनों के मेघ अम्बर में निरंतर
कल सुबह आ जाएगी फलती हुई आशाएं लेकर
ये अँधेरे बस घड़ी भर के लिए मेहमान है अब
कल उगेगा दिन सुनहरी धुप के संग में चमक कर


दे नहीं पाती दिलासा बात अब कोई ज़रा भी
प्राण से अतृप्त मन पर छा रही है अब उदासी 


वायदों के सिंधु आकर रोज ही तट पर उमड़ते
और बहती जाह्नवी में हाथ भी कितने पखरते
रेत के पगचिह्न जैसी प्राप्ति की सीमाएं सारी
शंख के या सीपियों के शेष बस अवशेष मिलते


ज़िंदगी इस व्यूह में घिर हो गई रह कर धुँआ सी
एक कण मांगे सुधा जा हर कली है  आज प्यासी


घेरते अभिमन्युओं कोजयद्रथों के व्यूह निशिदिन 
पार्थसारथि हो भ्रमित खुद ढूंढता है राह के चिह्न 
हाथ हैं अक्षम उठा पाएं तनिक गांडीव अपना 
आर ढलता सूर्य मांगे प्रतिज्ञाओं से बंधा ऋण


आज का यह दौर लगता गल्प की फिर से कथा सी
बूँद की आशा लिए है अलकनंदा  आज प्यासी


पास आये हैं सुखद पल तो सदा यायावरों से 
पीर जन्मों से पसारे पाँव ना जाती घरों से 
जो किये बंदी बहारों की खिली हर मुस्कराहट 
मांगती अँगनाई पुष्पित छाँह, सन्मुख पतझरों से


किन्तु हर अनुनय विवशता से घिरी लौटी निराशी 

जेठ में सावन तलाशे, ज़िंदगी यह आज प्यासी 

नई भोर की अगवानी में

जीवन की उलझी राहों में

आज विदा देकर रजनी को
नई भोर की अगवानी में
पूरे अड़सठ दीप जलाए 

 

आज तिमिर के अवशेषों को
नदिया की धारा पर दौने में
रखकर के सहज बहाया 
और नया इक दीप जलाया 

 

नवल  आस की फसल उग सके
साँसों की सुरभित क्यारी में
धड़कन के कुछ बीज बो रहा 
और सपन अंकुरित हो रहा

 

तय हो चुकी राह की दुविधा
आगे बढ़ते हुए नकारी 
आगत के जलकलश सजा कर
छिड़के द्वारे पर  छलका कर 

 

विगत और आगत दवारे पर
दहलीज़ों के संधिपत्र पर
आज कर रहे हैं हस्ताक्षर 
राही चल, बस निस्पृह होकर 

 


जो बह न सके थे वे आंसू



आषाढ़ी मेघ घिरे आकर
बैसाख चढ़े अंगनाइ में
जो वह न सके थे वे आंसू
उमड़े सूखी अमराई में

आमों पर बौर, न दिखे पिकी
बस हवा चली मरुथल वाली
फुलवारी पर छाया पतझर
गुलमोहर की सूखी डाली

आँखों से दूर हुई निंदिया
सपने खो गए संशयों में
उत्तर सब उलझे हुए रहे
प्रश्नों के सिर्फ़ प्रत्ययों में

बुझती आसों में प्रश्न नहीं
बस सहमे सहमे उत्तर है
कुछ भय के अनचीन्हे साये
इन सबसे ज़्यादा बढ़ कर है

जो बहन सके थे वे आंसू
ढल रहे चित्र में यादों के
कुछ कर न पाने की कुंठा
हावी हो रही विषादों पे

आपके ही नाम की

दिन उगा या दोपहर थी
याकि बीती शाम थी
साँस ने माला जपी बस 
आपके ही नाम की

आस्था का दीप रक्खा
प्राण में अपने जला कर
सरगमों के तार छेड़े
आपको ही गुनगुनाकर
आपको आराध्य माने
भक्ति में डूबे रहे हम
मान कर विपदा पड़ी तो
आप ले जाएँ बचा कर

आज जब झंझा घिरी तो
आप ही हैं लुप्त जग से
दूर तक दिखती नहीं
परछाई तक भी छांव की

वे कथाएँ जन्म से, पीकर  
घुटी हम आए पलते
आप हैं सच्चे पिता
हर एक संकट आप हरते 
किन्तु ये भ्रम ढह रहा है  
रेत  के प्रासाद जैसा 
जो सहस्त्रों आर्त्तनादों से 
तनिक भी ना पिघलते 

हैं दुखी मथुरा अयोध्या 
कल तलक थीं गर्विता जो 
वक्ष पर अपने संभाले 
रज  पुनीता  पाँव की 

मुट्ठियों से आज फिसली 
बालुओं सी आस्थाएं 
काम कितना आ सकीं हैं 
प्रार्थनाएं वन्दनाएं 
मन्त्र ध्वनियाँ हैं तिरोहित 
क्रन्दनों के शोर में अब 
आपकी यज्ञाग्नियों में 
ज़िंदगी कितनीं जलाएं 

प्राण दाता जिस जगह
करता उपेक्षा प्राण की ही
ये नई लगता प्रथा है
आपके ही गाँव की 

कोई संकेत देता रहा

 कौन संकेत देता रहा साँझ से

आँजने के लिए
चंद  मधुरिम सपन 

ज्यों ही अंतिम चरण
आ गया मंच पर 
दिन के अभिनीत
होते हुए दृश्य का
और तैयार होती 
हुई साँझ ने 
फिर से दुहराई 
अपनी चुनी भूमिका

एक तीली उठी आँख
मलते हुए
जागने लग पड़ी
वर्तिका में अग़न

कौन संकेत देता रहा 

झाड़ियों में घिरे 
झूटपटे में कहीं 
बूँद बन गिर रही
यों लगा चंद्रिका 
स्वर उमड़ते हुए
बादलों से घिरे
देते आभास 
गूंजित हुए गीत का 

मोड़ से देखते 
मुस्कुराते हुए
सुरमई रात के 
काजरी  दो नयन 

कौन संकेत देता रहा 

सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते
रुकी रात जब
छत के विस्तार को
नापने के लिए
कुछ सितारे रहे
इक प्रतीक्षा लिए
चूनरी का सिरा 
थामने के लिए 

पाँव लेकिन थमे 
उठ न पाए तनिक 
उनको जकड़े रही
एक वासी थकन 

कोई संकेत देता रहा 



फिर आइन चैतिया हवाएँ

 

पूनम की चंदियाई साड़ी धुली ओस के झांझर पहने
स्वर्णकलश से धूप उँडेले आती हैं चैतिया हवायें

मिला भोर का स्पर्श गुनगुना
हुई बालियों में कुछ सिहरन
होने लगी फरफ़ूरी न में
पात पात ने छेड़ीं सरगम 
ट्यूब वेल की ताल ताल पर
थिरक रहां है खलिहानों पथ
पगडंडी पर लगी क़तारें
मंडी तक मनता है उत्सव 

होली मना, विदाई लेकर लौट चुका है शिशिर गाँव से 
तालाबों  के तट पर आकर जल तरंग पायल खनकाएँ 

होड़ पतंगो से करती सी
उड़े गगन तक धानी चूनर 
चौपालों से मुँडेरों तक
लगे झनकने पग के नूपुर
पड़ी ढोलकी पर थापे तो
मुखरित हुई कंठ की सरगम
और गूंज लौटी है वापिस
दिशा दिशा से होती पंचम 

फिर अधरों के मधुर स्पर्श ने फूंके प्राण मौन बांसुर में
कई अनूठी सी स्वर लहरी लगा गगन से उतरी आएँ 

घर आँगन खिड़की चौबारा
लगे अल्पना नई सजाने
सरसा पिंजरे में हीरामन 
रामधुनी फिर लगा सुनाने
प्रकट कृपाला के छंदों की
आवाजें घर बाहर उभरी
छत पर पापड़ बड़ी सुखाने
को तत्पर हो गई दपहरी

बतियाने लग गई मुँडेरें इक दूजे से धीरे धीरे 
नव सम्वत् की शुभ्र ऋचाएँ अगरु धूम्र में लिपटी आएँ 





सन्नाटे का शासन है

  होठों पर ताले जड़ कर के बैठ रहो केवल सुनो। स्वरों से कुछ भी नहीं कहो आवाज़ों पर लगा हुआ प्रतिबंध यहाँ इस नगरी में सन्नाटे का शासन है  भोर...