ताना बाना बुने कबीरा


एक लुकाटी एक कठौती एक चदरिया चाहे जीवन
निशा दिवस फिर भी करघा ले ताना बाना बुने कबीरा

कते सू​त ​ को बुनते बुनते खो देता संतोष हृदय का
धुनिया से माँगे धुन कर दे उसको वह रेशम के धागे
बढ़ती आकांक्षाओं की सीमाए विस्तृत होती जाती
​मुंड़ी हुई भेड़ों के दवारे जाकर ऊन भीख में माँगे

भूला है मंज़िल के पथ पर संचय साथ नहीं चलता है
यायावर सब एक सरीखे, रहे धनिक या रहे फ़क़ीरा

धूप छाँह की आँखमिचौली का पीछा करते करते ही
एक वृत्त में चक्करघिन्नी बना हुआ ही घूमा करता
कैलेंडर की शाखाओं से झरते है दिनमान निरंतर
बिना ध्यान के बस अपनी परछाईं में ही खोया रहता

आपाधापी धमाचौकड़ी की बिसात फैला कर अपनी
सपना देखे एक चाल में ही प्यादे से बने वजीरा

केवल अपना बिम्ब निहारे उगी भोर से ढली साँझ तक
प्रतिबिंबों की इक मरीचिका का प्रतिपल ही पीछा करता
कर काँधे की छागल ख़ाली तपते मरु की पगडंडी पर 
स्वाति मेघ के घिर आने की असफल एक प्रतीक्षा करता

ज्ञात उसे है अंतर्मन की शांति , तोष का पथ देती है
फिर भी खोजा करता उस​को ​ पीट पीट कर ढोल मंजीरा 

आहना राधा गाला

 


एक झंकार उठ बीन के तार से
स्वर्ण नूपुर की ख़नकों से मिल कर गले
चाँदनी की किरण से फिसलते हुए
आज आइ उतर कर मेरी गोद में 

एक नन्ही कली  की मृदुल पाँखुरी
थरथराते हुए नव पुलक भर गई
रश्मियाँ हाथ में ले उगी भोर की 
अपने अस्तित्व का नाम नव लिख गई

मलयजी स्पर्श पाकर के सिहरी हुई 
झील के नीर में जो मची हलचलें 
उनमे पड़ते हुए बिम्ब से सज रही
रात के अंत पल में उगे स्वप्न सी 

मन में आह्लाद की गूंजने लग गई
अनगिनत आज सहसा ही शहनाइयाँ
अपने आराध्य का अंश पा सामने
शब्द करने लगे पृष्ठ पर नृत्य आ

आओ स्वागत तुम्हारा है  ओ आहना
ज़िंदगी में नई वाटिकाएँ खिलें
और अनुभूतियों से सुधा सिक्त हों
आगतो के निमिष तुमसे मिल कर गले

मौन हुए स्वर

 

न तो कुछ लिखने का ही है और न कुछ पढ़ने का मन है
नयनों की ड्यौढ़ी पर आकर अटका हुआ एक सावन है

कल तक जितना था कविता से उतना ही हूँ आज अजाना
शब्दों के गहरेपन की सीमाओं को मैं न पहचाना
भावों से लेकर वाणी में ढलने तक अक्षर की काया
कितने रंग बदल लेती है, नहीं समझ 
​में 
 संभव आना

यह मेरी ही अक्षमता है, रही सोच की सीमित सीमा
तब ही तो भाषा ने मुझसे ठानी हुई तनिक अनबन है

मौन हुए स्वर जब भी चाहा बातें व्यक्त करूँ मैं मन की
बिना दीप के रही सर्वदा तुलसी उगी मेरे आंगन की
नैवेद्यों की उंगली पकड़े संझवाती के सूने पथ पर
चलती रही आस की धुन पर बजती हुई ताल धड़कन की

रूठ चुके आराधित से कब शेष रहा है कोई अपेक्षित
सिमट गया पूजा की थाली में हर संवरा आराधन है

हुआ समर्पित चार कदम चल कर पथ में ही जो यायावर
नीड़ नहीं पाथेय नहीं न मिला उसे निशि या फिर वासर
अपनी सजी हुई दूकानों को समेट अपने कांधे पर
खुद खरीदता,खुद ही बेचा करता, है कैसा सौदागर

चुप होकर बहार के झोंके बैठे हाथ हाथ पर धर कर
बजता है हर एक दिशा में बस पतझर का विज्ञापन है

राकेश खंडेलवाल 


नदी किनारे घूमे

 

आज सांझ फिर लहराए सुधि के आँगन में वे पल जब 

नदी किनारे घूमे थे हम इक दूजे का हाथ थाम कर 

 

आज यहां इस नदिया के तट  बिखरे हैं कुछ अनचाहे पल 

जो निष्कासित हुए ज़िंदगी के रोजाना के गतिक्रम से 

एक बार उपयोग किए जाने के बाद  फेंक  दी जाती

वही  वस्तुएँ घोल रही थी विष तट पर आबे-जमजम के

 

दूभर हुआ पाँव भी रखना अब नदिया के तीर एक भी

सुबह दुपहरी  का सूनापन, अब है छाने लगा शाम पर 

 

नदिया का तट जिस पर कल तक थी कदम्ब की शीतल छाया

जिसके साये म मुरली की धुन पर पग की थिरकी पायल 

जहां गगन से झरी ओस में डूबी हुई चाँदनी किरणे

मन को कर ज़ाया करती थी बींध पुष्प के शर से घायल

 

आज वहाँ पर उगे हुये हैं कीकर औ बबूल के झुरमुट

नष्ट हुई नैसर्गिक सुषमा, नयी सभ्यता के मुकाम पर  

 

जितना दोषी मैं हूँ उतने तुम भी तो हो प्रियवर मेरे

हमने खुद ही तो बोयी है नागफनी आँगन में लाकर

पीपल, नीम, बरगंदी छाया को हमने तलाक़ देकर के

कृत्रिम फूल सजाये घर में तुलसी के विरवे उखाड़ कर 

 

साँसें बंद सिलिंडर में है, पानी भरा रखा बोतल में 

बंद हुए जीते कमरों में, खुली हवाओं को तमाम कर 

 


कृष्ण नमन

 


गीता शास्त्र प्रणेता माधव मधुसूदन घनश्याम
तुमको  शत शत वन्दन मेरे लाखों कोटि प्रणाम
 
तुम विराट, तुम सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, तुम ही सृष्टि रचेता
तुम ही सब प्रश्नों के उत्तर और तुम्हीं नचिकेता
तुम ही वाहन, तुम ही वाहक हो सब के जीवन के
दृश्य तुम ही हो, और तुम ही अनदेखे हर क्षण से
 
तुम हो खांडव वन की ज्वाला तुम बासंती शाम
तुमको कोटि कोटि वंदन हैं लाखों सहस प्रणाम
 
कालसर्प के नाथ नाथैया तुम गोकुल के बाँके
एक तुम्हारी ही छवि आकर ब्रह्मा शंकर ताके
अभिशापों  के तुम्हीं निवारक, दुष्ट विनाशक तुम ही
तुम संस्थापक धर्म ध्वजा के सत्य मार्ग तुम से ही
 
मधुर शांति की सरगम हो तुम, निशि-दिन आठों याम
तुमको शत-शत नमन करूँ मैं, अनगिन कोटि प्रणाम
 
राजपुत्र के सखा अनूठे मित्र सुदामा के भी
प्रीत निराली राधा की तुम, पूजित मीरा से भी
कूटनीतियाँ, राजनीतियाँ,युद्ध नीतियाँ  तुमसे
तुम ही हो सर्वत्र अकेले, अंतरहित उद्गम से
 
कर्मयोग परिभाषित करता श्री कृष्ण का नाम
करूँ तुम्हारा चिंतन हर पल करते हुए प्रणाम

वे सुनहरे पल

 जानते हो मीत ! सुधियों की घनी अमराईयों में

याद के पाखी निरन्तर डाल पर आ बोलते हैं

रख दिया था ताक पर मन ने उठा जिन पुस्तकों को
फ़ड़फ़ड़ाकर पंख अपने, पृष्ठ उनके खोलते हैं
 
संधियो पर उम्र की, जो चित्र खींचे थे कमल पर
राह में जो चिह्न छोड़े  लड़खड़ाने से संभल कर
दृष्टि के गुलमोहरों ने रात दिन जो सूत काते
अनकहे अनुबन्ध की कुछ पूनियों को आप वट कर
 
पृष्ठ से रंगीन बीती सांझ की अंगड़ाईयों के
रंग लेकर फ़िर हवा की लहरियों में घोलते हैं
 
वे सुनहरे पल कि जब संकल्प था आकाश छू लें
कर सकें चरितार्थ गाथायें,बढ़ा पग नाप भू लें
कल्पना की दूरियों को मुट्ठियों में भर समेटें
इन्द्रधनुषों के हिंडोले पर हवा के साथ झूलें
 
मन उमंगों की कटी पाँखें निहारे मौन गुमसुम
खोज लेने को गगन जब वे परों को तोलते हैं
 
करवटें लेकर समय ने दृश्य कितनी बार बदले
चाहना थी आगतों का अनलिखा हर पृष्ठ पढ़ ले
मोड़ ले अनुकूल कर धाराओं का निर्बाध बहना
हर दिवस को फूल की पांखुर, निशा को ओस कर ले
 
कामनायें पत्र कदली के बने लहरायें जब जब
वे नियति के चक्र बन कर बेर के सम डोलते हैं

अबअसह बन गया यह जीवन


अब असह बन गया यह जीवन 
बिन साथ तुम्हारे जीवन धन
सुधि ढूँढ रही है छाँह वही
कुंतल मेघों की घिरी  सघन 

वे अधर थरथराते थे जो
कुछ कहते कहते ठिठक ठिठक 
वह गिरती, उठती फिर गिरती
शर्माती नज़रें झिझक। झिझक

अब बिना तुम्हारे मौन हुई
पनघट पर पायल की झन झन 

आरति के दीप न जलते हैं
घंटी की खोई झंकारें
बस पता पूछती जगी भोर
में, पाखी कंठों की चहकारें

पग की थिरकन की राह तके
बाँसुरिया लेकर वृंदावन 

अटकी है दृष्टि पंथ पर के 
बस उसी मोड़ पर ही जाकर
जाते जाते देखा तुमने
पीछे मुड़ पल भर अकुलाकर

तब से ही पसरा पलकों पर
अब विदा नहीं लेता सावन 
१४ अगस्त २०२१ 









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पीपल की छाहों वाले दिन

 



आज यहां पर  याद आ रहे
पीपल की छाहों वाले दिन

साँझ ढले से चौपालों की
वे अद्भुत दरवेश कथाएँ
चंग झूमते ढपली के संग
बमलहरी के सुर खनकाएँ
अलगोजे पर तान लगाता
मन मन मुदित हुआ इक भोपा
आल्हा उदल , गोरा बादल
शौर्य भरे गीतों को गाएँ

गुड़ की डली, बेझरी रोटी
मिर्ची और प्यार वाले दिन

बनती हुई चाक पर गगरी
तप अलाव में रूप सजाना
रंग कर गेरू से खाड़ियाँ से
इंडुर चढ़ पनघट तक जाना
कंगन और मुंदरी में होती
कानाफूसी को सुन सुन कर
जेहर पर जा पाँव पसारे
गुप चुप पायल को बतलाना

गन्ने का रस और शिकंजी
आम और लस्सी वाले दिन

ठंडा ख़रबूज़ा, तरबूज़ा
क़ुल्फ़ी एक मलाई वाली
रह रह कर वह पास बुलाती
पके फालसों वाली डाली
कुछ अमरूद इलाहाबादी
खिन्नी और रसभरी मीठी
मन फिर। अहीन लौटना  बागे
पर सीमाएँ हुई सवाली

रबड़ी और फ़लूदे के संग
मौसम्मी के रस वाले दिन  

अजब वक्त यह आया

 

पता नहीं किस और छोर से  अजब वक़्त यह आया 
जब अपनी परछाई का भी ख़ुद को पता नहीं है 

होती तो है सुबह , नदारद किंतु धूप अम्बर से
हर नरसिसस अपने अपने सूर्य जेब में रखता
खंडहर की ड्योढ़ी पर उपजे कीकर की टहनी पर
चकाचौंध में खोई आँखो को गुलाब ही दिखता 

खींच रहे झीलों के खाके मरुथलिया धरती पर
जिनको जली प्यास का अनुभव तो हो सका नहीं है 

आशंका से घिरे हुए हर इक परिचित का चेहरा
संदेहों के घने क़ुहासा उमड़ छा रहे मन में 
चाहत फिर फिर ओढ़ रहीएकाकीपन  की चादर
सारे बंधन तोड़ लौट ले फिर इक शून्य विजन में 

मौन एक बगुले के जैसे  अचल पत्र शाखा पर 
जो तंद्रा से जगा सके वह चलती हवा नहीं है 

खंडित हुई आस्थाओं के टुकड़े चुनते चुनते
रंजित हुई उँगलियो को बस मौन निहारा करता 
डांवाड़ोल मान्यताओं की जर्जर होती नींवें
स्थिर करने की असफलता को सिर्फ़ संवारा करता 

शांति और आश्वासन से सूने सारे पूजस्थल
आरति प्रेयर और अजान की बिल्कुल दशा नहीं है 


खेल खिलाता है

 
खेल खिलाता है जीवन में निशा दिवस वह एक प्रशिक्षक
क़ैद रहा जिसकी मुट्ठी में हर परिणाम पूर्व स्पर्धा के
 
चाहे सौ मीटर की दूरी या फिर चाहे मैराथन हो
तैरें कोई पीठ पर लेटा या फिर तितली बना हुआ हो
एक रिले की हिस्सेदारी या फिर हो अपना बलबूता
या फिर एक टीम का ज़िम्मा उसके काँधे टिका हुआ हो
 
प्रतियोगी को मिला हुआ अपना दायित्व निभाना ही है
क्षमता के अनुरूपभूल कर क़िस्से अपनी व्यथा कथा के
 
धनुष हाथ हो तो प्रत्यंचा का तनना भी आवश्यक ही
लक्ष्य वेध के लिए ज़रूरी तन कामन का संकेंद्रण ही
ध्येय प्राप्ति के लिए सुलभ वह कर देता है उपकरणों को
मौक़ा देकर करवाता है नए पंथ का अन्वेषण भी
 
कुछ प्रयास तो सुलभ किए हैं निर्णय को हासिल करने को
पा जाता है उन्हें वही जो संकल्पित है बिन दुविधा के
 
जीवन की चौसर पर खेला जाता खेल अनवरत पल छिन
कोई खेले साँसे गिनतेकोई दिल की धड़कन गिन-गिन
लेकिन जीत उसी की होती जो कर्मांयवाधिकारस्ते
हो कर खेला करता है परिणामों की चिंताओं के बिन
 
ओ अनुरागी आज खेल में उतरो खेलोतब ही सम्भव
पा जाओ वरदान बरसते हैं जो स्वाहा और स्वधा के

ताना बाना बुने कबीरा

एक लुकाटी एक कठौती एक चदरिया चाहे जीवन निशा दिवस फिर भी करघा ले ताना बाना बुने कबीरा कते सू ​त ​ को बुनते बुनते खो देता संतोष हृदय का ...