अनजाने ही संवर गया है

आवाज़ों के प्रतिबिम्बों में जब जब भाव घुल गए मेरे
तब तब नया गीत  आ कोई अनजाने ही संवर गया है

मन के बुककेसों में रक्खी हुई किताबों ने खुल खुल कर
अक्सर ध्यान दिलाया मेरा रही अंनापढ़ी गाथाओं पर
और डायरी के पन्नों पर लिखे हुए वे छंद अधूरे
जिनका था आधार प्रीत में डूबी मादक संध्याओं पर

उनकी किसी पंक्ति ने जब भी मेरे अधर छुए हौले से
सरगम का सुर गीत समूचा बन कर तब तब निखर  गया है

यादों की पगडण्डी पर कुछ धूमिल से आकार् उभरते
प्रश्नचिह्न में ढलकर आँखों के पर्दो पर लहराते हैं
कौतूहल की ओढ़ दुशाला देते अनुभूति पर दस्तक
तो सहसा ही बिसरे सपने फिर संजीवित हो जाते है

उन सपनो का केंद्र बिंदु जब मन पोखर में हलचल करता
जलतरंग की कंपन में  तब गीत कोई आ बिखर गया है

जले प्रतीक्षाओं के दीपक नयनों की देहरी पर जब भी
अकुलाहट बिछ गई गली के जाकर के दोनों छोरो पर
बढ़ी और संभावनाये आ भुजबंधंन में सिहर सिहर कर
रुके भाव शब्दों में ढलकर आकर् अधरों की कोरो पर


फिसली है जब भी स्वर लहरी उन शब्दों की उंगली थामे
शब्दशिल्प इक नया गीत में तब आकर के उभर गया है

स्वागत है नव वर्ष



नए वर्ष की प्रथम भोर की पहली पहली किरण सुनहरी
अब इस बार खोल दें गाँठे बंधी हुई अरुणिम आँचल की

वर्ष वर्ष गुज़रे आशा की टूटी किरचे चुनते चुनते
नए वर्ष की अगवानी में नई नई आशाएँ बुनते
लेकिन सदा फिसलती डोरी हाथों से उड़ती पतंग की
बीत गई हर एक घड़ी बस प्रतिध्वनियो को सुनते सुनते

नए वर्ष का दीप जलाकर लाई देहरी किरण आज तू
अब इस  बार स्वरों की सरगम घोल कंठ में हलकी हलकी 

आँधी आती रही गली में पथ के सारे दिए बुझाकर
सुनी नहीं अम्बर ने भेजी सारी आवाज़ें लौटाकर
सूरज के रथ के पहियों की खिंची लीक पर चलते चलते
परिवर्तन को ढूँढ रही है दृष्टि आज रह रह अकुलाकर

हुई अपेक्षाओं में वृद्धि  वातायन पर नज़रें केंद्रित
नया वर्ष ये दुहराये न, बीती हुई कहानी कल की

तय हो चुका अभीतक जितना वो सारा ही सफ़र भला है
अब तेरे संग चमक रहा ये गगन और कुछ धुला धुला है
जागी नई नई निष्ठाएँ जीवन के बाव संकल्पों पर
साँसों की बगिया में आकर संदल जैसे घुला घुला है

नए वर्ष की। किरण खोल दे अब प्रकाश के स्रोत बंद जो
खिलती रहें पाँखुरी जिससे यहाँ ज्ञान के श्वेत कमल की 


१ जनवरी २०२०


संशय

नव चेतना दे नया स्वर ये प्रार्थना हर वर्ष थी
इस बार भी रीती रहेगी, क्या ये फैली अँजुरी

हर रात में सजते सपन को भोर नित आ तोड़ती
हर साधना की रीत को चंचल हवा झकझोरती
मंज़िल डगर बिछती सदा ही मानचित्रों पर मगर
विपरीत हो नियति की रबर, उनको मिटा कर छोड़ती

लेकर चले हैं फूल हर इक बार पूजा के लिए 
देहलीज तक आते हुए, हर एक पाँखुर थी झरी 

विश्वास प्राणो का लिये हर रोज़ दीपक से जले
मिलते रहे पथ में हमें झंझाओं के ही सिलसिले 
पर आस्था की डोर हमने हाथ से छोड़ी नहीं
इक मोड़ पर आकर कभी मंज़िल स्वयं हमसे मिले 

हर बार  टूटीं आस के टुकड़े उठाते हम चले 
पर धारणा ये पतझरी शाखाओं सी सूनी रही 

करते रहे थे कामना सबके दिवस हों सुख भरे
अपना नहीं तो आपका पथ, चाँदनी ज्योतित करे 
पर रह गई हर बार पुस्तक बिन खुले विश्वास की 
अब कामना भी सोचती है कामना क्योंकर करे

इक कल्पना है साथ बस, जिसके सहारे पर चले
 वो अज रही है आज भी केकिं तनिक सहमी डरीं




बीते बरस अलविदा


बीते बरस अलविदा तुझुको  जाते जाते इतना करना
अपने अर्जित संचय की निधि नए वर्ष को मत दे देना

तूने सदा इंद्रप्रस्थों को  खांडवप्रस्थ बना कर छोड़ा
और संजोए अपने कोषों में दिन रात नए दावानल
अश्वत्थामा बना खड़ा ब्रह्मास्त्र चढ़ाए प्रत्यंचा पर
कलुषित मन से दूषित करता रहा प्रगति  का झीना आँचल

चल समेट कर अपना डेरा अब अतीत के पथ पर बढ़ जा
तुझे शपथ अब पीछे मुड़ कर इन राहों को नहीं देखना

तूने अपनी अंगनाई में रोपी नित्य नई विष  बेलें
जाति धर्म की, रंग भेद की और नए अलगावबाद की
रची झूठ की नव प्रतिमाएँ  सत्य सुलाया शरशैय्या पर
आत्म मुग्ध तू रहा भुलाकर सुधियाँ कल की और आज की

नए वर्ष को इन बातों से दूर नया ही पंथ बनाना
इसीलिए अपनी परछाई भी उस पर पड़ने मत देना

आने वाले नए वर्ष से जुड़ी हमारी नव। आशाएँ
रहे हवा जल दूर प्रदूषण की तेरी अभिशप्त प्रथा से
तूने ख़ुद को मनमानी से इतिहासों में क़ैद कर लिया
नए वर्ष को अब लिखने है नव प्रकरण इक नई कथा के

बीते बरस याद के पन्ने तुझे मिटाने को आतुर है
कलम कह रही आगत का अब स्वागत गीत नया रच देना 

लेकिन सम्भव नहीं

बात तुम्हारी आज मानकर लिख तो दूँ मैं एक कहानी
लेकिन सम्भव नहीं अधूरे पल सब, इसमें समा सकेंगे

जीवन के इस रंगमंच पर आधी प्रस्तुत हुई कहानी
रही पटकथा और कथानक और सभी संवाद अधूरे
वक्त मदारी बना खड़ा था मुख्य पात्र बन रंगमंच का
और रहे हम सदा पार्श्व में हाँ हाँ करते हुये जम्हूरे

बात तुम्हारी आज मान कर कर तो दूँ मैं पूर्ण पटकथा
लेकिन सम्भव नहीं पार्श्व के पात्र कथानक निभा सकेंगे

इस जीवन की ब्रह्लवेल का पाँव जला मंत्रित दीपों से
दोपहरी फैलाया करती अंगनाइ में लाकर मरुथल
असमंजस में रही डूबती उतराती संध्या सुरमाई
और अधखुली आँखो से थी निशा बहाती रहती काजल

बात तुम्हारी आज मान कर तो दूँ श्रन्गार सभी का
लेकिन सम्भव नहीं हाथ की रेखा ये सब मिटा सकेंगे

वही पिघल कर वे रातें जो स्वाद उजाले का देती थीं
दुर्गम राहे सोख चुकी हैं तरल स्वप्न सब अंजलियों के
टुकड़े टुकड़े गिरी चाँदनी से गीला करते अधरो को
ठोकर खाते हुए मुसाफ़िर हम है पथरीली गलियों के

बात तुम्हारी आज मान कर अपनी डगर बदल तो लूँ मैं
लेकिन सम्भव नहीं फूल फिर चिह्न मील के उगा सकेंगे

देती भू पर मोती बिखेर

वह पुण्य शुभम स्वर्णिम काया
दे ओस कणों से, कदम बढ़ा
उगते शत पुष्प पंथ पर, वह
भू पर देती मोटी बिखेर

जब उगी भोर के विहग  वृंद
नभ पर अपने पर फैलाते
तब खोल क्षितिज के वातायन
गंधर्व नए सुर में गाते
सलिला की चपल लहरियों पर
बिखरें सोने के आभूषण
सहसा ही सरस सरस जाता
मन की वादी में वृंदावन

पारे की गतियाँ तरल लिए
बिखरी पर्वत पर, घाटी में
जिस ओर मुड़ी चलते चलते
देती रांगोली नव उकेर

भंगिमा नयन की जिधर मुड़े
लेती बहार आ अंगड़ाई
छेड़ा करता है पतझर भी
बस इक इंगित पर शहनाई
पूर्व,  पछुआ दक्किन, उत्तर
नाचे पैजानियाँ झंक़ा कर
जब करती एक इशारा वो
अपने कंगन को खनका कर

लहरातो धानी चूनर की
तूलिका उठाए हाथों में
वो खुले गगन के कैनवास पर
देती इंद्रधनुष चितेर्र

विधना के कर का प्रथम शिल्प
कल्पना भाव का वह संयोग
सम्पूर्ण अनंताकाशों पर
उसके जैसा न कहीं योग
वह रूप बदलती है पल पल
परिधान ओढ़ कर नए नए
वह प्रकृति एक है सुंदरतम
भारती सात्विकता हिए हिये

अंतरप्राणों की खोल दृष्टि
आयाम बिछाकर अंतहीन
वह शून्य तिमिर की वादी में
देती शत शत सूरज उजेर







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जो खुला आकाश

जो खुला आकाश स्वर में है तुम्हारे ओ बटोही
देखना उस पर घिरें ना आ कहासे संशयों के

उग रहे कितने प्रभंजन हर दिशा की वीथियों में
राजनीति. धर्म, भाषा, जाती की चादर लपेटे
चक्रवातों से, उमड़ कर चाहते अस्तित्व घेरें
हो रहे आतुर , बवंडर साथ में अपने लपेटे

आज के इस दौर में स्वाधीन स्वर सुनता न कोई
सोच यह, पड़ने न देना अक्स अपने निश्चयों पे

जो खुला आकाश स्वर में है, धारा पर गूंजता है
सरगामे बारादरी पर हो खड़ी पथ को निहारें
एक उठती गूंज अद्भुत खुल रहे स्वर में बटोही
साथ उसके भाव के पाखी उड़ें बन कर क़तारें

लालसाएँ व्यूह रच कर दे रही आवाज़ तुमको
भेदना तुम जाल उनके नयन लेकर संजयों के 

ज़िंदगी है हमसफ़र दरवेश बन कर ओ बटोही
राह में गतिमान रहना है नियति उसकी तुम्हारी 
दूर रह कर बन्धनो से तुम रहो स्वच्छंद  नभ में 
फिर समय की चॉसरों पर जीत हो हर पल तुम्हारी 

ये खुला स्वर जो खुले आकाश में गुंजित रहा है 
वह उभरता नित रहेगा, साज में से निर्भयो के 

राकेश खंडेलवाल 

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अनजाने ही संवर गया है

आवाज़ों के प्रतिबिम्बों में जब जब भाव घुल गए मेरे तब तब नया गीत  आ कोई अनजाने ही संवर गया है मन के बुककेसों में रक्खी हुई किताबों ने ख...