कनक तुली सी चंदन काया

 



कनक तुली से चन्दन काया 
पर कुंतल के मेघ घनेरे 
चन्दन वन की राहों में ज्यों 
ताक  लगाए खड़े सपेरे 

नील झील की लहरों से जब डुबकी लेकर निकली रूप​सि ​
लगा सूर्य निकला हो जैसी , लगे भोर के पल मुस्काने 

गात उगी हो ​खा​द्याहानों में
ज्वार छरहरी ​ ले ​ अंगड़ाई 
या कि सरो के इक पौधे पर
आइअभी अभी तरुणाई 

झुकी हुई कचनारी शाख़ों ने गलबहियाँ डाक दुलारा 
कलियों के सहचर होकर तब लगे मधुप नव राग सुनाने 

कंगन गढ़े चमेली ने आ
और मोतिया गजरा  गूँथे
कटिबंधन को हरसिंगार था
पुरवाएँ नूपुर बन गूंजे 

ऋतु गंधी समीर ने ली आ यौवन की पहले अंगड़ाई
दिशा दिशा हो मंत्रमुग्ध तब अलगोजों को लगी बजाने 

षोडस शृंगारों की पंक्ति
सज्जा करने को लालायित
मेहंदी बिखरी, कुंकुम चमका
हुआ अलकतक भी अभिरंजित

तौं बिखरे यौवन की कंचन धूप सुनहरी अंगड़ाई में
इंद्रधनुष उतरे अम्बर से पालकों को लग गाए सजाने

यायावर वनपकी मन का

 



मन का आवारा वन पाखी
ताका करता हर एक दिशा
फिर पंख फड़फड़ा रह जाता

तय की है उसने पगडंडी
चढ़ बही हवा के छोरों पर
उन तथाकथित गंतव्यों की
लौटा है साथ लिए झोली
अपने कोशों को लूटा, गाँव
पूँजी अपने मंतव्यों की

हर एक दिशा में यही हाल
पूरब पश्चिम, उत्तर दक्षिण
कुछ समझ नहीं उसको आता

उगते देखे चौराहों पर
मौसम ने बदली जब करवट
भ्रामक फूलों की नई फसल
केवल बदली हैं शाखायें
अंकुर वे ही प्रस्फुटित हुए
जो टहनी से कल गए फिसल

बरसों से घिसा पिटा ये ही
इतिहास अर्थ अपना खोकर
फिर फिर अपने को दुहराता

आती है उजड़ी गलियों में
पथ भूल वहीं, गुजरी थी कल
जिस द्वारे से उठ कर डोली
धुल चुके रंग, है स्याह वसन
चलते राजस गलियारों में
लेकर फिर से सूरत भोली

अमृत का देकर नाम आज
यह खोटा सिक्का वही पुनः
लाकर के भूनवाया जाता

तेरा चंदन बदन यह

 

तेरा चंदन बदन यह

शाम के अंतिम प्रहर की
आलसी अंगड़ाइयों के
फ़लसफ़े फिर से सुनाता है तेरा चंदन बदन यह
 
भोर से संध्या तलक के उपवनों में
खिलखिलातीं झूमती हैं 
तितलियाँ जिस गंध के अविरल प्रवाहित निर्झरों का
पान करती 
और कलियों के अविकसित पाटलों को
खोल देते हैं मधुप जो 
कुछ  रसीले चुम्बनों की छपी में लिपटे हुए प्रेमिल स्वरों को 
चूम कर के 
 
एक वह अनुभूति फिर से
कर रहा जीवंत आकर
आ मेरे भजपाश में तेरा सलोना सा बदन यह 
 
सावनी नभ में उमड़ती 
बदलियों में टैंक रही गोटा किनारि  जो रूपहली दमकती है 
जल तरंगें छेड़ती सी 
आ शिरा में शिंजिनी बन 
और कुछ मल्हार के स्वर
जो उमड़ने लग पड़ें सारणियों के तार को छूकर निरंतर
थाप देते चंग पर झूमे
उमंगित रागिनी बन 
 
इक पपीहे की मधुर आवाज़ लेकर 
टेरा है दूर से ही
बूँद की चूनर लपेटे भीगता तेरा बदन यह 
 
सुरमई। नभ की चदरिया 
को बिछाकरचाँदनी की झिलमिलाती साड़ियाँ तन पर लपेटे
थिरकते पग नृत्य करने
पेंजनी झंकार करके
तारकों के मध्य में 
अंगड़ाइयाँ लेती हुई इक मनचली नीहारिका के ज्वार को भर
कर सहज भुजपाश अपने 
तनिक पल को सिहर के 
 
व्योम की।मंदाकिनी  के तीर का कम्पन संजोए
बिजलियों की तड़पनों सा
एक झंझा की तरह उमड़ा तेरा चंदन बदन यह 
 
 

इंद्रधनुष के रंगों वाला

 


बहती हुई हवा की लहरों पर जो उड़ा पतंगों जैसा
एक तेरा है नाम सुनायने,  इंद्रधनुष के रंगों वाला

नीले अम्बर में तिरते है धवल बादलों के जो टुकड़े
उन पर रश्मि धूप की टाँके सोनहली गोटे की झालर
इठलातीं है कई तरंगें उन्हें छेड़ कर के हौले से
झंकृत होती हैं तब वे सब नाम तुम्हारा ले अकुलाकर

उनमे से कोई बादल का टुकड़ा बिछुड़ अधर पर आया
सिहरन में अनुभूत हुआ तब, नाम प्रिये मधुपरकों वाला

जागी हुई भोर ने अपना  बिम्ब निहारा जब  नदिया में
छिड़ी हवा से तब लहरों ने जल तरंग की धुनें बजाई
झुकी तटी की दूब चूमने, होता आलोड़न सरग़म का
और पड़ी तब दूर कहीं से बंसी की आवाज़ सुनाई

अंगड़ाई लेकर गंधों ने लिखा कली के मृदु  पाटल पर
कलासाधिके ! नाम रहा वो तेरा सहस अनंगों वाल

घोली स्याही घिरी घटा ने शाखाओं को कलम बना कर
पत्र पत्र पर लिखा एक हो नाम उभर कर आगे आया
गिरती हुई बूँद ने बोकर झंकारों को राग संवारे
मौसम ने छेड़ी शहनाई सारंगी ने  स्वर दे गाया

दिशा दिशा के वातायन से द्वार खोल कर बिखरा प्रति पल
रहा नाम वो बस शतरूपे उद्गम नई उमंगों वाला

बस अपना अपना दुखड़ा ही

 

सोचा मैंने गीत लिखूँ इक 
संवरा नहीं किंतु मुखड़ा भी
शब्द-विषय रह गए सुनाते
बस अपना अपना दुखड़ा ही 

विषय सामने पंक्ति बनाकर
वर्तमान के, खड़े हुए थे
वातावरण, युद्ध की घटना
स्वास्थ्य समस्या अड़े हुए थे
भूख, ग़रीबी, बेकारी सब
बार बार खुद को दोहराती
सत्ता की छीनाझपटी में
आपस में सब  लड़े हुए थे 

विषय प्राथमिकता को लेकर
करते रहे सिर्फ़ झगड़ा ही 
और एक दूजे से ज़्यादा
रहे सुनाते बस दुखड़ा ही 

शब्द परस्पर प्रतिद्वंदी थे
लिए अस्मिताएँ भाषा की
पारम्परिक शुद्धता लेकर
गयी संवारी अभिलाषा की
नई दिशा के अधर पैरवी
करते नई किसी संस्कृति का
बात उठाता रहा दूसरा
धरोहरों की, परिभाषा की

इस असमंजस में जो उपजा 
प्रश्न, रहा वह भी तगड़ा ही 
शब्द-व्याकरण लगे सुनाने
केवल बस अपना दुखड़ा ही 

फिर उठ गई दूसरी बातें 
छोड़े गीतों की परिपाटी
नयी भोर में प्रज्ज्वल करनी
केवल नव गीतों की बाती
हो तुकांत या मुक्त छंद हो
या फिर हो प्रयोग अनजाना
सरगम हो कितनी आवश्यक
वाणी में, जो गीत सुनाती

रही लेखनी असमंजस में
बढ़ता रहा और पचड़ा ही
गीत नहीं सँवरा कोई भी
बढ़ा शब्द का बस दुखड़ा ही 

ऋग्वेद के मंत्रों सरीखी ज़िंदगी

 

ज़िंदगी तो है जटिल ऋग्वेद के मंत्रों सरीखी
अर्थ समझें इसलिए अनुवाद ढूँढे जा रहे हम 

भोर उगती है किरण की गुत्थियों को साथ लेकर
गूढ़ प्रश्नों को थमा कर हाथ में, ढलते अंधेरे
प्रश्न पत्रों में लिखे उस प्रश्न को जानें ज़रा तो
यों अटक असमंजस्यों में बीत जाते हैं सवेरे

बीतते है दिन ग़ज़ल बन बिनरदीफो क़ाफ़िये के
और बस तरतीब को उस्ताद ढूँढे जा रहे हम 

दोपहर कीकर वनों में देखती वट वृक्ष छाया
माँगती पद चिह्न मरुथल में बगूडों की उठन से
आगमन को साँझ के, उत्सुक निगाहों की बिछा कर
पास के पल खर्च कर देती बिना कोई जतन के

साँझ आती मौन व्रत को ओढ़ कर रक्खे बरस से
और करने के लिए संवाद ढूँढे जा रहे हम

रात की मुँडेर पर आती नहीं है चाँदनी भी
तारको को  खूँटियों से खींच कर अपना दुशाला 
नींद रह जाती उलझ कर बिस्तरों की सलवटों में
पृष्ठ खोले दूसरे दिन का उतर आता उजाला

हाथ की धूमिल लकीरों में लिखी है जी इबारत
बस उसी का कर सकें प्रतिवाद ढूँढे जा रहे हम 




वर्तमान की दीवारों पर

 

वर्तमान की दीवारों पर
टाँक रहे हो तुम अतीत को
जिस पर लिखी इबारत पूरी
मिटा चुकी है रबर आज की

राजपथों के मोटे अजगर
लील चुके है
चौपालें पनघट पगडंडी
खलिहानों में तोड़ रही दम
उत्सव वाली
रेशम चूनरिया की झंडी

लौटा कर ले जाते अपने
शब्द उसी उजड़ी वीथी में
जिसे खंडहर बना चुकी है
करवट इस बदले समाज की

पीढ़ी है अनभिज्ञ आजकल
क्या होती हैं
दादी नानी कहें कहानी
वेद पुराण उपनिषद गाथा
उनके  अपने
माँ पापा से भी अनजानी

मोड़ चुकी मुख नई सभ्यता
अंधनुकरन कर रहे अपने
तौर तरीक़े, पश्चिम वाले
हर अंधे बहरे रिवाज की

सिमट गए सब रिश्ते नाते
Iइक आयत में
जो आ थमा हाथ सब ही के
ख़ुशी और त्योहार
हो रहे अब
अग्रेषित हो हो कर फीके

है पूरा विस्तार विश्व का
रुका उँगलियों के कोरों पर
लेकिन फिर भी रही अपरिचित
सुधियाँ, अपने एक आज की

अब गीत ग़ज़ल हो तो क्या ही

 गीत ग़ज़ल हो तो क्या ही


नौ बजने के पहले अब तो ढलने का लेती नहीं नाम
दिन की खूँटी पर टंकी हुई रहती है आकर यहाँ शाम
सुरमाई रंगत घोल पिए कुछ गर्म हवाओं के झोंके
है उजड़ गया पूरा लगता मीठी यादों का एक गाँव
सन्नाटे में तल्लीन हुए  पल पास रहे बाक़ी जो दो
अब गीत ग़ज़ल क्या कैसे हो

सुबहां उठ कर अंगड़ाई ले पाँवो को देती है पसार
दोपहरी सो जाती आकर मेपल की छाया को बुहार
अलसाएपन का आलिंगन कर देता शिथिल अंग सारे
प्रहरों पर कड़ी धूप तप  कर देती है रंगत को। निखार
भावों के पाखी का प्रवास अब हुआ आज दक्षिण दिशि को
तो गीत ग़ज़ल क्या कैसे हो

किरणों के कोड़े खा खा कर शब्दों के घोड़े हैं निढाल
तेरा करते थे राजहँस, सूखी हैं वे झीलें विशाल
पूरब से उठती झंझाएँ, पश्चिम में धू धू दावानल
कल भी बदलेगा नहीं, विदित है हमें आज जो हुआ हाल
किस किस पर दोष लगाएँ, जब हर इक जन ही अपराधी हो
फिर गीत ग़ज़ल क्या कैसे हो

किसकी बंसी की धुन गूंजी

 

लती अलसाई संध्या में
नदिया के इस निर्जन तट पर
मेरी सुधियों के तार छेड़
किसकी बंसी की धुन गूंजी

यादों का रेतीला मरुथल
उड़ते हैं धूलों के ग़ुबार
इस ओर नहीं मुड़ती राहें
जिन पर पग रखते हैं कहार
पगचिह्न नहीं कोई दिखता
बनने से पहले मिट जाते 
बस मौन कराहा करती है
जलता तन मन लेकर बयार 

नयनों की बिखरी वीरानी
में किसके यह खाके उभरे
किसको मेरी अंग​ना​ई में 
चुपके से आने की सूझी 

ये मौन तपस्वी से तरुवर
एकाग्र लगा कर खड़े ध्यान
बादल विहीन विस्तृत फैला
बस शून्य ओढ़ कर के वितान
पाखी के पर का फड़फड स्वर
है दूर कही जाकर खोया
सन्नाटे की धड़कन सहमी
हलचल का कोई नहीं भान 

फिर भी आभासित होती है
परछाई कोई अ​न​बूझी
मेरी सुधियों के तार छेड़
किसकी बंसी की धुन गूंजी 

असमंजस में डूबा है मन 
हर ओर ताकते हैं नयना
संध्या को करते हुए विदा
आतीं है थकी थकी रैना
है छीर चाँदनी की गठरी
सपनों का कोश लुटा पूरा
बैठी पलकों की चौखट पर 
ढूँढे बस पल भर का चैना

घिर कर आती है अन अर्जित
तकिए के तले रखी पूँजी 
मेरी सुधियों के तार छेद
किसकी बंसी की धुन गूंजी 

उसका कोई नाम नहीं है

 

जीवन के अँधियारे पल में जिसने आशा किरण जगाई 
मेरी सुधियों के आँगन में उसका कोई नाम नहीं है 

पथ पर चलते हुए राह में कितनी बार ठोकरें खाई
और पकड़कर बाँहें मेरी। किसने कितनी बार सम्भाला
भटकी हुए पंथ को किसने कितनी सही दिशाएँ देकर
आँजे हुए सपन आँखों के जिसने है शिल्पित कर डाला

आज खोल कर इतिहासों के पन्ने देखे उलट पलट कर
कितनी धुंधली आकृतियाँ थी उनका कोई नाम नहीं है 

यह महसूस हुआ है कितनी बार पकड़ता कोई ऊँगली
चक्रव्यूह से बाहर आने की जो क्रिया बदा देता है
बिना पाल मस्तूल लहर पर हिचकोले खाती नौका को
पतवारें बन कर के सहसा तट तक लाकर खे देता है

चेतन के, अवचेतन के सारे अध्याय पढ़े रह रह कर
ख़ालीपन ही मिला  अंत में जिसका कोई नाम नहीं है

रह जाते असमर्थ समझने में जो भी जीवन का दर्शन
एक मुखौटा लगा, हमें बस वोही राह दिखाते आकर
जहां शून्य से घिरा शून्य है। और शेष भी सिर्फ़ शून्य है
वहाँ किस तरह उत्तर देना सम्भव गुत्थी को सुलझा कर 

अवचेतन के तहख़ाने हैं अंतरिक्ष जैसे विस्तारित
परे कल्पना के जो कल्पित, उसका कोई नाम नहीं है 

कनक तुली सी चंदन काया

  कनक तुली से चन्दन काया  पर कुंतल के मेघ घनेरे  चन्दन वन की राहों में ज्यों  ताक  लगाए खड़े सपेरे  नील झील की लहरों से जब डुबकी लेकर निकली ...