आज उतरा है धरा पर


आज उतरा है धरा पर अवतरित जो रूप होकर
मेनका भी उर्वशी भी देख कर हैरान होते

चाँदनी की झील से उभरा हुआ यह संदली तन
पाँव  में रचती ​म​हावर ला​लि​माएँ आ उषा की
गंध के बादल उड़ाती  कुन्तलों की एक थिरकन
नैन की परछाइयों से कालिमा सजती निशा की

मदभरी इक​ दॄष्टि  के इंगित-भ्रमों  का स्पर्श पाकर
इंद्र​ ​के मधु के कलश भी  ​मुंह ​ छुपा हलकान होते

विश्व​कर्मा ​के सपन की एक छवि जो हाथ में ले
कूँचियाँ, उसने ज​तन ​ से शिल्प में जैसे चितेरी
​रंग​पट्टों के ख़ज़ाने खोल कर अपने समूचे
विश्व की सम्मोहिनी ले एक प्रतिमा में उँडे​री ​

देवता, गंधर्व, किन्नर और मानव, ऋषि मुनि सब
एकटक बस देखते है , देखकर हैरान होते

पाँव को छू पंथ की भी धूल में आ फूल खिलते
पड़ रही परछायों से सैकड़ों ​सँवरी अजंता
ओस में निखरे ​हुये ​प्रतिबिम्ब से बँनती एलोरा
और ​तन ​की कांति छूकर स्वर्ण का पर्वत पिघलता

देख कर सौंदर्य का यह रूप अद्भुत और अलौकिक
शायरों के होंठ पर हर पल नए दीवान होते

प्यार के पट खोलता है

मोड़ यह वयसंधियों का प्यार के पट खोलता है
और यह मन आँधियों में पात जैसा डोलता है 

आँजते  दोनो नयन ये इंद्रधानुशी स्वप्न  प्रतिपल
बाँसुरी की धुन निरंतर गूँजती अंगनाइयो मे
मौसमों  की जल तरंगे छेडते है तार मन के 
इक नई ही धुन सँवरती रागमय  शहनाइयों में

औ शिराओं में कोई ला शिंजिनी सी घोलता है 
मोड़ इक वयसंधियों का प्यार के पट खोलता है 

भोर उगती नित जगाती कुछ नई सम्भावनाएँ 
पतझरी ऋत भी बहारों के सरीखी झूमती है
काँच के रंगीन परदे पर संवरते चित्र पल पल 
आसमानों में विचारती आस मन को चूमती है 

आज का सच,शून्य होकर ही सभी कुछ बोलता है 
और यह मन आँधियों में पात बन कर डोलता है 

सेलफ़ोनी चित्रपट अटकाए रहता है निगाहें
आतुरामन हो प्रतीक्षित ताकता संदेश का पथ
कोई स्वर उठता; लगे सारंगियाँ जैसे बजीं हों 
गूँजने लगती ह्रदय में पायलों की झनझनाहट

यूँ लगे जैसे समय की चाल कोई रोकता है 
मोड़ इक वयसंधियों कप्यार के पट खोलता है 

राकेश खंडेलवाल 
१४ सितम्बर २०१९ 






स्वर मिला स्वर में तुम्हारे





रीतियाँ के अनुसरण में मंदिरो में सर झुकाया
यज्ञ कर कर देवता को आहुति हर दिन चढ़ाई
आर्चना के मंत्रस्वर में  साथ भी देते रहा मैं
पर समूची साधना भी साथ पलभर को न। आइ

मैं व्यथा की इस कथा को भूल  जाना चाहता हूँ
स्वर मिला स्वर में तुम्हारे गीत गाना चाहता हूँ

भोर की अँगड़ाइयों में पाखियों ने गीत गाए
साथ उनकी सरगमों का हर सुबह मैंने निभाया
मैं रहा वंचित सदा हर एक  युग की करवटों पर
कॄष्ण का इतिहास पूरा व्यास के सुर में सुनाया

वाल्मीकी के रचे श्लोक में गुन्जित हुआ में
स्वर मिला स्वर में तुम्हारे अर्थ पाना चाहता हूँ

घाट पर वाराणसी के घुल गया तुलसी स्वरों में
इक कथानक छंद में चौपाई में मैंने सुनाया
सूर के स्वर में मिला इक तार के आरोंह चढ़कर
फिर उतर अवरोह में मैंने निरंतर गीत गाया

एक पल के भी लिए  पर तुष्टि के क्षण मिल न पाए
स्वर मिला स्वर  में  तुम्हारे तृप्ति पाना चाहता हूँ

स्वर मिलाया था कभी दावानलो के तीक्षण स्वर से
और इक हुंकार से दिनकर अधर से  जो उठी  थी
तो कभी स्वर को मिलाया पार्थ सारथि के स्वरों से
सहज ही जिनसे प्रवाहित एक दिन गीता हुई थी

आज सब कुछ छोड़ पीछे, मौन की चादर लपेटे
स्वर मिला निस्तब्धता में मौन रहना चाहता हूँ

बूँद भर जल

बूँद भर जल बन गया आशीष, तेरा स्पर्श पाकर
चल दिया मैं आचमन कर तेरी स्तुतियाँ की डगर पर

मैं अजाना था कहाँ पर शब्द की जागीर फैली
और स्वर की सरग़मों की वीथियों की क्या दिशाये
दूर तक कोई नहीं था जो मुझे  निर्देश  देता
किस तरह से शब्द चुन कर राग में उनको सजायें

बूँद भर जल बन गया शतदल कमल के पत्र से झर
एक वह पथ का प्रदर्शक जो दिशा करता उजागर

स्वाति के नक्षत्र की इक बूँद का जल बन गया था
भिन्न गुण वाला परिस्थिति साथ जैसी मिल गई थी
उड़ गया कार्पूर बन कर याकि मोती बन गया था
हो गया विष जब कि संगत शेषनागी  हो गई थी

किंतु तेरी वीण के इक तार की झंकार छू कर
ज्ञान का भंडार होकर छा गया पूरे जगत पर

बूँद भर जल मेघगृह में जा हुआ है शत सहस्त्रित
और फिर बरखा बना है भूमि की तृष्णा बुझाने
ईश का वरदान बन कर जब सज़ा नत भाल पर तो
कालिदासों के मुखों से लग गया कविता बहाने


बूँद भर जल बह शिरा में ज़िंदगी को प्राण देता 
और संभव कर रहा हम गीत गायें गुनगुनाकर 

कल जहाँ से लौट कर

 कल जहाँ से लौट कर हम आ गए सब कुछ भुला कर
आज फिर से याद की वे पुस्तकें खुलने लगी हैं 

फिर लगी है तैरने इस साँझ में धुन बाँसुरी की 
भग्न मंदिर में जला कर रख गया है दीप कोई 
पनघटोंकी राह पर झंकारती है पैंजनी फिर 
पीपलों की छाँह में फिर जागती चौपाल सोई

कल जहाँ से लौट कर हम आ गए, सूनी  कुटी वह
गूँजते शहनाई स्वर के साथ फिर सजने लगी है 

भोर में नदिय किनारे सूर्य वंदन आज फिर से 
और फिर तैरे प्रभाती गीत कुछ बहती हवा में 
गुरुकुलों का शंखवादन जो अपरिचित हो गया था 
खींचता नूतन सिरे से चंचलता मन आस्था में 

कल जहाँ पर बह रही थी रात दिन पछुआ निरंतर 
आज फिर पूरबाइ की मद्दम गति बहने लगी है 

कल जहाँ से लौट आए गीत लेकर के निराशा 
मंच पर बैठे विदूषक, हाथ में कासा सम्भाले
आज फिर से छा रही हैं संस्कृतियाँ मेघदूती 
काव्य में में आने लगे, साकेत दिनकर के हवाले 

कल जहाँ पर राग -सरगम मुँह ढक कर सो गए थे
आज रंगीनियाँ वही पर निशिदिवस बजने लगी है  

एक उजली शाम के भटकाव में

खो चुके पहचान हम अपनी यहाँ
एक उजली शाम के भटकाव में
ढूँढते कुछ पल मिलें अपने कहीं
व्यस्तताओं के बढ़े सैलाब में

भोर ने प्राची रंगी हर रोज ही 
हम घिरे इक दायरे में रह गए
जो दिवस ने ला थमाए थे प्रहर
हाथ से फिसले कही पर बह गए 
आँख में आकर निशा थी आँजती
इक सुनहरे स्वप्न की परछाइयाँ 
किंतु चढ़ते रात की कुछ सीढिया
वे सभी टूटे बिखर कर ढह गए 

जानते थे मरूथली आभास है 
किंतु तृष्णा के रहे बहकाव में 

हर दिशा में राह स्वागत में बिछी
मंज़िलो तक साथ जाने के लिए
और निश्चय था प्रतीक्षज में खड़ा 
जो ग़हें हम ध्येय पाने के लिय
राज पर हमने चुनी विपरीत हो
दाक्षयरे में एक थी चलती रही
इसलिए ही आस की का पियाँ सभी
बिन खिले ही सूख कर झरती रहीं 

और हम बस सूत्र इक थे खोजते 
चाहना के इस घने बिखराव में  

तितलियों के पंख की परछाइयाँ
पंखरी  पर ओस सी गिरती रहीं
गंध की उमड़ी हुई कुछ बदलियन
सामने आ ताक पर अटकी रही 
पर हमारी दृष्टि के आकाश का 
मरुथली भ्रमजाल ही सीमांत था
ध्यान उस पर दे नहीं पाए  कभी
जो सहज उपलब्ध अपने पास था 

पांडुलिपियां रह  गई थी अनखुली 
अर्थ बस ढूँढा किए अनुवाद में 

सब अधूरे ही रहे  ईजिल  टंगे 
कैनवस पर चित्र जितने भी बने
चाह जिनकी थी, दिखा पाए नहीं 
जो लगे दीवार पर थे आईने
हम स्वयं दोषी हमें मालूम था 
किन्तु साहस था नहीं, स्वीकारते
चाह थी हर बार चूमे जयश्री 
इसलिए ही रह गए हम हारते 

चाहना थी गुम्बदों पर जा चढ़ें 
और बस अटके रहे मेहराब में 

 

दृष्टि में हर शाम

दृष्टि में हर शाम उभरी एक ही छवि वह मनोहर
एक दिन जो मोड़ पर वयसंधि के सहसा मिली  थी 

गा उठी थी कोकिले तब पतझरी अमराइयों में
और मन की क्यारियों में फूल अनगिनती खिले थे
रह रहे थे दृश्य जो छाए धुँधलके में लिपट कर
चीर  कर सारा कुहासा सामने खुल कर मिले थे

याद उस पल की बनी है शिल्प मन की वीथियों में
जब कुमुदिनी ले क़ेतकी को बिन ऋतु के ही खिली थी 

कर चुकी है उम्र कितनी दूरियाँ तय इस सफ़र में 
परिचयों की सूचियों में नाम कितने जुड़ गए हैं
दृष्टि में हर शाम आता सामने वह नाम केवल
पृष्ठ मन की पुस्तकों के एक जिस पर मुड़ गए हैं 

लौट कर जाता निरंतर  मन समुद्री पंछियों सा 
उस जगह पर याक ब यक मंजुल मिली thi

दृष्टि में हर शाम खुलते पट उन्ही वातायनों के
पार जिनके पुष्पधनवा के शैरन के रंग बिखरे
रंग गई थी ओढ़ जिनको वादियों की सब दिशाएँ
और नव शृंगार के पल थे जहाँ पर झूम सँवरे

गगन घिर आता क्षितिज तक राजहँसों के परों से 
ताजमहली शिल्प की परछाइयाँ  जैसे मिली थीं 

आज उतरा है धरा पर

आज उतरा है धरा पर अवतरित जो रूप होकर मेनका भी उर्वशी भी देख कर हैरान होते चाँदनी की झील से उभरा हुआ यह संदली तन पाँव  में रचती  ​म​ हावर ला...