जिस तरह आप चाहें

आदमी हम नही, झुनझुने हो गये
जिस तरह चाहे वैसे बजा लें हमें

हम हैं कठपुतलियां, जो बंधी डोर से
कर रहा है नियंत्रित कोई और है
नाचते हम उसी के इशारों तले
हम पे अपना नही सूत भर जोर है
मौलवी पादरी मंदिरों के गुरु
और पंडे हमारे हैं सर्वोपरी
दिन  दुपहरी घिरे रात या सांझ हो
बस उन्ही की किये जा रहे चाकरी

वो जो चाहें रखें कर खड़ा धूप में
चाह हो, कुर्सियों पर बिठा लें हमे

सोच अपनी हमारी नही है तनिक
अपना मस्तिष्क तो शून्य से है भरा 
जंतरों मन्तरों गंडे ताबीज से
है हुआ ये चमन ज़िन्दगी का हरा
सारे नक्षत्र गुरुओं की अंटी में है
जिन चुड़ैलों को बस में किये मौलवी
चुटकियों में अघोरी की नक्शे छुपे
भेंट बलिदान से मिल सकेंगे अभी

हम करेंगे हकीकत समझ अनुसरण
स्वप्न कैसा भी कोई दिखा दे हमें

राजनीतिक गडरिये  हमें हांकते
हम चले जा रहे झुंड में भेड़ से
सब्ज चश्मे चढ़ाये हुये आंख पर
हम खडे रह गये है बंधे पेड़ से
दिन बदलते रहे रात ढलती रही
हम जहां से चले हैं अभी तक वहीं 
जानते है कि बदलाव सम्भव नही
बस दिवास्वप्न की चूसते रसभरी

शीश नत कर खड़े हम समर्पित हुए
आप भी चाहें, उल्लू बना दें हमें 

गीत नहीं अब लिख​ता हूँ मैं

गीत नहीं अब लिखता हूँ मैं
समयाशिला पर जमी काई है
शब्द गीत के चुनते चुनते
अक्षर अक्षर
​ ​
फिसला हूँ मैं
 
बुनियादों में दिन की जाकर
ठहर गए सूरज के घोड़े
सपन रात की देहलीजों पर
रुके रहे पलकें न छोड़े
ओस किरण के चुम्बन की
अभिलाषाओं के शीश महल के
खंड खंड होती आशा के
टुकड़ों को रह रह कर जोड़े
 
बही हवा की झालारियों में
सेमल के फाहों के जैसा
आवारा हो उड़ता हूँ मैं
 
पथ उद्देश्यहीन हो पथ में
घूमा करते हैं बन फिरकी
ढकी नीम की शाखाओं से
मिलती है नीड़ो की खिड़की
​रि
क्त हुये पाथेय पात्र में
संचय की अक्षमता भर कर
विश्रांति के पल देते हैं
द्वारे पर से फिर फिर झिड़की
 
लुटी कल्पना यायावर की
फटी हुई गठरी में भरकर
देहरी देहरी फिरता हूँ मैं

संदेशो के रहे छूटते 
उगली के पोरो से धागे
भावो की अनुभूति निरंतर
अनुमति अभिव्यक्ति को मांगे
लेकिन जुड़ते नही स्वरों से
मन  की अंगड़ाई के फेरे
अंधकूप सी नीरावताएँ
​छाईं 
 रहती सांझ सवेरे

आईने के पार खड़ी 
परछाई का परिचय तलाशता
निर्निमेष बस तकता हूँ मैं

गीत नहीं अब लिख
​ता  हूँ मैं 

निद्रा के पल क्यों न बाँटे


तुम तो सोते रहे रात भर नींद चैन कीले खर्राटे
रही अनिद्रा प्रश्न उठाती, निद्रा के पल  क्यों न बाँटे
सप्त पदी की लगा दुहाईतुमने हर अधिकार जताया
तुमको जो कुछ लगा हाथ मेंसारा ही तुमने हथियाया
पाँच किलो रबड़ी खाने का जब जब मुझको मिला निमंत्रण
आधी घर पर लानी होगीवरना ! कह कह कर धमकाया
सारे फूल ले गईं चुन करछोड़े हैं मुझको बस काँटे
ये बतलाओ आधे आधेये सब क्यों न मुझसे बाँटे
मैं ग्वाला मथुरा का वासीकॄष्ण कन्हैया का आराधक
माखन मिश्री के मेरे भोगों में तुम बनती हो बाधक
सवामनी के जिजमानों ने भिजवाये जो भरे टोकरे
सब के सब डकार डाले हैं चुटकी भर भी लिया न पाचक
मैं कुछ कहता हूँ तो कहतीपड़े अकल पर मेरी भाटे
ये बतलाओ आधे आधे तुमने मुझसे क्यों न बाँटे
कितने दिन तक और सहूँ मैं कहो तुम्हारी तानाशाही
बीत चुके दस बरसऔर तुम अब भी करती हो मनचाही
रसगुल्लेचमचमकाजू की बरफ़ी सब ही छीन चुकी हो
कम से कम अब एक छोड़ दो मेरी खातिर बालूशाही
एक बार का सौदा करकेरोज उठाता हूँ मैं घाटे
ये बतलाओ आधे आधेतुमने मुझसे क्यों न बाँटे

ड्यौढ़ी पर गुलाब खिलते हैं-

जब जब आई अँगनाई में
फ़ागुन की रंगीन पूर्णिमा
या दोपहरी में चैती की
मिला धूप का स्पर्श गुनगुना
सुधियों की दुल्हन की
आंखों में उग आये स्वप्न सिन्दूरी
विपदाओं की झंझाओं का
हुआ शोर उस वक्त अनसुना
जब से चित्र तुम्हारे उपजे दृष्टि क्षितिज के वातायन पर
तब ही से गुलाब के पौधे नित ड्यौढ़ी पर आ खिलते हैं

लहरें जब मद्दम से स्वर में
आकर के तट से बतियाई
झाड़ी में से जुगनू ने जब
देखी थी अपनी परछाईं
लगी फ़ड़फ़ड़ाने पा
​खी 
 के
पर की घर के पथ में सरगम
सुरमाये नभ के आँचल पर
छवि तब एक उभर कर आई
रँगे दिशाओं के पल्लों पर चित्र सभी वे रहे तुम्हारे
जहाँ दिवस औ निशा चार पल नित ही गले मिला करते हैं

शिशियारी फुलवारी करती
है हिमांत की जब अगवानी
रंग बिरंगे स्वप्न सजाने
लगती श्वेत राह वीरानी
नव जीवन पाने लगते हैं
सूखी शाखाओं पर पत्ते
आलावों पर नाचा करती
नई बाल सोनहली धानी
मौसम की मदभरी हवायें नाम तुम्हारा गाया करती
पंखुड़ियों पर पड़ी ओस से जब उजियारे कण मिलते हैं

अब कोई यदि मेरे पथ पर

अब कोई यदि मेरे पथ पर बैठे चाहे पलक बिछाकर अब कोई यदि गहन निशा में रहे प्रतीक्षित दीप जला कर में उस पथ के पथ से भी अब इतनी दूर निकल आया हूँ...