अधलिखी कोई रुबाई गुनगुनाता जा रहा हूँ.

बन्द द्वारे से पलट कर लौट आते स्वर अधर के
दॄष्टि के आकाश पर आकर घिरीं काली घटायें
थाम कर बैठे प्रतीक्षा को घने अवरोध के पल
लीलने विधु लग गया है आज अपनी ही विभायें

किन्तु मैं दीपक जला कर आस की परछाईयों में
अधलिखी  कोई रुबाई गुनगुनाता जा रहा हूँ.

सिन्धु मर्यादाओं के तट्बन्ध सारे तोड़ता सा
बिछ रहा आकाश आकर के धरा की पगतली में
राजपथ को न्याय के जो पांव आवंटित हुए थे
रह गये हैं वे सिमट कर के कुहासों की गली में

किन्तु मैं निज को बना कर यज्ञकुंडों की लपट सा
दर्पणों में साध के बस झिलमिलाता जा रहा हूँ

उत्तरों की सूचियों का नाम लेकर प्रश्न बैठे
दोपहर ने ढूँढ ली है छांह निशि की चूनरी में
रक्तवर्णी पंकजों के पात सारे झर चुके हैं
आज  मणियाँ हो गईं मिश्रित  समर्पित घूघरी में

और मैं भटके हवा की डोर में अटके तृणों सा
बिन किसी कारण कोई गाथा सुनाता जा रहा हूँ

हैं उजालों के मुखौटे ओढ़ कर आते  अंधेरे
दे रहा इतिहास रह रह दंश अनगिनती दिवस को
वे अधर जो जल चुके हैं एक दिन पय स्पर्श पाकर
चाहते तो हैं नहीं पर थामते प्याला विवश हो

और मैं धुंधलाये पन्ने धर्मग्रंथों के उठाकर
दिन फ़िरेंगें, ये दिलासा ही दिलाता जा रहा हूँ
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चैतिया सारंगियां अब लग गईं बजने

हवा में गन्ध आकर कोई मोहक लग गई घुलने
क्षितिज पर बादलों के बन्द द्वारे लग गये खुलने
धरा ने श्वेत परदों को हटा कर खिड़कियाँ खोलीं
गमकती ओस से पाटल कली के लग गये धुलने

नगर से मौसमों के दूर जाता है शिशिर का रथ
पुलकती चैतिया सारंगियां अब लग गईं बजने

लगे हैं कुनमुनाने पालने में शाख के पल्लव
हुआ आरम्भ फ़िर से पाखियों का भोर में कलरव
उठी है कसमसाकर, धार नदिया की लगी बहने
हवा को चूम पाना दूब को होने लगा सम्भव

अंगीठी सेक कर पाने लगी है धूप अब गरमी
बगीचे के सभी पौधे चढ़ा आलस लगे तजने

लगा है धूप का साम्राज्य विस्तृत और कुछ होने
सिमटने लग गया है अब निशा के नैन का काजल
सँवरने लग गये पगचिह्न निर्जन पंथ पर फिर से
विचरते हैं गगन में दूध से धुल कर निखर बादल

लगीं लेने उबासी तलघरों में सिगड़ियां जलतीं
उठे कम्बल स्वयं को लग पड़ें हैं ताक पर धरने

वह हो गया स्वयं परिभाषित

यद्यपि कर न सका है ये मन
कभी समय की परिभाषायें
साथ तुम्हारे जो बीता है
वह हो गया स्वयं परिभाषित

उगी भोर जब अँगनाई में
पाकर के सान्निध्य तुम्हारा
शहदीले हो गये निमिष सब
पल पल ने छेड़ी बाँसुरिया
किरन तुम्हारे दर्शन का पा
पारस परस, सुनहरी हो ली
फूलों पर लाकर उंड़ेल दी
नभ ने ओस भरी गागरिया

प्राची ने खिड़की के परदे
हटा निहारा जब नदिया को
लहर लहर में गोचर तब थी
सिर्फ़ तुम्हारी छवि सत्यापित

अरुणाई हो जाती बदरी  
पाकर परछाईं कपोल की
पहन  अलक्तक के गहने को
संध्या हुई और सिन्दूरी
सुईयाँ सभी घड़ी की उस पल
भूल गईं अपनी गति मंथर
निर्निमेष हो अटक गई, तय
कर न सकी सूत भर दूरी

अनायास ही चक्र समय का
ठिठक रहा तुमको निहारता
चित्र दृष्टि ने खींच दिया जो
नहीं स्वप्न में था अनुमानित

आस का पात्र बस झनझनाता रहा


दिन उगा,ढल गया,रात आई,गई
साँस का कर्ज़ बढ़ता ही जाता रहा

काल के चक्र से बँध गये थे कदम
एक क्षण के लिये भी कहीं न रुके
नीड़ विश्रान्ति को था कहीं पर नहीं
अनवरत चल रहे पांव हारे थके
पंथ पाथेय में राह देता रहा
धुन्ध में डूब गन्तव्य ओझल रहा
दृष्टि छू न सकी दूर फ़ैला क्षितिज
भार पलकों का कुछ और बोझल रहा

इक भुलावा कि गति ज़िन्दगी से बँधी
फ़िर भ्रमित कर हमें मुस्कुराता रहा

शेष होते दिवस की खड़ी  सांझ ले
अपने हाथों में बस आरती के दिये
हर सुबह की उगी धूप ने हर घड़ी
ये छलावे हमें भेंट में ला दिये
मरुथली मेघ थे छत डगर की बने
धूप जलती रही जेठ को ओढ़कर
और हम कैद से मुक्त हो न सके
अपनी खंडित धरोहर का भ्रम तोड़कर

सीढ़ियों से निराशा की गिरते हुए
आस का पात्र बस झनझनाता रहा

हाथ जोड़े हुए शीश अपना झुका
हम समर्पण किये जब हुए थे खड़े
तो विदित हो गया साये अब हो गये
अपनी सीमाओं से कुछ अधिक ही बड़े
भीख मिल न सकी इसलिये, झोलियाँ
एक संकोच में खुल न पाईं कभी
और झूठे हुए दम्भ दीवार बन
एक दिन के लिये भी झुके न कभी

शून्य फ़ैली हथेली की रेखाओं पर
अपना हल लाके फिर फिर चलाता रहा

चाँदनी का नहीं कोई उल्लेख था
शब्द के कोष जितने रहे पास में
ओस की बून्द भी एक घुल न सकी
हर निमिष होंठ पर उग रही प्यास में
टूटती नाव के एक मस्तूल पर
छीर होता हुआ पाल देखा किये
ढूँढ़ते थक गये जिसको अपना कहें
कोई हो एक पल,हम कभी जो जिये

सिन्धु का तीर लहरें बुलाते हुए
हर घरौंदा बनाया, मिटाता रहा

रात आई थी मगर आई उबासी लेती

हमने पट नैन के हर रोज खुले छोड़े हैं
चाँदनी रात नये स्वप्न लिये आयेगी
होठ की गोख पे डाली नहीं चिलमन हमने
कोई सरगम ढली शब्दों में उतर आयेगी
आस खिड़की पे खड़ी दिल की, गगन से आकर
कोई बदली किसी पाजेब से टकरायेगी
और तारों की किरन पर से फ़िसलती यादें
बूँद बरखा की लिये साथ चली आयेंगी
गुनगुना उठेंगी कमरे में टँगीं तस्वीरें
पाँव क अलते को छू देहरी सँवर जायेगी
कोई धानी सी चु्नर हाथ हवा का पकड़े
मेरी आंखों के दहाने पे लहर जायेगी

मगर ये हो न सका, स्वप्न नहीं लाई थी
रात आई थी मगर आई उबासी लेती
पंथ फ़ागुन ने बुहारा था राग गाते हुए
बात उसकी न समझ पाई, रही चुप चैती
और पाजेब के घुँघरू भी गये टूट बिखर
तान बदली ने सुनाई तो झनझनाये नहीं
पाहुने यूँ तो बहुत द्वार पे आ आ के रुके
जिनकी चाहत रही दहलीज को, वे आये नहीं

पाहुने आये नहीं मांग लिये सूनी सी
देहरी बैठी ही रहीं श्वेत पहन कर साड़ी
आज भी ताकती हैं सूनी कलाई उसकी
एक कंगन ने जो चूनर पे बूटियाँ काढ़ीं

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...