जिस्र आज ने फिर दुहराया


मन उदास हैहो निढाल बस सोफे पर लेता अलसाया
ये ही तो हालत कल की थीजिस्र आज ने फिर दुहराया

दिन उगता घुटनों के बल चल संध्या को जल्दी सो जाता
मौन खड़े पत्ते शाखों पर कोई कुछ भी कह न पाता
खिड़की की चौखट को थामे खड़ी धूप बीमार सिसकती
अँगनाई की पलक प्रतीक्षा का हर पल उत्सुक रह जाता ​

​ 

पता नहीं चलता कब आकर रजनी ने  आँचल फहराया 
ऐसे ही कल की थी हालत जिसे आज ने फिर दोहराया ​

 

दूर क्षितिज तक जा पगडण्डी रही लौटती दम को साधे
सूना मंदिर लालायित था कोई आकर कुछ आराधे
हवा अजनबी पीठ फिराये खड़ी रही कोने में जाकर
बढ़ता बोझा एकाकीपन का, ढो ढो झुकते है काँधे

ताका करती दॄष्टि ​भाव की गुमसुम हो बैठी  कृशकाया
ऐसा ही तो कल बीता था जिसे आज ने फिर दुहराया ​

 

संदेशों के जुड़ कर टूटे कटी पतंगों जैसे धागे
बढ़ती हुई अपेक्षा रह रह पल दो पल का सहचर मांगे
फ़ैली हुई ​नजर ​की सीमा होती जाती और संकुचित
हो निस्तब्ध प्रश्न के सूचक, बने घड़ी के दोनों कांटे

फौलादी होता जाता है पल पल सन्नाटा गहराया
ऐसे हुआ हाल कल भी था जिसे आज ने फिर दोहराया

मन का कब ईतिहास पढोगे

अनुत्तरित यह प्रश्न अभी तक कब बोलो तुम उत्तर दोगे
तन का तो भूगोल पढ़ लिया, मन का कब ईतिहास पढोगे 

युग बीते पर पाठ्यक्रमों में किया नही परिवर्तन 
​तू
मने
बने हुए हो बस अतीत के पृष्ठों में होकर के बन्दी
मौसम बदले, ऋतुयें बदली, देशकाल की सीमाएं भी
किन्तु तुम्हारी अंगनाई 
​की बदली नहीं घिरी 
 नौचंदी

बिख्री
​ हुइ मान्यताओ के अन्धकूप मे डूबे  हो तुम 
बोलो नई  सुबह की अपने मन मे कब उजियास भरोगे ​

सिमटा रहा तुम्हारा दर्शन सिर्फ मेनका उर्वशियो में
लोपी, गार्गी, मैत्रेयी को कितना तुमने समझा जाना
दुष्यंती स्मृतियां सहेज कर, कच से रहे अर्थसाधक तुम
यशोधरा का और उर्मिला का क्या त्याग कभी पहचाना

अनदेख करते आये हो बिम्ब समय के दर्पण वाला
कटु यथार्थ की सच्चाई पर, बोलो कब विश्वास करोगे
 
एकाकी जीवन की राहें होती है अतुकांत काव्य सी
मन से मन के संबंधों की लय सरगम बन  कर सजती है 
सहचर बनने को कर देता जब कोई जीवन को अर्पित
पल पल पर सारंगी तब ही साँसों की धुन में बजती है 

जीवन का अध्याय तुम्हारा अर्थ, विषय से रहित गद्य सा
इसको करके छंदबद्ध कब अलंकार अनुप्रास जड़ोगे 

 

तूमन केवल स्वप्न ही दिये

तुमने मुझको स्वप्न कुछ दिए
लेकिन तुमने स्वप्न ही दिए

​नील 
 गगन के परे सुवासित औ 
​पुष्पित 
राहों 
​के 
निज पाशों में  रखे बाँध कर हर पल उन  बाहों के 
धवल चाँदनी  में अंगड़ाई ले, संदली हवा के 
सांस सांस भर तृप्ति प्राप्त करती, बढ़ती चाहों के 

रहा खोजता मैं उत्तर, पर 
तुमने केवल प्रश्न ही दिए 

प्रश्न स्वप्न की इस दुनिया का पथ है शुरू कहाँ से
जो सभाव्य बताते उसको संभव करे जहाँ से
प्रतिबिम्बो के आकारों के आयामों को नापें
आदि अंत की रेखाओं का कर दें अंत कहाँ पे

मांगीमाल उत्तरों वाली
तुमने मुझको यत्न ही  दिए

यत्न किये निशि वासर इन लंबी राहों पर चलते
जिन पर कभी मंज़िलों के साये भी आ न पड़ते
होते है आरम्भ, अंत  पर जिनका कही नहीं है
और नीड भी संध्या के, पाथेयो में ही ढलते

परिणति की अभिलाषाओं को
अंतशेष भी भग्न ही दिए

 
तूमन केवल स्वप्न ही दिये

रचना करती है अभिनंदन

क्षमता नहीं किसी में सुन ले
उसके लेखन में गुंजायश
सबका है अपना विज्ञापन

किस रचना को गया सराहा
किसने देखे है सम्मेलन
कौन शब्द दे करे उजागर
किसी हृदय का अन्तर्वेदन
 कहाँ कहाँ पर मिला मान है
और छपी है कितनी पुस्तक
आत्म प्रशंसा के सब  साधन 

किस रचना के योगदान पर
कितने मंच रहै है निर्भर
किस रचना  का शिल्प आनूठा
हावी हुआ सभी के उपर 
कितनी हुई संकलित अब तक
और संकलन का कितनो के
कितनी बार किया संपादन   

बीए एमए पी एच डी की
कितनी सनद बटोरी अब तक
भाषा औ व्याकरण कहां तक
द्वारे आकर देते दस्तक
आलोचक आ शीश झुकाते
करते हैं साहित्यकार का
सांझ सवेरे बस आराधन
ऐसे अद्भुत स्वतःप्रशंसक
का रचना करती अभिनंदन
 

अब कोई यदि मेरे पथ पर

अब कोई यदि मेरे पथ पर बैठे चाहे पलक बिछाकर अब कोई यदि गहन निशा में रहे प्रतीक्षित दीप जला कर में उस पथ के पथ से भी अब इतनी दूर निकल आया हूँ...