जीवन के पतझड़ में

जीवन के पतझड़ में जर्जर सूखी दिन की शाखाओं पर
किसने आ मल्हार छेड़ दी औ अलगोजा बजा दिया है

मुड़ी बहारो की काँवरिया मीलो पहले ही 
​इ
स पथ से
एक एक कर पाँखुर पाँखुर बिखर चुके है फूल समूचे
बंजर क्यारी में आ लेता अंकुर कोई नहीं अंगड़ाई
और न आता कोई झोंका गंधों का साया भी छू
​ ​
के

​फिर 
 भी इक अनजान छुअन से धीरे से दस्तक दे कर के 
इस  मन के मरुथल को जैसे रस वृंदावन बना दिया है 

सूखी शाखाओं की उंगली छोड़ चुकी है यहां लताएं
बस करील की परछाई ही शेष रही है इस उपवन में
उग आये हर एक दिशा में  मरुथल के आभास घनेरे
एकाकीपन गहराता है पतझड़ आच्छादित जीवन में

फिर भी सुघर मोतियों जैसी उभरी कोमल पदचापों ने
गुंजित हो ज्यो कालिंदी तट को आँगन में बुला दिया है

 ढलती हुई सांझ की देहरी पर अब दीप नहीं जलते है
 भग्न  हो चुके मंदिर में आ करता नहीं आरती कोई
अर्घ्य चढ़ाता कौन जा रहे अस्ताचल की और, सूर्य को
 खर्च हो चुका कैलेण्डर कमरे में नहीं टांगता कोई

फिर भी आस कोंपलों ने मुस्काकर जीवन के पतझड़ में
जलती हुई दुपहरी को मदमाता सावन बना दिया
​ है 
 

और एक दिन बीता

और एक दिन बीता 
कर्मक्षेत्र से नीड तलक बिखरे चिन्हों को चुनते हुए राह में 
बिखर रहे सपनों का हर अवशेष उठाते हुए बांह में 
संध्या के  तट  पर आ पाया हर घट था रीता 
और एक दिन बीता 

एक अधुरी परछाई में सुबह शाम आकार तलाश  करते
छिद्रित आशा के प्याले मे दोपहरी के शेष ओसकण भरते 
और कोशिशें करते समझाती रहती क्या   गीता 
और एक दिन बीता 

थकी हुई परवाजों की गठरी को अपनी जोड़े हुए सुधी से 
रहे ताकते पंथ अपेक्षा का जो  लौट होकर पूर्ण  विधी से 
और बने उपलब्धि संजोई आशा की परिणीता 
और एक दिन बीता

बस उड़ान में विघ्न न डालो



 तुमने मुझे पंख सौंपे है और कहा विस्तृत वितान है 
पंख पसारे मैं आतुर हूँ बस उड़ान  में विघ्न न डालो 

पुरबाई जब सहलाती है पंखों की फड़फड़ाहटों को
नई चेतना उस पल आकर सहज प्राण में है भर जाती  
आतुर होने लगता है मन,नव  उड़ान लेने को नभ में 
सूरज को बन एक चुनौती पर फैलाता है स्म्पाती

मैं तत्पर हूँ फैला अपने  डैने  नापूँ सभी दिशाएँ 
अगर खिंची  लक्ष्मण रेखाएं एक बार तुम तनिक  मिटा  लो 
 
नन्ही गौरेया की क्षमता कब उकाब से कम है होती 
संकल्पों की ही उड़ान तो नापा करती है वितान को 
उपक्रम ही तो अनुपातित है परिणामों की संगतियों से 
लघुता प्रभुताएं केवल बस इनसे ही तो नापी जाती 
 
एक किरण नन्हे दीपक की, तम को ललकारा करती है 
और मिटा देती है उसको, डाले पहरे अगर उठा लो 

साक्षी हो तुम अनुमोदन जब मिल जाता है विश्वासों को 
कुछ भी प्राप्ति असंभव तब तब शेष नहीं रहती जीवन में 
मनसा वाचा और कर्मणा सत्य परक  सहमति पा कर के
एक बीज से विस्तृत बेलें छा जाती पूरे उपवन में 

एक अकेली चिंगारी भी दावानल बन जाया करती 
फ़न फैलाये अवरोधों को अगर मार्ग से तनिक हटा लो
 
 
 

स्वप्न मांगे है नयन ने

चुन सभी अवशेष दिन के
अलगनी पर टांक के
स्वप्न मांगे है नयन ने
चंद घिरती रात से 

धुप दोपहरी चुरा कर ले गई थी साथ में
सांझ 
​थी 
प्यासी रही 
​ले 
 छागला 
​को 
हाथ में
भोर ने दी रिक्त झोली
​ ​
​ही 
 सजा पाथेय की
मिल न पाया अर्थ कोई भी सफर 
​की 
 बात में

चाल हम चलते रहे
ले साथ पासे मात के

आंजुरी में स्वाद वाली बूँद न आकर गिरी
बादलो के गाँव से ना आस कोई भी झरी
बूटियों ने रंग सारे मेंहदियों के पी लिए 
रह गई जैसे ठिठक कर हाथ की घड़ियाँ डरी

ओर दिन को तकलियो पर
रह गए हम कातते

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...