खुलते तो हैं पृष्ठ

खुलते तो हैं पृष्ठ हवा को छूकर इस मन की पुस्तक के
सुधियों वाली जो संध्या की गलियों में टहला  करती है
पी जाती है पर आंखों में तिरती हुई धुंध शब्दों को
और रिक्तता परछाई बन  कर आंगन में आ तिरती है
 
 
हो जाती है राह तिरोहित, अनायास ही चलते चलते
एक वृत्त में बन्दी बन कर लगता है पग रह जाते हैं
अधरों पर रह रह कर जैसे कोई बात लरज जाती है
लेकिन समझ नहीं आ पाता उमड़े स्वर क्या कह जाते हैं
 
 
बिखराने लगता है चढ़ता हुआ अंधेरा स्याही जैसे
सपनों की दहलीजों पर बन ओस फ़िसलती है गिरती है
और मौन की प्रतिध्वनियां बस देखा करती प्रश्न चिह्न बन
जैसे ही तारों से कोई तान बांसुरी की मिलती है
 
 
भटकन लौट लौट  कर आती है टकराते हुये क्षितिज सेे
आकारों के आभासों से जुड़ता नहीं नाम कोई भी
दीपक रोज जला कर रखता है दिन ला अपने आले में
मुट्ठी में भर रख लेती है उसकी रश्मि सांझ  सोई सी
 
 
हँसिये का आकार चाँद ले लेता हाथ रात का छूकर
सपनों के पौधे उग पाने से पहले ही कट जाते हैं
बिखरे हुये विजन की गूँगी आवाज़ों को खोजा  करते
अवगुंठित हो इक दूजे में निमिष प्रहर सब घुल जाते हैं

जब कथानक गया इस कथा का लिखा

बन गईं लेखनी रश्मियाँ भोर की
आज लिखने लगी इक नई फिर कथा
हो गये हैं इकत्तीस पूरे बरस
जब कथानक गया इस कथा का लिखा
 
 
अजनबी एक झोंका हवा का उड़ा
दो अपरिचित सहज गये पास में
दृष्टि से दृष्टियों ने उलझते हुये
एक दूजे को बाँधा था भुजपाश में
पंथ दो थे अलग, एक हो घुल गये
पग बढ़े एक ही रागिनी में बँधे
लक्ष्य के जितने अनुमान थे वे सभी
एक ही बिन्दु को केन्द्र करते सधे
 
 
एक ही सूत्र है धड़कनों जोड़ता
हर सितारा गया मुस्कुरा कर बता
 
 
भोर उगती रहीं सांझ ढलती रहीं
सांस के साथ सांसें लिपटती रहीं
दोपहर नित नये आभरण ओढ़ती
प्रीत की धूप पीती सँवरती रही
स्वप्न चारों नयन के हुये एक से
एक ही कामना परिणति की रही
साथ मिलकर के दो आंजुरि एक हो
यज्ञ में आहुति साथ देती रहीं
 
 
प्राण दो थे मगर एक हो जुड़ गये
एक से जब विलग दूसरा कुछ था
 
 
तय किये पंथ फ़ैले हुये दूर तक
पग चले साथ अवलम्ब बनते हुये
जेठिया धूप की चादरें थीं तनी
चाँदनी थी सितारों से छनते हुये
हर अपेक्षा की उड़ती हुये पांख को
बांध रक्खा समन्वय की इक डोर से
कर समर्पित रखे भावना के प्रहर
पांव में उद्गमों के प्रथम छोर पे
 
 
आज जीवन्त फिर से हुई कामना
साथ बस एक यह प्राप्त होवे सदा

नाम थी आज की सभ्यता लिख गई

इक सड़क के किनारे पे बिखरे पड़े
फ़्रेन्च फ़्राई के कन्टेनरों पे छपा
नाम थी आज की सभ्यता लिख गई
कोशिशें की बहुत,पर नहीं पढ़ सका
 
 
विश्व पर्यावरण दिन मनाया था कल
खूब नारे लगे खूब जलसे हुये
रोक लगना जरूरी, न दूषण बढ़े
बात उछली हवाओं में चलते हुये
रिक्त पानी की बोतल गिरीं पंथ में
चिप्स के बैग बन कर पतंगें उड़े
हर डगर पर यही चिह्न छोड़ा किये
पांव चलते हुये जिस तरफ़ भी मुड़े
 
 
स्वर उमड़ता हुआ करता उद्घोष था
भोर से सांझ बीती,नहीं पर थका
 
 
एक टुकड़ा हरी घास बाकी रहे
एक आँजुरि रहे स्वच्छ जल की कहीं
अगली पीढ़ी को देनी विरासत हमें
लेवें संकल्प अस्मर्थ हंवे नहीं
बस यही सोच ले, कैन थी हाथ में
कोक की पेप्सी और स्प्राईट की
खाली होते किनारे उछाला उन्हें
बात उनके लिये यह सहज राईट थी
 
 
ध्यान से मैं मनन अध्ययन कर रहा
पर समझ आ नहीं पाया ये फ़लसफ़ा
 
 
दीप तो बाल कर रख लिया शीश पर
पर तले का अंधेरा न देखा तनिक
दृष्टि दहलीज के बार जब भी गयी
अंश था काल का एक ही वह क्षणिक
जिस नियम को बनाने का जयघोष था
मात्र वे सब रहे दूसरों के लिये
उनके आगे कभी आ न दर्पण सका
सोच के वे बदलते रहे जाविये
 
 
दायां कर एक उपदेश की मुद्रिका
बायें से खेलते है नियति से जुआ.
 

दीप दीपावली के जलें इस बरस

भोर की रश्मियों की प्रखरता लिये दीप दीपावली के जलें इस बरस
रक्त-कमलासनी के करों से झरे,आप आशीष का पायें पारस परस
ऋद्धि सिद्धि की अनुकूल हों दृष्टियाँ साथ झंकारती एक वीणा रहे
भावनाओं में अपनत्व उगता रहे, क्यारियाँ ज़िन्दगी की रहें सब सरस



 

जले हैं फिर से इस बरस हजार कामना लिए
नवीन वर्तिकाओं से सजे हुए नए दिए
नए ही स्वप्न आँजती है आँख फिर से इस बरस 
जो अंकुरित हो आस वो बरस के अंत तक जिए

रची पुरबि के द्वार पर नवीन आज कल्पना 
न अब रहे ह्रदय कहीं पे   कोई भी हो अनमना 
उगे जो भोर निश्चयों के साथ यात्राओं के 
डगर के साथ अंश हों नवीन वार्ताओं के 
न व्यस्तता की चादरों से दूर एक पल रहे 
औ' आज ही भविष्य हो गया है आन कल कहे 
न नीड़  के निमंत्रणों से एक पल कोई छले 
औ लक्ष्य पग के साथ अपने पग मिला मिला चले

हैं मंत्रपूर सप्तानीर आंजुरी में भर लिए
जले हैं फिर से इस बरस हजार कामना लिए

जो कामनाएँ हैं मेरी, वही रहें हों आपकी 
ये डोरियाँ जुड़ी रहें सदा हमारे साथ की 
न मैं में तुम में भेद हो,जो तुम कहो वो मैं कहूं 
तुम्हारी भावना प्रत्येक साथ साथ मैं सहूँ 
यों  तुम से मैं जुडू  कि  भेद बीच आप का हेट 
बढ़ा है भ्रम में डूब कर  समस्त फासला कटे 
चले थे साथ पंथ जिस पे एक दिन,पुन:: चलें 
जो खंड हिम के बीच आ गए सभी के सब गलें

न फिर से कोई रह सके अधर पे मौन को लिए 
जले हैं दीप पर्व पर नए ही इस बरस दिए

सुनो जो कह रहीं हैं आज वर्तिकाएँ थरथरा
 उठो तो अन्धकार का परस रहे डरा डरा
चलो तो दूरियाँ क्षितिज की इक कदम में बंद हों
 बढ़ो तो हाथ थामने को मंजिलों में द्वन्द हों 
हैं प्राप्ति के पलों की उंगलियाँ तुम्हारे हाथ में
अमावसी निशा भले, जले हैं दीप साथ में 
लगा रहीं हैं अल्पनायें स्वस्ति कल के भाल पर 
लिखा है हल उठे हुए नजर के हर सवाल पर

सितारे आसमान पर जलें तुम्हारे ही लिए 
खड़ा  हूँ  दीप पर्व पर यही मैं कामना लिए।

सब कुछ ठीक ठाक है


सांझ अटक कर चौराहे पर पीती रही धुंआ ज़हरीला
बूढ़े  अम्बर का जर्जर तन हुआ आज कुछ ज्यादा पीला
पीर पिघल कर बही नयन से घायल हुई घटाओं की यों
पगडंडी का राज पथों का सब ही का तन मन है गीला
बान्धे रहा राजहठ लेकिन पट्टी अपने खुले नयन पर
कहते हुये चिह्न उन्नति के हैं ये, सब कुछ ठीक ठाक है
 
 
मौसम की करवट ने बदले दिन सब गर्मी के  सर्दी के
बसा  लिया है सावन ने अब अपना घर सूने मरुथल में
सिन्धु तीर पर आ सो जातीं हिम आलय से चली हवायें
नीलकंठ का गला छोड़कर भरा हलाहल गंगा जल में
निहित स्वार्थ के आभूषण   से शोभित प्रतिमा के आराधक
ढूँढ़ा करते दोष दृष्टि में, कहते दर्पण यहाँ साफ़ है
 
 
कर बैठी अधिकार तुलसियों के गमलों पर विष की बेलें
खेतों में उगती फ़सलों की अधिकारी हैं अमरलतायें
भूमिपुत्र मां के आंचक्ल को हो होकर व्याकुल टटोलते
प्राप्त किन्तु हो पातीं केवल उसको उलझी हुई व्यथायें
जिनका है दायित्व सभी वे हाथ झाड़ अपने कह देते
जो पीड़ित है उसे जनम का पिछले कोई मिला श्राप है
 
 
धरा  टेरती जिसको वो ही इन्द्रसभा में जाकर बैठे
दृष्टिकिरण घाटी में आती नहीं जहां से कभी उतर कर
गंधर्वों के गान अप्सराओं  की किंकिणियों के स्वर में
कतिपय आश्वासन रह जाते होठों पर चुप्पी धर धर कर
लेकिन जिस पल धैर्य सुराही आतुर हुई छलक जाती है 
सोचा करते तब जाने क्या हमने आखिर किया पाप है  

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...