आपके लिये नव वर्ष

हर दिवस हो नये गीत सा छंदमय, सांझ बन कर गज़ल की रवानी रहे
रात डूबी हुई प्रीत की गंध में चांदनी की नई इक कहानी कहे
बात निशिगंध से मिल चमेली करे, औ’ भरे मोगरा बाँह कचनार को
ऐसी छवियों से सज कर उमगती हुई, इस नये वर्ष की ॠतु सुहानी रहे

मुट्ठियों में संवरने लगे आपकी, आपकी कल्पनाओं का विस्तार सब
स्वप्न हर, भोर में प्रश्न करने लगे, नैन में से निकल शिल्प होना है कब ?
इस नये वर्ष में जितने आयाम हैं सब सिमटते रहें आपके द्वार पर
कामना के सुमन की भरी आंजुरि, आपके पगकमल पे चढ़ाता हूँ अब

अंतिम गीत

विदित नहीं लेखनी उंगलियों का कल साथ निभाये कितना
इसीलिये मैं आज बरस का अंतिम गीत लिखे जाता हूँ

चुकते हुए दिनों के संग संग
आज भावनायें भी चुक लीं
ढलते हुए दिवस की हर इक
रश्मि, चिरागों जैसे बुझ ली
लगी टिमटिमाने दीपक की
लौ रह रह कर उठते गिरते
और भाव की जो अँगड़ाई थी,
उठने से पहले रुक ली

पता नहीं कल नींद नैन के कितनी देर रहे आँगन में
इसीलिये बस एक स्वप्न आँखों में और बुने जाता हूँ

लगता नहीं नीड़ तक पहुँचें,
क्षमता शेष बची पांवों में
चौपालें सारी निर्जन हैं
अब इन उजड़ चुके गांवों में
टूटे हुए पंख की सीमा
में न सिमट पातीं परवाज़ें
घुली हुई है परछाईं ,
नंगे करील की अब छांहों में

पता नहीं कल नीड़ पंथ को दे पाथेय नहीं अथवा दे
इसीलिये मैं आज राह का अंतिम मील चले जाता हूँ

गीतों का यह सफ़र आज तक
हुआ, कहाँ निश्चित कल भी हो
धुला हुआ है व्योम आज जो,
क्या संभव है यह कल भी हो
सुधि के दर्पण में न दरारें पड़ें,
कौन यह कह सकता है ?
जितना है विस्तार ह्रदय का आज,
भला उतना कल भी हो ?

पता नहीं कल धूप, गगन की चादर को कितना उजियारे
इसीलिये मैं आज चाँद को करके दीप धरे जाता हूँ

कैसे गीत प्रणय के गाये

ये अम्बर पर घिरी घटाओं में घुलते यादों के साये
ऐसे में अब गीत प्रणय के कोई गाये तो क्या गाये

टूटी हुई शपथ रह रह कर कड़क रही बिजली सी तड़पे
मन के श्याम क्षितिज पर खींचे सुलग रही गहरी रेखायें
भीगी हुई हवा के तीखे तीर चुभें आ कर सीने पर
आलिंगन के घावों की फिर से रह रह कर याद दिलायें

और अकेलापन ऐसे में बार बार मन को हुलसाये
ऐसे में अब गीत प्रणय के गाये भी तो कैसे गाये

बारिश की बून्दों में घुल कर टपक रहे आंखों के सपने
खिड़की की सिल पर बैठे हैं सुधि के भीगे हुए कबूतर
परदों की सिलवट मेम उलझी हुईं इलन की अभिलाषायें
और आस बुलबुलों सरीखी, बनते मिटते रह रह भू पर

उनका फ़ीकापन दिखता है छाये हुए अंधेरे में भी
डूब तूलिका ने आंसू में अब तक जितने चित्र बनाये

झड़ी बने दस्तक देते हैं द्वारे पर आकर ज़िद्दी पल
छँटती नहीं उदासी को ओढ़े जो बैठी है खामोशी
दीवारों पर चलचित्रों सी नर्तित हैं परछाईं धुंधली
और हवायें लगता खुद से ही करती रहतीं सरगोशी

कोरा कागज़ पड़ा मेज पर बिन बोले मुंह को बिचकाये
ऐसे में अब गीत प्रणय को कैसे तुम बतलाओ गाये

बस पंथ थम गया

पांव हमारे ही अक्षम थे
उठे न पथ में एक कदम भी
और लगाते दोष रहे यह
मंज़िल का पथ स्वयं थम गया
किरण ज्योति की बो न सके हम
सूनी रही ह्रदय की क्यारी
यही एक कारण , आंगन में
सिर्फ़ बिखरता हुआ तम गया

असमंजस के श्यामपट्ट पर
बने न निर्णय के श्वेताक्षर
शंकायें जो कल घिर आईं
आईं फिर से आज उमड़ कर
जुड़ीं अनिश्चय के चौराहे
पर न कभी निश्चय की गलियां
ऊहापोहों के गमले में
उगी न संकल्पों की कलियां

और संजोई पूंजी में से
एक दिवस हो और कम गया
खड़े रहे हम ही राहों में
कहते हैं, बस पंथ थम गया

रहे बिखेरे अंगनाई में
संशय के बदरंग कुहासे
खड़े रहे देहरी को थामे
किसी प्रतीक्षा को दुलराते
इन्द्रधनुष चाहत के हमने
प्रश्न चिन्ह से रखे टांग कर
रहे ढूँढ़ते रेखाओं को
आईने से साफ़ हाथ पर

और संजोते रहे पोटली में
जो बिखरा हुआ भ्रम गया
पांव हमारे उठे नहीं, हम कहते
हैं बस पंथ थम गया

फूलों की हर गंध, नाम के
बिना द्वार से लौटा दी है
द्वार चांदनी आई तो बस
यही शिकायत की आधी है
बिकीं रश्मि जब बाज़ारों में
हम तटस्थ ही खड़े रह गये
मधुमासों को नीरस कहते
अपनी ज़िद पर अड़े रह गये

अस्त-व्यस्त यूँ हुई ज़िन्दगी
टूट बिखर कर सभी क्रम गया
पांव हमारे उठे नहीं, हम कहते
हैं बस पंथ थम गया

पल ने जो उपहार दिया था

मंजूषा में से यादों की पुन: उभर कर आया वह पल
साथ तुम्हारा जिसने मुझको एक दिवस उपहार दिया था

नभ के गलियारे में जब था हुआ
सितारों का सम्मेलन
भाग्य लेख के किसी शब्द ने
किया बाँध कर हाथ निवेदन
तो हो द्रवित सभा ने उस पल
नक्षतों को किया नियंत्रित
और एक वह स्वर्णजड़ित पल
सहसा हुआ वहीं पर शिल्पित

जिसके अन्तर्मन से उपजी हुई एक अनुभूति देख कर
आवेदन, विधि ने सहसा ही बिना शर्त स्वीकार किया था

भू पर आकर उतरे थे तब
नभ की गंगाओं के धारे
कलियों ने अपने सब घूँघट
अगवानी में स्वयं उघारे
चन्दन की गंधों में डूबे
झोंके सारे चली हवा के
कमल. ताल की लहरों पर से
उचक उचक तुमको थे ताके

इन्द्रधनुष पर स्वर्ण किरण के तार बाँध कर मौसम ने भी
साज बना कर नया, तुम्हारी सरगम को झंकार दिया था

वह इक पल जिसमें सहसा ही
हुई सॄष्टि सम्पूर्ण समाहित
सुधियों का संचय पा जिसको
अपने साथ, हुआ आनंदित
जो धड़कन के नव गतिक्रम का
फिर से इक आधार बना है
वही एक पल आकर मेरी
सुधियों का संसार बना है

होकर अब जीवंत खड़ा है मेरी थामे उंगली वह पल
जिसने जाने या अनजाने जीवन पर उपकार किया था

ज़िन्दगी प्रश्न करती रही

ज़िन्दगी प्रश्न करती रही नित्य ही
ढूँढ़ते हम रहे हल कोई मिल सके
हर कदम पर छलाबे रहे साथ में
रश्मि कोई नहीं साथ जो चल सके

कब कहाँ किसलिये और क्यों, प्रश्न के
चिन्ह आकर खड़े हो गये सामने
सारे उत्तर रहे धार में डूबते
कोई तिनका न आगे बढ़ा थामने
दिन तमाशाई बन कर किनारे खड़े
हाशिये पर निशायें खड़ी रह गईं
और हम याद करते हुए रह गये
सीख क्या क्या हमें पीढ़ियां दे गईं

तेल भी है, दिया भी न बाती मगर
दीप्त करते हुए रोशनी जल सके

बस अपरिचित पलों की सभायें लगीं
जिनसे परिचय हुआ वे चुराते नजर
सारे गंतव्य अज्ञातवासी हुए
पांव बस चूमती एक पागल डगर
हो चुकी,गुम दिशायें, न ऊषा जगी
और पुरबाई अस्तित्व को खो गई
सांझ अनजान थी मेरी अँगनाई से
एक बस यामिनी आई,आ सो गई

हैं प्रहर कौन सा, छटपटाते रहे
एक पल ही सही, कुछ पता चल सके

कामनायें सजीं थीं कि ग्वाले बनें
हम बजा न सके उम्र की बाँसुरी
गीत लिख कर हमें वक्त देता रहा
किन्तु आवाज़ अपनी रही बेसुरी
द्वार से हमने मधुमास लौटा दिया
और उलझे रहे स्वप्न के चित्र में
अपने आंगन की फुलवाड़ियां छोड़ कर
गंध खोजा किये उड़ चुके इत्र में

अब असंभव हुआ जो घिरा है हुआ
यह अंधेरा कभी एक दिन ढल सके

आँसू ने इंकार कर दिया

मैने कलम हाथ में लेकर, सोचा शब्द पीर को दे दूँ
लेकिन आंसू ने स्याही में ढलने से इंकार कर दिया

निमिष विरह के जले दीप से, एकाकीपन नागफ़नी है
और जहां तक देखा मन में घिरी निराशा बहुत घनी है
मुस्कानों की नगरी वाले पथ पर जब जब भी आशायें
चलीं चार पग, वक्त लुटेरा, आ कर जाता राहजनी है

मैने हर पल ज्योति जगा कर एक किरन को पास बुलाया
लेकिन्ब रजनी ने उषा में ढलने से इंकार कर दिय

सुधियों की शहनाई पर जब बजी वेदनाओं की सारगम
सारंगी के करुण स्वरों ने किया साथ में मिलकर संगम
अलगोजे के सुर ने पकड़ा मरुथल वाली लू का झोंका
पंचम का आरोह बन गया, सिसकी वाला स्वर भी मद्दम

पथाराई आंखों में चाहा स्वप्न आंज दूं चन्द्र निशा के
लेकिन संध्या ने काजल में ढलने से इंकार कर दिया

सन्नाटे का दर्द न समझी, बढ़ती हुई गहन खामोशी
अपराधी सी हवा मौन है, दे स्वीकॄति होने की दोषी
सुइयों ने कर लिया घड़ी की, आज पेंडुलम से गठबन्धन
अटकी हुईं एक ही स्थल पर पीती हुईं सभी सरगोशी

मैने सूरज को आमंत्रण भेजा, आ दिन को गति दे दे
लेकिन उसके हर घोड़े ने चलने से इंकार कर दिया

बासन्ती चूनर पर आकर लगे बबूलों के यों पहरे
उड़ा रंग बस शेष रह गये हैं पतझड़ के साये गहरे
कोयल की कूकों को पीने लगी चीख नभ में चीलों की
ओढ़ घनी निस्तब्ध टीस को,पल आकर पल के घर ठहरे

मैने चाहा अमराई को नये सिरे से मैं बौराऊं
लेकिन मरुतों ने पुरबा में ढलने से इंकार कर दिया

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...