बाधा नहीं बनना

 
भले ही साथ मत दो तुम चुनी इस राह पर मेरा 
मेरे संकल्प में बस कोई भी बाधा नहीं बनना 
 
सुनो सिद्धार्थ के पथ में बना व्यवधान क्या कोई 
यशोधर द्वार रोके क्या खड़ी होकर वहां रोई
नहीं रोका था राहुल ने पिता अन्वेषणा में रत 
तपस्या ने बुलाया था प्रतीक्षा में जो थी खोई
 
चलें जब कृष्ण बन कर द्वारका को पाँव ये मेरे 
अपेक्षा है यही तुमसे कि तुम राधा नहीं बनना 
 
हुआ अभिमन्यु शाश्वत, उत्तरा की प्रेरणा से ही 
न ममता ही सुभद्रा की खड़ी हो राह को रोकी 
बनी गलहार रानी तोड़ कर अनुराग के बंधन 
उसी से तो था चूडावत समर में हो सका विजयी 
 
रहूँ इतिहास में बन कर तुम्हारे साथ बरसों तक 
नहीं दोहराई जाए, एक वह गाथा नहीं बनना 
 
रचो इतिहास जिसको भूल पाना हो  नहीं सम्भव 
रहे स्वर्णांकित लक्ष्मी, पद्मिनी शान और गौरव 
प्रणेता थी हुई रत्ना,चरित मानस प्रवाहों की 
बढ़ाया कोरवाकी ने, कलिंग। सम्राट जय सौरभ 
 
तुम्हें अधिकार अपना पात्र जो चाहो वही चुन लो
पराजित सर टिके जिस पर, वो इक कांधा नहीं बनना 

 

असम्भव चल चुके इक तीर का

असंभव है कमानों पर चला फिर तीर चढ़ जाना 
नहीं संभव बही धाराओं का भी लौट  कर आना  

नियति ने कर दिया हमको खड़ा  उस मोड़ पर लाकर
जहाँ हमने बुनी   कच्चे रंगों से स्वप्न की चादर
कभी पूरबाइयों ने छेड़ दी थी जल तरंगी धुन
पंखूरियों को सुनाते थे तुहिन  कण गीत गा गाकर 

कहाँ सम्भव रहा पीछे उमर के पंथ पर जाना
बहुत बेचैन कर देता  वो  बिसरी  याद का आना 

अभावों की गली में छा गई थी होंठ पर चुप्पी 
झिझक ने खींच दी थी बीच में दीवार इक लम्बी
बँधे बरगद की शाखा पर क़सम के मख़मल धागे 
बनाते थे इरादों को हमारे जो  गगन चुम्बी 

फिसल  कर उँगलियों से छोर चूनर का निकल जाना 
बहुत मँहगा पड़ा हमको पुरानी  याद का आना 

घिरी संध्याओं में जब सुरमई  परछाइयाँ बिखरी 
हमारे ताजमहलों पर धवल थी चाँदनी सँवरी
परिस्थितियाँ बनी बाधाएं  अपनी दृष्टि के आगे 
हुई थी ज़िंदगी यायावरी , जब बाँध कर गठरी 

मचलता मन उमर के फिर उसी इक घाट पर नहाना
बजा सुधियों में सारंगी, वो भूली याद का आना 

एक अपरिचय के आँगन में

 चले निरंतर मंज़िल पथ पर

आ पहुँचे पर आज अचानक
एक अपरिचय के आँगन में
वयसंधि के एक मोड़ ने
जब हमको दरवेश बनाया
बस तब से विश्रांति निमंत्रण
हर ढलती संध्या ठुकराया
गया बताया यह ही हमको
जब तक गति, तब तक जीवन है
मूल मंत्र बस यही साध कर
हमने अपना पाँव बढ़ाया
आ पहुँचे हम आज अचानक
जहाँ शाख़ पर सर्प झूलते
बेलों जैसे, चंदन वन में
अनुरागों के तरु की छाया
विलय हो गई उगी धूप में
घिरे सांत्वना के पल सारे
अधरों से छलके विद्रूप में
पथ के गीतों के स्वर को तो
निगल गया इकतारा बजता
रहे सिमट कर नीड़ राह के
संवरी निशि के स्याम रूप में
जहाँ जले थे अधर तृषा से
वहाँ उगी थी फसल प्यास की
प्रतिपल उमड़ रहे सावन में
संकल्पों से अनुबंधित मन
यायावर था रजनी वासर
और रहा आवारापन भी
बांध पगों में अपनी झाँझर
थाली में भर धूप दे गई
जब आइ छत पर दोपहरी
लेकिन हठी साँझ थैली में
ले जाती उसको बुहार कर
एक किरण अब भी तलाशते
कंधे छील रही भीड़ों के
मध्य बने इस शून्य विजन मे

कोई भी गंध नहीं उमड़ी

  कोई भी गंध नहीं उमड़ी  साँसों की डोरमें हमने, नित गूँथे गजरे बेलकर लेकिन रजनी की बाहों में कोई भी गंध नहीं साँवरी नयनों में आंज गई सपने ज...