सांस को चिश्वास की पूँजी

निराशा के समन्दर के सभी तटबन्ध जब टूटॆ
सपन हर आस की परछाईयों के नैन से रूठे
अपरिचित हो गये जब सान्त्वना के शब्द से अक्षर
सभी संचय समय के हाथ पल भर में गये लूटे

तभी जाते हुये अस्ताचली को जो किरन लौटी
उसी की स्वर्णरेखा ने अगोचर सी डगर सूझी

अंधेरों ने हजारों चक्रव्यूहों को रचा बढ़ कर
सुनिश्चय सो गया प्रारब्ध कह लड़ते हुये थक कर
दिशा भ्रम ने लगाये आन कर दहलीज पर पहरे
हवायें सोखने जब लग पड़ें हर एक उठता स्वर

तेरे अनुराग से जो बन्ध गयी इक ज्योति की डोरी
वही बस दे रही है सांस को चिश्वास की पूँजी

डगर पीने लगे जब पगतली के चिह्न भी सारे
अधर की कोर पर आकर टंके जब अश्रु ही खारे
नजर क्र सब वितानों में विजन की शून्यता बिखरे
निशायें सोख लें आकाशगंगा के सभी तारे

पलों की तब असहनीयताओं की उमड़ी हुई धारा
समुख करती रही है एक छवि बस और न दूजी

लगे गंतव्य अपने आप को जब धुन्ध में खोब्ने
दिशाओं के झरोखे जब धुंआसे लग पड़ें होने
क्षितिज का द्वार सीमित हो पगों की उंगलियों पर आ
दिवाकर भी दुपहरी में अंधेरा लग पड़े बोने

उठी इतिहास पृष्ठों से नये संकल्प की धारा
गगन पर चित्र रचती है लिये कर आस की कूची

सांझ के पहले दिये से भोर के अंतिम दिये तक

पढ़ चुका दिन धूप के लिक्खे हुए पन्ने गुलाबी
हो गई रंगत बदल कर मौसमों की अब उनावी
धार नदिया की लगा जम्हाईयाँ लेने लगी है
शाख पर है पत्र की बाकी नहीं हलचल जरा भी
 
याद की तीली रही सुलगा नई कुछ बातियों को
सांझ के पहले दिये से भोर के अंतिम दिये तक
 
एक पल आ सामने अनुराग रँगता राधिका सा
दूसरे पल एक इकतारा बजाती है दिवानी
रुक्मिणी का नेह ढलता भित्तिचित्रों में उतर कर
फिर हवायें कह उठी हैं सत्यभामा की कहानी
 
छेड़ता है कोई फिर अनजान सी इक रागिनी को
तोडती   है   जो ह्रदय  के तार बंसी के हिये तक
 
बांधती है पांव को अदृश्य सी जंजीर कोई
कोई मन का उत्तरीयम बिन छुये ही खींचता है
एक अकुलाहट उभरने लग पड़े जैसे नसों में
मुट्ठियों में कोई सहसा ही ह्रदय को भींचता है
 
दृष्टि की आवारगी को चैन मिल पाता नहीं है
हर जुड़े सम्बन्ध से अनुबन्ध हर इक अनकिये तक
झिलमिलाते तारको की अधगिरी परछाईयों में
घुल संवरते हैं हजारों चित्र पर रहते  अबूझे 
कसमसाहट सलवटों पर करबटें ले ले निरन्तर
चाहती है कोई तो हो एक पल जो बात पूछे
 
खींच लेती हैं अरुण कुछ उंगलियाँ चादर निशा की
वृत्त ही बस शेष रहता रेख के हर जाविये तक

 
 

इक कुम्हारन समय की



इक कुम्हारन समय की कहीं गाँव में
गढ़ रही है दिवस के घड़े चाक पर
रात मिटटी का लोंदा बना गूंधती
और फिर तापती उनको आलाव पर

क्या भरे क्या पता आज के हाथ में
जो दिवस का घडा सौंप कर वो गई
तृप्ति का नीर ला कोई भर जाएगा
या मथेगी उसे रश्मियों की रई
ला जलहरी पे कोई उसे टांक दे
या बुलाये उसे पनघटों की गली
छाप उसकी बने काल के शीश पर
या निगल ले उसे सांझ की वावली
 
कौन जाने कुशल उँगलियों ने रखा
कितना विस्तार उसमें गुणा माप कर
 
आ गए सांझ के द्वार को छोड़ कर
रात के पाँव इस और चलते हुए
ये सुनिश्चित उसी ने किया था सदा
साथ दीपक रहें कितने जलते हुए
कितनी नीहारिकाएं सपन के कलश
भर सकेंगी उमड़ नैन की छाँव में
भोर के तारकों की बजे पैंजनी
जानती है वही कौन से पाँव में
 
एक ही है प्रहर रच दिया था जिसे
आठ से कर गुना रख दिया ताक पर

जो पथिक चल रहा है दिशा छोड़ कर
तय करे वह उसे पोटली सौंप दे
भर के पाथेय गंतव्य की राह का
या कि पग बीच में ही कहीं रोक दे
किसको मालूम कब क्या गढ़ें उंगलियां
उस कुशल शिल्पिनी की मचलती हुई
कब सुनहरी करे,  काजरी कब करे
एक चादर रही जो  लहरती हुई

बाँटती जा रहीअपने हर शिल्प को
पात्रता के लिये योग्यता आँक कर

दुशाला लग गई बुनने


पते से दूरियां आमंत्रणों की  जब लगीं बढ़ने
अपरिचित  हो गए जब सांझ के सब रंग सिन्दूरी
नदी की धार  ने निगले जले सब दीप दोनों के
उड़ा था आस की हर बूँद का आभास कर्पूरी
किरण तब एक नन्ही सी
मेरी अंगनाई में आकर
नये संकल्प की फिर से दुशाला लग गई बुनने

बँटी थी धूप टुकड़ों में दिवस की सल्तनत की नित
न टिकता छोर पर आ हाथ के कोई परस पल भी
सभी फेंके हुए पासे  गिरे थे सामने उलटे
अँधेरा हर घड़ी था पास आने की किये जल्दी
सितारे चार छः नभ से
उतर कर आ गए सहसा
मेरे हर मौन की गाथा हुए तन्मय लगे सुनने

हुये थे   पृष्ठ पुस्तक के अचानक आप ही कोरे
सिमट कर रह गया वृत्तांत केवल भूमिकाओं में
कहा जो कुछ गया था  अर्थ के विपरीत था   वह तो
रहा जो शेष था ओझल निखरती शून्यताओं में
लिखे को बांच पाना तो  
न हो पाया कभी संभव
सुनाई बस कहानी बांसुरी की एक ही धुन ने

अन्धेरा कात कर देते रहें कंदील सब  जलते
स्वयं ही नीड़ आकर हाथ में पाथेय दे जाते  
थकन की बेड़ियों से बंध नहीं रुकना हुआ संभव
सभी सुर सांत्वना वाले प्रयाणी गीत ही गाते
थकन को हो नहीं पाया
कभी स्वीकार रुक पाना
डगर जब आ स्वयं ही लग गई हो पाँव को चुनने

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...