तमस से लड़ रहा है


ओ पथिक विश्वास वह लेकर चलो अपनी डगर पर
साथ में जिसको लिए दीपक तमस  से लड़ रहा है

ज़िंदगी के इस सफ़र में मंज़िलें निश्चित  नहीं है
एक ही संकल्प पथ में हर निमिष गतिमान रहना
लालसाएँ जाल फैलाये छुपी हर मोड़ पर आ
संयमित रहते हुए बस लक्ष्य को ही केंद्र रखना

आ घिरें कितनी घटाये व्योम पर हर इक दिशा से
सूर्य का पथ पालता कर्तव्य अपना बढ़ रहा है

चिह्न जितने पाँव के तुम देखते हो इस सफ़र में

छोड कर वे हैं गए निर्माण जो करते दिशा का

चीर पर्वत घाटियों को लांघ कर नदिया, वनों को
रास्ता करते गए  आसान पथ की यात्रा का

सामने देखो क्षितिज के पार भी बिखरे गगन पर

धनक उनके चित्र में ही रंग अद्भुत भर रहा है 

 

अनुसरण करना किसी की पग तली की  छाप का या

आप अपने पाँव के  ही चिह्न सिकता पर बनाना

पृष्ठ खोले ज़िंदगी में नित किसी अन्वेषणा के 

या घटे इतिहास की गाथाओं को ही दोहराना 

 

आज चुनना है विकल्पों में किसी भी एक को ही

सामने फ़ैला हुआ यह पथ, प्रतीक्षा कर रहा है 





संघर्षों में जीते हैं हम

जीवन ने जब जब विष सौंपा हमको नीलकंठिया कह कर
हमने सुधा मानकर उसको बूँद बूँद स्वीकार किया है

इस पथ पर जब पाँव रखे थे हमें विदित था इन राहों पर
केवल इक विश्वास ह्रदय में ही होगा अपना सहयोगी
स्नेह और अपनत्व साथ तो दे देंगे उत्प्रेरक बन कर
लेकिन मंज़िल के प्रांगण में प्रस्तुति केवल अपनी होगी

दुर्गम पथ पर पग पग उगती झंझा की भरपूर चुनौती
को बाहैं  फैला कर अपनी प्रतिपल अंगीकार किया है

हमने प्रण था किया  पंथ में नित संघर्षरती रहने  का
जब तक जय का घोष स्वयं ही  आ निनाद पथ में करता हो
छाये हों अवसाद घनेरे पर  निश्चय विचलित न होगा
बढे अंधेरी रातों में हम जब तक न सूरज उगता हो

अपने पग के छालों को ही बना अलक्तक रची अल्पना
जब जब राहों ने जीवन को काँटों का उपहार दिया है

निष्ठाये रही एकलव्यी जिस से पल भर भी डिगे नहीं  
पल पल मिलती पीड़ाओं ने मन को दुर्बल होने न दिया
अपने प्रतिबिंबों में हमने अपने से चित्र तलाशे थे
मुश्किल के सजल क्षणों में भी जिन ने हताश होने न  दिया

इस जीवन की लाक्षागृह सी जलती हुई विषमताओं में
तपती हुई अस्मिता को अब हमने नव विस्तार दिया है 

तुम निरंतर बुझ रहे हो

ओ बटोही प्राण में धधकी हुई ज्वालाएँ लेकर
ये बताओ किसलिए अब तुम निरंतर बुझ रहे हो

दीप प्राणों का रखो प्रज्ज्वल, तुम्हीं को तम हटाना
ये युगों से जो घिरा कोहरा तुम्हें अब चीरना है
श्वास में झंझायें  भर कर ये घिरे बादल हटाने
इक नए उजियास की नूतन फसल को सींचना है

घोल कर संकल्प में विश्वास निश्चय तो करो तुम
कल नया युग आएगा पथ में अभी क्यों रुक रहे हो

देखते हो एकलव्यों को उपेक्षित आज भी तुम
आज तुमको देवदत्तों से नया उद्घोष करना
जाति  की औ रंग की या धर्म की रेखा खिंची जो
वे मिटा कर नव दिवस में एक नूतन रंग भरना

तोड़ कर हर व्यूह को है अग्रसर होना डगर पर
देख कर इक मेड़ छोटी सी कहो क्यों झुक रहे हो

लक्ष्य के सम्मुख सभी भ्रम यक्ष प्रश्नो के हटे हैं
चूमते गिरि  शृंग आकर पंथ में बढ़ते कदम को
हों भले राहे अदेखी  बढ़  चलो जीवंत होकर
है प्रतीक्षित हर सफलता  बस  तुम्हारे ही  वरण को

कंठ में रोको नहीं स्वर की उमड़ती अब नदी को
दो उसे निर्बाध बहने, आज तक हो चुप रहे हो

एक अनिर्णय


एक अनिर्णय हर शनि-रवि को अकस्मात् ही आकर घेरे
कहाँ गया आराम आज कल, बढ़ी व्यस्तता सुबह सवेरे

जो थे लाकड़ाऊन से पीड़ित,  उन सबको इक दिशा मिल गई
हर सप्ताह लग गई पाँतें, एक एक कर आयोजन की
नई संस्थाएँ उमड़ी हैं,  नित्या नए ही संयोजन  है
मेल बाक्स में बढ़ती संख्या नित नित नूतन आमंत्रण की

किसे चुनें य  किसे न चुने, असमंजस में घिर जाता मन
एक नया सरदर्द दो दिनों का बस रहा लगाता फेरे

गूगलमीट, फ़ेसबुक लाइव, वेब एक्स है और ज़ूम है
यूटूबित चैनल अनगिनती, हैं मुशायरे, कवि सम्मेलन
वीकेंड के केवल दो दिन, ढाई दर्जन प्रोग्राम हैं
किस को अस्वीकार करें हम, सब ने भेजे स्नेह निवेदन

कितने रहे अपरिचित, कितने हैं परिचय की सीमाओं में
किसी किसी से नाता गहरा। कुछ हैं केवल नत्थू खैरे

शनि की सुबह चाय की प्याली, उधर। ज़ूम पर होती दस्तक
और बुलाती दे आवाज़ें, लिस्ट पेंडिंग पड़े काम की
लोड बड़े दो लांडरी वाले, दूध,दही ,सब्ज़ी की शापिंग
और व्यवस्था भी करनी हफ़्ते भर के ताम झाम की

सोम, भौम, बुध, श्क्र, गुरु को पूरे दिन ही रहे व्यस्तता
बस रिपोर्ट, रेक्वीजीशन के, लाजिस्टिक्स के लगते डेरे

आवश्यक जो कार्य कर रहे, उस सूची में नाम हमारा
घर में बैठे कविता करना-सुनना, सब हो गया असम्भव
दो दिन मिलते शनि औ’ रवि का अपना हाल जान लेने को
उसमें भी यदि ज़ूम ​क​रे तो हम खुद लाक्डाउन होंगे तब

संडे को वेक्यूम समूचा , फिर मंडे का लंच बनाना
कविता ग़ज़लें पेट न भरती, बंद पड़ा आफिस का  कैफ़े 

कोई भी गंध नहीं उमड़ी

  कोई भी गंध नहीं उमड़ी  साँसों की डोरमें हमने, नित गूँथे गजरे बेलकर लेकिन रजनी की बाहों में कोई भी गंध नहीं साँवरी नयनों में आंज गई सपने ज...