होकर मेरा गीत प्रणेता

ढलती हुइ निशा के पल में
और भोर के प्रथम प्रहर में
निंदिया की खिड़की पर कोई
आ मुझको आवाज़ें देता

धुंधली चन्द्र किरण की डोरी को थामे
धीरे धीरे आ जाता है मेरे सपनों में
चित्र उभरता जो नयनों के पाटल पर
वैसा कोई चित्र न परिचित अपनों में
कभी निखरता और कभी ओझल होता
बादल के घूँघट से दिखता हो तारा
बार बार सोचा कुछ नाम उसे दे दूँ
बार बार मैं अपने उपक्रम में हारा

कभी कभी ऐसा लगता है
शायद वह ही है अनजाना
जो कि रहा जाना पहचाना
होकर मेरा गीत प्रणेता

बन्द पड़े मेरे नयनों के दरवाज़े
बिन दस्तक के अनायास खुल जाते हैं
शीशे पर झिलमिल झिलमिल किरणों जैसी
आकॄतियों के मेले आ कर लग जाते हैं
रजत पात्र से कुछ अबीर तब छलक छलक
स्वर्ण किरण की माला में गुंथ जाता है
और अचानक सोये इस निस्तब्ध कक्ष में
दूर कहीं से वंशी सा सुर आ जाता है

खुली पलक में घुले अपरिचय
बन्द पलक के अपने पन में
अन्तर को ढुँढ़ा करता है
मन हो जिज्ञासु नचिकेता

कुछ अजीब सा लगता है अहसास अजाना
अक्षम रहती अभिवयक्ति कुछ उसे कह सके
लगता है कुछ उमड़ा उमड़ा मन के नभ से
किन्तु पिघलता नहीं धार में बँधे बह सके
रह रह कर लगता है मुट्ठी में कुछ बँधता
हाथ खोल देखूँ तो शून्य नजर आता है
पाखी एक बैठता है मन छत मुंड़ेर पर
पाने को सामीप्य बढ़ूँ तो उड़ जाता है

एक पंख चितकबराअ लेकर
अभिलाषित अम्बर को छू ले
इसीलिये सुरहीन कंठ से
शब्दों को रँगता कह देता

ज़िन्दगी बस बिलम्बित बजाती रही

तुम को आवाज़ देता रहा हर निमिष
पर महज गूँज ही लौट आती रही

दर्द सीने में अपने छुपाये रखा
था बताने से कुछ भी नहीं फ़ायदा
प्यार की रीत क्या ? मैने जानी नहीं
न ही समझा यहाँ का है क्या कायदा
भावनाओं में उलझा रहा अब तलक
लोग मुझको खिलौना समझते रहे
चाह कर भी शिकायत नहीं कर सका
शब्द मेरे गले में अटकते रहे

और तन्हाइं दीपक जला कर कइं
दवार दिल के दिवाली मनाती रही

थे उठे ठोकरों से, गुबारों को मैं
सींच कर आँसुओं से दबाता रहा
पथ तुम्हारा सुखद हो सके इसलिये
राह में अपनी पलकें बिछता रहा
पर गये तुम तो फिर लौट आये नहीं
साथ पलकों के नजरें बिछी रह गइं
आँसुओं की उमड़ती हुइं बाढ़ में
मेरे सपनों की परछाइंयाँ बह गइं

और अम्बर से लौटी हुइं प्रतिध्वनि
शंख, ढ़ोलक , मजीरे बजाती रही

पाँव फ़िसले मेरे सर्वदा उस घड़ी
इन्च भर दूर जब था कंगूरा रहा
दूसरा अन्तरा लिख ना पाया कभी
गीत हर एक मेरा अधूरा रहा
एक पल देर से राह निकली सभीं
एक पग दूर हर एक मन्ज़िल रही
एक टुकड़ा मिली चाँदनी कम मुझे
एक जो साध थी, अजनबी हो रही

और सूनी नजर को क्षितिज पर टिका
ज़िन्दगी बस बिलम्बित बजाती रही

बांसुरिया की तान हो गई

मेरे जिन गीतों को तुमने एक बार गुनगुना दिया है
उन गीतों की धुन, कान्हा की बांसुरिया की तान हो गई

शब्द शिल्प में ढल कर प्रतिमा, यों ही नहीं बना करते हैं
रागों के आरोहों पर स्वर यों ही नहीं चढ़ा करते हैं
यों ही नहीं घटा की संगत गगन श्याम रंग में रँग देती
विहग भाव के बिना पंख के यों ही नहीं उड़ा करते हैं

तुमने जिसको अपने कोमल स्वर का मधुमय स्पर्श दिया है
वही भावना, उगी भोर की अँगड़ाई का गान हो गई

बिना परस पाये पारस का लौह स्वर्ण में कब ढलता है
और अग्नि का स्पर्श न पाये, स्वर्ण कहां कुन्दन बनता है
और नहीं उंगलियां कला की दें अपने चुम्बन का जादू
तो फिर कुन्दन कहां किसी आभूषण में ढल कर सजता है

आज तुम्हारे अधरों के गुलाब ने जिसे छू लिया आकर
एक पंक्ति में लिखी बात भी गज़लों का उन्वान हो गई

बिना सुरों के लिखे हुए सब गीत अधूरे रह जाते हैं
नयन-सेज के आमंत्रण बिन, सारे सपने ढह जाते हैं
सुरभि न कर दे यदि हस्ताक्षर, तो पुष्पों का रूप अधूरा
पत्र बिना अवलबन के शाखों से गिर कर बह जाते हैं+

मिला तुम्हारे कंठ सरगमी का जो साथ आज उसको तो
श्वेत शब्द की चूनरिया, इक सतरंगा परिधान हो गई

याद आई तो ऐसा लगा

याद आई तो ऐसा लगा कांच पर इन्द्रधनुषी किरण छटपटाने लगी
जो अबीरों से लबरेज थीं प्यालियां, वे सभी की सभी छलछलाने लगीं
तान आने लगी बाँसुरी की मधुर,दूर से डोरियों में हवा की उलझ
चित्र आँखों में पल पल बदलने लगे, कल्पना और कुछ कसमसाने लगी

ये घटा जो घिरी, आपके कुन्तलों की मुझे याद फिर आज आने लगी
दामिनी खिलखिलाई गगन में कहीं, एक छवि आपकी मुस्कुराने लगी
यूँ तो यादों का मौसम रहा है सदा, आज की बात कुछ और ही है प्रिये
एक बदरी पिरोये हुए बून्द में, आपके गीत को गुनगुनाने लगी

फिर दहकने पलाशों के साये लगे, गुलमोहर याद के लहलहाने लगे
जो अमलतास की छांह से थे बँधे, सारे अनुबन्ध फिर याद आने लगे
वक्त की करवटों में छुपे थे रहे, आज जीवन्त पल वे सभी फिर हुए
इक नये राग में गा उठे प्रीत-घन,साज मन के सभी झनझनाने लगे

आज उन्ही शब्दों को मेरी कलम गीत कर के लाई है

शब्दकोश के जिन शब्दों ने अधर तुम्हारे चूम लिये थे
आज उन्ही शब्दों को मेरी कलम गीत कर के लाई है

रंग तुम्हारे मन का बिखरा उपवन के सारे फूलों पर
जलतरंग बन चाल तुम्हारी अंकित सरिता के कूलों पर
उंगली के इंगित से जागीं सावन की मदमस्त मल्हारें
हर मौसम में पैगें लेतीं चढ़ी हवाओं के झूलों पर

शब्द शब्द की अनुभूति में व्याप्त तुम्हीं हो मधुर कल्पने
ढाई अक्षर पढ़ा तुम्हीं ने ज्योति ज्ञान की बिखराई है

तुमसे पा उनवान, गज़ल की महफ़िल में कोयलिया चहकी
तप्त कपोलों की अरुणाई से पलाश की बगिया दहकी
नयनसुधा की कुछ बूँदों का जो पाया है स्पर्श सुकोमल
बिसरा कर अपने गतिक्रम को सांस सांस है बहकी\ बहकी

जब बहार ने उपवन में आ अपना घूँघट जरा हटाया
पता चला उसका चेहरा भी सिर्फ़ तुम्हारी परछाई है

स्वर का कंपन छू नदिया की धारा लेती है अँगड़ाई
पग चुम्बन के लिये आतुरा हो, दुल्हन बनती अँगनाई
चितवन से विचलित होते हैं विधि के नियम कई प्रतिपादित
चिकुरों से ले रात कालिमा, दॄष्टि दिवस को दे तरुणाई

महकी हुई हवानों ने जब अपना अस्तर आकर खोला
तब मालूम हुआ है खुश्बू तुमसे ले उधार आई हैं

मीनाक्षी से एलोरा तक चित्र शिल्प जितने, तुमसे ही
मौसम की गतिविधियों का जो कारण रहा, रहा तुमसे ही
तुमही तो कविता, कविता में गज़लें नज़्म सभी हैं तुमसे
जितने छलके गीतकलश से, गीत रहे वे सब तुमसे ही

संध्या ने दिन की पुस्तक के पन्ने पढ़ते हुए बताया
जितनी भी गाथायें संचित, सब तुम ही ने लिखवाईं हैं

शब्दों के अक्सर अर्थ बदल जाते हैं

शब्दों का संयोजन यों तो अधरों से हर बार बहा है
लेकिन हमको ज्ञात नहीं है, कभी कभी हम क्या गाते हैं

चाहत तो बढ़ती हैं नभ में उमड़े हुए धुँए के जैसी
दिशाहीन विस्तारित होतीं फिर सहसा छितरा जाती हैं
बिखरी हुई आस की किरचें,चुनते चुनते थकी उंगलियाँ
गुलदानों में फूल एक भी रखने में सकुचा जाती हैं

सौगन्धों ने सम्बन्धों के जितने भी अनुबन्ध लिखे थे
दिनमानों के झरते झरते वे सब धूमिल हो जाते हैं

उगती हुई धूप पी जाती खिलते हुए फूल सपनों के
रिश्तों के सूखे पत्तों को हवा उड़ा कर ले जाती है
बरसों का संचय हर लेती, पल की एक बदलती करवट
और पास की खाली झोली फिर से खाली रह जाती है

शब्दों के आकॄति से लेकर सुर में ढलने तक की दूरी
तय करते करते शब्दों के अक्सर अर्थ बदल जाते हैं

टपकी हुई तिमिर की बूँदें भर देतीं जब दिन का प्याला
तब सुधियों के एकाकी पल अपनेपन से कट जाते हैं
पिछवाड़े की यादों वाली झाड़ी से उड़ उड़ कर जुगनू
तन्द्राओं के सूनेपन में कोई हलचल भर जाते हैं

तारों की छाया आँखों के परदे पर इक चित्र बनाये
इससे पहले ही कूची के सारे रंग बिखर जाते हैं

बन्द किताबों में र हते हैं उठे हुए प्रश्नों के उत्तर
फिर भी कट कर सन्दर्भों से रह रह प्रश्न उभर आते हैं
नजरों के बौनेपन को तो करती अस्वीकार चेतना
अहम अस्मि के पंख लगा कर स्वर के पंछी उड़ जाते हैं

झुके हुए शीशों की परिभाषा से वंचित हैं जो काँधे
अधिक नहीं वे तने शीश का अपना बोझा ढो पाते हैं

इक अधूरी गज़ल गुनगुनाते रहे

छाँह तो पी गये, वॄक्ष पथ के स्वयं
धूप हिस्सा हमारा, बताते रहे
हम अवनिका पकड़ कर खड़े रह गय
दॄश्य जो भी मिला, वे चुराते रहे

राह भटका रहा पग उठा राह में
होंठ पर मौन बैठी रही बाँसुरी
फूल अक्षत बिखरते रहे थाल से
भर नहीं पाई संकल्प की आँजुरी
सिन्धु था सामने खिलखिलाता हुआ
बाँह अपनी पसारे हुए था खड़ा
पर अनिश्चय का पल लंगरों के लिए
बोझ, अपनी ज़िदों पे रहा है अड़ा

हाशिये से परे हो खड़े हम रहे
पॄष्ठ पर वाक्य थे झिलमिलाते रहे
यज्ञ में जो हुआ शेष, वह स्वर लिये
इक अधूरी गज़ल गुनगुनाते रहे

थे निमंत्रण रहे भेजते, सावनी
मेघ आ जायेंगे पनघटों के लिये
किन्तु शायद पता था गलत लिख गया
आये आषाढ़ घन सिर्फ़ तॄष्णा लिये
स्वर बना कंठ का आज सुकरात सा
भब्द प्याले भरा छलछलाता रहा
आंख का स्वप्न था इन्द्रधनुषी नहीं,
एक धुँआ वहाँ छटपटाता रहा

और हम दंश पर दंश सहते हुए
दूध ला पंचमी को पिलाते रहे
बीन के काँपते राग को थाम कर
मौन स्वर से कहानी सुनाते रहे

पीठ पर पीढ़ियों के सपन से भरी
एक गठरी रही बोझ बनती हुई
उंगलियों के सिरों से परे ही रही
हर किरन जो उगी, याकि ढलती हुई
किसलिये क्या कहां कौन किसके लिये
प्रश्न से युद्ध में जूझते रह गये
भूल कर नाम अपना, भटकते हुए
अर्थ, अपना पता पूछते रह गये

धूल उड़ती हुई जो रही सामने
शीश, चन्दन बना कर लगाते रहे
जो कि आधा लिखा रह गया था कभी
गीत बस एक वह गुनगुनाते रहे

एक भी आज तक तुमने गाया नहीं

स्वप्न पलकों से टपका किये रात भर
हाथ में एक भी किन्तु आया नहीं
गीत लिखता रहा भोर से सांझ तक
आपने एक भी गुनगुनाया नहीं

एक नीहारिका की बगल से उठे
पार मंदाकिनी के चले थे सपन
चाँद की नाव में बैठ कर थे तिरे
चप्पुओं में संजो चाँदनी की किरन
नींद की इक लहर पर फ़िसलते हुए
नैन झीलों के तट पर रुके चार पल
खूंटियों पर टँगा कैनवस थाम ले
इससे पहले ही पलकों से भागे निकल

मैं लिये इन्द्रधनुषी खड़ा कूचियां
रंग से एक भी बांध पाया नहीं

भाव मन की तराई में वनफूल से
खिल रहे थे घने, मुस्कुराते हुए
नैन पगडंडियों पर बिछे थे हुए
शब्द को देखते आते जाते हुए
राह में छोड़ सांचे, कदम जो गये
उनके, अनुरूप ढलते रहे हैं सभी
चाही अपनी नहीं एक पल अस्मिता
कोई अध्याय खोला नया न कभी

इसलिये उनको अपना कहूँ ? न कहूँ
सोचते मैं थका, जान पाया नहीं

प्रीत की गंध में डूब संवरा हुआ
शब्द निखरा कि जैसे कली हो सुमन
हर घड़ी साथ में हमकदम हो चली
एक अनजान सुखदाई कोमल छुअन
रंग सिन्दूर के जब गगन रँग गये
आस आई नई रश्मियों में ढली
आपके कंठ की ओस में भीग कर
स्वर्ण पहने मेरे गीत की हर कली

छू न सरगम सकी शब्द की डोरियाँ
और संगीत ने सुर सजाया नहीं

रिश्ता मेरे नाम से

गीतों का रिश्ता छंदों से
फूलों का रिश्ता गंधों से
जो रिश्ता नयनों का होता है सपनों के गांव से
पीड़ा ने ऐसा ही रिश्ता जोड़ा मेरे नाम से

दिन बबूल से आकर मन की अलगनियों पर टँगे जाते हैं
रातें अमरबेल सी मुझको भुजपाशों में भर लेती हैं
दोपहरी की धूप रबर सी खिंच कर भरी रोष में रहती
संध्या आती है धुन्धों का परदा मुँह पर कर देती है

सांकल का रिश्ता कड़ियों से
प्रहरों का रिश्ता घड़ियों से
जो रिश्ता है सुखनवरी का उठते हुए कलाम से
पीड़ा ने ऐसा ही रिश्ता जोड़ा मेरे नाम से

पिघला हुआ ह्रदय रह रह कर उमड़ा करता है आँखों से
शाखों से पल छिन की टपकें पल पल पर बदरंग कुहासे
टिक टिक करते हुए समय के नेजे से प्रहार सीने पर
भग्न आस के अवशेषों के बाकी केवल चित्र धुंआसे

शब्दों से नाता अक्षर का
दहलीजों से नाता घर का
संझवाती के दीपक का ज्यों नाता होता शाम से
पीड़ा ने ऐसा ही नाता जोड़ा मेरे नाम से

अंधियारे की चादर हटती नहीं, भोर हो या दोपहरी
संकट वाली बदली मन के नभ से दूर नहीं जाती है
जितनी बार बीज बोये हैं धीरज के मन की क्यारी में
उतनी बार सुबकियों वाली चिड़िया उनको चुग जाती है

जो नयनों का है काजल से
मंदिर का है गंगाजल से
मरुथल का जो रिश्ता रहता है झुलसाती घाम से
पीड़ा ने जोड़ा ऐसा ही रिश्ता मेरे नाम से

हम गीतों के गलियारे में

हम गीतों के गलियारे में संध्या भोर दुपहरी भटके
कंठ न ऐसा मिला किन्तु जो गीतों को कोई स्वर देता

छंदों की टहनी पर हमने अलंकार के फूल उगाये
और लक्षणा की पांखुर पर, ओस व्यंजना बना सजाये
छंदों की छैनी से हमने शिल्प तराशे गज़ल-नज़्म के
वन्दनवारी अशआरों से द्वार द्वार पर चित्र बनाये

किन्तु न सरगम की क्यारी में फूट सके रागों के अंकुर
एक एक कर सब युग बीते, क्या सतयुग, क्या द्वापर त्रेता

सारंगी ने अलगोजे की बांह थाम कर जो कुछ गाया
जलतरंग पर बांसुरिया ने जो कदम्ब के तले बजाया
वह इक सुर जो भटक गया है चौराहों के चक्रव्यूह में
जिसे नाद की चन्द्र-वीथि में शंख-ध्वनि ने नित्य बजाया

उसी एक सुर की तलाश में अलख जगाया हर द्वारे पर
किन्तु न पट को खोल सका है वह इक सुर-संदेश प्रणेता

बार बार खोली है हमने अपनी स्मॄतियों की मंजूषा
संध्या की अँगनाई में हम करते हैं आमंत्रित ऊषा
विद्यापति के, वरदाई के पदचिन्हों का किया अनुसरण
किन्तु न बदली लेशमात्र भी, जो इक बार बन गई भूषा

एक इशारे से उंगली के जो दे देता सही दिशायें
नहीं हुआ संभव वह मांझी, हमको अनुगामी कर लेता

आपकी ओढ़नी का सिरा चूम

शाख के पत्र सब नॄत्य करने लगे
पांखुरी पांखुरी साज बन कर बजी
क्यारियों में उमड़ती हुई गंध आ
रुक गई एक दुल्हन सरीखी सजी
पर्वतों के शिखर से उतर कर घटा
वादियों में नये गीत गाने लगी
आपकी ओढ़नी का सिरा चूम जब

एक झोंका हवा का हुआ मलयजी.

अब नहीं संभव रहा है गीत कोई गुनगुनाना

कंठ में अवरुद्ध है स्वर होंठ पर आता नहीं है
अब नहीं संभव रहा है गीत कोई गुनगुनाना

कसमसाती उंगलियों से पूछती रह रह कलम है
किसलिये तुमने न चलने की उठा रक्खी कसम है
मानचित्रों में मिलेगी राह नूतन कोई तुमको
जान लो यह धुंध में डूबा हुआ केवल भरम है

कर समर्पण हो शिथिल जो रुक गये है मोड़ पर ही
शब्द को संभव नहीं है पॄष्ठ पर अब पग बढ़ाना

प्रश्न के उत्तर स्वयं ही प्रश्न बनने लग गये हैं
आईने अपने स्वयं के बिम्ब छलने लग गये हैं
झर रही केवल उदासी की झड़ी अब बादलों से
छोड़ कर नभ को अकेला, सब सितारे ढल गये हैं

पारदर्शी हो गये हैं आज वातायन निशा के
है नहीं संभव कोई परदा गिराना या उठाना

मौन की लंबी गली में और कितनी दूर चलना
और कितनी देर बन कर धूप का इक दीप जलना
एक अपने खोखले सिद्धांत के डमरू बजाते
और कितनी देर अपने अर्थ को है आप छलना

झुनझुने हम हो गये हैं आप अपनी ही नजर में
आपका क्या दोष, चाहें आप जो हमको बजाना

वर्त्तिका मैं बनूँ, तीलियाँ तुम बनो

चाँदनी के अधूरे सपन की कथा
वादियों में अकेले सुमन की व्यथा
आज भी शब्द में ढल न पाई अगर
लेखनी का जनम फिर रहेगा वॄथा
इसलिये आओ अभिव्यक्तियों के कलश, भाव के नीर से आज हम तुम भरें
वर्त्तिका मैं बनूँ, तीलियाँ तुम बनो, ज्योति बन दूर छाया अंधेरा करें

वाक्य में अक्षरों के छुपे मध्य में
भावनाओं के निर्झर उमड़ते हुए
एक के बाद इक स्वप्न की क्यारियाँ
और गुंचे हज़ारों चटकते हुए
अश्रु जो छू गये, सुख के दुख के नयन
शब्द के बीच में आते जाते रहे
हैं परे रह गये दॄष्टि के कोण से
किन्तु अस्तित्व अपना जताते रहे

आओ हम शब्द की तूलिकायें लिये, इनकी रातों में चित्रित सवेरा करें
वर्तिका मैं बनूँ, तूलिका तुम बनो, ज्योति बन दूर छाया अंधेरा करें

स्वप्न जो आँख में आ तड़पते रहे
स्वर, न छू पाये जो थरथराते अधर
एक पाथेय जो भोर में न सजा
एक पग के परस को तरसती डगर
एक आलाव दरवेश की राह में
नीड़ जिसकी टँगी मोड़ पर है नजर
एक हथेली, लकीरों भरी छाओ जो
छोड़ जाती रही घर की दीवार पर

इनकी बेचैनियाँ आओ हम जान लें और हल साथ मिल कर चितेरा करें
चाँद तुम बन सको, मैं सितारे बनूँ , रात को आओ हम तुम उजेरा करें

स्वप्न से नैन के मध्य की दूरियाँ
फूल से दूर जितना सुवासित पवन
पायलों और झंकार के मध्य में
शून्य का एक विस्तॄत उमड़ता गगन
पीर का गीत से एक अनुबन्ध है
प्यास का जो बरसते हुए नीर से
इक शपथ जो कई जन्म के साथ की
या कि धारा का हो साथ ज्यों तीर से

आओ मिल कर इन्हें हम नये नाम दें, नाम जो अर्थ नूतन उकेरा करें
रश्मियां मैं बनूँ त्रुम दिवाकर बनो, आओ मिल कर नया इक सवेरा करें

रहा एक सूखे निर्झर में

संकल्पों का आवारापन, दिशाहीन होकर भटका है
अनुशासन में उन्हें बाँध लूँ, होने लगा आज तत्पर मैं

मौन निशा अंधियारेपन को
ओढ़े बैठी रही रात भर
कोई सितारा नहीं ध्यान जो
देता उसकी कही बात पर
मैं सहभागी बन पीड़ा का
उसकी, जागा हाथ बँटा लूँ
गीत मिला कर उसके सुर में
अपना सुर , मैं कोई गा लूँ

मैने दी आवाज़ भोर की अँगनाई के प्रथम विहग को
लेकिन बात अनसुनी करके वो उड़ गया कहीं अंबर में

एकाकीपन बोझा होता
रही बताती संध्या पागल
दोपहरी ने भी समेट कर
रखे रखा सुधियों का आंचल
ढलता सूरज बोल गया कुछ
किन्तु हवा ने स्वर को रोका
और दे गया दिन हमराही
फिर से आधे पथ में धोखा

नदिया बन कर बह निकली वे गाथायें जो छुपी हुईं थीं
मैं उद्गम के स्रोत ढूँढ़ता रहा एक सूखे निर्झर में

भोर, शब्द दीवाने होते
थकी ओस से कहते कहते
भाव बदलते, एक समय की
धारा के संग बहते बहते
अलग कसौटी पर अर्थों के
अक्सर मूल्य बदल जाते हैं
संप्रेषित कुछ और हुआ जब
शब्द और कुछ कह जाते हैं

अनुवादों के बिन भी समझी जाती हैं मन की भाषायें
जाने था पर दे न सका हूँ उनको कोई भी अवसर मैं

अजनबियत की उम्र रही है
उतनी, जितना हमने चाहा
सम्बन्धों के धागे बुनने
तत्पर है परिचय का फ़ाहा
दूरी हर तय हो जाती है
एक कदम के उठ लेने से
अम्बर का विस्तार सिमटता
लगे फ़ैलने इक डैने से

जो लगती है बात अनर्गल, उसमें भी कुछ गूढ़ रहा है
शिल्पकार इक मध्य रहा है मंदिर की मूरत-पत्थर में

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...