कितने गीत और लिखने हैं ?

आह न बोले, वाह न बोले
मन में है कुछ चाह न बोले
जिस पथ पर चलते मेरे पग
कैसी है वो राह न बोले
फिर भी ओ आराध्य ह्रदय के पाषाणी ! इतना बतला दो
कितने गीत और लिखने हैं ?
कितने गीत और लिखने हैं, लिखे सुबह से शाम हो गई
थकी लेखनी लिखते लिखते, स्याही सभी तमाम हो गई

संझवाती, तुलसी का चौरा, ले गुलाब, गुलमोहर चन्दन
मौसम की हर अँगड़ाई से मैने किये नये अनुबन्धन
नदिया, वादी, ताल, सरोवर, कोयल की मदमाती कुहु से
शब्दों पर आभरण सजा कर, किया तुम्हारा ही अभिनन्दन

किन्तु उपासक के खंडित व्रत जैसा तप रह गया अधूरा
और अस्मिता दीपक की लौ में जलकर गुमनाम हो गई

अँधियारी रजनी में नित ही रँगे चांदनी चित्र तुम्हारे
अर्चन को नभ की थाली में दीप बना कर रखे सितारे
दिन की चौखट पर ऊषा की करवट लेकर तिलक लगाये
जपा तुम्हारा नाम खड़े हो, मैने निमिष निमिष के द्वारे

बन आराधक मैने अपनी निष्ठा भागीरथी बनाई
लगा तुम्हारे मंदिर की देहरी पर वह निष्काम हो गई

है इतना विश्वास कि मेरे गीतों को तुम स्वर देते हो
सागर की गहराई, शिखरों की ऊंचाई भर देते हो
भटके हुए भाव आवारा, शब्दों की नकेल से बाँधे
शिल्पों के इंगित से ही तुम उन्हें छंदमय कर देते हो

कल तक मेरे और तुम्हारे सिवा ज्ञात थी नहीं किसी को
आज न जाने कैसे बातें यह, बस्ती में आम हो गईं

जो अधरों पर संवरा आकर, एक नाम है सिर्फ़ तुम्हारा
और तुम्हारी मंगल आरति से गूँजा मन का चौबारा
हो ध्यानस्थ, तुम्हारे चित्रों से रँगकर नैनों के पाटल
गाता रहा तुम्हीं को केवल, मेरी धड़कन का इकतारा

किन्तु न तुमने एक सुमन भी अपने हाथों दिया मुझे है
जबकि तुम्हारे नाम-रूप की देहरी तीरथधाम हो गई

आशीषों की अनुभूति को मिला नीड़ न अक्षयवट का
तॄषित प्राण की तॄष्णाओं को, देखा, हाथ रूका मधुघट का
दूर दिशा के वंशीवादक ! तान जहां सब विलय हो रहीं
आज उसी बस एक बिन्दु पर सांसों का यायावर अटका

स्वर था दिया, शब्द भी सौंपे, और न अब गीतों का ॠण दो
एक बात को ही दोहराते अभिव्यक्तियां विराम हो गईं

अनुभूति को अहसासों को, बार बार पिंजरे में डाला
एक अर्थ से भरा नहीं मन, अर्थ दूसरा और निकाला
आदि-अंत में धूप-छाँह में, केवल किया तुम्हें ही वर्णित
अपने सारे संकल्पों में मीत तु्म्हें ही सदा संभाला

मिली तुम्हारे अनुग्रह की अनुकम्पा, शायद इसीलिये तो
सावन की काली मावस्या, दोपहरी की घाम हो गई

कितने गीत और लिखने हैं ?

दॄष्टि के चुम्बन

दॄष्टि के चुम्बनों ने छुआ जब मुझे
खिलखिलाने लगी देह में रागिनी

सिक्त मधु की फ़ुहारों से होकर नजर
आई हौले से मेरे नयन द्वार पर
ओट से चिलमनों की सरकती हुई
सारी बाधाओं को पंथ की पार कर
साथ अपने लिये एक मुस्कान की
जगमगाती हुई दूधिया रोशनी
दृश्य ले साथ में एक उस चित्र का
दांत में जब उलझ रह गई ओढ़नी

मेरी अनुभूतियों की डगर पर बिछी
पूर्णिमा की बरसती हुई चांदनी

ओस भीगी हुई पांखुरी सा परस
बिजलियां मेरे तन में जगाने लगा
धमनियों में घुलीं सरगमें सैंकड़ों
कतरा कतरा लहू गुनगुनाने लगा
धड़कनों में हजारों दिये जल गये
सांस सारंगियों को बजाने लगी
बँध गया पूर्ण अस्तित्व इक मंत्र में
एक सम्मोहिनी मुझपे छाने लगी

कर वशीभूत मन, वो लहरती रही
वह नजर एक अद्भुत लिये मोहिनी

चेतना एक पल में समाहित हुई
स्वप्न अवचेतनायें सजाने लगीं
वादियों में भटकती सुरभि पुष्प की
मानचित्रों को राहें बताने लगीं
ढाई अक्षर कबीरा के उलझे हुए
व्याख्यायें स्वयं अपनी करने लगे
चित्र लिपटे कुहासे में अंगनाई के
मोरपंखी रँगों से सँवरने लगे

कल्पना के सुखद एक आभास में
आज सुधियाँ हुईं मेरी उन्मादिनी.

आस की डोरियाँ

पंथ पर ज़िन्दगी के नये मोड़ पर
एक दीपक जला है नया साध का
याद के इन्द्रधनुषी सपन, ज्योति की
हर किरण सातरंगीं बनाने लगे

राह में जितने मुझको मिले हमसफ़र
उनका अपनत्व जीने का विश्वास है
योजनों दूर मुझसे रहे हों भले
मन की अँगनाई में उनका आवास है
भावना के पखेरू बने वे कभी
मेरे मानस के आकाश पर आ गये
और अनगिन उमंगें लिये बाँह में
द्वार पर मेघ-मल्हार आ गा गये

उनका पावन परस छेड़ता तार है
मन की सारंगियों से मधुर साज के
स्वर्ण के इक कलश से झरी ओस से
भोर प्राची में जैसे नहाने लगे

डगमगाते कदम का सहारा बने
वे बने हैंदिशा राह जब खो गई
बन के बादल सा कालीन पथ में बिछे
राह कुंठा से जब कंटकी हो गई
ढल गई सांझ जब, बन गये ज्योत्सना
रात में चाँद बन जगमगाने लगे
वे निकटतम रहे हैं, जो मेरे सदा
आज नज़दीक कुछ और आने लगे

सांझ चौपाल पर दीप इक बाल कर
अपनी स्मॄतियों की चादर बिछाये हुए
चंद अनुभूतियों की सुरा ढाल कर
होंठ फिर नाम वे गुनगुनाने लगे

कहकहों के निमंत्रण मिले हैं कभी
तो मिली थीं कभी अश्रु की पातियाँ
यज्ञ की ज्वाल से दीप पाये कभी
और पाईं कभी बुझ चुकी बातियाँ
मेघ झूला झुलाते रहे हैं कभी
फूल गाते रहे गंध की लोरियाँ
तो कभी उंगलियाँ छटपटाती रहीं
बाँध वट पर सकें आस की डोरियाँ

आज संतोष से भर गया मनकलश
आपके स्नेह की पा बरसती सुधा
हर्ष-अतिरेक स्वर पी गया कंठ का
नैन में आ निमिष छलछलाने लगे

राकेश खंडेलवाल
१८ मई २००७

पर न आया उतर कर कोई देवता

वक्त के साथ सब कुछ बदलता रहा
जो न बदले तनिक, लेख थे भाग के

रोज ही राह में दीप इक बाल कर
इक प्रतीक्षा लिये थी प्रतीक्षा खड़ी
पश्चिमी द्वार पर से गुजरता हुआ
सूर्य करता रहा उम्र उसकी बड़ी
स्वप्न के नित्य अंकुर रहे फूटते
नैन की क्यारियों में , मगर दो घड़ी
और बस शेष रह पाईं हैं हाथ में
टूट कर झर रहे मोतियों की लड़ी

आस के कुमकुमे इस तरह टूटते
जल में उठते हुए बुलबुले झाग के

उंगलियाम थक गईं रंग सिन्दूर में
द्वार पर लाभ, शुभ, लाभ लिखते हुए
हर दिशा में बनाते हुए सांतिये
और दीवार रंगीन करते हुए
थाम कर जलकलश, मंत्र से पूर कर
अपनी अँगनाई में जल छिड़कते हुए
इत्र खस के, हिना, केवड़े के लिये
अपने आराध्य को भेंट करते हुए

पांव पर उनके मुर्झाये जो, फूल थे
अपने सिरमौर, सर पर रखी पाग के

ये नहीं था कि हम कर्म से हीन थे
शास्त्र ने जो कहा नित्य करते रहे
व्रत, अनुष्ठान पूजा, कथा भागवत
की डगर पर सदा ही विचरते रहे
राह में जो भी मंदिर मिला, हम वहीं
शीश अपना झुका प्रार्थना कर रहे
और नागा किये बिन, सवाया सदा
मंदिरों में समर्पण लिये , धर रहे

पर न आईं बसन्ती बयारें इधर
फूल खिल पाये, मन के , नहीं बाग के

रवि को सूरज नमन, सोम शिव पूजते
करते मंगल पवन सुत की आराधना
बुध को चन्दा को हमने चढ़ाया अरघ
और गुरु को बॄहस्पति की,की साधना
शुक्र संतोष में बीत कर रह गया
तेल शनि को शनि पर चढ़ाया किये
भोर - संध्या नमन, रात को जागरण
के स्वरों से रहा गूँजता आँगना

पर न आया उतर कर कोई देवता
शब्द कहता हमें चार अनुराग के

केसरी वस्त्र में तन लपेटे हुए
चादरें ओढ़ कर राम के नाम की
वे गुरु बन सिखाते रहे थे हमें
ज़िन्दगी में महत्ता है बस नाम की
मान उनके वचन, ब्रह्म के वाक्य हम
उनका करते रहे थे सदा अनुसरण
और कहते रहे, है हमीं में कमी
जो सफ़लता नहीं कर सकी है वरण

ये न जाना कि अपनी तमस में घिरे
जाग कर स्वप्न देखा किये जाग के

एक विद्रोह से भर गया फिर ह्रदय
तोड़ डाले सभी बंध बाँधे हुए
बोझ अपना उठाने का निश्चय किये
आज तैयार फिर अपने काँधे हुए
चीर कर पंडितों के बनाये हुए
सारे भ्रम जाल हम आज कर्मठ हुए
एक पल में , जो कीकर बिछे राह में
छाँह शीतल लुटाते हुए वट हुए

झोलियाँ मधुकणों से उफ़नने लगीं
दीप बन कर सजे पिंड सब आग के

फिर नया एक सूरज उगा बोध का
छाँट किरणों की कैची से तम का वसन
ज्ञान का दीप प्रज्वल हुआ है नया
स्वेद-कण आंजुरि भर किया आचमन
खोलने पट लगी हैं दिशायें सभी
आईं उपलब्धियां चल स्वत: राह में
गूँजते घोष जय के गगन में नये
पुष्प बिछने लगे आ स्वयं राह में

कुछ न हासिल हुआ था हमें, जब तलक
हम रहे थे भरोसे पड़े भाग के

मातृ दिवस: नमन

आदि से अंत तक
शून्य से ब्रह्म तक
ज़िन्दगी के प्रथम स्वप्न से हो शुरू
आस की डोर में
सांझ में भोर में
तुम ही मेरी सखा, तुम ही मेरी गुरू

तुम ही आराध्य हो
तुम सहज साध्य हो
प्रेरणा धड़कनों के सफ़र की तुम्ही
पंथ सम्भाव्य में
मन के हर काव्य में
एक संकल्प लेकर बसी हो तुम्ही

दर्द की तुम दवा
पूर्व की तुम हवा
चिलचिलाती हुई धूप में छाँह हो
कष्ट की आह में
कंटकी राह में
तुम सहारे की फैली हुई बाँह हो

सॄष्टि आरंभ तुमसे
तुम्ही पर खतम
बस तुम्हारा ही विस्तार सातों गगन
एक तुम आरुणी
एक तुम वारुणी
एक तुम ही हवा एक तुम ही अगन

सॄष्टि की तुम सॄजक
प्यास को तुम चषक
मेरे अस्तित्व का तुम ही आधार हो
बिन तुम्हारे कभी
चन्द्रमा न रवि
है अकल्पित कहीं कोई संसार हो

हर धड़ी, एक क्षण
एक विस्तार, तॄण
जो भी है पास में, तुमने हमको दिया
किन्तु हम भूलते
दंभ में झूलते
साल में एक दिन याद तुमको किया

कैसी है ये सदी
कैसी है त्रासदी
भूल जाते हैं कारण हमारा है जो
हैं ॠणी अन्त तक
प्राण के पंथ पर
साँस हर एक माता तुम्हारी ही हो

कुछ अलग रंग के मुक्तक

मोहब्बत के बगीचे के अगर हम इक शजर होते
ज़माने की अलामत से सदा ही बेखबर होते
ये मुमकिन है कि करते हम, कहीं तकरीर बन लीडर
यकीं है और कुछ होते, न शायर हम मगर होते.

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धरम के चोंचले ये सब जो जन्नत में गढ़े होते
जो हैं छोटे वे अपने कद से न ज्यादा बड़े होते
न ही तब मिशनरी होती, न होता धर्म परिवर्तन
जनमते ही धरम सीने पे बन तमगे जड़े होते.

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जब ह्रदय की पीर हमने ढाल शब्दों में बहाई
आपका संदेश आया है बधाई हो बधाई
यों लगा शुभकामनायें आपकी ये कह रही हैं
ज़िन्दगी भर रुक न पाये अब तुम्हारी ये रुलाई


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दो कदम जो चले तुम मेरे साथ में

स्वप्न मेरा हर इक हो गया भोर का
दो कदम तुम चले जो मेरे साथ में

ये जो दीवार पर है कलेंडर टँगा
आज भी बस दिवस वो ही दिखला रहा
तुमने मुझसे कहा था कि"मैं प्रीत के
कुछ नये अर्थ तुमको हूँ सिखला रहा"
वह दिवस वह निमिष अब शिलालेख हैं
मेरी सुधियों के रंगीन इतिहास में
मेरी परछाईयों में घुल हर घड़ी
तुम रहो दूर या मेरे भुजपाश में

अब समझने लगा, अर्थ सारे छुपे
और अभिप्राय, हर अनकही बात में

पोर पर उंगलियों के हिना ने लिखा
नाम बस आस के एक अनुराग का
रंग उसमें उतरता गया आप ही
गुनगुनाती उमंगों भरे फाग का
कंगनों में जड़े, मोतियों में पिरो
शब्द संबंध के एक अनुबन्ध के
सांस की क्यारियों में लगीं रोपने
धड़कनें, बीज शत-जन्म-सौगन्ध के

बनके दुल्हन लगी झूमने इक दिशा
रंग सिन्दूर के भर गये साध में

प्राप्ति से भर लबालब छलकने लगी
चाहना की बढ़ाई हुई आंजुरी
कामना बून्द की थी, मिली प्रीत से
बादलों के भरे कोष की गागरी
दूरियाँ गीत गाने मिलन के लगीं
अपने अस्तित्व की आहुति होम कर
दॄष्टि के कक्ष में बन्द होकर मिलन
जगमगाया सितारा बना व्योम पर

आज अँगनाई भी लग पड़ी झूमने
गंध पीकर छुपी संदली गात में.

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...