कितने दीप जले सुधियों कर

कल संध्या जब पंडितजी ने अञ्जुरी में गंगाजल डाला
सच बतलाना उस पल मन में कितने दीप जले सुधियों के

सम्भव है लहराये होगे पलको के पर्दे पर कितने
चित्र एक ​अ​लसाई संध्या के जो कैनवास पर उभरे
और क​समसाये होंगे वे हिना रंगी उंगली के बूटे
जो उस पल पल्लू की गुत्थी के व्यूहों में जा थे ठहरे

और गुदगुदाई होंगी वे चुहलें जो की थी सखियों ने
सच बतलाना उस पल मन मे कितने दीप जले सुधियों के

यज्ञ कुंड की अग्नि शिखा के साथ साथ नर्तित होते वे
सपने जो थे परे कल्पना की सीमा के, उससे पहले
स्पर्श अजनबी सा आहुति के लिए ​थाम  कर​ उँगलियों  को
तारतम्य में रहा बांधता असमंजस के सब पल फैले

निश्चित मुझको खुलते ​होंगे  कोष तुम्हारी कुछ स्मृतियों के
सच बतलाना उस पल मन मे कितने दीप जले सुधियों के

मंत्रपूरिता जल से भीगी हुई हथेली सिहरी थी जब
कमल पखुरियों ने खीं​ची थी रेखाएं ​नूतन सपनों की
नयनो ने मद भरे पलो के आगत का आजा था काजल
सुरभि संजोई  सौगंधों ने अधरों पर थिरके वचनों की

नये पंथ पर पगतालियो को जब सहलाया था कलियों ने
सच बतलाना उस पल मन में कितने दीप जले सुधियों के

अनायास ही गीत बुन गये


मैने चाहा नहीं लिखूं मैं कभी गज़ल या कविता कोई
शब्द स्वयं ही मुझ तक आये, अनायास ही गीत बुन गये

मैं अनजान काव्य के नियमों से, छन्दों की परिभाषा से
बहर काफ़िये औ रदीफ़ की मेरे शब्द कोश से दूरी
नहीं व्याकरण की गलियों का पता मिला मुझको नक्शे मे
 दोहे,चौपाइ ​कवित्त से, मिली नहीं मुझको मंजूरी

फिर भी भाव भटकते आय्र अनजाने मेरी देहरी पर
और सफ़र में पग धरने को मेरा आकर साथ चुन गये

लय गति और मात्राओं की गिनती मुझको तनिक ना आई
छन्द भेद की सारिणियों का मुझको कोई ज्ञान नहीं है
कहां अन्तरा रुकता, होती कहाँ वाक्य की पुनरावृत्तियां
इनका भेद किस तरह जानूँ, ये मुझको अनुमान नहीं है

 जितनी बार कंठ की खिड़की से बाहर ​मेरे स्वर झांके
सरगम ने चूमा फ़िर लय के साथ सजा कत उन्हे सुन गये

मन अम्बर में भाव विचरते रहते बिना किसी अंकुश में
बांधा करती है शब्दों की डोरी कोई कलाकार की
मेरी झोली रही कृपण ही शब्दों से भी भावों से भी
और कभी संप्रेषणता सेहो न सकासाक्षात्कार भी

यों बस हुआ शब्द जितने भी चढ़े भाव के करघे पर आ
थे चाहे अनगढ़ लेकिन सब किसी छन्द की राह धुन गये

फूल सूखे किताबों में मिलते नहीं


शैल्फ में ही रखी पुस्तकें रह गईउंगलियां छू के अब पृष्ठ खुलते नहीं 
आज करने शिकायत लगी है हवाफूल सूखे किताबों में मिलते नहीं 

वे ज़माने हुए अजनबी आज जबसाँझ तन्हा  सितारों से बातें करे
 इत्र में भीगे रूमाल से गंध उड़ याद की वीथियों में निरंतर झरे 
दॄष्टि  की कूचियों से नयन कैनवस पर उकेरे कोई चित्र आकर नया 
मौन की स्याहियाँ ले कलम पगनखीभूमि पर अपने हस्ताक्षरों को करे 

ढूँढती है नजर भोर से सांझ तककोई चूनर कही भी लहरती नहीं
ना ही शाने से रह रह फ़िसलते हुयेउंगलियों पे वे पल्लू लिपटते नहीं

कुन्तलों की रहा अलगनी पे टँगा फूल मुस्का रहा था गई  शाम से
मोगरे का महकता हुआ बांकपन भेजता था निमंत्रण कोई नाम ले
कंगनों में उलझती रही वेणियां  आज की है नहींबात कल की रही
लग रहे चित्र सार ​महज  अजनबीदूर इतने हुये याद के गांव से

तोड़ कर रख लिए एक गुलदान मेंमेज की शोभा चाहे बने चार दिन
कल के टूटे हुए फूल वासी हुएदेव के शीश पर जाके सजते नहीं 

​दॄष्टि उठ कर झुके फिर से  गिर कर उठे और कहती रहे शब्द बिन बात को 
देह के नभ पे बिखरे हुए हों चिकुर, नित्य लज्जित करें मावसी रात को 
कितनी नदियों के उठ कर चले हों भंवर, चाह लेकर समाहित हों त्रिवली में आ 
गंध पूरबाइयों से झरे आतुरा थामने के लिए संदली हाथ को

चित्र नयनों के ये है दिवास्वप्न जो  भोर आने तलक 
​तो
 ठहरते नही
कल्पना के वि
​हग 
फड़फड़ाते हुए आज के 
​व्योम पर ​
आ विचरते नहीं 

दिये जलाकर ढूंढ रहे

तमस राह में
दिया जला कर
ढूंढ रहै तकदीर
जिन हाथो में
शेष न कोई
बाकी रही लकीर

कबिरा की 
​विकलांग ​ लुकाठी
 हाथों में थामें 
सांस भिखारिन उस
द्वारे पर
आ भिक्षा मांगे

जिस द्वारे पर
पंक्ति बना कर
सत्तर खड़े फ़कीर

बिना सुई की
घड़ियां पहने
इठलाती दीवार
टिका हुआ है
कैलेंडर सा
परसों का अखबार

​खबर छपी कल
​लुटने वाली
धड़कन की जागीर 

​रही रिक्त 
सन्देश बिना 
इक काँधे की झोली 
सूनी  छत पर
कोई चिरैय्या 
आकर न बोली 

लक्ष्मण रेखा 
खींच खड़ा खुद 
जमनाजी का तीर  ​


कितनी बार जलाए

  कितनी बार जलाए हमने अपनी आशाओं के दीपक   सोचे बिना तिमिर का खुद ही हमने ओढ़ा हुआ आवरण   कल की धूप बनाएगी अपने आँगन में रांगोली ...