लेकिन सम्भव नहीं

बात तुम्हारी आज मानकर लिख तो दूँ मैं एक कहानी
लेकिन सम्भव नहीं अधूरे पल सब, इसमें समा सकेंगे

जीवन के इस रंगमंच पर आधी प्रस्तुत हुई कहानी
रही पटकथा और कथानक और सभी संवाद अधूरे
वक्त मदारी बना खड़ा था मुख्य पात्र बन रंगमंच का
और रहे हम सदा पार्श्व में हाँ हाँ करते हुये जम्हूरे

बात तुम्हारी आज मान कर कर तो दूँ मैं पूर्ण पटकथा
लेकिन सम्भव नहीं पार्श्व के पात्र कथानक निभा सकेंगे

इस जीवन की ब्रह्लवेल का पाँव जला मंत्रित दीपों से
दोपहरी फैलाया करती अंगनाइ में लाकर मरुथल
असमंजस में रही डूबती उतराती संध्या सुरमाई
और अधखुली आँखो से थी निशा बहाती रहती काजल

बात तुम्हारी आज मान कर तो दूँ श्रन्गार सभी का
लेकिन सम्भव नहीं हाथ की रेखा ये सब मिटा सकेंगे

वही पिघल कर वे रातें जो स्वाद उजाले का देती थीं
दुर्गम राहे सोख चुकी हैं तरल स्वप्न सब अंजलियों के
टुकड़े टुकड़े गिरी चाँदनी से गीला करते अधरो को
ठोकर खाते हुए मुसाफ़िर हम है पथरीली गलियों के

बात तुम्हारी आज मान कर अपनी डगर बदल तो लूँ मैं
लेकिन सम्भव नहीं फूल फिर चिह्न मील के उगा सकेंगे

देती भू पर मोती बिखेर

वह पुण्य शुभम स्वर्णिम काया
दे ओस कणों से, कदम बढ़ा
उगते शत पुष्प पंथ पर, वह
भू पर देती मोटी बिखेर

जब उगी भोर के विहग  वृंद
नभ पर अपने पर फैलाते
तब खोल क्षितिज के वातायन
गंधर्व नए सुर में गाते
सलिला की चपल लहरियों पर
बिखरें सोने के आभूषण
सहसा ही सरस सरस जाता
मन की वादी में वृंदावन

पारे की गतियाँ तरल लिए
बिखरी पर्वत पर, घाटी में
जिस ओर मुड़ी चलते चलते
देती रांगोली नव उकेर

भंगिमा नयन की जिधर मुड़े
लेती बहार आ अंगड़ाई
छेड़ा करता है पतझर भी
बस इक इंगित पर शहनाई
पूर्व,  पछुआ दक्किन, उत्तर
नाचे पैजानियाँ झंक़ा कर
जब करती एक इशारा वो
अपने कंगन को खनका कर

लहरातो धानी चूनर की
तूलिका उठाए हाथों में
वो खुले गगन के कैनवास पर
देती इंद्रधनुष चितेर्र

विधना के कर का प्रथम शिल्प
कल्पना भाव का वह संयोग
सम्पूर्ण अनंताकाशों पर
उसके जैसा न कहीं योग
वह रूप बदलती है पल पल
परिधान ओढ़ कर नए नए
वह प्रकृति एक है सुंदरतम
भारती सात्विकता हिए हिये

अंतरप्राणों की खोल दृष्टि
आयाम बिछाकर अंतहीन
वह शून्य तिमिर की वादी में
देती शत शत सूरज उजेर







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जो खुला आकाश

जो खुला आकाश स्वर में है तुम्हारे ओ बटोही
देखना उस पर घिरें ना आ कहासे संशयों के

उग रहे कितने प्रभंजन हर दिशा की वीथियों में
राजनीति. धर्म, भाषा, जाती की चादर लपेटे
चक्रवातों से, उमड़ कर चाहते अस्तित्व घेरें
हो रहे आतुर , बवंडर साथ में अपने लपेटे

आज के इस दौर में स्वाधीन स्वर सुनता न कोई
सोच यह, पड़ने न देना अक्स अपने निश्चयों पे

जो खुला आकाश स्वर में है, धारा पर गूंजता है
सरगामे बारादरी पर हो खड़ी पथ को निहारें
एक उठती गूंज अद्भुत खुल रहे स्वर में बटोही
साथ उसके भाव के पाखी उड़ें बन कर क़तारें

लालसाएँ व्यूह रच कर दे रही आवाज़ तुमको
भेदना तुम जाल उनके नयन लेकर संजयों के 

ज़िंदगी है हमसफ़र दरवेश बन कर ओ बटोही
राह में गतिमान रहना है नियति उसकी तुम्हारी 
दूर रह कर बन्धनो से तुम रहो स्वच्छंद  नभ में 
फिर समय की चॉसरों पर जीत हो हर पल तुम्हारी 

ये खुला स्वर जो खुले आकाश में गुंजित रहा है 
वह उभरता नित रहेगा, साज में से निर्भयो के 

राकेश खंडेलवाल 

,





जाल सन्नाटे निरंतर बुन रहे हैं

सभ्यता के कौन से इस मोड़ पर है आ खड़े हम
बढ़ रही यूँ भीड़, काँधे हर कदम पर छिल रहे है
कान तो बंधक हमारे हेडफ़ोनो की जकड़ में
होंठ हैं चुप, जाल सन्नाटे निरंतर बुन रहे हैं

रीतियाँ अब संस्कृतियों की उपेक्षित हो रही हैं
रह गए सम्बंध सीमित कुंजियों की खटखटों पर
कोई भी त्योहार हो या पर्व हो वार्षिक दिवस का
आश्रित हो कर खड़े सब वहाट्सेप्प की चौखटों पर

खा चुके हैं ठोकरें जिन पत्थरों से राह में हम
पथ हमें फिर से दिखाने को उन्ही को चुन रहे हैं

अजनबियत की घटाए ओढ़ बैठी हैं दिशाएँ 
आइने के बिम्ब। ही पहचान में आते नहीं है
भोर की आ अलगानी पर बैठते जितने पखेरू
देखते हैं प्रश्न लेकर , कोई सुर गाते नहीं है

सोच बिन छीना हमीं ने कंठ स्वर कल पाखियों के
आज इनको मौन पाकर, हम सरों को धुन रहे हैं

उग रहे कितने प्रभंजन भेजते हम ही निमंत्रण
राह को झंझाएँ कितनी द्वार तक आकर। बुहारें
स्वार्थ की लिप्साओं में लिपटे हुए एकाक्षी हम
एक ही प्रतिबिम्ब अपना सिर्फ, दृश्यों में निहारें 

भेजती चेतावनी नित, भोर, संध्या और दुपहरी 
पर पलक को मूँद कर हम, कब कहाँ कुछ सुन रहे हैं 

वहीं जाकर माना लेंगे

  चले ये सोच कर भारत, वहाँ छुट्टी मना लेंगे
पुरानी याद जो छूटी हैं गलियों में उठा लेंगे

वहाँ पर पाँव रखते ही नयन के स्वप्न सब टूटे
जो कल परसों की छवियाँ थी सभी इतिहास में खोई
कहीं दिखता न पअपनापन उमड़ती बेरुख़ी हर सू
नई इक सभ्यता के तरजुमे में हर ख़ुशी खोई

वो होली हो दिवाली हो , कहें हैप्पी मना लेंगे
मिलेंगे वहात्सेप्प संदेश तो आगे बढ़ा देंगे

कहीं भी गाँव क़सबे में ,न परचूनी दुकानों पर
खिलौने खाँड़ वाले साथ बचपन के ,नहीं दिखते
न  पूए हैं मलाई के ,न ताजा ही इमारती हैं
जिधर देखा मिठाई के चिने डिब्बे ही बस सजते

यहाँ जो मिल रहा उसको वहीं फ्रिज से उठा लेंगे
चलें मन हम ये दीवाली  जा अपने घर  मना लेंगे

हमारे पास हैं मूरत महा लक्ष्मी गजानन की
घिसेंगे सिल पे हम चंदन, सज़ा कर फूल अक्षत भी
बना लेंगे वहीं पूरी कचौड़ी और हम गुझिया
बुला कर इष्ट मित्रों को  मनेगी  अपनी दिवाली

पुरानी रीतियाँ को हम पुनः अपनी निभा लेंगे
उजालों के लिए मिट्टी के फिर दीये तलाशेंगे
पुराने बाक्स से लेकर उन्हें फिर से जला लेंगेवही

उजालों के लिए मिट्टी के फिर दीये तलाशेंगे

कभी संध्या में जलते हैं किसी की याद के दीपक
कभी  विरहा में जलते हैं किसी के नाम के दीपक
कभी राहों के खंडहर में कभी इक भग्न मंदिर में
कोई आकर जला जाता किशन के राम के दीपक 
मगर जो राज राहों पर घिरे बादल अँधेरे के 
कोई भी  रख नहीं पाता उजाले को कोई दीपक 
चलो निश्चित करें हम आज, गहरा तम मिटा देंगे 
उजालों के लिए मिट्टी के फिर दीये तलाशेंगे 

जले हैं कुमकमे अनगिन कहीं  बुर्जों  मूँडेरो पर
उधारी रोशनी लेकर, जली जो कर्ज ले ले कर  
कहीं से बल्ब आए हैं कहीं से ऊर्जा आई 
चुकाई क़ीमतें जितनी बहुत ज्यादा  हैं दुखदाई 
किसे मालूम लड़ पाएँ ये कितनी देर तक तम से
टिके बैसाखियों पर बोझ ये कितना उठा लेंगे
चलें लौटें जड़ों की ओर, हमें विश्वास है जिन पर
उजालों के लिए मिट्टी के फिर दीये तलाशेंगे

बहत्तर वर्ष बीते हैं मनाते यूं ही दीवाली 
न खीलें हैं बताशे हैं रही फिर जेब भी खाली 
कहानी फिर सूनी वो ही, कि कल आ जाएगी लक्ष्मी 
बसन्ती दूज फिर होगी सुनहरे रंग की नवमी  
सजेगा रूप चौदस को, त्रयोदश लाए आभूषण 
खनकते पायलों - कंगन के सपने कितने पालेंगे 
चलें बस लौट घर अपने, वहीँ बीतेंगे अपने दिन 
उजाले के लिए मिट्टी के फिर दीपक जला लेंगे 

राकेश खंडेलवाल 



फिर दीपक जला लेंगे

करेंगे मेजवानी कब तलक छाए अंधेरों की
भला कब रूढ़ियों के चक्र से ख़ुद को निकालेंगे
भले ही भूल बैठा हो दिशा इस ओर की सूरज
उजालों के लिए मिट्टी के फिर दीये तलाशेंगे

नए फिर थाम  कर निश्चय कमर कस कर के तत्पर हो
नए संकल्प हम लेकर बना लेंगे दिशा अपनी
नहीं है शेष आशा की अपेक्षा हुक्मरानों से
हुए जो खोखले वायदे न बनते नींव सपनों की

नए निश्चयहमारे हैं नयीं राहें बना लेंगे
उजालों के लिए मिट्टी का फिर दीपक जला लेंगे

सहारा ढूँढने की जो हमें अब तक बिमारी ही
उसी को तो भुनाते हैं हमारे ही चुने शासक
शिकायत, हाथ फैलाना, कोई दे दे मदद हमको
हमारी उन्नति  में हो गया सबसे  बड़ा बाधक

अगर हम तोड़ कर रेखा, क़दम अपने बढ़ा लेंगे
उजाले तब स्वयं आकर हमारा पथ सज़ा देंगे

बहुत दिन हो चुके, इक नींद में संवाद सेवा थी
उठी अँगड़ाइयाँ लेकर अमावस के अंधेरों में
अगर ये व्यस्तताओं का कलेवर जो तनिक उतरे
 नहीं फिर देर लग पाए,  नए  उगते सवेरों में

यहाँ आ गीत-ग़ज़लें नित नई शमअ जला लेंगे
उजालों के लिए मिट्टी के फिर दीये तलाशेंगे।




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आज तुम मुझको जगाकर जगमगाओ


खो गया  हूँ धुँध से घिर कर अंधेरों के शहर में
दीप मेरे आज तुम मुझको जगा कर जगमगाओ

सूर्य तो बंदी हुआ है राजमहली तलघरों में
औरकिरणो की गति पर लग रहे पहरे निरंतर

हम बहलते रह गए है देख कर बस चित्र धुंधले
आइनों पर धूल की परतें जमी है इंचियों भर

प्रार्थना में हुआ रत मन माँगता प्रतिदान इतना
इन अंधेरों से मुझे अब मुक्ति थोड़ी तो दिलाओ

पार तक बिखरी क्षितिज के अब तिमिर की राजधानी
कोई भी सम्भावना अब रोशनी की दिख न पातीं
कब तलक देंगे दिलासा है अँधेरा रात भर का
रात ढलने की कोई सूरत नजर में आ न पाती 

तुम अमावस की निशा से लड़ रहे दीपक अकेले
मैं तुम्हारा साथ दूँगा आओ पग से पग मिलाओ 

एक तुम पर ही टिकी है आस्था परिवर्तनों की
युद्ध में तुमसे पराजित हो हटेंगे यह अंधेरे
मैं उठा संकल्प नूतन साथ चलता हूँ तुम्हारे
हम बुला कर लाएँगे इस ओर फिर खिलते सवेरे

दीप मेरे जोड़ तुमसे मैं नई संभावनायें
हो रहा तत्पर चलो अब इक नए दिन को बुलाओ 

राकेश खंडेलवाल 












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आज उतरा है धरा पर


आज उतरा है धरा पर अवतरित जो रूप होकर
मेनका भी उर्वशी भी देख कर हैरान होते

चाँदनी की झील से उभरा हुआ यह संदली तन
पाँव  में रचती ​म​हावर ला​लि​माएँ आ उषा की
गंध के बादल उड़ाती  कुन्तलों की एक थिरकन
नैन की परछाइयों से कालिमा सजती निशा की

मदभरी इक​ दॄष्टि  के इंगित-भ्रमों  का स्पर्श पाकर
इंद्र​ ​के मधु के कलश भी  ​मुंह ​ छुपा हलकान होते

विश्व​कर्मा ​के सपन की एक छवि जो हाथ में ले
कूँचियाँ, उसने ज​तन ​ से शिल्प में जैसे चितेरी
​रंग​पट्टों के ख़ज़ाने खोल कर अपने समूचे
विश्व की सम्मोहिनी ले एक प्रतिमा में उँडे​री ​

देवता, गंधर्व, किन्नर और मानव, ऋषि मुनि सब
एकटक बस देखते है , देखकर हैरान होते

पाँव को छू पंथ की भी धूल में आ फूल खिलते
पड़ रही परछायों से सैकड़ों ​सँवरी अजंता
ओस में निखरे ​हुये ​प्रतिबिम्ब से बँनती एलोरा
और ​तन ​की कांति छूकर स्वर्ण का पर्वत पिघलता

देख कर सौंदर्य का यह रूप अद्भुत और अलौकिक
शायरों के होंठ पर हर पल नए दीवान होते

प्यार के पट खोलता है

मोड़ यह वयसंधियों का प्यार के पट खोलता है
और यह मन आँधियों में पात जैसा डोलता है 

आँजते  दोनो नयन ये इंद्रधानुशी स्वप्न  प्रतिपल
बाँसुरी की धुन निरंतर गूँजती अंगनाइयो मे
मौसमों  की जल तरंगे छेडते है तार मन के 
इक नई ही धुन सँवरती रागमय  शहनाइयों में

औ शिराओं में कोई ला शिंजिनी सी घोलता है 
मोड़ इक वयसंधियों का प्यार के पट खोलता है 

भोर उगती नित जगाती कुछ नई सम्भावनाएँ 
पतझरी ऋत भी बहारों के सरीखी झूमती है
काँच के रंगीन परदे पर संवरते चित्र पल पल 
आसमानों में विचारती आस मन को चूमती है 

आज का सच,शून्य होकर ही सभी कुछ बोलता है 
और यह मन आँधियों में पात बन कर डोलता है 

सेलफ़ोनी चित्रपट अटकाए रहता है निगाहें
आतुरामन हो प्रतीक्षित ताकता संदेश का पथ
कोई स्वर उठता; लगे सारंगियाँ जैसे बजीं हों 
गूँजने लगती ह्रदय में पायलों की झनझनाहट

यूँ लगे जैसे समय की चाल कोई रोकता है 
मोड़ इक वयसंधियों कप्यार के पट खोलता है 

राकेश खंडेलवाल 
१४ सितम्बर २०१९ 






स्वर मिला स्वर में तुम्हारे





रीतियाँ के अनुसरण में मंदिरो में सर झुकाया
यज्ञ कर कर देवता को आहुति हर दिन चढ़ाई
आर्चना के मंत्रस्वर में  साथ भी देते रहा मैं
पर समूची साधना भी साथ पलभर को न। आइ

मैं व्यथा की इस कथा को भूल  जाना चाहता हूँ
स्वर मिला स्वर में तुम्हारे गीत गाना चाहता हूँ

भोर की अँगड़ाइयों में पाखियों ने गीत गाए
साथ उनकी सरगमों का हर सुबह मैंने निभाया
मैं रहा वंचित सदा हर एक  युग की करवटों पर
कॄष्ण का इतिहास पूरा व्यास के सुर में सुनाया

वाल्मीकी के रचे श्लोक में गुन्जित हुआ में
स्वर मिला स्वर में तुम्हारे अर्थ पाना चाहता हूँ

घाट पर वाराणसी के घुल गया तुलसी स्वरों में
इक कथानक छंद में चौपाई में मैंने सुनाया
सूर के स्वर में मिला इक तार के आरोंह चढ़कर
फिर उतर अवरोह में मैंने निरंतर गीत गाया

एक पल के भी लिए  पर तुष्टि के क्षण मिल न पाए
स्वर मिला स्वर  में  तुम्हारे तृप्ति पाना चाहता हूँ

स्वर मिलाया था कभी दावानलो के तीक्षण स्वर से
और इक हुंकार से दिनकर अधर से  जो उठी  थी
तो कभी स्वर को मिलाया पार्थ सारथि के स्वरों से
सहज ही जिनसे प्रवाहित एक दिन गीता हुई थी

आज सब कुछ छोड़ पीछे, मौन की चादर लपेटे
स्वर मिला निस्तब्धता में मौन रहना चाहता हूँ

बूँद भर जल

बूँद भर जल बन गया आशीष, तेरा स्पर्श पाकर
चल दिया मैं आचमन कर तेरी स्तुतियाँ की डगर पर

मैं अजाना था कहाँ पर शब्द की जागीर फैली
और स्वर की सरग़मों की वीथियों की क्या दिशाये
दूर तक कोई नहीं था जो मुझे  निर्देश  देता
किस तरह से शब्द चुन कर राग में उनको सजायें

बूँद भर जल बन गया शतदल कमल के पत्र से झर
एक वह पथ का प्रदर्शक जो दिशा करता उजागर

स्वाति के नक्षत्र की इक बूँद का जल बन गया था
भिन्न गुण वाला परिस्थिति साथ जैसी मिल गई थी
उड़ गया कार्पूर बन कर याकि मोती बन गया था
हो गया विष जब कि संगत शेषनागी  हो गई थी

किंतु तेरी वीण के इक तार की झंकार छू कर
ज्ञान का भंडार होकर छा गया पूरे जगत पर

बूँद भर जल मेघगृह में जा हुआ है शत सहस्त्रित
और फिर बरखा बना है भूमि की तृष्णा बुझाने
ईश का वरदान बन कर जब सज़ा नत भाल पर तो
कालिदासों के मुखों से लग गया कविता बहाने


बूँद भर जल बह शिरा में ज़िंदगी को प्राण देता 
और संभव कर रहा हम गीत गायें गुनगुनाकर 

कल जहाँ से लौट कर

 कल जहाँ से लौट कर हम आ गए सब कुछ भुला कर
आज फिर से याद की वे पुस्तकें खुलने लगी हैं 

फिर लगी है तैरने इस साँझ में धुन बाँसुरी की 
भग्न मंदिर में जला कर रख गया है दीप कोई 
पनघटोंकी राह पर झंकारती है पैंजनी फिर 
पीपलों की छाँह में फिर जागती चौपाल सोई

कल जहाँ से लौट कर हम आ गए, सूनी  कुटी वह
गूँजते शहनाई स्वर के साथ फिर सजने लगी है 

भोर में नदिय किनारे सूर्य वंदन आज फिर से 
और फिर तैरे प्रभाती गीत कुछ बहती हवा में 
गुरुकुलों का शंखवादन जो अपरिचित हो गया था 
खींचता नूतन सिरे से चंचलता मन आस्था में 

कल जहाँ पर बह रही थी रात दिन पछुआ निरंतर 
आज फिर पूरबाइ की मद्दम गति बहने लगी है 

कल जहाँ से लौट आए गीत लेकर के निराशा 
मंच पर बैठे विदूषक, हाथ में कासा सम्भाले
आज फिर से छा रही हैं संस्कृतियाँ मेघदूती 
काव्य में में आने लगे, साकेत दिनकर के हवाले 

कल जहाँ पर राग -सरगम मुँह ढक कर सो गए थे
आज रंगीनियाँ वही पर निशिदिवस बजने लगी है  

एक उजली शाम के भटकाव में

खो चुके पहचान हम अपनी यहाँ
एक उजली शाम के भटकाव में
ढूँढते कुछ पल मिलें अपने कहीं
व्यस्तताओं के बढ़े सैलाब में

भोर ने प्राची रंगी हर रोज ही 
हम घिरे इक दायरे में रह गए
जो दिवस ने ला थमाए थे प्रहर
हाथ से फिसले कही पर बह गए 
आँख में आकर निशा थी आँजती
इक सुनहरे स्वप्न की परछाइयाँ 
किंतु चढ़ते रात की कुछ सीढिया
वे सभी टूटे बिखर कर ढह गए 

जानते थे मरूथली आभास है 
किंतु तृष्णा के रहे बहकाव में 

हर दिशा में राह स्वागत में बिछी
मंज़िलो तक साथ जाने के लिए
और निश्चय था प्रतीक्षज में खड़ा 
जो ग़हें हम ध्येय पाने के लिय
राज पर हमने चुनी विपरीत हो
दाक्षयरे में एक थी चलती रही
इसलिए ही आस की का पियाँ सभी
बिन खिले ही सूख कर झरती रहीं 

और हम बस सूत्र इक थे खोजते 
चाहना के इस घने बिखराव में  

तितलियों के पंख की परछाइयाँ
पंखरी  पर ओस सी गिरती रहीं
गंध की उमड़ी हुई कुछ बदलियन
सामने आ ताक पर अटकी रही 
पर हमारी दृष्टि के आकाश का 
मरुथली भ्रमजाल ही सीमांत था
ध्यान उस पर दे नहीं पाए  कभी
जो सहज उपलब्ध अपने पास था 

पांडुलिपियां रह  गई थी अनखुली 
अर्थ बस ढूँढा किए अनुवाद में 

सब अधूरे ही रहे  ईजिल  टंगे 
कैनवस पर चित्र जितने भी बने
चाह जिनकी थी, दिखा पाए नहीं 
जो लगे दीवार पर थे आईने
हम स्वयं दोषी हमें मालूम था 
किन्तु साहस था नहीं, स्वीकारते
चाह थी हर बार चूमे जयश्री 
इसलिए ही रह गए हम हारते 

चाहना थी गुम्बदों पर जा चढ़ें 
और बस अटके रहे मेहराब में 

 

दृष्टि में हर शाम

दृष्टि में हर शाम उभरी एक ही छवि वह मनोहर
एक दिन जो मोड़ पर वयसंधि के सहसा मिली  थी 

गा उठी थी कोकिले तब पतझरी अमराइयों में
और मन की क्यारियों में फूल अनगिनती खिले थे
रह रहे थे दृश्य जो छाए धुँधलके में लिपट कर
चीर  कर सारा कुहासा सामने खुल कर मिले थे

याद उस पल की बनी है शिल्प मन की वीथियों में
जब कुमुदिनी ले क़ेतकी को बिन ऋतु के ही खिली थी 

कर चुकी है उम्र कितनी दूरियाँ तय इस सफ़र में 
परिचयों की सूचियों में नाम कितने जुड़ गए हैं
दृष्टि में हर शाम आता सामने वह नाम केवल
पृष्ठ मन की पुस्तकों के एक जिस पर मुड़ गए हैं 

लौट कर जाता निरंतर  मन समुद्री पंछियों सा 
उस जगह पर याक ब यक मंजुल मिली thi

दृष्टि में हर शाम खुलते पट उन्ही वातायनों के
पार जिनके पुष्पधनवा के शैरन के रंग बिखरे
रंग गई थी ओढ़ जिनको वादियों की सब दिशाएँ
और नव शृंगार के पल थे जहाँ पर झूम सँवरे

गगन घिर आता क्षितिज तक राजहँसों के परों से 
ताजमहली शिल्प की परछाइयाँ  जैसे मिली थीं 

इस उजड़ते हुये गाँव से


आज इक और राही निकल कर चला उम्र के इस उजड़ते हुये गाँव से 
हो चले चिह्न सारे बनेधूमिली कल तलक जिनको छोड़ा हुआ पाँव ने 


जो चुनी उसने राहेंगई शून्य को कोई भी लौट कर के नहीं आ सका 
है ये उद्गम या फिर अंत हैराह का कोई इसका पता भी नहीं पा सका 
जाते जाते समेटे हैं जो फूल वे हैं लपेटे हुए ग़म कि या फिर ख़ुशी 
हर कोई घिर के असमंजसों में रहा सत्य क्या है समझ में नहीं आ सका 


इस सफ़र में बिछी चौसरे हर तरफ़हार निश्चित सदा ही लगे दाँव पे 
और घाटा ही घाटा ही हासिल रहा उम्र के इस उजड़ते हुए गाँव से 


हर दिवस ने सजाया था पाथेय नव,इंद्रधनुषी सपन आँख में आँजते
साँझ के नीड़ से पूर्व ही था चुका हर क़दम पर गिरा कोष से भागते 
हाथ में एक कासा थमा माँगता था अपेक्षायें हर इक खुले द्वार से 
और धागों में आशा पिरोए हुए रोज दरगाह में जा उन्हें टाँगते

सूर्य की तपतपी  साथ में ही रही कितना बैठे था जा पेड़ की छांव में 
किन्तु विश्रान्ति के पल नहीं मिल सके, उम्र के इस उजडते हुये गाँव में

छोड़ जाते रहे लोग इस गाँव से और बढ़ती रही पीर दिल में घनी 
हाथ के पाँव के बढ़ते शैथिल्य से निश्चयों की  हुई और कुछ तनतनी
मध्य में द्रश्य के और बीनाई के अवणिकाएँ नई नित्य गिरने लगी 
और अपनातव की गंध वाले क्षणों से  बढ़ गई और ज़्यादा हुई दुश्मनी

चल दिया जो निकल, वो न राही रुका, कोई ज़ंजीर बाँध न सकी पाँव से 
छोड़ जाते रहे एक के बाद इक उम्र के इस उजड़ने हुए गाँव से 

शब्द के गजरे बनाकर


  सुनयने फूल गूँथे वेणियो में सज रही तुम
आओ मैं कुन्तल सँवारूँ शब्द के गजरे बनाकर

आज तक तुमने संवारे पुष्प लेकर चिकुर अपने 
मोतिया, बेला, चमेली और हरश्रृंगार चुन कर 
मैं पिरो दूँ  गंध के गुलदान से चुन कल्पना  के 
खुल  रहे आयाम नूतन डोरियों में आज ​बट कर 

संदली शाखायें झूमें नृत्य में तब छमछमाकर 
आज मैं कुंतल संवारूँ शब्द के गजरे बना कर 

पारिजाती हो हवाए रंग ले कचनार वाले
बन ​अलक्तक  रक्त वर्णी पाँव रचती हैं तुम्हारे 
अर्ध विकसित बूटियाँ अंगदाइयाँ लेते , हिना की 
मुस्कुराती हैं अरुण रंग हो ,​​​​ हथेली में तुम्हारे 

मैं रखूँ ला हस्त-पग में , रक्त शतदल  पत्र लाकर
आओ मैं कुन्तल सँवारूँ शब्द के  गजरे  बनाकर 

​ओ  सुमुखि है फूल की तो उम्र केवल एक दिन की 
और बिखरी कुछ दिनों ही रूप की भी ज्योत्सनाए 
शब्द के शृंगार शाश्वत हो, रहे हर एक युग में
ये बताती आइँ हमको ग्रंथ में वर्णित  कथाएँ 

मैं करूँ शृंगार गहने शब्द के नूतन सजाकर
और तुम वेणी सँवारो शब्द के गजरे लगाकर 

तमस से लड़ रहा है

ओ पथिक विश्वास वह लेकर चलो अपनी डगर पर साथ में जिसको लिए दीपक तमस   से लड़ रहा है ज़िंदगी के इस सफ़र में मंज़िलें निश्चित   नहीं है एक ...