पलकों पर किसे बिठाऊँ मैं

तुम तो बसी हुई सांसों में सहचर हो धड़कन की मेरी
शतरूपे फ़िर सपनों की पलकों पर किसे बिठाऊँ मैं

एक प्रतीक्षा पलक बिछाये रहती है लम्बी राहों पर 
चरण पुष्प की खिली पांखुरी हौले से आकर के छू ले
कनक तुली काया से झरते गन्धों के झरने में भीगे
मादकता से ओत प्रोत झोंकों में लेते पैंगे झूले

गिरती हुई ओस सी पग की आहट के मद्दम सुर लेकर
राग तुम्हारा मिले तभी फिर गीत बना कर गाऊँ मैं

नभ में उड़ते पाखी लाते सन्देसे केवक वे ही जो
पाकर  के आभास तुम्हारा अनायास ही संवर गये हैं
मेघदूत कलसी में भरकर ढुलकाता है सुधा कणों को
जोकि तुम्हारे कुन्तल की अलगनियों पर से बिखर गये हैं

तन की द्युतियाँ, मन की गतियाँ बन्दी होकर रहीं तुम्हारी
कलासाधिके , पृष्ठ खोल दो तो संभव पढ़ पाऊँ मैं

करवट लेकर आंख खोलती प्राची  के आंगन में किरणें
और पखारें अपने मुख को ढलती हुई ज्योत्सनाओं में
उगता हैं तब चित्र तुम्हारा बिछे क्षितिज के कैनवास पर
साँझ  आँजने लग जाती हैं , तब से मीत तुम्हारे सपने

इन्द्रधनुष के रंग तुम्हारे  इक  इंगित के अनुयायी है 
बंधी हथेली तनिक खुले   तो चित्र कोई रंग पाऊँ  मैं 

जब खुली थी प्रथम, होंठ की पाँखुरी

नव ग्रहों ने किया आज गठजोड़ यूँ
सब के सब आज नौ  वर्ष में ढल गए
इक रजत पर्व की जो थी प्रतिमा सजी
उसमें आकर सभी एक संग  मिल  गए

फिर से इतिहास के पृष्ठ कुछ खुल गए
याद में सात रंगी उमंगें घिरी
फिर से जीवंत होने लगे वे निमिष
जब खुली थी प्रथम, होंठ की पाँखुरी
दृष्टी की रश्मियाँ थी रिसी ओट से
पार करते हुए कुछ अवनिकाओं को
तंत्रियों में बजी सरगमों की धुनें
साज करते हुए मन की धाराओं को

वह घड़ी जब हृदय से हृदय के सिरे
बिन प्रयासों के सहसा गले मिल गए
इक रजत पर्व की जो थी प्रतिमा सजीं
आज उसमें बरस पूर्ण  नौ  मिल गए

एक वह मोड़ जिस पर भटकती हुई
वीथियां दो अचानक निकट आ गई 
एक वह पल कि जिसमें समाहित हुई
प्रेम गाथाएं खुद को थी दुहरा गई
जो शची से पुरंदर का नाता रहा
उर्वशी से पुरू का था सम्बन्ध जो
एक पल में नया रूप धरते हुए 
सामने आ खड़ा अवतरित हो के वो 

झोंके बहती हवा के लिए गंध को
तन को मन को भिगोने को ज्यों तुल  गए
इक रजत पर्व की जो थी प्रतिमा सजीं
आज उसमें बरस पूर्ण  नौ  मिल गए

अग्नि के साक्ष्य में जो हुए थे ध्वनित 
मन्त्र के स्वर लगे आज फिर गूंजने 
शिल्प का एक, श्रृंगार आकर किया 
रूप की चमचमाती हुई धूप  ने 
स्वस्ति चिह्नित भरे जलकलश सामने 
एक चादर बना व्योम तारों भरी 
मन ने दुहराई फिर आज अनुबंध के
सत्य सौगंध की इक नै पंखुरी 

इक नए वर्ष की सज रही राह में 
कामना के सुमन और कुछ खिल गए
इक रजत पर्व की जो थी प्रतिमा सजीं
आज उसमें बरस पूर्ण  नौ  मिल गए  

खुली हवा की पगडंडी पर चलते हुये गन्ध के राही


पंक्ति बना कर शब्द अनगिनत होठों पर आ बस तो जाते
मन ये माने नहीं गीत हैं, सुर चाहे सज कर गाते हैं
 
सन्ध्या आ लिखने लगती है बीते दिन के इतिहासों को
दीप हजारों जल जाते हैं अर्जित पीड़ा की बाती के
अवरोघों के अवगुंठन में उलझ आह के सिसकी के सुर
सन्नाटे की प्रतिध्वनियों के रह जाते हैं साथी बन के
 
सीढ़ी पर धर पांव उतरती रजनी के पग की आहट पा
सोई हुई पीर के पाखी फ़िर से पंख फ़ड़फ़ड़ाते हैं
 
फ़ैली हुई हथेली असफ़ल रह जाती कुछ संचय कर ले
खुलती नहीं दृष्टि द्वारे पर लटकी आगल और साँकलें
अभिलाषा के वातायन पर जड़ी हुईं अनगिनत सलाखें
कर देती हैं पूर्ण असंभव नील गगन में जरा झाँक लें

खुली हवा की पगडंडी पर चलते हुए गंध के राही
कभी कभी तो जानबूझ कर अपनी गठरी खो जाते हैं

गीला करता आंजुरि को आ जब जब नव संकल्पों का जल
तब तब विधना की कलमों से रच जाते हैं नूतन अक्षर
आशाओं के चन्द्रमहल सब, सिन्धु तीर पर बालू वाले
एक घरोंदे जैसे पाकर परस लहर का रहे बिखर  कर

उलझी हुई हाथ की रेखाओं से नक्षत्रों के रिश्ते
जोड़ घटाने, भाग गुणित करने पर सुलझ नहीं पाते हैं

दीप दीपावली के सजें न सजें

दीप दीपावली के सजें न सजें
ये अंधेरे नहीं शेष रह पायेंगे
तुम जरा मुस्कुरा दो प्रिये एक पल
दीप अँगनाई में खुद ही जल जायेंगे

भोर नित ही उगाती रही सूर्य को
सांझ ढलते अंधेरा मगर आ घिरे
अनवरत चल रहे चक्र के आज तक
कोई भी थाम पाया नहीं है सिरे
आओ अब इक नई रीत को जन्म दें
फ़िर न रह पाये मावस अंधेरी यहाँ
मुस्कुराती रहे चाँदनी से सजी
दोपहर सी गली हो सजे नित जहाँ

नागिनी नृत्य से ये निशा के चिकुर
चाँद की रश्मियाँ बन सँवर जायेंगे
तुम जरा मुस्कुरा दो प्रिये एक पल
दीप अंगनाई में खुद ही जल जायेंगे

रोशनी की किरन एक पल न थकी
तम की सत्ताओं से युद्ध करते हुये
तम कुचलता हुआ सिर उठाता रहा
आदि से आज तक यूँ ही चलते हुये
आज रच लें नई नीतियां कर जतन 
जो अंधेरे का बाकी नहीं शेष हो
एक क्षण के लिये भी नहीं रुक सके
शंख से  गूँजकर अब जो जयघोष हो

ये तुम्हारे ही इंगित से संभव प्रिये
पृष्ठ इतिहास के सब बदल जायेंगे
तुम जरा मुस्कुरा दो प्रिये एक पल
दीप अंगनाई में खुद ही जल जायेंगे

कार्तिकी एक तिथि की प्रतीक्षा बिना
दीप के पर्व हर रोज मनता रहे
भोर दीपक जलाये जो कल आ यहाँ
काल के अंत तक यूँ ही जलता रहे
शब्दकोशों से मिट कर तिमिर अब रहे
आओ ऐसे प्रयासों को मिल कर करें
मिट्टियों के नहीं ज्ञान के दीप हम
देहरी पर हर इक ज़िन्दगी की धरें

आंजुरि में सजे आज  संकल्प तो
कुछ असंभव नहीं शेष रह पायेंगे
तुम जरा मुस्कुरा दो प्रिये एक पल
दीप अंगनाई में खुद ही जल जायेंगे

इक गीत नया होने को है

अलसाई सांझ ओढ़ लेती इन दिनों नया ही इक घूँघट
झरते पत्तों में धीमे से बोता रागिनियाँ वंशीवट
अभिसारित अभिलाषायें ले कह उठता है शरदीला पल
ये रात कहाँ सोने को है
इक गीत कोई होने को है.

आता है दूर कहीं गिरती बर्फीली फुहियों का ये  सुर 
सीढ़ी से नीचे उतर रही, पुरबाई के पग के नूपुर 
इनको लेकर के साथ चला आवारा मौसम का पटुवा 
सरगम लगता पोने को है
 इक गीत नया होने को है 

दिन सिकुड़ा सकुचा सिमटा सा ,निशि यौवन की ले अंगड़ाई 
शिंजिनियाँ घोल शिरा में दे, भुजपाशों की ये गरमाई 
पुष्पित शर लिए खड़ा धन्वा , इक  लक्ष्य भेद संधाने है 
अब ध्यान भंग होने को है 
इक गीत नया होने को है 

चंदियाई गोटे का जोड़ा, पहने रजनी की नवल वधू
हाथों की मेहँदी के बूटे, महकाते संदलिया खुशबू
नजरें उठ्ती हैं बार बार वापिस आती हैं पथ को छू
आतुर अपने गौने को है
------------------फ़िर कलम किस तरह मौन रहे
इक नया गीत होने को है.

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...