सिन्दूर से पुत पा सकूं अभिषेक कोई

रह गए सूने पुन: सारी दिशाओं के झरोखे
रश्मियों ने दी नहीं दस्तक कोई वातायनों पे
डोरियों ने बरगदों से लहर कर सन्देश भेजे
वे सिमट कर रह गए भटकी हवा के अंचलों पे
 
और मैं टूटी हुई इक साध के टुकडे उठाकर
दीप कोई जल सके ये कामनाएं कर रहा हूँ
 
झर  गए दिनमान सूखे, वर्ष की शाखाओं पर से
आगतों के झुनझुने के स्वर नहीं देते सुनाई
उड़  गई कर कोष रीता सावनी हर एक बदरी
आरसी की धुंध में छवियाँ संवरती जा समाई
 
और मैं सिन्दूर से पुत पा सकूं अभिषेक कोई
तरुतले पत्थर बना ये लालसाएं कर रहा हूँ
 
घुट रहीं मन में अपेक्षाएं हजारों  ढेर बन कर
फ़ड़फ़ड़ाने  के लिए भी पर कोई बाकी नहीं है
उम्र की बालू खिसकती मुट्ठियों में से समय की
दृष्टि में उपलव्धि कोई भी समा पाती नहीं है
 
जल चुकी है जो अगरबत्ती, उसी की राख ले मैं
गंध के अवशेष पर आराधनायें कर रहा हूँ
 
अर्थ अपना खो चुके संकल्प के उद्यापनी पल
हर कथा का सामने आ लग गया है  तथ्य  खुलने 
संस्कृतियों की धरोहर मान कर रक्खी हृदय में 
संशयों के घोल में वह लग पडी है आज घुलने 
 
और मैं क्षत हो चुके इक ग्रन्थ के पन्ने  बटोरे 
रूप नव पा जाऊं ये संभावनाएं कर रहा हूँ 

भाग्य रेख में कुछ संशोधन

ओ अनामिके जब से तेरा नाम जुड़ा मेरे अधरों से
उस पल से मन के सब गहरे भावों का हो गया विमोचन
 
लगीं गूँजने सुधि के आँगन, लैला शीरीं हीर कथायें
गुलमोहर के साथ दुपहरी निशिगंधा को ला महकायें
बरखा केबून्दों से मिलकर गूँज उठे सरगम के सब स्वर
और सितारों की छाया में गीत सुनाने लगीं विभायें
 
ओ संकल्पित! जब से तेरा नाम जुड़ा है संकल्पों से
उस पल से लगता जीवन को मिला और कुछ नया प्रयोजन
 
हुई पुन: जीवन्त लवंगी के सँग कथामयी मस्तानी
संयोगिता,सुभद्रा,रुक्मिणी और सती की प्रेम: कहानी
देवलोक का त्याग उर्वशी करती डूब भावना जिसमें
वैसी ही भावना अचानक लगी मुझे जानी पहचानी
 
ओ समर्पिते ! जब से तेरा मूक समर्पण महसूसा है
तब से स्वर्णिम आभाओं से दीप्त हुए हैं मेरे लोचन
 
लिखे गये अध्याय स्वत: कुछ नये ज़िन्दगी की पुस्तक में
बहती हुई हवाओं ने लीं पीपल की छाया में कसमें
जुड़े करों में झरे गगन से अभिलाषा के सुमन अनगिनत
फिर से गहरी हुईं देवयानी ने जो जोड़ी थीं रस्में
 
सजलतूलिके ! छू ली तूने जबसे मेरी खुली हथेली
तब से मेरी भाग्य रेख में हुए अनूठे कुछ संशोधन

बाँध तोड़ यादों की सरिता मचल पडी

आज अचानक एक पुरानी  पुस्तक से
सूखी हुई फूल की पांखुर फिसल पडी
इन्द्रधनुष बन गये  हजारों हाथों में
बाँध तोड़ यादों की सरिता मचल पडी

यौवन की देहरी पर जब थी उम्र चढी
स्वप्न नयन के सभी हुए थे सिंदूरी
उड़ने लगी पतंगें बन कर आकांक्षा
सिमट गई नभ से मुट्ठी तक की दूरी
मन के वातायन में गाती थी कोयल
राजहंस के पंख उँगलियों पर रहते
अभिलाषा सावन सी झड़ी   लगाती थी 
और उमंगो के झरने अविरल बहते 

वे पल जब निश्चय नव होते थे प्रतिदिन
डगर चूमने पांवों को खुद  निकल पडी
इन्द्रधनुष बन गये  हजारों हाथों में
बाँध तोड़ यादों की सरिता मचल

कोई शब्द होंठ को आकर छूता था
अनजाने ही गीत नया बन जाता था
मन संध्या की सुरभि ओढ़ महकी महकी
बना पपीहा मधुरिम टेर लगाता था
बिना निमंत्रण रजनी की उंगली पकडे
तारे सपने बन आँखों में आते थे
और चांदनी के झूले पर चढ़ चढ़ कर
नभ गंगा के तट को जा छू आते थे


चित्र अजन्ता के बाहों में भर भर कर
एलोरा में टांगा करते घड़ी घड़ी
इन्द्रधनुष बन गये  हजारों हाथों में
बाँध तोड़ यादों की सरिता मचल पडी

कोई पत्र द्वार तक जब आ जाता था
चढ़ा डाकिये की खाकी सी झोली में
लगता था कहार कोई ले आया है
बिठला नई नवेली दुल्हन डोली में
खुले पत्र के साथ गूंजती शहनाई
घर में आँगन में देहरी पर गलियों में
नई रंगतें तब छाने लग जाती थीं
उगने से पहले आशा की कलियों में

बिन प्रयास जब सांझ सवेरे द्वारे पर
सजी अल्पनायें आकर चुपचाप कढ़ी
इन्द्रधनुष बन गये  हजारों द्वारे पर
बाँध तोड़ यादों की सरिता मचल पडी

रहती थी भावना ओस की बून्द बनी
बचपन से यौवन के नव अनुबन्ध पर
मन होता था व्याकुल जब अनजाने ही
उड़ी भावना की कस्तूरी गन्ध पर
रजत रश्मियां स्वर्ण किरण की बांह पकड़
टहला करतीं सुधियों के गलियारे में
नयनों की क्यारी में फूटा करते थे
अंकुर नूतन नहा नहा उजियारों में

बैठी रहती दीवाली खिड़की पर आ
होली रहती शीश झुकाए द्वार खड़ी
इन्द्रधनुष बन गये  हजारों द्वारे पर
बाँध तोड़ यादों की सरिता मचल पडी
 

 

कर दी है हड़ताल आजकल

भाव शब्द में जब ढलते हैं, तब तब गीत नया बन जाता
लेकिन मेरे भावों ने तो कर दी है हड़ताल आजकल
 
गति का क्रम कोल्हू के चारों ओर चल रहे बैलों जैसा
परिवर्तन की अभिलाषा के अंकुर नहीं फूट पाते हैं
हाथ उठा कर दिन का पंछी करे भोर की अगवानी को
उससे पहले लिये उबासी निमिष पास के सो जाते हैं
 
सिक्के ढाल ढाल किस्मत के, बदले थी जो विधि का लेखा
लिये हाथ में कासा फ़िरती चाँदी की टकसाल आजकल
 
रोज क्षितिज की दहलीजों पर सपनों की रांगोली काढ़े
चूना लिये दिवस का, गेरू सांझ उषा के रंग मिला कर
लीपा करती है अम्बर की अंगानाई को आस घटा से
और शंख सीपियां चमकती बिजली के ले अंश सजा कर
 
भ्रमित आस की दुल्हनिया का यह श्रंगार सत्य है कितना
कल तक जो बहले रहते थे, करते हैं पड़ताल आजकल
 
बदल रहे मौसम की अँगड़ाई में सब कुछ हुआ तिलिस्मी
पता नहीं चलता आषाढ़ी घटा कौन  सी बरस सकेगी
हर इक बार बुझे हैं दीपक अभिलाषा के किये प्रज्ज्वलित
किसे विदित है  द्रवित-प्यास इस मन चातक की कहाँ बुझेगी
 
जब से सुना हुआ दिन फ़ेरा करती यहाँ समय की करवट
जो मिलता कहता है पूरे होगये, बारह साल आजकल

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...