नूतन वर्षाभिनन्दन

उठी अवनिका प्राची पर से नई किरण लेती अँगड़ाई
नवल आस को लिये भोर नव नये राग पर गाती आये
नया दीप है नई ज्योत्सना और नया विश्वास हॄदय में
यह नव वर्ष नये संकल्पों से कर्मठता और बढ़ाये

आशंका, संत्रास भ्रमित पल परिचय के धागों से टूटें
थकन, निराशा औ' असमंजस सब ही पथ में पीछे छूटें
आंजुरि का जल अभिमंत्रित हो पल पल नूतन आस उगाये
और आस्था हर इक सपना दिन दिन शिल्पित करती जाये

जीवन की पुस्तक का यह जो एक पॄष्ठ है समय पलटता
उसका नव संदेश प्राण में अनुष्ठान हो नूतन भरता
प्रगति पंथ की मंज़िल आकर भित्तिचित्र बन सके द्वार पर
नये वर्ष की अगवानी में यही कामना हूँ मैं करता.

राकेश खंडेलवाल
नव वर्ष २००६

खुशबू

बजी है बाँसुरी बन कर तुम्हारे नाम की खुश्बू
अधर पर थरथराती है तुम्हारे नाम की खुश्बू
कलम हाथों में मेरे आ गई जब गीत लिखने को
महज लिख कर गई है बस तुम्हारे नाम की खुश्बू
तुम्हीं पर जीस्त का हर एक लम्हा थम गया अब तो
कभी आगाज़ की खुश्बू कभी अंजाम की खुश्बू
दरीचे से उतर कर धूप आती है जो कमरे में
लिये वो साथ आती है महकती शाम की खुश्बू
मेरी हर सांस की पुरबाई में है घुल गई ऐसे
कि सीता की सुधी में ज्यों बसी हो राम की खुश्बू
जुड़ी है जाग से भी नींद से भी रात दिन मेरी
हुई गलियों में रक्सां आ तुम्हारे गांव की खुशबू

गीत बन

स्वर उठा कंठ से शब्द से कह रहा
गीत बन गीत बन, भाव है बह तहा

अर्थ दे तू स्वयं को नये आज से
आंसुओं में उगा बीज मुस्कान के
जो मिली है धरोहर तुझे ्वंश की
दे बदल मायने उनकी पहचान के

चल बदल वक्त के साथ रफ़्तार बन
तू अभी तक क्यों इतिहास में रह रहा

जो छुपे अर्थ कर दे प्रकाशित उन्हें
अपने विस्तार को जान तो ले सही
हो ध्वनित, सब प्रतीक्षा में च्याकुल खड़े
क्यों जमाये हुए है तू मुंह में दही

मौन तो अंत ही स्पंदनों का रहा
किसलिये फिर व्रथा वेदना सह रहा
गीत बन गीत बन

गुलाब कर लूं

जो आरिजों पर हवा ने आकर लिखे हैं सिहरन के चंद लम्हे
मैं सोचता हूँ कि आज उनको तेरे अधर के गुलाब कर लूँ
जो दिल के बरकों पर धड़कनों से लिखी है यादों ने सांझ आकर
मैं सोचता हूँ तेरे नयन को उन इबारतों की किताब कर लूँ
अभी बहुत सा है कर्ज़ बाकी मेरे तुम्हारे अहदे वफ़ा का
जो मिल गये हो तुम आज क्यों न मैं उन सभी का हिसाब कर लूँ
नजर में अपनी सवाल अनगिन रही उठाती ये ज़िन्दगानी
ले साथ तेरा मैं इन सवालों को सोचता हूँ जवाब कर लूँ

वो तो

वो बुझे दियों की कतार थी जो कि मेरे आसपास थी
मैने समझा था जिसे चांदनी, वो तो झुटपुटे का कुहास थी

जिसे ढूँढ़ती रही नजर, फ़ंसी भटकनो में इधर उधर
मुझे ये मगर न हुई खबर, वो तो गुमशुदा ही तलाश थी

मेरी आरज़ुओं की हर थकन, सुकूं माँगती थी शबे सहर
मैने समझा जिसको कुमोदिनी वो तो एक दहका पलाश थी

भर भर घड़े उंड़ेलकर , दिये पनघटों ने पुकार कर
जो बुझी न पल के लिये मगर, वो मरुस्थली मेरी प्यास थी

जिसे नाम तुमने गज़ल दिया, जिसे मैने सोचा कि नज़्म है
वो जो माला शब्दों की एक थी, वो तो भावना का निकास थी

वो जो रात के प्रथम प्रहर मेरी ख्वाहिशो को समेटकर
मेरे ख्वाब में गई आ संवर, तेरे महके तन की सुवास थी

जो थी शब-बखैर की आरज़ू, जो बसी हमारे थी चार सू
जिसे सींचा है लम्हों में बांध कर, वो तेरे मिलन की ही आस थी.

वनपाखी

मन का आवारा वनपाखी अब गीत नहीं गा पाता है

कुछ रंग नहीं भर पाता है कोरे खाकों में चित्रकार
तूलिका कोशिशें करती है पर विवरण न पाती उभार
खूँटियां पकड़ ढीली करतीं रह रह सलवएं पड़ा करतीं
यूँ कैनवास यह जीवन का फिर से अपूर्ण रह जाता है

बन पाते बिम्ब अधूरे ही धुंधला धुन्धला मन का दत्पण
चिलमन की ओट छुपा लेती मनमोहक हर बांकी चितवन
पन्ने पलटे दिन रात मगर, अक्षर पुस्तक के फढ़े नहीं
यूँ ढाई आखर का लेखा, अनपढ़ा पुन: रह जाता है

नित ॠचा उचारा करी मगर मंत्रों से भाग्य नहीं जागे
सांसों की एक भिखारिन हर इक गली मोड़ रुकरुक मांगे
खाली झोली, पाथेय नहीं राहों का कुछ भी पता नहीं
यूँ उठ पाने से पहले ही हर बार कदम रुक जाता है

साधक सी लगन जगी लेकिन मिल पाया कोई साध्य नहीं
निर्जन हो गये सभी मंदिर है कोई भी आराध्य नहीं
पूजा की थाली सजी मगर हैं क्रूर थपेड़े आँधी के
यूँ ज्योतित होने से पहले हर बार दिया बुझ जाता है

सुधियों की डोर थामता है अक्सर मन का एकाकीपन
भूली भटकी स्मॄतियों की कुछ और अधिक बढ़ती तड़पन
पथ में हैं मोड़ बने इतने,दो कदम साथ न संव्हव हैं
यों परिचय होने से पहले हर कोई बिछड़ता जाता है

बस्ती के इकलौते पनघट पर गूँज नहीं पाती पायल
नर्तन करते हैं मोर किन्तु इक बून्द न बरसाता बादल
झूले पेड़ों पर पड़े नही कनकौए नभ में उड़े नहीं
यूँ सावन भादों से पहले हर बरस अगहन आ जाता है

हर रोज बिखेरी थाली भर भर धूप दुपहरी ने आकर
हर लहर लुटाती रही कोष जो संजो रखे था रत्नाकर
मधुवन ने सोंपे फूल और सरगम की तान कोयलों ने
पर मेरी खुली आंजुरि में कुछ भी न सिमटने पाता है

सूरज के रथ के घोड़ों को कोई उद्देश्य नहीं बाकी
टूटे टुकड़े ले मधुघट के बैठी है सुधियों की साकी
खाली आँजुरि क्या सूर्य नमन ? क्या कर पाये संध्या-वंदन
यूँ उग पाने से पहले ही हर रोज दिवस ढल जाता है

मन का आवारा वनपाखी अब गीत नहीं गा पाता है.

आप-निवेदन

काव्य मेरा सॄजित, य्रे सिमट कर कहीं बंद होकर किताबों में ही न रहे
आपके कंठ की रागिनी थाम कर, आपके होंठ पर ये मचलता रहे
कल्पना ने मेरी जिसमें गोते लगा, शब्द श्रन्गार को आपके हैं चुने
मेरी भाषा की भागीरथी आपके द्वार के सामने से निरंतर बहे

राकेश खंडेलवाल
नवंबर २००५

कविता पुरानी

धड़कनो< की ताल पर गाने लगी है ज़िन्दगानी
याद मुझको आ रही है फिर कोई कविता पुरानी

धूप में डूबे हुए कुछ तितलियो< के पंख कोमल
पर्वतों को ले रहीं आगोश में चंचल घटायें
झील को दर्पण बना कर खिलखिलाते चंद बादल
प्रीत की धुन पर थिरकती वादियों में आ हवायें

लिख रहे हैं भोज पत्रों पर नई फिर से कहानी
याद मुझको आ रही है फिर कोऊ कविता पुरानी

वॄक्ष पर आकर उतरते इन्द्रधनु्षों की कतारें
गुनगुनाती रागिनी से रंग सा भरती दुपहरी
लाज के सिन्दूर में डूबी हुई दुल्हन प्रतीची
और रजनी चाँदनी की ओढ़कर चूनर रुपहरी

भोर की अँगड़ाईयों से हो रहा नभ आसमानी
याद मुझको आ रही है फिर कोई कविता पुरानी

पतझड़ी संदेशवाहक बाँटता सा पत्र सबको
स्वर्ण में लिपटा हुआ संदेश का विस्तार सारा
खेलती पछुआ अकेली शाख की सूनी गली में
राह पर नजरें टिकाये भोर का अंतिम सितारा

कर रही ऊषा क्षितिज पर, रश्मियों संग बागवानी
याद मुझको आ रही है फिर कोई कविता पुरानी


आरिजों पर दूब के हैं प्रीत चुम्बन शबनमों के
फूल ने ओढ़ी हुई है धूप की चूनर सुनहरी
हंस मोती बीनते हैं ताल की गहराईयों से
पेड़ की फुनगी बिछाये एक गौरैया मसहरी

कह रही नव, नित्य गाथा प्रकॄति इनकी जुबानी
याद मुझको आ रही है फिर कोई कविता पुरानी

राकेश खंडेलवाल

नवंबर २००५

अधूरी गाथा

पॄष्ठ रहे सब के सब कोरे, सुध-बुध बिसरा कलम सो गई
शब्द भाव के बीच निरंतर, बढ़ती रही बीच की दूरी
करते करते यत्न थक गया, पर अंतिम अध्याय न लिखा
जीवन के इस रंगमंच की हर गाथा रह गई अधूरी.

तुम-केवल तुम

भोर आती रही, रात जाती रही
काल का चक्र तुम से ही चलता रहा

एक तन्हाई लेकर तुम्हारी छवि
दस्तकें साँझ के द्वार देती रही
नीड को लौटते पँछियों की सदा
नाम बस इक तुम्हारा ही लेती रही
धुन्ध बढती हुई, दिन छिपे, व्योम में

आकॄति बस तुम्हारी बनाती रही
याद बन कर दुल्हन, रात की पालकी
बैठ, कर सोलह श्रन्गार आती रही

स्वप्न बीते दिनों को बना कूचियाँ
आँख के चित्र रंगीन करता रहा

लेके रंगत तुम्हारे अधर की उषा
माँग प्राची की आकर सजाती रही
पाके सरगम तुम्हारे स्वरों से नई
कोयलें प्यार के गीत गाती रहीं
ले के थिरकन तुम्हारे कदम से नदी
नॄत्य करती हुई खिलखिलाने लगी
गन्ध लेकर तुम्हारे बदन की हवा
मलयजी; वादियों को बनाने लगी

आसमाँ पा तुम्हारी नयन-नीलिमा
अपने दर्पण में खुद को निरखता रहा

जो तुम्हारे कदम के निशाँ थे बने
मन-भरत को हुए राम की पादुका
भाव घनश्याम बन कर निहारा किये
तुम कभी रुक्मिणी थीं कभी राधिका
चित्र लेकर तुम्हारे अजन्ता बनी
बिम्ब सारे एलोरा को तुम से मिले
हैं तुम्ही से शुरू, हैं तुम्ही पर खतम
प्रेम-गाथाओं के रंगमय सिलसिले

एक तुम ही तो शाश्वत रहे प्राण बस
चाहे इतिहास कितना बदलता रहा

थरथराये अधर, जल तरंगें बजीं
सरगमें सैकडों मुस्कुराने लगीं
तुमने पलकें उठा दॄष्टि डाली जरा
हर दिशा दीप्ति से जगमगाने लगी
धूप मुस्कान की जो उगी होंठ से
मन्दिरों में हुई मँगला आरती
पैंजनी की खनक,जैसे वीणा लिये
तान झंकारने हो लगी भारती

इन्द्रधनुषी हुए रंग सुधि के सभी
चित्र हर कल्पना का सँवरता रहा


राकेश खंडेलवाल


आप-अंतराल के पश्चात

नैन में आपके है अमावस अँजी, और पूनम है चेहरे पे इठला रही
ताप्ती नर्मदा और गोदावरी, चाल का अनुसरण हैं किये जा रही
एक संदल के झोंके में घुल चाँदनी आपकी यष्टि के शिल्प में ढल रही
आपके होंठ छू वादियों में हवा, प्यार के गीत नव आज है गा रही.

तीन गीत


गीत तेरे होंठ पर


गीत तेरे होंठ पर खुद ही मचलने लग पड़ें आ
इसलिये हर भाष्य को व्यवहार मैं देने लगा हूँ

देव पूजा की सलौनी छाँह के नग्मे सजाकर
काँपती खुशबू किसी के नर्म ख्यालों से चुराकर
मैं हूँ कॄत संकल्प छूने को नई संभावनायें
शब्द का श्रन्गार करता जा रहा हूँ गुनगुनाकर

अब नयन के अक्षरों में ढल सके भाषा हॄदय की
इसलिये स्वर को नया आकार मैं देने लगा हूँ

रूप हो जो आ नयन में खुद-ब-खुद ही झिलमिलाये
प्रीत हो, मन के समंदर ज्वार आ प्रतिपल उठाये
बात जो संप्रेषणा का कोई भी माध्यम न माँगे
और आशा रात को जो दीप बन कर जगमगाये

भावना के निर्झरों पर बाँध कोई लग न पाये
इसलिये हर भाव को इज़हार मैं देने लगा हूँ

मंदिरों की आरती को कंठ में अपने बसाकर
ज्योति के दीपक सरीखा मैं हॄदय अपना जला कर
मन्नतों की चादरों में आस्था अपनी लपेटे
घूमता हूँ ज़िन्दगी के बाग में कलियाँ खिलाकर

मंज़िलों की राह में भटके नहीं कोई मुसाफ़िर
इसलियी हर राह को विस्तार मैं देने लगा हूँ

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दहलीज का पत्थर

शुक्रिया, दहलीज का पत्थर मुझे तुमने बनाया
है सुनिश्चित अब तुम्हारे पांव की रज पा सकूँगा

जब किसी देवांगना के हाथ की डलिया हिलेगी
और उसमें से छिटक कर फूल की पाँखुर गिरेगी
अर्घ्य के जल की किसी इक बूंद से स्नान होगा
और रंग कर रोलियों में एक अक्षत गिर पड़ेगा

एक पल को ही सही मैं भी बनूँगा तुम सरीखा
और तुम मुझमें बसे हो गर्व से मैं कह सकूँगा

गोपुरम पर शीश अपना कौन है बोलो झुकाता
चूम कर पेशानियों को कौन है सज़दा कराता
मैं बिछा हूँ पांव में तो शीश मुझ पर झुक रहे हैं
आपके याचक सभी अब प्यार मुझसे कर रहे हैं

द्वारका को हो गमन, या वन-गमन के कारुणिक पल
मैं प्रथम चुम्बित हुआ, ये थाति लेकर रह सकूँगा
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गीत तो मेरे अधर पर

गीत तो मेरे अधर पर रोज ही मचले सुनयने
पर तुम्हारे स्पर्श के बिन रह गये हैं सब अधूरे

मन अजन्ता सा रंगा है चाँदनी के रंग लेकर
फूल के सपने बुने हैं प्रीत की रसगन्ध लेकर
दीप की पावन शिखा से बाँध कर संबंध डोरी
आस्थाओं के सघन वटवॄक्ष से कोंपल बटोरी

पर प्रतीक्षित मंत्र के उच्चार का होकर तुम्हारे
मैं धुंआ बन अगरबत्ती का कहो कब तक बहूँ रे

संदली हर कामना के ताजमहली बिम्ब में खो
रूप की भागीरथी में डूबकर फिर गंधमय हो
सिलसिले कचनार के कुछ,जोड़ कर फिर गुलमोहर से
वादियों में साँझ के भरता रहा हूँ रंग दुपहर से

सरगमी सारंगियों का साथ लेकिन मिल न पाया
जल रहे एकाकियत को ओढ़ कर अब तानपूरे

वॄन्द कानन में खनकती पायलों के सुर सजीले
हाथ में उगते हुए बूटे हिना के कुछ रंगीले
स्वप्न की कजरी नयन को भेजती रह रह निमंत्रभ
और पग को चूमने होता अलक्तक का समर्पण

भोर की उगती हुई पहली किरण, संबल बना कर
धूप को आगोश में ले, स्वर्णमय होते कंगूरे

शब्द की नित पालकी उतरी सितारों की गली में
हो अलंकॄत गंध के टाँके लगाती हर कली में
और पाकर अंजनी के पुत्र से कुछ प्रेरणायें
झूलती अमराई में आकर हिंडोले नित हवायें

दॄष्टि-चुम्बन की प्रतीक्षा में,पलक को राह कर कर
छंद का हर शिल्प कहता आ मुझे तू आज छूरे

अर्चना के दीप की मधुरिम शिखा में जगमगाकर
आरती की घंटियों के साथ सुर अपना मिलाकर
नित नयी उपमाओं की पुष्पांजलि भरता रहा हूँ
कल्पनारत हो निरंतर साधना करता रहा हूँ

रागिनी का हाथ थामे भाव भटका भोर से निशि
प्रश्न लेकिन प्रश्न करता है बता है कौन तू रे

चाँदनी के हाथ में है झील का दर्पण अचंभित
रात की कोमल कली भी रह गई है अर्ध- विकसित
याद के पाटल फिसलती, आँख की शबनम निशाभर
भोर से खामोशियाँ बैठी रही है द्वार आकर

एक छलना के थिरकते मोहजालों में उलझकर
स्वर तकार्जा कर रहा है तुम कहो मैं क्या कहूँ रे
राकेश खंडेलवाल

केवल तुम

मेरे दर्पण की परछाईं के नैन में चित्र तेरे नजर मुझको आते रहे
मेरे अधरों पे तेरे सुरों से जगे, गीत, आकर गज़ल गुनगुनाते रहे
मेरे सपनों का विस्तार सिमटा रहा,तेरे लहराते आँचल के अंबर तले
तेरे अहसास के दीप हर साँझ को, मेरी गलियों में आ जगमगाते रहे

तूलिक मचली जब उंगलियों में मेरी, चित्र तेरे ही केवल बनाती रही
तेरे होठों की स्मित का स्पर्श पा, बाग की हर कली मुस्कुराती रही
लेखनी कोशिशें करते करते थकी, पर नहीं न्याय कर पयी है रूप से
चूम कर पग तेरे भोरे की रश्मियाँ मेरी राहों में कंचन लुटाती रहीं.

गंध की परछाईयाँ

गंध की परछाईयों के बन के अनुचर रह गये हम
अब नही संभव रहा हम राह अपनी ढूंढ़ पायें


धूप के जिन पनघटों से, भोर भर लाते कलसिया
आज उसकी राह में हैं उग रहे जंगल कँटीले
सांझ की जो पालकी दिन के कहारों ने उठाई
बींध कर उसको गये हैं दंश विधना के नुकीले

रात की काली दुशाला में हज़ारों छेद हैं अब
कोई भी दर्जी नहीं है, हम रफ़ू किससे करायें

मान कर प्रतिमान जिनको, ज़िन्दगी हमने बिताई
मूल्य बदले हैं समय की करवटों के साथ उनके
सींचते संबंध के वटवॄक्ष जिनको हम रहे थे
वे सहारों के लिये अब ढूँढ़ते हैं स्वयं तिनके

शब्द का जो कोष संचित कर रखा था, लुट गया है
रिक्त हैं कुछ पॄष्ठ बाकी, क्या पढ़ें हम क्या सुनायें

आप- संपूर्ण प्रस्तुति

प्रीत मेरी शिराओं में बहती रही शिंजिनी की तरह झनझनाये हुए
छेड़ता मैं रहा नित नई रागिनी बाँसुरी को अधर पर लगाये हुए
कल्पना की लिये तूलिका आज तक एक ही चित्र में रंग भरता रहा
मैने देखा तुम्हें लेते अंगड़ाईयाँ दूधिया चांदनी में नहाये हुए
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मुस्कुराने लगीं रश्मियाँ भोर की क्षण दुपहरी के श्रन्गार करने लगे
झूमने लग पडीं जूही चंपाकली रंगमय गुलमोहर हो दहकने लगे
यूँ लगा फिर बसन्ती नहारें हुईं इन्द्रधनुषी हुईं सारी अँगनाईयाँ
रंग हाथों की मेंहदी के, जब आपके द्वार की अल्पनाओं में उतरने लगे
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आपके ख्याल हर पल मेरे साथ थे सोच में मेरी गहरे समाये हुए
मेरी नजरों में जो थे सँवरते रहे चित्र थे आपके वे बनाये हुए
साँझ शनिवार,श्रन्गार की मेज पर भोर रविवार को लेते अँगडाइयाँ
औ' बनाते रसोई मे खाना कभी अपना आँचल कमर में लगाये हुए
.......------------------------------------------
.चित्र आँखों में मेरी बनाते रहे याद के प्रष्ठ कुछ फ़डफ़शाते हुए
रंग ऊदे, हरे,जामनी कत्थई भित्तिचित्रों से मन को सजाते हुए
मेरी पलकों के कोरों पे अटका हुअ चित्र है एक उस साँझ का प्रियतमे
दोनों हाथॊं में पानी लिये अर्घ्य का चौथ के चन्द्रमा पर चढाते हुए
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०
उम्र सारी है बीती, लगा, आज तक बस हथेली पे सरसों जमाते हुए
हम निराशा की चादर लपेटे रहे दस्तकें खंडहर पर लगाते हुए
हमने राहें भी वे ही सजाईं सदा जो न जाती, न आती कहीं से यहाँ
गुत्थियों में नक्षत्रों की उलझे रहे कुंडली पंडितों को दिखाते हुए
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-
खनकती पायलों की ताल की सौगन्ध है तुमसे
स्वरों की लहरियों के राग का अनुबन्ध है तुमसे
तुम्हारे ध्यान में डूबा हुआ हूँ इस कदर प्रियतम
मेरे पिछले जनम का भी कोई सम्बन्ध है तुमसे
.................
आपके पाँव को चूमने के लिये, राह पथ में नजरिया बिछायी रही
बाँसुरी आपके होंठ को चूमने , कुंज में रास पल पल रचाती रही
लहरें देते हुए दस्तकें थक गईं, आप आये न यमुना के तट पर कभी
और सूनी प्रतीक्षा खडी साँझ में, एक दीपक को रह रह जलाती रही.
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आपके ले के संदेश छत पर मेरी, कुछ पखेरू सुबह शाम आते रहे
साज सब आपकी तान को थाम कर, एक ही राग को गुनगुनाते रहे
द्वैत- अद्वैत, चेतन- अचेतन सभी आपकी द्रष्टि से बिंध बंधे रह गये
आपके ख्याल दीपक दिवाली के बन, मन की मावस को पूनम बनाते रहे.
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आप आये नहीं, पथ प्रतीक्षित रहे, वर्ष मौसम बने आते जाते रहे
हम नयन में मिलन के सपन आँज कर रात की सेज पर कसमसाते रहे
राग भी हैं वही, तान भी है वही, बाँसुरी के मगर सुर बदलने लगे
सीप था मन बना, स्वाति के मेघ पर इस गगन से नजर को बचाते रहे
-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-
आप आये तो पग चूम कर राह की धूल, सिन्दूर बन मुस्कुराने लगी
मावसी थे डगर, कुछ हुआ यूँ असर, बन के दीपावली जगमगाने लगी
आपके केश छू मरुथली इक पवन, संदली गंध लेकर बहकने लगी
आप आये तो आँगन की सरगोशियाँ, बन के कोयल गज़ल गुनगुनाने लगीं
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कामना लेके अँगड़ाई कहती रही, चूम लूँ आपकी चंद अँगड़ाइयाँ
स्वप्न्म के चित्र बनते रहे कैनवस पर सजाते रहे मेरी तन्हाइयाँ
अपने भुजपाश में आपको बाँधकर, कल्पना चढ़ के स्यन्दन विचरती रही
और छाने लगीं मन के आकाश पर, संदली देह-यष्टि की परछाइयाँ
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-
केसमसाती हुई मन की वीरानगी ढूँढ़ती भीड़ में कोई तन्हा मिले
वादियों में गुलाबों की महकी हुई, चाहती है कोई कैक्टस भी खिले
राग,खुशबू,बहारें,मिलन,प्रेम अब दिल को बहला नहीं पा रहे इसलिये
एक इच्छा यही बलवती हो रही, अब जुड़ें दर्द के कुछ नये सिलसिले
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०
आपने इस नजर से निहारा मुझे, बज उठीं हैं शिराओं में शहनाईयाँ
अल्पनाओं के जेवर पहनने लगीं, गुनगुनाते हुए मेरी अँगनाइयाँ
आपकी चूनरी का सिरा चूम कर पतझड़ी शाख पर फूल खिलने लगे
बन अजन्ता की मूरत सँवरने लगीं भित्तिचित्रों में अब मेरी तन्हाइयाँ
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भोर की पालकी बैठ कर जिस तरह, इक सुनहरी किरण पूर्व में आ गई
सुन के आवाज़ इक मोर की पेड़ से, श्यामवर्णी घटा नभ में लहरा गई
जिस तरह सुरमई ओढ़नी ओढ़ कर साँझ आई प्रतीची की देहरी सजी,
चाँदनी रात को पाँव में बाँध कर, याद तेरी मुझे आज फिर आ गई
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आपने इस नजर से निहारा मुझे, बज उठीं हैं शिराओं में शहनाईयाँ
अल्पनाओं के जेवर पहनने लगीं, गुनगुनाते हुए मेरी अँगनाइयाँ
आपकी चूनरी का सिरा चूम कर पतझड़ी शाख पर फूल खिलने लगे
बन अजन्ता की मूरत सँवरने लगीं भित्तिचित्रों में अब मेरी तन्हाइयाँ
-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-
आप मुस्काये ऐसा लगा चाँद से है बरसने लगी मोतियों की लड़ी
सामने आके दर्पण के जलने लगी, जैसे दीपवली की कोई फुलझड़ी
हीरकनियों से छलकी हुई दोपहर,,नौन की वादियों में थिरकने लगी
रोशनी की किरण इक लजाती हुई, जैसे बिल्लौर की पालकी हो चढ़ी
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जाते जाते ठिठक कर मुड़े आप औ' देखा कनखी से मुझको लजाते हुए
दाँत से होंठ अपना दबा आपने कहना चाहा था कुछ बुदबुदाते हुए
वक्त का वह निमिष कैद मैने किया स्वर्ण कर अपनी यादों के इतिहास में
अब बिताता हूँ दिन रात अपने सदा, आपके शब्द सरगम में गाते हुए
-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-x-
भोर से साँझ तक मेरे दिन रात में आपके चित्र लगते रहे हैं गले
मेरे हर इक कदम से जुड़े हैं हुए, आपकी याद के अनगिनत काफ़िले
आपसे दूर पल भर न बीता मेरा, मेरी धड़कन बँधी आपकी ताल से
आपकी सिर्फ़ परछाईं हूँ मीत मैं, सैकड़ों जन्म से हैं यही सिलसिले
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गुलमोहर, मोतिया चंपा जूहीकली, कुछ पलाशों के थे, कुछ थे रितुराज के
कुछ कमल के थे,थे हरर्सिंगारों के कुछ,माँग लाया था कुछ रंग कचनार से
रंग धनक से लिये,रंग ऊषा के थे, साँझ की ओढ़नी से लिये थे सभी
रंग आये नहीं काम कुछ भी मेरे, पड़ गये फीके सब, सामने आपके
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तुमको देखा तो ये चाँदनी ने कहा, रूप ऐसा तो देखा नहीं आज तक
बोली आवाज़ सुनकर के सरगम,कभी गुनगुनाई नहीं इस तरह आज तक
पाँव को चूमकर ये धरा ने कहा क्यों न ऐसे सुकोमल सुमन हो सके
केश देखे, घटा सावनी कह उठी, इस तरह वो न लहरा सकी आज तक
मुस्कुराईं जो तुम वाटिकायें खिलीं, अंश लेकर तुम्हारा बनी पूर्णिमा
तुमने पलकें उठा कर जो देखा जरा, संवरे सातों तभी झूम कर आसमां
प्यार करता हूँ तुमसे कि सिन्दूर से करती दुल्हन कोई ओ कलासाधिके
मेरा चेतन अचेतन हरैक सोच अब ओ सुनयने तुम्हारी ही धुन में रमा.
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मेरे मानस की इन वीथियों में कई, चित्र हैं आपके जगमगाये हुए
ज़िन्दगी के हैं जीवंत पल ये सभी, कैनवस पर उतर कर जो आये हुए
चाय की प्यालियाँ, अलसी अँगड़ाईयाँ, ढ़ूँढ़ते शर्ट या टाँकते इक बटन
देखा बस के लिये भी खड़े आपको पर्स,खाने का डिब्बा उठाये हुए
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मन के कागज़ पे बिखरे जो सीमाओं में,रंग न थे, मगर रंग थे आपके
बनके धड़कन जो सीने में बसते रहे,मीत शायद वे पदचिन्ह थे आपके
जो हैं आवारा भटके निकल गेह से आँसुओं की तरह वो मेरे ख्याल थे
और रंगते रहे रात दिन जो मुझे, कुछ नहीं और बस रंग थे आपके
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देख पाया है जिनको ज़माना नहीं. रंग थे मीत वे बस तुम्हारे लिये
रंग क्या मेरे तन मन का कण कण बना मेरे सर्वेश केवल तुम्हारे लिये
सारे रंगों को आओ मिलायें, उगे प्रीत के जगमगाती हुई रोशनी
रंग फिर आयेंगे द्वार पर चल स्वयं, रंग ले साथ में बस तुम्हारे लिये
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आपके आगमन की प्रतीक्षा लिये, चान्दनी बन के शबनम टपकती रही
रात की ओढ़नी जुगनुओं से भरी दॄष्टि के नभ पे रह रह चमकती रही
मेरे आँगन के पीपल पे बैठे हुए, गुनगुनाती रही एक कजरी हवा
नींद पाजेब बाँधे हुए स्वप्न की, मेरे सिरहाने आकर मचलती रही
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मेरी अँगनाई में मुस्कुराने लगे, वे सितारे जो अब तक रहे दूर के
दूज के ईद के, चौदहवीं के सभी चाँद थे अंश बस आपके नूर के
ज़िन्दगी रागिनी की कलाई पकड़, एक मल्हार को गुनगुनाने लगी
आपकी उंगलियाँ छेड़ने लग पड़ीं तार जब से मेरे दिल के सन्तूर के.
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आप की याद आई मुझे इस तरह जैसे शबनम हो फूलों पे गिरने लगी
मन में बजती हुई जलतरंगों पे ज्यों एक कागज़ की कश्ती हो तिरने लगी
चैत की मखमली धूप को चूमने, कोई आवारा सी बदली चली आई हो
याकि अंगड़ाई लेती हुइ इक कली, गंधस्नात: हो कर निखरने लगी
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चांद बैठा रहा खिड़कियों के परे, नीम की शाख पर अपनी कोहनी टिका
नैन के दर्पणों पे था परदा पड़ा, बिम्ब कोई नहीं देख अपना सका
एक अलसाई अंगड़ाई सोती रही, ओढ़ कर लहरिया मेघ की सावनी
देख पाया नहीं स्वप्न, सपना कोई, नींद के द्वार दस्तक लगाता थका
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छंद रहता है जैसे मेरे गीत में, तुम खयालों में मेरे कलासाधिके
राग बन कर हॄदय-बाँसुरी में बसीं, मन-कन्हाई के संग में बनी राधिके
दामिनी साथ जैसे है घनश्याम के, सीप सागर की गहराईयों में बसा
साँस की संगिनी, धड़कनों की ध्वने, संग तुम हो मेरे अंत के आदि के
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गीत मेरे अधर पर मचलते रहे, कुछ विरह के रहे, कुछ थे श्रंगार के
कुछ में थीं इश्क की दास्तानें छुपीं,और कुछ थे अलौकिक किसी प्यार के
कुछ में थी कल्पना, कुछ में थी भावना और कुछ में थी शब्दों की दीवानगी
किन्तु ऐसा न संवरा अभी तक कोई, रंग जिसमें हों रिश्तों के व्यवहार के.
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आपने अपना घूँघट उठाया जरा, चाँदनी अपनी नजरें चुराने लगी
गुनगुनाने लगी मेरी अंगनाईयां भित्तिचित्रों में भी जान आने लगी
गंध में फिर नहाने लगे गुलमोहर रूप की धूप ऐसे बिखरने लगी
आईने में चमकते हुए बिम्ब को देखकर दोपहर भी लजाने लगी
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सावनी मेघ की पालकी पर चढ़ी एक बिजली गगन में जो लहराई है
रोशनी की किरन आपके कान की बालियों से छिटक कर चली आई है
कोयलों की कुहुक, टेर इक मोर की, या पपीहे की आवाज़ जो है लगी
आपके पांव की पैंजनी आज फिर वादियों में खनकती चली आई है.
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था गणित और इतिहास-भूगोल सब, औ' पुरातत्व विज्ञान भी पास था
भौतिकी भी रसायन भी और जीव के शास्त्र का मुझको संपूर्ण अहसास था
अंक, तकनीक के आँकड़ों में उलझ ध्यान जब जब किया केन्द्रित ओ प्रिये
थीं इबारत किताबों में जितनी लिखीं, नाम बन कर मिली वे मुझे आपका
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तूलिका आई हाथों में जब भी मेरे, कैनवस पर बना चित्र बस आपका
लेखनी जब भी कागज़ पे इक पग चली, नाम लिखती गई एक बस आपका
चूड़ियों की खनक, पायलों की थिरक और पनघट से गागर है बतियाई जब
तान पर जल तरंगों सा बजता रहा मीत जो नाम है एक बस आपका
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कनखियों से निहारा मुझे आपने
राह के मोड़ से एक पल के लिये
मनकामेश्वर के आँगन में जलने लगे
कामना के कई जगमगाते दिये
स्वप्न की क्यारियों में बहारें उगीं
गंध सौगंध की गुनगुनाने लगी
आस की प्यास बढ़ने लगी है मेरी
आपके साथ के जलकलश के लिये
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आप पहलू में थे फिर भी जाने मुझे क्यूँ लगा आप हैं पास मेरे नहीं
थे उजाले ही बिखरे हुए हर तरफ़, और दिखते नहीं थे अन्धेरे कहीं
फूल थे बाग में नभ में काली घटा, और थी बाँसुरी गुनगुनाती हुई
फिर भी संशय के अंदेशे पलते रहे,बन न जायें निशा, ये सवेरे कहीं.
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आप नजदीक मेरे हुए इस तरह, मेरा अस्तित्व भी आप में खो गया
स्वप्न निकला मेरी आँख की कोर से और जा आपके नैन में सो गया
मेरा चेतन अचेतन हुआ आपका, साँस का धड़कनों का समन्वय हुआ
मेरा अधिकार मुझ पर न कुछ भी रहा,जो भी था आज वह आपका हो गया
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आप की प्रीत ने होके चंदन मुझे इस तरह से छुआ मैं महकने लगा
एक सँवरे हुए स्वप्न का गुलमोहर, फिर ओपलाशों सरीखा दहकने लगा
गंध में डूब मधुमास की इक छुअन मेरे पहलू में आ गुनगुनाने लगी
करके बासंती अंबर के विस्तार को मन पखेरू मेरा अब चहकने लगा
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तुम्हारा नाम क्योंकर लूँ, मेरी पहचान हो तुम तो
कलम मेरी तुम्ही तो हो, मेरी कविता तुम्ही से है
लिखा जो आज तक मैने , सभी तो जानते हैं ये
मेरे शब्दों में जो भी है, वो संरचना तुम्ही से है
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मेरी हर अर्चना, आराधना विश्वास तुम ही हो
घनाच्छादित, घिरा जो प्यास पर, आकाश तुम ही हो
मेरी हर चेतना हर कल्पना हर शब्द तुमसे है
मेरे गीतों के प्राणों में बसी हर सांस तुम ही हो
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आपके पन्थ की प्रीत पायें कभी, आस लेकर कदम लड़खड़ाते रहे
आपके रूप का गीत बन जायेंगे, सोचकर शब्द होठों पे आते रहे
आपके कुन्तलों में सजेंगे कभी, एक गजरे की महकों में डूबे हुए
फूल आशाओं के इसलिये रात दिन अपने आँगन में कलियाँ खिलाते रहे
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मैं खड़ा हूँ युगों से प्रतीक्षा लिये, एक दिन आप इस ओर आ जायेंगे
मेरे भुजपाश की वादियों के सपन एक दिन मूर्तियों में बदल जायेंगे
कामनाओं के गलहार को चूमकर पैंजनी तोड़िया और कँगना सभी
आपकी प्रीत का पाके सान्निध्य पल, अपने अस्तित्व का अर्थ पा जायेंगे
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बोला कागा मेरी छत पे आके सुबह, आपके पाँव लगता उठे इस तरफ़
ओढ़ कर चूनरी. फूल की पाँख्रुरी से सजी मुस्कुराने लगी है सड़क
शाख पर मौलश्री की चहकने लगी एक बुलबुल मुरादें लिये गीत की
द्वार पर लग पड़ीं रंगने रांगोलियाँ, देहरी पर नई आ गई है चमक
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रूप है चाँद सा, रूप है सूर्य सा रूप तारों सा है झिलमिलाता हुआ
भोर की आरती सा खनकता हुआ और कचनार जैसे लजाता हुआ
आपका रूप है चन्दनी गंध सा जो हवाओं के संग में बहकती रही
रूप की धूप से आपकी जो सजा मेरा हर दिन हुआ जगमगाता हुआ.
.................................................
.भोर का जो सितारा गगन पर टँगा आपकी ओढ़नी से था छिटका हुआ
पूर्व में था क्षितिज, आपके मुख से ले रंग ऊषा के चेहरे में भरता हुआ
आपके स्वर से जागी हुई घंटियाँ, मंगला मंदिरों में बजाती हुईं
सॄष्टि का एक दिन और फिर आपकी प्रेरणा से लगा है उभरता हुआ.
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आपके पग को छूकर के सूनी डगर आपकी पायलों सी खनकने लगी
आपकी नथ के गौहर को छू रश्मियं भोर की रंग अंबर में भरने लगीं
आपके स्वर से ले रागिनी, गूँजने लग पड़ी है प्रभाती यहाँ गांव में
आपकी उठती पलकों से जागी हुई ज़िन्दगी की सुबह नव संवरने लगी
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आपकी प्रीत में डूब महकी हुई, झुटपुटी साँझ की मेरी तन्हाईयाँ
स्वप्न बूटे बनाती रहीं नैन में आपकी गुनगुनाती सी परछाईयाँ
आपकी साँस की बाँसुरी थाम कर आपके कुंतलों की सघन छाँह में
रास कालिन्दी तट बन रचाती रहीं खनखनाते हुए मेरी अँगनाईयाँ
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आपके गीत गाता रहा उम्र भर, और कुछ भी था मुझको गवारा नहीं
नैन के पाटलों पर सिवा आपके कोई भी चित्र मैने संवारा नहीं
किन्तु मन की किसी तह में सुलगी हुई एक मीठी शिकायत अभी शेष है
होंठ पर गीत खुद ही मचलने लगें , आपने मुझको ऐसे निहारा नहीं
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जब से त्रिवली में अटका है जा आपकी यूँ लगा है कि मन जैसे पगला गया
एक साड़ी का, बादल, किनारा बना जो घटा बन सुधाओं को बरसा गया
लेते अँगड़ाई जो हाथ उठते गिरे, तो लगा सैंकड़ों हैं भँवर बन गये
जितनी कोशिश उबरने की करता रहा, उतनी गहराईयों में ये धंसता गया
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मुस्कुराती हुई चाँदनी की कसम, आप मुस्काये तो खिल; गई चाँदनी
रागिनी ने कहा गुनगुनाते हुए, आप बोले तो स्वर पा सकी रागिनी
संदली हो गईं है हवा आपके संदली तन का पाकर परस गंधमय
आपके कुन्तलों से मिली प्रेरणा तब ही हो पाई है ये घटा सावनी.
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रूप है चाँद सा, रूप है सूर्य सा रूप तारों सा है झिलमिलाता हुआ
भोर की आरती सा खनकता हुआ और कचनार जैसे लजाता हुआ
आपका रूप है चन्दनी गंध सा जो हवाओं के संग में बहकती रही
रूप की धूप से आपकी जो सजा मेरा हर दिन हुआ जगमगाता हुआ.
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दीप जलते रहे हैं प्रतीक्षा लिये, आप आयें तो सज आरती में सकें
थरथराती रही फूल की पाँखुरी, आप छू लें तो वे देव पर चढ़ सकें
शिव के केशों में उलझी रही जान्हवी, आप भागीरथी में बदल दें उसे
शब्द छंदों में सिमटे हुए रह गये आपके छू अधर वे स्तुति बन सकें
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आपके छू अलक्तक रंगे ये चरण, देहरियाँ अल्पनाओं से सजने लगीं
आपके कुनतलों ने ली अँगड़ाई तो है घटा वादियों में बरसने लगी
आपकी पायलों की खनक से बंधी पालकी आ बहारों की उतरी गली
आपके आरिजों से मिली लालिमा, रजनी संध्या के रंग में सँवरने लगी
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साँझ सिन्दूर में डूब कर जो खिली, आपकी याद के चित्र बनने लगे
रात की ओड़्हनी में पिरोये हुए बिम्ब नयनों में आकर उतरने लगे
टूट कर गगन से सितारे गिरे, आपके कान की बालियाँ थी हिली
आपके केश से एक मोती गिरा, प्रीतमय हो जलद सब बरसने लगे
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गीत संकलन

बांसुरी


मन हो घनश्याम करता प्रतीक्षा रहा
आप राधा बने जब इधर आयेंगे
ज़िन्दगी की मेरी बाँसुरी के स्वरों
पर नये गीत खुद ही सँवर जायेंगे
रात भर थे सितारे जले, आपको
साथ ले आयेंगी रश्मियां भोर की
आस्था का सिरा थाम कर हर घडी
थी सुलगती रही आस की डोर भी
पर न आई उषा,बादलों में छुपे,
सूर्य ने घर के बाहर न भेजा उसे
और फिर रह गये स्वप्न बिखरे हुऎ
घोर तन्हाई के विषधरों से डंसे
एक दीपक खडा सांझ के द्वार पर
जुगनुओं को शिखा पर सजाये हुए
सोचते, आपके द्रष्टि - स्पर्श से
फूल बन ये गगन में बिखर जायेंगे
हाथ की धुन्ध रेखाओं में ढूँढते
उम्र गुजरी, न किस्नत की कोई मिली
भाग्य ने द्वार खोला नहीं कोई भी
दस्तकें देते दोनों हथेली छिली
लग रहा कोई आसेब का चक्र सा
गिर्द मेरे निरन्तर है चलता हुआ
वक्त के ज्योतिषी ने कहा, आपके
आगमन से ही सुधरेगी यह ग्रहदशा
आँज उत्सुक पलों को नयन में, मेरी
पन्थ, पगडंडियाँ हैं निहारा करीं
पाके सिकता के कण आपके पाँव से
रंग साधों के सिन्दूर हो जायेंगे
सोचता हूँ कि मनुहार जो कर रहा
शीघ्र ही वे फ़लीभूत हो जायेंगी
आपजी पालकी के सिरे से बँधी
वाटिका में बहारें चली आयेंगी
रेशमी कल्पनाओं की अँगडाईयाँ
नभ को छूने लगेंगी उठा हाथ को
तुष्ट हो जायेंगे प्यास के पल सभी
जो तरसते रहे आपके साथ को
फूल की पाँखुरी, आँजुरी में मेरी
आपके छू अधर जब चली आयेगी
देवताओं के आशीष तब राह पर
मेरी आ चांदनी जैसे बिछ जायेंगे
राकेश खंडेलवाल
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मौसम

पल में तोला हुआ, पल में माशा हुआ
लम्हे लम्हे ये मौसम बदलता रहा

मेरी खिडकी के पल्ले से,बैठी,सटी
एक तन्हाई जोहा करी बाट को
चाँदनी ने थे भेजे सन्देशे , मगर
चाँद आया नहीं आज भी रात को
एक बासी थकन लेती अन्गडाईयाँ
बैठे बैठे थकी,ऊब कर सो गई
सीढियों में ही अटके सितारे रहे
छत पे पहुँचे नहीं और सुबह हो गई

अनमनी हो गई मन की हर भावना
रंग चेहरे का पल पल बदलता रहा

ले उबासी खडी भोर की रश्मियाँ
कसमसाते हुए, आँख मलती रहीं
कुछ अषाढी घटाओं की पनिहारिनें
लडखडा कर गगन में संभलती रही
हो के भयभीत, पुरबा, चपल दामिनी
के कडे तेवरों से, कहीं छुप गई
राहजन हो तिमिर था खडा राह में
दीप की पूँजियाँ- हर शिखा लुट गई

और मन को मसोसे छुपा कक्ष में
एक सपना अधूरा सिसकता रहा

था छुपा नभ पे बिखरी हुई राख में
सूर्य ने अपना चेहरा दिखाया नहीं
तान वंशी की गर्जन बनी मेघ का
स्वर पपीहे का फिर गूँज पाया नहीं
बाँध नूपुर खडे न्रत्य को थे चरण
ताल बज न सकी रास के वास्ते
आँधियाँ यूँ चलीं धूल की हर तरफ़
होके अवरुद्ध सब रह गये रास्ते

देख दहके पलाशों की रंगत चमक
गुलमोहर का सुमन भी दहकता रहा

एक पल के लिये ही लगा आई है
द्वार से ही गई लौट वापिस घटा
झाँकती ही रही आड चिलमन की ले
चौथी मन्ज़िल पे बैठी हुई थी हवा
धूप थाली में भर, ले गई दोपहर
और सन्ध्या गई रह उसे ताकती
पास कुछ भी न था शेष दिनमान के
वो अगर माँगती भी तो क्या माँगती

रात की छत पे डाले हुए था कमन्द
चोर सा चुप अन्धेरा उतरता रहा

बादलों के कफ़न ओढ कर चन्द्रमा
सो गया है निशा के बियावान में
ढूँढते ढूँढते हैं बहारे थकी
कलियाँ आईं नहीं किन्तु पहचान में
मानचित्रों में बरखा का पथ था नहीं
प्यास उगती रही रोज पनघट के घर
बुलबुलों के हुए गीत नीलाम सब
ऐसी टेढी पडी पतझडों की नजर

और जर्जर कलेंडर की शाखाओ से
सूखे पत्ते सा दिन एक झरता रहा

राकेश खण्डेलवाल
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मंदिरों की घंटियाँ
सुर के तारों से जुड़ न सकी भावना शब्द सब कंठ में छटपटाते रहे

पंथ पर था नजर को बिछाये शिशिर कोई भेजे निमंत्रण उसे प्यार का
प्रश्न लेकर निगाहें उठीं हर निमिष पर न धागा जुड़ा कोई संचार का
चाँदनी का बना हमसफ़र हर कोई शेष सब ही को जैसे उपेक्ष मिली
उठ पुकारें, गगन से मिली थीं गले किन्तु सूनी रही इस नगर की गली
टुकड़े टुकड़े बिखरता रहा आस्माँ स्वप्न परवाज़ बिन छटपटाते रहे

क्षीण संचय हुआ होम करते हुए गुनगुनाई नहीं आस की बाँसुरी
मन्त्र ध्वनियाँ धुएं में विलय हो गईं भर नहीं पाई संकल्प की आँजुरी
कोई संदेस पहुँचा नहीं द्वार तक उलझी राहें सभी को निगलती रहीं
मील का एक पत्थर बनी ज़िन्दगी उम्र रफ़्तार से किन्तु चलती रही
प्यास , सावन की अगवानी करती रही मेघ आषाढ़ के घिर के आते रहे

भोर उत्तर हुई साँझ दक्षिण ढली पर न पाईं कही चैन की क्यारियाँ
स्वप्न के बीज बोये जहाँ थे कभी उग रहीं हैं वहाँ सिर्फ़ दुश्वारियाँ
बिम्ब खोये हैं दर्पण की गहराई में और परछाईं नजरें चुराने लगी
ताकते हर तरफ कोइ दिखता नहीं कैसी आवाज़ है जो बुलाने लगी
\कोई सूरत न पहचान में आ सकी रंग भदरंग हो झिलमिलाते रहे

हमने भेजे थे अरमान जिस द्वार पर बंद निकला वही द्वार उम्मीद का
कोई आकर मिला ही नहीं है गले अजनबी बन के मौसम गया ईद का
सलवटों में हथेली की खोती रहीं भाग्य ने जो रँगी चन्द राँगोलियाँ
हमने माणिक समझ कर बटोरा जिन्हें वो थीं टूटी हुई काँच की गोलियाँ
राह को भूल वो खो न जाये कहीं सूर्य के पथ में दीपक जलाते रहे
है सुनिश्चित कि सूरज उगे पूर्व में आज तक ये बताया गया था हमें
और ढलना नियति उसकी, पश्चिम में है ज़िन्दगी भर सिखाया गया था हमें
पर दिशाओं ने षडयंत्र ऐसे रचे भूल कर राह सूरज कहीं खो गया
एक आवारा बादल भटकता हुआ लाश पर दिन की, दो अश्रु, आ रो गया
और हम देवताओं की मरजी समझ घंटियाँ मंदिरों की बजाते रहे

राकेश खंडेलवाल
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मन का आँगन

भित्तिचित्र से सजी अजन्ता, घिरा घटाओं से है सावन
और तुम्हारी छवि से चित्रित, मीत मेरे मन का है आँगन
संध्या की निंदियारीं पलकें, ऊषा की पहली अँगड़ाई
दोपहरी की धूप गुनगुनी, रजनी की कोमल जुन्हाई
बगिया में भ्रमरों का गुंजन, नदिया की धारा की कल कल
गंधों की बढ़ती मादकता, पुरबा की अठखेली चंचल
बन कर गीत तुम्हारे गूँजे, मेरे मन पर ओ जीवन-धन
और तुम्हारी छवि से चित्रित मीत मेरे मन का है आँगन
बरगद पर लहराते धागे, जले दीप पीपल के नीचे
सर्पीली भटकी पगडंडी दिशा दिशा में आँखें मीचे
पनिहारिन के पग की पायल, संध्या के नयनों का काजल
फूल फूल पर दस्तक देता तितली का सतरंगा आँचल
राकेश खंडेलवाल
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प्राची और प्रतीची
जो पथ सन्मुख था उस पथ की मंज़िल भी पथ बनी हुई थी
इसीलिये उस पथ के पथ से मेरा हर पग दूर रह गया
अंझ्धकार की काली सत्ता, निगल गई सूरज के वंशज
प्राची और प्रतीची दोनों में बिखरा सिन्दूर रह गया

अस्ताचल के राजमार्ग पर बैठे थे कहार ले डोली
सपनों की चूनरी सजाकर, काढ सितारों की राँगोली
किन्तु न दुल्हन बनी साँझ ने आकरके पालकी संवारी
और रही गूँजती रूदन बन, शहनाई की मीठी बोली

झंझावातें लेकर पतझड आया था अगवानी करने
और गुलाबों सा हर सपना, उससे टकरा चूर रह गया

अंबर की वीथि में भटकी, निशा पहन पूनम की साडी
आँचल का इक छोर थाम कर साथ चला चन्द्रमा अनाडी
नक्षत्रों के गजरे उसके बहा ले गई नभ की गंगा
उल्काओं से घिरी ज्योत्सनाओं की नव- विकसित फुलवाडी

चौराहे पर धूमकेतुओं की टोली थी राह रोकती
जो निकला आवारा केवल वह तारा मशहूर रह गया

यादों की घाटी का सूनापन रह रह सन्नाटा पीता
लेकिन फिर भी उजडे पनघट जैसा ही रह जाता रीता
भटकी पगडंडी रह रह कर राह पूछती है नक्शों से
बिछा समय की चौसर बाज़ी खेल रही विधि बन परिणीता

आईने के सन्मुख दीपक जला जला कर थकीं उंगलियाँ
चमक न पाया चेहरा, केवल बुझा बुझा सा नूर रह गया
राकेश खंडेलवाल
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चूनरी चाँदनी कीस्वप्न आँखें सजाती रहीं रात भर,चाँदनी रात की चूनरी के तले
पर उगी भोर की दस्तकों से सभी, बन के सिन्दूर नभ में बिखरते रहे

तारे पलकों पे बैठे रहे रात भर, आने वालों का स्वागत सजाये हुए
ओस बन कर टपकते रहे राग सब,चाँद के होंठ पर गुनगुनये हुए
थाम कर चाँदनी की कलाई हवा, मन के गलियारे में नृत्य करती रही
कामना एक बन आस्था चल पड़ी आस पी के मिलन की लगाये हुए

सात घोड़ों के रथ बैठ आई उषा, एक सन्दूकची थाम कर हाथ में
जिसके दर्पण की परछाइयाँ थाम कर रंग सातों गगन पर सँवरते रहे

पग की पाजेब के बोल कुछ बोल कर, थे गुँजाते रहे एक चौपाल को
रूख कड़े घंटियों के सुरों के मगर, न सफ़ल हो जगा पाये घड़ियाल को
थरथरा थरथरा दीप तुलसी तले,साँझ से पूर्व ही थक गया सो गया
रह गया एक पीपल अचंभित खड़ा, होना क्या था मगर क्या से क्या हो गया

रोज लाता रहा दिन, कभी साँझ ने , अपने केशों में गजरे लगाये नहीं
मोतिया जूही चंपा चमेली सभी,रोज कलियों की तरह चटखते रहे
राकेश खंडेलवाल
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मेंहदी सिसकती ऱी

नाम तुमने कभी मुझसे पूछा नहीं
कौन हूँ मैं, ये मैं भी नहीं जानता
आईने का कोई अक्स बतलायेगा
असलियत क्या मेरी, मैं नहीं मानता
मेरे चेहरे पे अनगिन मुखौटे चढ़े
वक्त के साथ जिनको बदलता रहा
मैने भ्रम को हकीकत है माना सदा
मैं स्वयं अपने खुद को हूँ छलता रहा

हाथ आईं नहीं मेरे उपलब्धियाँ
बालू मुट्ठी से पल पल खिसकती रही

बीन के राग को छेड़ने के लिये
हाथ की लाल मेंहदी सिसकती रही

यज्ञ करते हुए हाथ मेरे जले
मंत्र भी होंठ को छू न पाये कभी
आहुति आहुति स्वप्न जलते रहे
दॄष्टि के पाटलों पे न आये कभी
कामनायें ॠचाओं में उलझी रहीं
वेद आशा का आव्हान करते रहे
उम्र बन कर पुरोहित छले जा रही
ज़िन्दगी होम, हम अपनी करते रहे

दक्षिणा के लिये शेष कुछ न बचा
अश्रु की बून्द आँजुर में भरती रही

बीन के राग को छेड़ने के लिये
हाथ की लाल मेंहदी सिसकती रही
एक बढ़ते हुए मौन की गोद में
मेरे दिन सो गये मेरी रातें जगीं
एक थैली में भर धूप, संध्या मेरे
द्वार पर आके करती रही दिल्लगी
होके निस्तब्ध हर इक दिशा देखती
दायरों में बँधा चक्र चलता रहा
किससे कहते सितारे हॄदय की व्यथा
चाँद भी चाँदनी में पिघलता रहा

एक आवारगी लेके आगोश में
मेरे पग, झाँझरों सी खनकती रही

एक सूरज रहा मुट्ठियों में छुपा
रोशनी दीप के द्वार ठहरी रही
धुन्ध के गांव में रास्ता ढूंढती
भोर से साँझ तक थी दुपहरी रही
मौन आईना था कुछ भी बोला नहीं
प्रश्न पर प्रश्न पूछा करी हर नजर
साफ़ दामन बचा कर निकलती रही
अजनबीबन के हर एक राहे गुजर

और स्वर की नई कोंपलों के लिये
इक विरहिणी बदरिया बरसती रही

रूप मुझसे खफ़ा होके बैठा रहा
वस्ल की एवजों में जुदाई मिली
मैने चाहा था भर लूँ गज़ल बाँह में
किन्तु अतुकान्त सी इक रूबाेई मिली
मेरा अस्तित्व है मात्रा की तरह
अक्षरों के बिना जो अधूरी रही
मैं चला हूँ निरन्तर सफ़र में, मगर
रोज बढ़यी हुई पथ की दूरी रही

काल ने कुछ न छोड़ा किसी हाट में
साँस टूटी हुई हाथ मलती रही

गूँज पाई नहीं गूँज घड़ियाल की
मंदिरों में नहीं हो सकी आरती
कोई दीपक सिराने यहाँ आयेगा
रह गईं आस-बूटे लहर काढ़ती
बाँच पाये कथायें पुरोहित नहीं
कोई श्लोक क्रम से नहीं मिल सका
हो न पाई कभी पूर्ण आराधना
अर्चना के लिये फूल खिल न सका

एक सुकुमार गोरी किरन के लिये
प्यास भोले शलभ की मचलती रही

अर्थ विश्वास के दायरों में बंधे
सत्य को सर्वदा भ्रम में दाले रहे
मोमबत्ती जला ढूंढ़ता सूर्य था
पर अंधेरों में लिपटे उजाले रहे
प्यास सावन लिये था खड़ा व्योम में
कोई पनघट बुझाने को आया नहीं
तार पर सरगमें रोते रोते थकीं
साज ने गीत पर गुनगुनाया नहीं

और बदनामियों से डरी, मुंह छुपा
बिजली बादल के घर में कलपती रही

बीन के राग को छेड़ने के लिये
हाथ की लाल मेंहदी सिसकती रही

राकेश खंडेलवाल
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यादों के मानसरोवर


संझवाती के दीपक की लौ के लहराते सायों में जब
धुंधले धुंधले आकारों के कुछ चिन्ह नजर आ जाते हैं
यादों के मानसरोवर की लहरों से उड़कर राजहंस
उस घड़ी शाम के ढलते ही अंगनाई में आ जाते हैं

बीते कल के चित्रों में कुछ बदलाव न कर पाती कूची
आँखों में आ लहराती है फिर एक अधूरी वह सूची
जिसमें चिन्हित पल जब हमने आशा के विरवे बोये थे
जिनके अंकुर ,बरसों बीते, प्रस्फ़ुटित नहीं हो पाते हैं

यादों के मानसरोवर की लहरों से उड़ कर राजहंस
उस घड़ी शाम के ढलते ही अंगनाई में आ जाते हैं

नजरों की खोज भटकती है मावस की सूनी रातों में
सुधियों के पत्र बिखरते हैं, साँसों के झंझावातों में
पाटल पर बनते सपनों के रंग गडमड हो कर रह जाते
जब मन की सोई झीलों में कुछ कंकर फेंके जाते हैं

यादों के मानसरोवर की लहरों से उड़कर राजहन्स
उस घड़ी शाम के ढलते ही अंगनाई में आ जाते हैं

अजनबियत जब बँध जाती है, परिचय के कोमल धागों से
जैसे सरगम का जुड़ता है नाता आवारा रागों से
उस परिचय के पथ में कोई जब ऐसा मोड़ मिला करता
जब शब्द अधर को छूने से पहले ही फिसले जाते हैं

यादों के मानसरोवर की लहरों से उड़कर राजहंस
उस घड़ी शाम के ढलते ही अंगनाई में आ जाते हैं

इतिहासों के घटनाक्रम जब, सहसा ही हो जाते जीवित
विस्तारित अंबर की सीमा, मुट्ठी में हो जाती सीमित
चेहरे पर आँसू की रेखा बन कर पगडंडी रह जाते
धूमिल से चिन्ह,धुंआसे जब कुछ और अधिक हो जाते हैं

यादों के मानसरोवर की लहरों से उड़कर राजहंस
उस घड़ी साँझ के ढलते ही अंगनाई में आ जाते हैं
राकेश खंडेलवाल
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चाँदनी जब नाम पूछे

चाँदनी जब नाम पूछे,तुम कहो हम क्या बतायें
प्रीत के ये गीत बोलो कब तलक हम गुनगुनायें

हाँ तुम्हारे कुंतलों की छाँह ने निंदिया संवारी
हाँ तुम्हारी दॄष्टि ने विधु की विभा मेरे संवारी
हाँ तुम्हारे चित्र ने साकार मेरी भावना की
और हाँ स्पर्श ने मेरे हृदय को चेतना दी

पर " अहं ब्रह्मास्मि" के वाग्जालों में फंसे हम
ज़िन्दगी पर है तुमहारा, किस तरह, अनुग्रह बतायें

शब्द ने छूकर अधर को, बोल सीखे हैं ,तुम्हारे
और पा स्पर्श, आशा के खुले हैं राज द्वारे
ओढ़नी अहसास लहराई पा इंगित तुम्हारा
अर्थ के अनुपात से अभिप्राय जुड़ता सा हमारा

पर शिराओं में संवरती शिंजिनी की झनझनाहट
से सपन रंग कर नयन में किस तरह बोलो सजायें

हाँ तुम्हारे आलते ने अल्पना के चित्र खींचे
हाँ तुम्हारे होंठ ने हैं प्यास को मधुघट उलीचे
हाँ तुम्हारी अर्चना ने दीप को सौंपी शिखायें
हाँ तुम्हारे पग-कमल से मंत्रणा करतीं दिशायें

पर क्षितिज की अलगनी पर सांझ के लटके रवि सी
साध की इस छटपटाहट को कहो कैसे मनायें
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गोकुल आवाज़ें देता है

लालायित शब्द अधर के हैं, सरगम का चुम्बन पाने को
पर तार न छिड़ते वीणा के, स्वर टूट गले में जाता है

ओढ़े खामोशी बैठे हैं, मन की कुटिया घर का अँगना
पायल से रूठा लगता है, गुमसुम है हाथों का कँगना
नयनों की सेज सजी, पल पल आमंत्रित करती रहती है
पर मिलन-यामिनी को करने साकार, नहीं आता सपना

अँगड़ाई लेते हुए हाथ आतुर हैं कुछ क्षण पकड़ सकें
द्रुत-गति से चलता समय मगर, कुछ हाथ नहीं आ पाता है

अंबर की सूनी बाहों में बादल भी एक नहीं दिखता
पदचिन्ह बिना सूनी तन्हा, सागर तट बिछी हुई सिकता
मन का वॄंदावन सूना है, कालिन्दी के फिसलन वाले
घाटों पर एक निमिष को भी, भावों का पांव नहीं टिकता

गोकुल आवाज़ें देता है, हरकारे भेजे गोवर्धन
पर बढ़ा कदम जो मथुरा को, अब लौट न वापस आता है

दीपक की ज्योति निगल कर तम फैलाता है अपने डैने
सन्ध्या प्राची की दुल्हन को पहनाती काजल से गहने
बादल के कफ़न ओढ़ चन्दा, सोता यौवन की देहरी पर
मेंहदी के बोल मौन रहते, पाते हैं कुछ भी न कहने

आँजुर की खुली उंगलियो से रिसते संकल्पों के जल सा
प्रत्याशित सौगंधों का क्षण, फिर एक बार बह जाता है .
राकेश खंडेलवाल
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बदलती रही


हम हुए अजनबी खुद से भी, आपकी
सिर्फ़ तस्वीर ही बस बदलती रही

आईने की परेशानियों का सबब
क्या मुखौटे थे मेरे या मैं खुद ही था
अक्स जिनको दिखाता रहा आईना
एक कोई भी उनमें से मेरा न था
अक्स के अक्स का अक्स महसूसती
अपने ही अक्स में आईने की नजर
बिम्ब कितने प्रतीक्षित रहे मोड़ पर
खत्म हो जाये असमंजसों का सफ़र

इक ऊहापोह में थी उलझ रह गई
रश्मियाँ बर्फ़ जैसे पिघलती रही

गांव की चंद पगडंडियो< के सिरे
आँख मलते हुए स्वप्न बुनते रहे
फड़फड़ाते हुए पॄष्ठ इतिहास के
इक भविष्यत को रंगीन करते रहे
काल के चक्र से हाथ की रेख का
न समन्वय हुआ एक पल के लिये
धागे बाँधे सदा बरगदों के तले
मन्नतों के मगर जल न पाये दिये

और समय की गुफ़ा में किरण आस की
रास्ता ढूँढ़ती बस भटकती रही

हम अभी तक खड़े हैं उसी मोड़ पर
तुम जहाँ थे रूके एक पल के लिये
मुट्ठियों में हैं अवशेष, शपथों के जो
थीं उठाईं गई उम्र भर के लिये
दॄष्टि का मेरा आकाश सिमटा हुआ
कुछ न दिख पाता इक दायरे के परे
दीप थाली में नजरें चुराता रहा
मंत्र भी प्रार्थना के हैं सहमे डरे

शेष बाकी नहीं गर्द भी राह में
सीटियाँ बस हवाओं की बजती रहीं

नित बदलते हुए विश्व चलता रहा
कोई ठहराव गति में नहीं आ सका
ज़िन्दगी दौड़ते दौड़ते चल रही
एक पल भी नहीं हाथ में आ सका
भावनायें बिछी रह गईं राह सी
और संबंध पहियों से चलते रहे
आस्था ने उगाये जो सूरज सभी
भोर को सांझ करके निगलते रहे

आप भी साथ बदलें हमारे यही
साध बस एक सीने में पलती रही

हम बदल कर हुए अजनबी, आपकी
सिर्फ़ तस्वीर ही बस बदलती रही
तुमने जिसको सुना गूँज थी मौन कीजो कि उजड़ी बहारों में छुप रह गईआगमन की प्रतीक्षा मदन की लियेकोंपलें आँख खोले हुए रह गईंटूटे शीशे की आवाज़ संगीत बनलहरियों पे हवा की बिखरती रही
गंध जो संदली थी हवा में उड़ी
पेड़ की पत्तियों में सिमटती रही
इक नजर में न बदली, मगर दूसरीमें वो तस्वीर फिर भी बदलती रही
पत्थरों में उगी नागफ़नियां रहीं
आप भ्रम से उन्हें फूल कहते रहेस्रोत सपनों के खंडहर से निकले हुएनैन के निर्झरों से टपकते रहेआईने पर जमी गर्द में आईनाबिम्ब अपना नहीं देख पाया कभीहाँ नजर के भरम में उलझते हुएतुम रहे ,वे रहे और रहे हैं सभीएक वह मिथ्या भ्रम तोड़ने के लियेकोशिशें लेखनी नित्य करती रही
हम बदल कर हुए अजनबी आपकीसिर्फ़ तस्वीर ही इक बदलती रही
रात जैसे तो मन के अंधेरे रहेऔर चेतन को संशय हैं घेरे रहेहो गईं बंद पत्तों की जब जालियाँरोशनी क्या छनी और बरसात क्यामॄग तो तॄष्णा के पीछे भटकता रहाऔर ये सत्य मन में अटकता रहा
क्यों छलावों में लिपटी रही ज़िन्दगी
स्वप्न क्यों हर, कली सा चटकता रहा
कौन सा है निमित साथ लेकर जिसेउम्र धड़कन से बंध कर ढुलकती रही
हम हुए अजनबी खुद से भी आपकीसिर्फ़ तस्वीर ही इक बदलती रही
राकेश
ooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooooo

चित्र मावस का था
राहें ठोकर लगाती रहीं हर घड़ी
और हम हर कदम पर संभलते रहे
कट रही ज़िन्दगी लड़खड़ाते हुए
स्वप्न बनते संवरते बिगड़ते रहे

चाह अपनी हर इक टंग गई ताक पर
मन में वीरानगी मुस्कुराती रही
आस जो भी उगी भोर आकाश में
साँझ के साथ मातम मनाती रही
अधखुले हाथ कुछ भी पकड़ न सके
वक्त मुट्ठी से पल पल खिसकता रहा
शब्द के तार से जुड़ न पाया कभी
स्वर अधूरा गले में सिसकता रहा

कोई भी न मिला मौन जो सुन सके
सुर सभी होठ पर आ बिखरते रहे

जेठ गठजोड़ मधुबन के संग कर रहा
कोंपलें सब उमीदों की मुरझा गईं
टूट कर डाल से उड़ गये पात सी
आस्थायें हवाओं में छितरा गईं
देह चन्दन हुई, सर्प लिपटे रहे
मन के मरुथल में उगती रही प्यास भी
कल्पनाओं के सूने क्षितिज पर टंगा
पास आया न पल भर को मधुमास भी

हाथ में तूलिका बस लिये एक हम
चित्र मावस का था, रंग भरते रहे

भोर को पी गई इक किरण सूर्य की
साँझ दीपक बनी धार में बह गई
टिमटिमाते सितारों की परछाईयाँ
रात की ओढ़नी पर टँकी रह गईं
प्यास हिरना की बनकर भटकते सपन
नींद सो न सकी एक पल के लिये
अर्थ पाने की हम कोशिशें कर रहे
जो बुजुर्गों ने आशीष हमको दिये

मान्यताओं के घाटों पे काई जमी
हम कदम दर कदम बस फिसलते रहे
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प्यार की पाती

लिखी है पाँखुरी पर ओस से जो भोर ने आकर
तुम्हारे नाम भेजी थी वो मैने प्यार की पाती
चितेरी वादियों में गंध ने पुरबाई से मिलकर
सपन की चूनरी, है जन्म के अनुबंध से काती

नयन की छैनियों ने कल्पना को शिल्प में ढाला
हृदय की आस ने वरदान को आकार दे डाला
हजारों साधनायें आज हैं अस्तित्व में आईं
तपस की साध ने जिनको अभी तक मंत्र में पाला
ढली है आज जो प्रतिमा, तुम्हें शायद विदित होगा
क्षितिज पर रोज ही प्राची, यही इक चित्र रच जाती

अधर के बोल के आमंत्रणों का आज यह उत्तर
गगन से रश्मियों के साथ आया है उतर भू पर
बँधे जो धड़कनों से साँस के सौगन्ध के धागे
लगा है गूँजने कंपन भरा उनका सुरीला स्वर
मचलतीं लहरियाँ फिर आज वे सब गुनगुनाती सी
जिन्हें हम छेड़ते थे साँझ को करते दिया-बाती

लगा यायावरी हर कामना ने नीड़ पाया है
तुम्हारे पंथ ने सहचर मुझे अपना बनाया है
पड़ी इक ढोलकी पर थाप, ने शहनाई से मिल कर
पिरो नव-राग में वह गीत फिर से गुनगुनाया है
जिसे तुम बैठ कर एकाकियत के मौन इक पल में
नदी की धार के संग सुर मिला कर थीं रही गाती

राकेश खंडेलवाल
अगस्त २००५

15 अगस्त

आ गया है आज फिर इतिहास से उठ कत वही दिन
और फिर उस पर मुलम्मा हम चढ़ाते जा रहे हैं

उत्तरों की कर प्रतीक्षा प्रश्न ने दम तोड़ डाला
पंच वर्षी स्वप्न का इस बार भी है रंग काला
वायदों के शब्द अंबर में टँगे बन कर सितारे
चाँद का साया नहीं पाया, गगन कितना खंगाला
शुष्क आँखों में न कण भी अश्रुओं का शेष बाकी
शून्य के साम्राज्य में हर कामना है छटपटाती
व्योम की हर वीथि का अवरोध गिद्धों ने किया है
एक गौरैया सहज सी आस की भी उड़ न पाती

फ़र्क क्या पड़ता किसी को , हो खरा, खोटा भले हो
माँग सिक्के की, जिसे हम सब चलाये आ तहे हैं

नीम की शाखाओं पर आ धूप तिनके चुन रही है
बाँसुरी शहनाईयों की मौन सरगम सुन रही है
बादलों के चंद टुकड़ों की कुटिल आवारगी के
साथ मिल षड़यंत्र, झालर अब हवा की बुन रही है
फूल के संदेश माली कैद कर रखने लगा है
योजना के चित्र पर फिर से सपन उगने लगा है
मच रहे हड़कंप में बाजी उसी के हाथ लगती
जो दिये को नाग के फन पर यहाँ रखने लगा है

स्वर्ण-पल के आठवें वर्षाभिनन्दन का समारोह
किन्तु हम फिर भी मनाते जा रहे हैं, गा रहे हैं.)


राकेश खंडेलवाल

है सभी कुछ वही

एक दीपक वही जो कि जलते हुए
मेरे गीतों में करता रहा रोशनी
एक चन्दा वही, रात के खेत में
बीज बो कर उगाता रहा चाँदनी
एक पुरबा वही, मुस्कुराते हुए
जो कि फूलों का श्रन्गार करती रही
एक बुलबुल वही डाल पर बैठ जो
सरगमों में नये राग भरती रही


भोर भी है वही, औ वही साँझ है
सिर्फ़, लगता है मैं ही बदलने लगा

जो संदेसा सुबह ने था आके दिया
आवरण था नया, बात थी पर वही
हैं वही चंद उलझे हुए फ़लसफ़े
है कहानी वही जो रही अनकही
है वही धूप गुडमुड सी लटकी हुई
अलगनी के अकेले उसी छोर पर
है वही एक खामोश पल वक्त का
मुँह छुपाता, गली के खडा मोड पर

मंज़िलें भी वही, राह भी है वही
सिर्फ़ निश्चय सफ़र का बदलने लगा

है धुआँसा धुआँसा वही आँगना
वो ही कुहरे में लिपटा हुआ गाँव है
वो ही साकी, वही मयकदा है, वही
लडखडाते, सँभलते हुए पाँव हैं
वो ही दहलीज आतुर बिछाये नयन
आस पग चुम्बनों की सजाये हुए
और यायावरी एक जोगी वही
धूनी पीपल के नीचे रमाये हुए

रंग भी हैं वही, कैनवस भी वही
तूलिका का ही तेवर बदलने लगा

राकेश खंडेलवाल

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...