मेरे दर्पण की परछाईं के नैन में चित्र तेरे नजर मुझको आते रहे
मेरे अधरों पे तेरे सुरों से जगे, गीत, आकर गज़ल गुनगुनाते रहे
मेरे सपनों का विस्तार सिमटा रहा,तेरे लहराते आँचल के अंबर तले
तेरे अहसास के दीप हर साँझ को, मेरी गलियों में आ जगमगाते रहे
तूलिक मचली जब उंगलियों में मेरी, चित्र तेरे ही केवल बनाती रही
तेरे होठों की स्मित का स्पर्श पा, बाग की हर कली मुस्कुराती रही
लेखनी कोशिशें करते करते थकी, पर नहीं न्याय कर पयी है रूप से
चूम कर पग तेरे भोरे की रश्मियाँ मेरी राहों में कंचन लुटाती रहीं.
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
नव वर्ष २०२४
नववर्ष 2024 दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...
-
प्यार के गीतों को सोच रहा हूँ आख़िर कब तक लिखूँ प्यार के इन गीतों को ये गुलाब चंपा और जूही, बेला गेंदा सब मुरझाये कचनारों के फूलों पर भी च...
-
नववर्ष 2024 दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...
-
परिभाषा उस एक निमिष की खोज रहा हूँ जिस पल तुमने होठों से न कहते कहते आँखों से मुझको हाँ की थी वह पल जब शाकुन्तल सपने, सँवरे थे दुष्यन्त नयन ...
1 comment:
"मेरे दर्पण की परछाईं के नैन में चित्र तेरे नजर मुझको आते रहे"
वाह ! वाह !
Post a Comment