संध्या की नजरें धुँधलाने

 

संध्या की नजरें धुँधलाने

दिन भर चल चल कर थका हुआ सूरा अलसाने लगता है
तब ललक प्रतीची सिंदूरी आँचल की छाया कर देती

संध्या की नजरें धुँधलाने लगती हैं जब धीरे धीरे
अम्बर नीचे झुकि कर देता पालकों को थोड़ा सुरमई
तब दूर कहीं से झोंकों के दामन को पकड़ के अपने
यादों की बारादरियीं में बजती धीमी सी शहनाई

तब खुले निशा के वातायन से किरणों की डोरी थामे
इक सुखद मधुर अनुभूति उतर बागों में मुझको भर लेती

गुलमोहर की पंखरियों से छलके हुए मधुप के कुछ चुम्बन
तितली के पंख, कैनवस कर तब चित्र उकेरा करथे हैं
गुलदानों से अंगड़ाई ले जागी ख़ुशबू के उमड़ मेघ
साँसों की गलियों में आकर मृदु गंध बिखेरा करते हैं

सुधियों के धूमिल पन्नों से धूलों की परतों को बहार
कच्चे यौवन की घटनाएँ मुझको विभोर आ कर देती

नदिया के तट पर नीम तले अधलेटि अलसी दोपहरी
जितने थे लिखे गिरे पत्तों पर टेढ़े मेढ़े कुछ अक्षर
उनमें उभरे थे स्वस्ति चिह्न सहसा ही कुछ अनुबंधों के
लगता था समय चक्र की गति उस पल पर ही  थी गई  ठहर

उनके ही बिम्ब उभरते हैं यामिनी के तारन आँचल में
उस आलोड़न की आवृतियाँ मन में हिलोर ला भर दती


दर्पण कहीं पिघल न जाय

 अरे सद्यःस्नात रूपसी! बिम्ब न अपना अभी निहारो

खिली रूप की तपी धूप से दर्पण कहीं पिघल न जाए

गुँथी हुई मुक्ता वाल्लरियाँ कजरे मेघों से चिकुरों में
उनसे प्रिज़्मित रंग धनक के एक पुंज में घनीभूत है
जिससे दमक रही हर वादी. वन विहार एकांत समुच्चय
गोचर और अगोचर सब ही एक उसी के वशीभूत हैं

अभी अभी नादिया के जल की सिहरन थोड़ा शांत हुई है
परछाई को छू कर तेरी से जल तरंग फिर मचल न जाए

पलक  खोल कलियों के पाटल बाट तुम्हारी जोह रहे हैं
चम्पा जूही और चमेली, भुजबँधन   बनने को आतुर
बेला गुँथा स्वयं गजरे में और गुलाब की मृदुला पाँखरी
सोच रहीं हैं बनें किस तरह पग में बन गंधों के नूपुर

सोच समझ कर करना बगिया में प्रवेश धीमे शतरूपे
पदचापों की मलयज़ छूकर मौसम कहीं बहक ना जाए

कलसाधिके!  मंगल वंदन को आतुर है दिवस तुम्हारा
लेकर पूजा थाल चरण जब रखना अपने, देवालय में
प्राण प्रतिष्ठित प्रतिमा में जो, विचलित भी शायद हो सकते
देख तुम्हारी आभा छिटकी अवनि व्योम सम्पूर्ण निलय में

 

अर्घ्य चढ़ाओ कलश लिए तुम ही नतमस्तक अरे मानिनी

विश्वामित्री संकल्पों का निश्चय कहीं बदल न जाये


कनक तुली सी चंदन काया

 



कनक तुली से चन्दन काया 
पर कुंतल के मेघ घनेरे 
चन्दन वन की राहों में ज्यों 
ताक  लगाए खड़े सपेरे 

नील झील की लहरों से जब डुबकी लेकर निकली रूप​सि ​
लगा सूर्य निकला हो जैसी , लगे भोर के पल मुस्काने 

गात उगी हो ​खा​द्याहानों में
ज्वार छरहरी ​ ले ​ अंगड़ाई 
या कि सरो के इक पौधे पर
आइअभी अभी तरुणाई 

झुकी हुई कचनारी शाख़ों ने गलबहियाँ डाक दुलारा 
कलियों के सहचर होकर तब लगे मधुप नव राग सुनाने 

कंगन गढ़े चमेली ने आ
और मोतिया गजरा  गूँथे
कटिबंधन को हरसिंगार था
पुरवाएँ नूपुर बन गूंजे 

ऋतु गंधी समीर ने ली आ यौवन की पहले अंगड़ाई
दिशा दिशा हो मंत्रमुग्ध तब अलगोजों को लगी बजाने 

षोडस शृंगारों की पंक्ति
सज्जा करने को लालायित
मेहंदी बिखरी, कुंकुम चमका
हुआ अलकतक भी अभिरंजित

तौं बिखरे यौवन की कंचन धूप सुनहरी अंगड़ाई में
इंद्रधनुष उतरे अम्बर से पालकों को लग गाए सजाने

यायावर वनपकी मन का

 



मन का आवारा वन पाखी
ताका करता हर एक दिशा
फिर पंख फड़फड़ा रह जाता

तय की है उसने पगडंडी
चढ़ बही हवा के छोरों पर
उन तथाकथित गंतव्यों की
लौटा है साथ लिए झोली
अपने कोशों को लूटा, गाँव
पूँजी अपने मंतव्यों की

हर एक दिशा में यही हाल
पूरब पश्चिम, उत्तर दक्षिण
कुछ समझ नहीं उसको आता

उगते देखे चौराहों पर
मौसम ने बदली जब करवट
भ्रामक फूलों की नई फसल
केवल बदली हैं शाखायें
अंकुर वे ही प्रस्फुटित हुए
जो टहनी से कल गए फिसल

बरसों से घिसा पिटा ये ही
इतिहास अर्थ अपना खोकर
फिर फिर अपने को दुहराता

आती है उजड़ी गलियों में
पथ भूल वहीं, गुजरी थी कल
जिस द्वारे से उठ कर डोली
धुल चुके रंग, है स्याह वसन
चलते राजस गलियारों में
लेकर फिर से सूरत भोली

अमृत का देकर नाम आज
यह खोटा सिक्का वही पुनः
लाकर के भूनवाया जाता

कोई भी गंध नहीं उमड़ी

  कोई भी गंध नहीं उमड़ी  साँसों की डोरमें हमने, नित गूँथे गजरे बेलकर लेकिन रजनी की बाहों में कोई भी गंध नहीं साँवरी नयनों में आंज गई सपने ज...