पढ़ कर सुनाये गुनगुनाते

पृष्ठ पर किसने हवा के याद के कुछ गीत लिख कर
पांखुरी से कह दिया पढ़ कर सुनाये गुनगुनाते
 
जलतरंगों से सिहरती धार की अवलोड़ना में
हो रही तट की प्रकम्पित सुप्त सी अवचेतना में
झाड़ियों पर टँक रही कंदील में जुगनू जलाकर
सांझ को ओढ़े प्रतीची के अधर पर स्मित जगा कर
 
कौन है जिसने उड़ाकर बादलों की चादरों को
बून्द को सन्देश भेजा द्वार पर अपने बुलाते
 
दोपहर में ओक-मेपल के तले इक लम्ब खींचे
कौन पल भर के लिये आकर रुका है आँख मींचे
फ़ेंकता है कौन पासे धूप से बाजी लगाकर
रंग भरता है धुंधलके में अजाने कसमसाकर
 
डालता है कौन मन की झील में फ़िर कोई कंकर
तोड़ता है इन्द्रजाली स्तंभनों को हड़बड़ाते
 
एक पल लगता उसे शायद सभी पहचानते हैं
और है मनमीत यह भी बात सब ही जानते हैं
किन्तु दूजे पल बिखरते राई के दानों सरीखा
छूट जाता हाथ से पहचान पाने का तरीका
 
प्रश्न यह अनबूझ कब से सामने लटका खड़ा है
और हल कर पायें रहतीं कोशिशें बस छटपटाते

तीन देवों का आशीष तीनों दशक

तीन देवों का आशीष तीनों दशक
हर दिवस था सुधा से भरा इक चषक
हर निशा स्वप्न के पुष्प की क्यारियाँ
भोर निर्झर घने रश्मियों के अथक
 
आज इस मोड़ पर याद आने लगे
और पल झूम कर गुनगुनाने लगे
 
दीप के साथ जलती अगरबत्तियां
धूप,तुलसी प्रसादी कलश नीर के
क्षीर का सिन्धु,गोकुल दधी के कलश
पात्र छलके हुए पूनमी खीर के
चन्दनी शीत मं घुल हिनाई महक
केवड़ों में भिगोते हुए वेणियाँ
कामनाओं की महकी हुई रागिनी
मंत्र पूरित स्वरों की पकड़ उंगलियाँ
 
आज जैसे विगत छोड़ आये निकट
और फिर बांसुरी सी बजाने लगे
 
दोपहर ला खिलाती रही पंथ में
फूल गमलों में बो सुरमई सांझ के
सांझ ने ओढ़नी पर निशा की रखे
चिह्न दीपित हुये एक विश्वास के
मानसी भावना ताजमहक्ली हुई
धार रंगती रही नित्य परछाईयाँ
सांस की रागिनी प्रीत की तान पर
छेड़ती थी धुनें लेके शहनाईयां
 
दृश्य वे सब लिये हाथ में कूचियाँ
चित्र फिर कुछ नये आ बनाने लगे
 
एक आवारगी को दिशा सौंप कर
वाटिकायें डगर में संवरती रहीं
ध्येय की फूलमालाओं को गूँथती
भोर अंगनाई में आ विचरती रही
पल के अहसास की अजनबी डोर ने
नाम अपने लिये इक स्वयं चुन लिया
थे बिखरते रहे झालरी से फिसल
भाव ,मन ने उन्हें सूत्र में बुन लिया
 
दृष्टि के दायरे और विस्तृत हुये
व्योम के पार जा झिलमिलाने लगे
 
वीथियाँ पग जिन्हें चूमते आ रहे
कुछ परे गंध से,कुछ रहीं मलयजी
कुछ विजन की दुशाला लपेटे हुये
और कुछ थीं रहीं वाटिका सी सजी
पल कभी साथ में होके बोझिल रहे
वक्त जिनमें रहा होके फ़ौलाद सा
और कुछ थे पखेरू बने उड़ गये
एक भी हाथ अपने नहीं आ सका
 
देख कर सारिणी में अपेक्षा सजी
प्राप्ति के पल सभी मुस्कुराने लगे
 
सांझ के रथ चढ़ा नीड़ जाता हुआ
कह रहा है दिवाकर सजाओ सपन
जो चला पोटली को उठा कर विगत
सौंप दो तुम उसे संचयित सब थकन
शब्द जो थे जगे अग्नि के साथ में
आहुती दे उन्हें प्रज्ज्वलित फ़िर करो
शेष जो आगतों के परस में छिपा
साथ भुजपाश में उसको मिल के भरो
 
प्रीत के भाव उल्लास से भर गये
नूपुरों की तरह झनझनाने लगे

लिखा था तुमने खत में.

आये वे पल याद
अचनक बहुत दिनों के बाद
चले थे चार कदम तुम साथ
एक अनजाने पथ में

सपनों के प्याले फिर से लग गये छलकने
आशाओं के पंछी लगे गगन में उड़ने
महक भर गई नये दिवस की आ सांसों में
रजनीगंधा दोपहरी में लगी महकने

होंठ पर आया था जब नाम
हँसी थी यमुना तट पर शाम
थिरकने लगे नृत्य में पांव
उस घड़ी वंशीवट में

सौगंधों की रेशम डोरी फिर लहत्राई
पीपल पत्रों ने सारंगी नई बजाई
मंदिर की चौखट पर संवरीं वन्दन्वारें
अम्बर ने थी पिघली हुई विभा बरसाई

लगे थे बजने मधुरिम गीत
उमड़ती थी हर पग में प्रीत
गये हैं एकाकी पल बीत
लिखा था तुमने खत में.

समय चक्र की फिर परिवर्तित गति आवारा
जो धो गई ह्रदय का सजा हुआ चौबारा
बहती हुई हवा ने मिलन बांसुरी पर जब
डूबा हुआ विरह में ही हर राग संवारा

अटक कर रही नजर उस मोड़
गया था मन को कोई झिंझोड़
चले तुम गए मुझे थे छोड़
चढ़े फूलों के रथ में

पत्थरों के देवता पे कुछ असर हुआ नहीं

अर्चना के दीप नित्य अनगिनत जलाए थे
प्रार्थना के गीत  भोर सांझ   गुनगुनाये थे
शीश टेकते रहे थे चौखटों पे भोर सांझ
भक्ति में डुबो के फूल पांव पर चढ़ाए थे
पत्थरों के देवता पे कुछ असर हुआ नहीं
हम जहां थे बस वहीं अड़े हुए ही रह गए

अंत हो सका नहीं है रक्तबीज आस का
छिन्न हो गया अभेद्य जो कवच था पास का
वक्त हो पुरंदरी खडा हुआ आ द्वार पर
कुण्डलों को साध के वो ले गया उतार कर
लेन देन का हिसाब इस तरह हुआ कि हम
दान तो दिये परन्तु हो ऋणी ही रह गये

ढूँढ़ते जिसे रहे हथेलियों की रेख में
वो छुपा हुआ रहा सदा ही छद्म वेश में
हम नजर के आवरण को तोड़ पर सके नहीं
अपने खींचे दायरों को छोड़ पर सके नहीं
दिवासपन मरीचिकाओं से बने थे सामने
एक बार फिर उलझ के हम वहीं ही रह गए

प्रश्न थे हजार पर न उत्तरों की माल थी
ज़िंदगी से जो मिली, वो इस तरह किताब थी
हल किये सवाल किन्तु ये पता नहीं चला
कौन सा सही रहा, है कौन सा गलत रहा
जांचकर्ता मौन ओढ़ कर अजाने ही रहे
अर्थ कोशिशों के घोष्य बिन हुए ही रह गए

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...