अभी विश्वास करता है

सिमटने लग गई थी जब उजाले की बिछी चादर
छलकने लग गई थी जब अंधेरे की भरी गागर
हुए यायावरी पग भोर में जो, लौट घर आये
पिघल कर स्वर्ण के टुकड़े, लहर के साथ मुस्काये
नयन में घोल कर विश्वास था तुमने कहा मुझसे
हमारा साथ है जैसा सितारों का रहा नभ से

अभी तक यह अकेला मन , वही पल याद करता है
किसी दिन लौट कर आओगे तुम विश्वास करता है

हथेली पर खिंची रेखायें धुंधली लग गई होने
प्रतीक्षा के सभी पल अब लगे हैं अर्थ भी खोने
बुझी जल जल हजारों बार मन के दीप की बाती
निरन्तर आस की बदली रही छँटती, रही छाती
चली आई पलट कर सिन्धु को उमड़ी हुई आंधी
सिमटने लग गई ब्रज की नदी के तीर की चाँदी

कदम्ब की छांह में मन पर अभी तक रास करता है
किसी दिन लौट कर आओगे तुम विश्वास करता है

निगाहों के विजन में हो नहीं पाई कोई हलचल
बना पत्थर ह्रदय ये वावला, हो भाव से वि्ह्वल
निरुत्तर रह गये सब प्रश्न जो थे सामने आये
मिले जितने, सभी उत्तर समझ में आ नहीं पाये
कदम को रोकने में लग गई जब राह बन बाधा
ह्रदय ने जिस सुनहरी आस का धागा रहा बांधा

वही धागा दिलासे की निरन्तर बात करता है
किसी दिन लौट कर आओगे तुम विश्वास करता है

गीत कलश का चारसौवाँ पुष्प- माँ शारदाके चरणों में-मेरा मन लौट कर वृन्दावनी हो

छा गई आ कहकहों पर एकदम गहरी उदासी
रंग की अनुभूतियां लेने लगीं पल पल उबासी
याद पर जो जम गईं थीं धूल की परतें हटीं सब
बढ़ गई दिन के पलों में कुछ अचानक बदहवासी


एक झौंका आ मुझे पुरबाईयों का छू गया तो
हो गया आतुर मेरा मन लौट कर वृन्दावनी हो


है सभी कुछ पास, लगता पास में कुछ भी नहीं है
कोई जो संतुष्टि का कारण रहे, बस वह नहीं है
नाम जिन पर है लिखा, संपत्तियों के ढेर भौतिक
किन्तु मन के कोष की अलमारियों में कुछ नहीं है


ढूँढ़ता मन एक मुट्ठी पंचवट की शान्ति छाया
तुष्टि न देती बनाई स्वर्ण लंका रावनी हो


भोर की पहली किरण के नूपुरों की झनझनाहट
आ जगा देती ह्रदय में इक अजब सी कसमसाहट
ताकती है दृष्टि पल पल द्वार को वातायनों को
लौट कर आये कहीं से एक परिचित सुगबुगाहट


चाह अपने आवरण को फ़ेंक कर तोड़ें मुखौटे
औ’ उड़ायें फ़ाग डूबें रंग में फिर फ़ागुनी हो


रोज ही लेकर अपेक्षायें यहाँ उगते सवेरे
हो खड़ा जाता महाजन वक्त का आ द्वार घेरे
एक पल ऐसा नहीं मिलता जिसे अपना बतायें
हों उजाले दोपहर के रात के या हों अंधेरे


नैन के आकाश पर घिरती नहीं आ कोई बदरी
चाह प्यासी है घनेरी छाँह कोई सावनी हो


चाहता मन दीप कोई सांझ, तुलसी पर जलाये
चाह है चौपाल पर कोई पुन: आल्हा सुनाये
चाह गूँजे धार पर फिर गीत मांझी के स्वरों में
चाह आ आलाव पर दरवेश कोई बैठ जाये


सोचता मन रुक गई बहती नदी के आ किनारे
दीप जिसमें जा सिराये, वो कहीं मन्दाकिनी हो

कितनी बार संजोई मुट्ठी में पर धूप

नयनों के गमलों में आशा बोती तो है फूल निशा दिन
लेकिन विधना की कूची से पंखुड़ियां छितरा जाती हैं

पुन: प्राथमिकता पाती हैं आवश्यकता फुलवारी की
और प्यास फिर रह जाती है बिना बुझी नन्ही क्यारी की
धड़कन से सिंचित बीजों का रुक जाता है पुन: अंकुरण
एक बार फिर, राख निगल लेती अंगड़ाई चिंगारी की

बुनते हुए नीड़ तिनकों से दिवस बरस में ढल जाते हैं
निमिष मात्र में आंधी की थिरकन उनको बिखरा जाती है

कितनी बार संजोई मुट्ठी में पर धूप न रहती कर में
आती उतर घटा मावस सी सावन भादों बिन ही घर में
जिसे बरसना था उपवन में वह आँखों में बरसा करती
और ओस की बूँद अटक कर ही रह जाती है अम्बर में

लगता है डर छूने से भी अभिलाषा की परछाई को
सहमी हुई भावना जाने क्यों रह रह सिहरा जाती है

रहता है अधिकार गंध पर अपनी ही, कितना चन्दन को
पट निर्धारित अब करते हैं समय प्रार्थना को वन्दन को
जिस कठपुतली के धागों का होता कोई और नियंत्रक
उसको क्या विकल्प होता है सिवा मौन रह अनुमोदन को

भ्रामक गल्प कथायें लगती हैं अनुकूल हवा की बातें
या फिर अग्निपरीक्षा् कुन्दन को अक्सर निखरा जाती है

अनलिखा पत्र हूँ

थरथराती हुई उंगलियों से फ़िसल
छांव पलकों की ओढ़े अधर चूम कर
मेज पर गिर गई इक कलम के सिरे
पर अटक रह गया अनलिखा पत्र हूँ

मन की गहराईयों से उमड़ते हुए
भाव के सिन्धु की एक भीनी लहर
पाटलों पर संवरते हुए चित्र में
रंग की संधि पर एक पल को ठहर
ओढ़ संभावना की नई सी दुहर
रात के रत्न आभूषणों से सजा
कथ्य वह जो उभरता रहा कंठ से
शब्द में जो मगर रह गया अनढला

पत्र पीपल के जिसके रहे साक्ष्य में
सांझ की झुटपुटी रोशनी में घिरे
मौन स्वर, दृष्टि की साधना में कटा
अंश में एक पल के, वही सत्र हूँ

कितने असमंजसों की भुलैय्याओं में
कितने संशय के सायों से घिरते हुए
जो हुआ स्वर्णमंडित कभी, तो कभी
रह गया बून्द बन कर बिखरते हुए
टिक गया पार पगडंडियों के कभी
व्योम से रिस रहे मेघ के तार पर
रह गया अलगनी पे लटकता हुआ
एक परछाईं सी बन के दीवार पर

जो रखी चिलचिलाती हुई धूप में
आस की टोकरी एक सहमी हुई
उसके कोमल सपन को बचाता हु
मैं शपथ के कवच का बना छत्र हूँ
जन्म जन्मान्तरों के सिरे जोड़ती
एक अनुभूति है कँपकँपाती हुई
एक अभिव्यक्ति है मौन के साज पर
धमनियों में कहीं झनझनाती हुई
आतुरा भाव हैं,गंध के,दृश्य के
श्रव्य के स्वर के इक स्पर्श के वास्ते
भावनायें हुई हैं समर्पित लिये
श्वास के फूल संचित सभी पास के
कर नियंत्रित रहा काल के चक्र को
सूत्र बुनता हुआ नित्य सम्बन्ध के
जोकि अर्चित रहा चाहना से सदा
वो अदेखा अजाना मैं नक्षत्र हूँ

शान्ति के पल ढूँढ़ता है

उठ रहे उद्वेलनों के गहन अंधड़ में उलझकर
शान्ति के पल ढूँढता है, आज मेरा मन अकेला

सीढियां चढ़ते हुए मैंने कभी सोचा नहीं था
कौन सी परछाइयों को छोड़ पीछे जा रहा हूँ
राग से बिछुड़ा हुआ है रागिनी से है अछूता
एक स्वर वह जो शिखर पर हो खड़ा मैं गा रहा हूँ

रीतियाँ बनने लगीं थीं पांव की जब बेड़ियां, तब
मैं बना रावण बिभीषण की तरह उनको धकेला

सोच तो थी गंधमादन से चुनूंगा फूल कुछ मै
लौट कर के फिर संवारूंगा गली की वाटिका को
रुक्मिणी से साथ मेरा चार दिन का ही रहेगा
और फिर भुजपाश में अपने भरूंगा राधिका को

किन्तु मैं रीझा रहा बस कांच की परछाईयों मे
स्वर्ण मुद्रा छोड़, थामा हाथ में अपने अधेला

जो नियति ने सौंप दीना था नहीं सन्तोष देता
लालसा ने पथ अंधेरी राह पर अक्सर बढ़ाये
दीप की लौ की पुकारें अनसुनी करता रहा मै
झाड़ियों में खो गया जुगनू जहाँ पर जगमगाये

सोचता था राह जो ले जायेगी चौबारियों तक
अंत पर उसके उजड़ कर था रहा बस इक तबेला

दीप जितने जले आज

दीप जितने जले आज ये देखना
कल की परछाईयां आ इन्हें न पियें
वर्त्तिकायें हँसी हैं नयन खोलकर
एक लम्बी उमर ले बरस भर जियें


कामनायें,चमक फुलझड़ी की रहे
ला दिवस नित बताशे रखे हाथ पर
गंध की झालरी नित्य चुन बाग से
फूल टाँगे नये आपके द्वार पर
रात रजताभ हों चाँदनी से धुली
दिन पिघलते हुए स्वर्ण से भर रहे
सन्दली शाख पर जो रही झूलती
आपकी वीथि में वोही पुरबा बहे


बात इतनी पुरानी सभी ये हुईं
शब्द ने अर्थ भी अब लगा खो दिये


स्वप्न सजते हुए आँख में थक गये
आस पलती हुये शून्य में मिल गई
हर बरस साध का एक पल मिल सके
कामना बस यही एक पलती रही
पर तिमिर चक्रवर्ती,रहा राज कर
टिमटिमाती रही मुँह छिपा रोशनी
और जो इक किरन थी उठी भोर में
सांझ के साथ आंसू बहा कर गई

ये कथा बस कहानी न बन कर रहे
सत्य ने दानवों के हनन थे किये


है प्रकृति का नियम ये रहा सर्वदा
पूर्णिमा आयेगी जब अमावस ढले
रात के बीतते आ उषा की किरन
पूर्व के व्योम से नित्य मिलती गले
किन्तु दीपावली पर वही दीप हैं
वे ही अँगनाई हैं, हैं वही अल्पना
लग रहा कैद पिंजरे में हो रह गई
जो क्षितिज के परे थी उड़ी कल्पना


आज बदलें चलो रीत, नूतन करें
जितने संकल्प थे ज़िन्दगी ने किये


भावना एक अपन्त्व की बस रहे
स्वार्थ पाये नहीं स्थान कोई कहीं
प्रज्ज्वलित ज्योति दीपावली की रहे
रह न पाये कलुष तम का कोई नहीं
बात होठों से निकले जो अबके बरस
शब्द में ही सिमट कर नहीं बस रहे
जो भी निश्चय करें बस वही धार बन
एक भागीरथी की निरन्तर बहे

आओ हम तुम मनायें ये दीपावली
आज संग संग यही एक निर्णय लिये

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...