मंजिल

जीवन पथ पर पल पल उगती रही लालसा इक मंज़िल की
इस मंज़िल पर आकर पाया मन्ज़िल ढूंढ रही खुद मंज़िल

थी मरीचिकाओं में लिपटी इस मंज़िल पर आती राहें
 झंझाओ की भूलभुलैया पल पल पर डाले थी डेरे
यात्रा में पाथेय नीङ का कोई अंतर  शेष नही था
पता नही था सांझ ढली कब और किस घड़ी उगे सवेरे

इस मंज़िल पर आकर यह मन प्रश्न स्वयं से ये करता है
इस मअंजिल की बहॉग दौड़ में क्या कुछ तुझे हुआ है हासिल

मोड़  मोड़ पर झंझाओ से जूझा एकाकी यायावर
बोता रहा कदमतलियों  में लाकर सूरज चांद सितारे
पार  किये अनगिन कंटक  वन फूल सजाने को इस पथ पर
यज्ञ परीक्षा की आहुति में होम किये सब स्वप्न सँवारे

थी असाध्य जो और असंभव करते रहे तपस्याएं वे
किंतु एक बादल का टुकड़ा भी छाया को न पाया मिल

इस मंज़िल पर आकर जाना, हर इक मंज़िल दिवास्वप्न है
धुँधलाये दर्पण में तिरती किसी धुंये की परछाई सी
 करती है सम्मोहित  मन को सुखद सुनहरे सपने  दर्शा
मौन किसी निर्जन  में बजती हो प्रतीत एक शहनाई सी

मंज़िल की राहों पर चलकर पा जाता हर कोई मंज़िल
कोई पाए मनचाही तो बने किसे की भटकन मंज़िल

 

में इस मंज़िल पर




जीवन के पथ पर अनगिनती मंज़िल मिलती यायावर को
में इस मंज़िल पर आकर हूँ एक नई मन्ज़िल  तलाशता

मोड़ मोड़ पर मिली मन्ज़िलें स्वागत में बाँहें फ़ैलाये
आमंत्रण देती, सन्ध्या का नीड़ वहीं अंतिम बन जाये
पथ की बाधाओ को सहकर जो परिणाम अपेक्षित पाया
कर संतोष उसी में, यात्रा वहीं पूर्ण तय कर दी जाये

 पर मन का उतावलापन तो ​नये क्षितिज की खिड़की खोले
​ दूर नजर की सीमाओं  से रहे ध्येय को फिर पुकारता


संचय की प्रवृत्ति तो जीवन का प्राकृतिक ही स्वभाव है
पूर्ण पूर्णता पा लेने पर भी लगता कुछ तो अभाव है
इस मन्ज़िल पर आकर ऐसी ही अनुभूति जगी है मन में
यह मन्ज़िल है बस मरीचिका, दूर अभी मेरा पड़ाव है

रिक्त हो गई गठरी की  में खोल तहे सीधी कर लेता
और भोर में पाथेयों की निधियां फिर नूतन निखारता ​


मन्ज़िल की परिभाषाये टी हर मंज़िल पर आकर बदलीं  
नई भोर के साथ डगर के अम्बर पर छाई नव बदली
झंझाओ से पथचिह्नों को मील सदा आयाम नए ही
कदम कदम पर संकल्पो को देख देख बाधाएं सम्भली

इस मंज़िल पर, मंज़िल ही अब दिखा रही है दूजी मंज़िल
मैं नव मंज़िल का नूतन पथ मानचित्र में हूँ संवारता 

संस्कार तो बंदी लोक कथाओं मर


संस्कार तो बन्दी लोक कथाओं में
रिश्ते नातों का निभना लाचारी है

जन्मदिनों से वर्षगांठ तक सब उत्सव
वाट्सएप की एक पंक्ति में निपट गये
तीज और त्योहार, अमावस पूनम भी
एक शब्द "हैप्पी" में जाकर सिमट गये

सुनता कोई नही, लगी है सीडी पर
कथा सत्यनारायण कब से जारी है

तुलसी का चौरा अंगनाई नहीँ रहे
अब पहले से ब​हना भाई नहीं रहे
रिश्ते जिनकी छुअन छेड़ती थी मन में
मधुर भावना की शहनाई, नहीं रहै

दुआ सलाम रही है केवल शब्दो में
​और औपचारिकता सी  व्यवहारी हैं

जितने भी थे फेसबुकी संबंध हुए
कीकर से मन में छाए मकरंद हुये 
भाषा के सब शब्द अधर की गलियों से
फिसले, जाकर कुंजीपट में बंद हुए

बातचीत की डोर उलझ कर टूट गई
एक भयावह मौन हर तरफ तारी है 

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कितनी बार जलाए

  कितनी बार जलाए हमने अपनी आशाओं के दीपक   सोचे बिना तिमिर का खुद ही हमने ओढ़ा हुआ आवरण   कल की धूप बनाएगी अपने आँगन में रांगोली ...