संस्कार तो बंदी लोक कथाओं मर


संस्कार तो बन्दी लोक कथाओं में
रिश्ते नातों का निभना लाचारी है

जन्मदिनों से वर्षगांठ तक सब उत्सव
वाट्सएप की एक पंक्ति में निपट गये
तीज और त्योहार, अमावस पूनम भी
एक शब्द "हैप्पी" में जाकर सिमट गये

सुनता कोई नही, लगी है सीडी पर
कथा सत्यनारायण कब से जारी है

तुलसी का चौरा अंगनाई नहीँ रहे
अब पहले से ब​हना भाई नहीं रहे
रिश्ते जिनकी छुअन छेड़ती थी मन में
मधुर भावना की शहनाई, नहीं रहै

दुआ सलाम रही है केवल शब्दो में
​और औपचारिकता सी  व्यवहारी हैं

जितने भी थे फेसबुकी संबंध हुए
कीकर से मन में छाए मकरंद हुये 
भाषा के सब शब्द अधर की गलियों से
फिसले, जाकर कुंजीपट में बंद हुए

बातचीत की डोर उलझ कर टूट गई
एक भयावह मौन हर तरफ तारी है 

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