रिश्ता मेरा और तुम्हारा

तुमने मुझसे पूछा क्या है रिश्ता मेरा और तुम्हारा
मुश्किल हुआ शब्द दे पायें तुमको इसका उत्तर सारा

फूलों का गंधो से जो है, नदिया का बहते पानी से
तट से जो नाता सिकता का, पत्तों का है शाखाओं से
तुमसे मेरा रिश्ता प्रियवर कुछ ऐसा ही सम्बंधित है
किसी तपस्वी का ज्यों तप से या यज्ञों का समिधाओं से

आरति से ज्यों बँधा हुआ है मंत्रों का स्वर गया उचारा
सच कहता हूँ मीत यही है रिश्ता मेरा और तुम्हारा

पूनम की रातों का रिश्ता  बिखरी हुई ज्योत्सनाओं से
जुड़ी हुई वल्गायें सूरज के रथ की ज्यों खिली धूप से
उद्यापन का नैवेद्यों से और समर्पण से जो रिश्ता
रिश्ता तुमसे मेरा ऐसे बौद्ध मठों का ज्योंकि स्तूप से

साहूकार से समबन्धित ज्यों कर्जदार के घर का द्वारा
वैसे ही तो है शतरूपे रिश्ता मेरा और तुम्हारा

कलासाधिके ! हर रिश्ता कब परिभाषित होने पाया है  
मेरा और तुम्हारा रिश्ता- छंदों का रिश्ता गीतों से  
मंदिर से जो गंगाजल का, मदिरा का जो पैमाने से 
रिश्ता मेरा और तुम्हारा,संस्कृतियों का जो रीतों से 

नीरजनयने असफ़ा रहे ग्रंथ जिसका उत्तर देने में
उसी प्रश्न में गूँथा हुआ है रिश्ता मेरा और तुम्हारा 

राकेश खंडेलवाल 

धूप से उठ के दूर



ओ मेरे आवारा मन चल  धूप से उठ के दूर कहीं पर 
इसमें शेष उजास नहीं है केवल है अंधियारा  बाक़ी

हर इक बार उगा है सूरज नए नए आश्वासन लेकर 

ओढ़ सकेंगी नई सुबह मेंसिर पर कलियाँ शाल सुनहरी 
चीर कुहासे और धुंध को कोसरसेगा मतवाला मौसम
खोलेगी नवीन सम्वत् के द्वार गुनगुनी हुई दुपहरी 

लेकिन जागी नई भोर जबआँख मसलते ले अँगड़ाई
उसमें केवल तिमिर घुला थानहीं सुनहरा रंग ज़रा भी 

निश्चय तो था हुआ व्योम से अंशुमान  जब धूप बिखेरे
हर इक कोना रहे प्रकाशित इक समान ही हर कण कण में 
लेकिन चल कर आसमान से धूप रुक गई कँगूरों पर
एक किरण भी उतर न चमकी कोहरे में लिपटे आँगन में 

रहे ताकते चित्र धूप के जो बरसों से  गये  दिखाए
किंतु न बंधी गठरिया अब तक एक बार जो खुली निशा की 

नहीं आज की तथाकथित यह धूप नहीं गुण रूप धूप का
चन्दा के इकतरफा रुख सीएक ओर  ही रही प्रकाशित 
चढ़ बैठी बादल की छत पर  नहीं उतरती आ गलियों में
इससे करना कोई अपेक्षा बिलकुल नहीं रहा सम्भावित

घुटती है आशाए तम से भरे हुये सीले तलघर में 
कहें धूप से उठ के दूर चली जा चाहत नहीं प्रभा की 

स्वर मिला स्वर में तुम्हारे

रीतियाँ के अनुसरण में मंदिरो में सर झुकाया यज्ञ कर कर देवता को आहुति हर दिन चढ़ाई आर्चना के मंत्रस्वर में  साथ भी देते रहा मैं पर समूची साध...