अजब वक्त यह आया

 

पता नहीं किस और छोर से  अजब वक़्त यह आया 
जब अपनी परछाई का भी ख़ुद को पता नहीं है 

होती तो है सुबह , नदारद किंतु धूप अम्बर से
हर नरसिसस अपने अपने सूर्य जेब में रखता
खंडहर की ड्योढ़ी पर उपजे कीकर की टहनी पर
चकाचौंध में खोई आँखो को गुलाब ही दिखता 

खींच रहे झीलों के खाके मरुथलिया धरती पर
जिनको जली प्यास का अनुभव तो हो सका नहीं है 

आशंका से घिरे हुए हर इक परिचित का चेहरा
संदेहों के घने क़ुहासा उमड़ छा रहे मन में 
चाहत फिर फिर ओढ़ रहीएकाकीपन  की चादर
सारे बंधन तोड़ लौट ले फिर इक शून्य विजन में 

मौन एक बगुले के जैसे  अचल पत्र शाखा पर 
जो तंद्रा से जगा सके वह चलती हवा नहीं है 

खंडित हुई आस्थाओं के टुकड़े चुनते चुनते
रंजित हुई उँगलियो को बस मौन निहारा करता 
डांवाड़ोल मान्यताओं की जर्जर होती नींवें
स्थिर करने की असफलता को सिर्फ़ संवारा करता 

शांति और आश्वासन से सूने सारे पूजस्थल
आरति प्रेयर और अजान की बिल्कुल दशा नहीं है 


खेल खिलाता है

 
खेल खिलाता है जीवन में निशा दिवस वह एक प्रशिक्षक
क़ैद रहा जिसकी मुट्ठी में हर परिणाम पूर्व स्पर्धा के
 
चाहे सौ मीटर की दूरी या फिर चाहे मैराथन हो
तैरें कोई पीठ पर लेटा या फिर तितली बना हुआ हो
एक रिले की हिस्सेदारी या फिर हो अपना बलबूता
या फिर एक टीम का ज़िम्मा उसके काँधे टिका हुआ हो
 
प्रतियोगी को मिला हुआ अपना दायित्व निभाना ही है
क्षमता के अनुरूपभूल कर क़िस्से अपनी व्यथा कथा के
 
धनुष हाथ हो तो प्रत्यंचा का तनना भी आवश्यक ही
लक्ष्य वेध के लिए ज़रूरी तन कामन का संकेंद्रण ही
ध्येय प्राप्ति के लिए सुलभ वह कर देता है उपकरणों को
मौक़ा देकर करवाता है नए पंथ का अन्वेषण भी
 
कुछ प्रयास तो सुलभ किए हैं निर्णय को हासिल करने को
पा जाता है उन्हें वही जो संकल्पित है बिन दुविधा के
 
जीवन की चौसर पर खेला जाता खेल अनवरत पल छिन
कोई खेले साँसे गिनतेकोई दिल की धड़कन गिन-गिन
लेकिन जीत उसी की होती जो कर्मांयवाधिकारस्ते
हो कर खेला करता है परिणामों की चिंताओं के बिन
 
ओ अनुरागी आज खेल में उतरो खेलोतब ही सम्भव
पा जाओ वरदान बरसते हैं जो स्वाहा और स्वधा के

आँगन के तुलसी चौरे पर


वनवासी मन सोच रहा है पीछे छूट गई गलियों में
सँझवती का दीप जला क्या आँगन के तुलसी चौरे पर 

इस नगरी में सुबह शाम का अंतर पता नहीं चल पाता
ट्यूबलाइट के तले बिना सूरज को देखे दिन ढल जाता 
घिरी साँझ कब? रात चढ़ी कब ? कोई प्रश्न नहीं उठता है 
दहलीज़ों का एकाकिपन फिर से सूना ही रह जाता 

कल की बातें बिसर चुकी है एक एक कर धीरे धीरे
कोई इबारत शेष न दिखती यादों के काग़ज़ कोरे पर 

नहीं बह सका कोई दीपक दौने में बेठा लहरों पर
पग पग पर अंकुश अनदेखा कोई लगा हुआ प्रहरों पर
किमकर्तव्यविमूढ भावना मन की ओढ़े असमंजस को
जिधर दृष्टि है उधर प्रश्न ही उगे हुए सारे चेहरों पर

अंधाधुंध दौड़ में आपा धापी मची हुई दिखती है
मादकताये सिर्फ़ कनक की चढ़ी हुई काले गोरे पर 

घर के पूजागृह में  चंदन अब भी रोज़ घिसा जाता क्या
देवी के आँगन में अब भी लांगुरिया गाया जाता क्या 
अटका हुआ अटकलों में मन बंद हो चुके इतिहासों में
भोर मंगला आरतियों में शंख बजाया भी जाता क्या 

लौट रहा है उसी धुरी पर चला अनवरत समय चक्र यह
जिससे सब कुछ हुआ नियंत्रित पर अदृश्य रहे डोरे पर

१४ जुलाई २०२१ 


 

शब्द की सीमाओं को अब तोड़ कर

 



कह सकूँ कुछ शब्द की सीमाओं को मैं तोड़ कर
इसलिए आया सुरों के पाश पीछे छोड़ कर 

है उचित कितना 
करूँ मैं शब्द के पिंजरे बना कर क़ैद अपनी भावना को 
या समेटूँ 
एक मुट्ठी आसमाँ के कटघरे में भाव की परवाज़ अपने
मैं विहग 
विस्तृत अटल में जो विचरने के लिए है काल के निश्शेष क्षण तक
किस घड़ी, पल
या प्रहर में संकुचित कर काट डालूँ इंद्रधनुषी डोर के रंगीन सपने 

बह  रहा मैं अब हवा की झालती से होड़ कर
कह सकूँ कुछ शब्द की सीमाओं को अब तोड़ कर

प्यार के 
पर्याय क भाषा हृदय की कोर से जब जब उठी है 
कब सहारा
वह तलाशी शब्द की बैसाखियों का स्वत्व की संप्रेषणा को
मैं नयन से
नयन तक तिरती तरंगी में हुई अविरल घनी आलोड़न से
दे रहा 
आवाज़ कण कण के कथन में मौन रह कर छुप गई उस प्रेरणा को 

उठ रहा हूँ उत्स हिमगिरि के ताने झँझोड़ कर
कह सकूँ कुछ शब्द की सीमाओं को मैं तोड़ कर

कब इबारत
शेष रहती जो लिखी जाती रही है सिंधु तट पर इस समय के
मैं लहर की
कूँचियाँ लेकर शिला की भीत पर कुछ चित्र अंकित कर रहा हूँ 
 वक्ष पर  
इतिहास के जो कर गए हस्ताक्षर अपने पगों के चिह्न बो कर 
मैं उसी क्रम को 
 निभाता आज की चट्टान पर सम्भावनाओं की नई अन्वेषणाए कर रहा हूँ 

ज़िंदगी के घट चुके संचय पुनः मैं जोड़ कर
कह रहा कुछ शब्द की सीमाओं को अब तोड़ कर 




आज लगा है रूठ गया सा

  सम्बन्धों के राजमार्ग तक जाती थी जितनी रेखाएं 

मानचित्र  से उनका  नाता आज लगा है टूट गया सा 

पीठ टिकाये उजडे पीपल से बैठा है आवारा मन 
ढूंढ रहा है पगडण्डी पर बने नहीं उन  पदचिह्नों को 
फैले हुए विजन में तिरती हुई हवाओं  की देहरी पर 
खड़ा देखता सूखे तालाबों में बनते प्रतिबिम्बों को 
 
अपने से भी हुआ अजनबी, चाहे है परिचय तलाशना 
पर अपने से अपना रिश्ता आज लगा है रूठ गया सा 
 
अँगड़ाई से शुरु उबासी  तक फ़ैले दिन का सूनापन
मरुथल की मरीचिकाओं सा भी आकार नजर ना आता
रातों की चादर पर पड़ती हुई सलवटों के गुड़मुड़ के
चक्रव्यूह में बन्दी निद्रा का भी सिरा हाथ ना आता
 
अंधियारों के गर्भगृहों से ज्योति किरण उपजा करती है
इस थोथे आश्वासन का भ्रम तक हाथों से छूट गया सा
 
खड़ा महाजन इतिहासों का बहियाँ लिये हाथ में आकर
सब कुछ मिलता नाम लिखा ही कोई पूँजी नहीं जमा की
सुधियां चक्रवृद्धि  ब्याजों के समीकरण में उलझी रहती 
अपनी ही परछाईं तक भी आकर छूती नहीं जरा भी
 
बरस बीतते परिवर्तन की खिड़की सदा खुला करती है
आशाओं का भरा कलश यह, आज लग रहा फ़ूट गया सा
 

कोई भी गंध नहीं उमड़ी

  कोई भी गंध नहीं उमड़ी  साँसों की डोरमें हमने, नित गूँथे गजरे बेलकर लेकिन रजनी की बाहों में कोई भी गंध नहीं साँवरी नयनों में आंज गई सपने ज...