सूरज की छवियाँ दिखलाने


जो कल तक छलते थे हमको सपनो के आश्वासं देकर
आए है इस बार हमें वे सूरज की छवियाँ दिखलाने

वायदों की कजराई  ने थे रोज  साँझ नयनों में आँजे
देते हुए  दिलासा उगती हुई भोर में सच हो लेंगे
किन्तु भोर की प्रथम रश्मि के आते आते हुए तिरोहित
संभव रहा नहीं फिर वे इक अंश मात्र भी शिल्पित फोगे

कितने बरस बीतते आये, एक इसी धुन को दोहराते
वे आये हैं उन्ही धुनों को नए राग में फिर सिखलाने

ढलते हुए और नव उदिता सूरज की छवियों का अंतर
कब कर पाई है अभाव की ऎनक के पीछे से नज़रें
इश्क़ मोहब्बत की ग़ज़लों की हों या बासी अख़बारों की
तरसी हुई आस को लगती एक सरीखी सारी सतरें

महीने भर के रोजे रख कर जो आतुर है इफ़्तारी को
वे लाए है उसको मीनू अगले महीने  का समझाने

सूरज की छवियाँ बदली कब, बदले मौसम की करवट से
नयनी की मरीचिकाओं ने ही हर बार रखा भरमाकर
रंग रश्मियों ने तो बदला नहीं कभी भी ऋतु हो कोई
कुछ रंगीन काँच के टुकड़े भ्रमित करें उनको छितराकर

उतर चुकी है चढ़ी कलाई की एक एक कर सारी परतें
वे लाये हैं  खोटे सिक्के एक बार फिर  यहाँ भुनाने

उसमें कोई छंद नहीं था

गीतों से अनबन थी मेरी 
कविता से अनुबंध अँहीं था 
इसीलिये जो लिख पाया मैं 
उसमें कोई छंद नहीं था 

​लय ​ की गति से अनजाना मैं 
कैसे लिखता कोई कहानी 
क्रमश​:ता ​ की बहती धारा
लेशमात्र सुधि ने न जानी 
रहे कथानक सभी अधूरे 
शब्द नहीं क्रम से लग पाये 
सरगम से थे रहे अपरिचित 
अधरों ने जो स्वर दुहराये 

मन में उठे विचारों में से 
कोई भी स्वच्छंद नहीं था 
इसीलिये जो लिख पाया मैं 
उसमें कोई छंद नहीं था 

ग़ज़लों में ​बहरों की ​बंदीश 
औ' रदीफ़ से जुड़े काफिये 
नहीं समझ ये तनिक आ सका 
रुक कर कब मु​ड़ गए काफिये 
नहीं संतुलन होने पाया 
मिसरा उला और सानी ​ में 
तितर बितर अहसास समूचे 
उलझ रह गए मनमानी में 

बन न  सका मधुपर्क बूँद भर 
क्योंकि पास मकरंद नहीं था 
लिख पाई जो कलम आज तक 
उसमें कोई छंद नहीं था 

नवगीतों ने किया न आकर
कभी लेखनी का आलिंगन
दोहों और सवैय्यों से भी
रहा अनछुआ मेरा आँगन
 कविता को समझूँ इस में ही
दिवस निशा हो जाते हैं गुम
झरते जाते कैलेन्डर से
यूँ ही दिनमानों के विद्रुम

जोड़ तोड़ में, तुकबन्दी में
किंचित भी आनन्द नहीं था
इसीलिये मेरे लिखने में
जो कुछ था वह छन्द नहीं था

पृष्ठ बिखरे संहिताओं के

आप जो बदले शिकायत है नहीं कुछ भी
आजकल बदले नज़रिए देवताओं के

इंद्र को गिरिधारियों का
अब नहीं है भय
बाँटता ही है नहीं
वो काश का संचय
हो गए दिन ज्येष्ठ वाली प्रतिपदाओं से

अब नहीं धन्वन्तरि की
आज कल गिनती
द्रोण गिरि पर अब
नहीं संजीवनी उगती
पृष्ठ बिखरे चरम-सुश्रुत संहिताओं के

है नहीं सम्भावना कुछ,
आस हो पूरी
याकि मिट पाए तनिक
भी, मध्य की दूरी
पाँव डिगते कब जुड़ी कुछ आस्थाओं के

नए वर्ष के नये सूर्य

हे नए वर्ष के नये सूर्य 
इस बार उगो ले परिवर्तन

कुछ प्रखर करो धुँधली  किरने
हो नवल ऊर्जा कुछ भरने
ये बरस बरस का गहराता 
तम लगे इस बरस कुछ छँटने
मन के अँधियारे कोनो में
इक नई ज्योति फिर से जागे
सूखी नयनों की झीलों में
नव  स्वप्न लगे फिर से तिरने

यूँ करो कि कैलेंडर कर ले 
हर रोक तुम्हारा अभिनंदन 

इस बार बदल कर पंथ चलो 
उन रहीं उपेक्षित राहों पर 
जिन पर विश्रांति चिह्न अंकित 
बस सिसकी,क्रंदन , आहों पर   
उनकी तिमिराई अंगनाइ
फिर नहाए पा उज्ज्वल प्रकाश
कुछ नई अंकुरित हों कलियाँ
उनकी मुरझाई चाहों पर

बरसों से सूने मस्तक पर
खिलता हो अक्षत अरु चंदन 

बदलो इस वर्ष दिशा अपनी
चल दो दक्षिण या उत्तर को 
महलों के साये में खोते
देखो उस टूटे छप्पर को 
समदशा हो दो संप्रकाश 
फुनगी  से लेकर के जड़ तक
उतरो नीचे कंगूरों से 
करने रोशन अब घर घर को 

तब बिखरे अधरों पर सबके 
उषा से संध्या सूर्या नमन 

ओ  चित्रकार खींचो नूतन 
कुछ इंद्रधनुष वातायन में 
कुछ शान्ति चैन की बेलों को 
बो दो सन्मुख नीराजन में 
मन से मन तक की दूरी को 
नापो किरणों की डोरी से 
बाँधो अपने संचय के पल
नव  हर्षों के प्रतिपादन में 

इस बार मिटा दो हर मन में 
पलते संत्रास और कुंठन 
 

अनजाने ही संवर गया है

आवाज़ों के प्रतिबिम्बों में जब जब भाव घुल गए मेरे तब तब नया गीत  आ कोई अनजाने ही संवर गया है मन के बुककेसों में रक्खी हुई किताबों ने ख...