अब गली के मोड़ पर है

कल्पवृक्षों के सुमन कुछ आन झोली में गिरे हैं
आ मरुस्थल पर लगा ज्यों सावनी बादल घिरे हैं
देवसलिला की लहर आईं उमड़ कर वीथियों में
नयन झीलों में सपन सतरंगिया होकर तिरे हैं
 
एक झोंका गंध का पट खोलकर वातायनों के
कह गया है रथ तुम्हारा अब गली के मोड़ पर है
 
लग पड़ी छँटने घिरी थी कक्ष में गहरी उदासी
सांझ की अंगड़ाईयों में लग पड़ी घुलने विभा सी
रश्मि की पाजेब बांधे नृत्यमग्ना हो प्रतीची
हो गई है पुष्पधन्वा के शरों की कामना सी
 
आतुरा होते नयन की दृष्टि को संगम अपेक्षित
ज्ञात है बस झपझपाती सी पलक की कोर पर है
 
सांस में सारंगियों के सुर लगे आकर विचरने
धड़कनों की आस में लगने लगा विश्वास भरने
श्वेत पाटल पर कुसुम के चन्द बासन्ती पराकण
लग पड़े हैं चित्र में अनुराग के नव रंग भरने
 
रह गया बँध कर कलाई से दिवस की शाख पर जो
वह निराशा का प्रहर अब उंगलियों की पोर पर है
 
दृष्टि बन रेखायें रह रह भित्तिचित्रों को निहारें
थाल में अगवानियों के पुष्प की गंधें निखारें
ध्यान की नारद सरीखी भ्रामरी को कर नियंत्रित
मन निलय सज्जाओं की बारीकियां फ़िर फ़िर संवारे
 
बांसुरी की टेर पर पाजेब की रुनझुन बिखरना
एक स्मितमय अधर के बस थरथराते छोर पर है

गज़लों का उन्वान कर लिया


हमको जब सुकरात समझ कर दिया भेंट में गरल किसी ने
हमने खुद को नीलकंठ तब कर कर उसका पान कर लिया
 
आवश्यकता नहीं अगर तो नहीं अपेक्षायें हीं  होती
जिसका जितना संचय, उसकी उतनी बढ़ीं लालसायें भी
भोर गिनतियों की सीढ़ी पर चढ़ते चढ़ते विलय हो गयी
और दिवस की गुत्थी में ही रहीं उलझ कर संध्यायें भी
 
युग तो देता रहा निरन्तर अवसर राजमुकुट को थामे
लेकिन वह आसीन कहाँ रह्ता जिसने अभिमान कर लिया
 
दृष्टि सितारों पर रख कर जब चलते रहे पांव गतिमय हो
तब तब अपने पग के चिह्नों का भी हमने किया आकलन
भाव अगर इक तन कर मन में खड़ा हो गया ताड़ सरीखा
तब तब हमने देखा अपनी परछाईं का सहज समर्पण
 
ठोकर खा गिर पड़े शब्द जो रहे पंथ में अनदेखे ही
हमने उन सब को चुन चुन कर गज़लों का उन्वान कर लिया
 
इन्द्रधनुष की आभाओं में जब जब भी अटका था ये मन
तब तब हमने याद कर रखी मन में रात अमावस वाली
बुझे हुये दीपक की प्राणों की आहुति को दिया कंठ स्वर
दृष्टि लगी उलझाने जिस पल, सजी हुई पूजा की थाली
 
आतुर किसी पपीहे का स्वर हो या टेर मधुर वंसी की
हमने अपने स्वर में इनको बो, वीणा की तान कर लिया 

मन फ़िर से एकाकी

दोपह्री है दिन से रूठी
आशाओं की गगरी फूटी
परिवर्तन की बातें झूठीं
विमुख हो चुकी है प्याले से अब सुधियों की साकी
मन फिर से एकाकी
 
जीवन की पुस्तक के पन्ने
से अक्षर लग गये बिगड़ने
तम के रंग लगे हैं भरने
फिर लिख पाये ऐसी कोई नहीं लेखनी बाकी
मन फ़िर से एकाकी
 
जुड़े तार सारे ही बिखरे
रंग पीर के गहरा निखरे
हुए सपन सब टूटॆ ठिकरे
जेठ किये बैठा बन्दी कर सावन की हर झांकी
मन फ़िर से एकाकी

पहने हर संध्या ने मेरे गीतों के गहने

दिन के उजियारे हों चाहे , चाहे रातों के अंधियारे
प्रहर , दिवस हों सप्ताहों से जुड़ कर मिले हुए पखवारे
कोई ऐसा निमिष नहीं था जबकि साथ में उंगली पकडे
चले नहीं हों मेरे संग संग ओ स्वरूपिणे , चित्र तुम्हारे
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पहने हर संध्या ने मेरे गीतों के गहने
 
 
लौट रहा हो चरवाहा घर
रुके नीड़ पर आ यायावर
सबके अधरों पर आ आ कर
सहज लगे बहने
पहने हर संध्या ने मेरे गीतों के गहने
 
 
हुई प्रतीची अरुणाई में
जले दीप की अँगड़ाई में
पछुआई सी पुरबाई में
लगा धुँआ कहने
पहने हर संध्या ने मेरे गीतों के गहने
 
 
रक्त-पीत नदिय के जल में
बिखरे रजनी के काजल में
आज बीत बन जाते कल में
होते पल तहने
पहने हर संध्या ने मेरे गीतों के गहने

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...