मन फ़िर से एकाकी

दोपह्री है दिन से रूठी
आशाओं की गगरी फूटी
परिवर्तन की बातें झूठीं
विमुख हो चुकी है प्याले से अब सुधियों की साकी
मन फिर से एकाकी
 
जीवन की पुस्तक के पन्ने
से अक्षर लग गये बिगड़ने
तम के रंग लगे हैं भरने
फिर लिख पाये ऐसी कोई नहीं लेखनी बाकी
मन फ़िर से एकाकी
 
जुड़े तार सारे ही बिखरे
रंग पीर के गहरा निखरे
हुए सपन सब टूटॆ ठिकरे
जेठ किये बैठा बन्दी कर सावन की हर झांकी
मन फ़िर से एकाकी

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

एकाकी मन जीवन को राह दिखाता है, हर बार..

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...