उम्र ढलते ही

छंट गई है गर्द सारी आइने से यकबयक ही
उम्र ढलते ही दिखा है सत्य हर परदा हटा कट

दम्भ अपने बाजुओं का कर समर्पण चुप खड़ा है
धुंध में डूबी नजर रह रह पलक को 
​मि​
​मि​
चाती
कान का 
​है 
ध्यान सारा द्वार की चुप सांकलों पर
डाकिया आ खटखटाये हाथ 
​में 
 
​ले 
 
​को
ई पाती

तोड़ परिचय राह चल दी उम्र के इस मोड़ से
​,​
 अब
दृष्टि  में उभरे नहीं है कोई चेहरा मुस्कुराकर 

​मंज़िलों की सीढ़ियां भी मांगती विश्राम प्रतिपल 
दिन निकलते पूछता है सांझ कितनी दूर है अब 
दोपहर रखकर हथेली आँख पर ताके दिशाएँ 
बादलों की पालकी ले छाँह को, आ पाएगी कब

हर कदम आगे बढा  है इक असीमित बोझ लेकर 
कोई शायद नाम ले ले  ​दूर से उसको बुलाकर 

उम्र ढलते ही हुये  हैं स्वप्न सारे पतझड़ी वे
जो सजे चढ़ती उमर के नयन में आ गुलमोहर से
प्रश्नचिह्नों की लगी है अनवरत लम्बी कतारें
औऱ उत्तर है तिरोहित जिंदगी की पुस्तको से

 ग्रीष्म के इक मरुथली नभ सा तिरा है शून्य केवल 
स्पर्श कुछ देती हैं हैं अब हवा भी गुनगुनाकर 

मेरे अस्तित्व पर डाल अभिमंत्रणा

फ़ायलों में उलझते रहे जब नयन
कुंजियों पे रहीं दौड़ती उंगलियाँ
मीटिंगों के बुलावे खड़े पंक्ति में
और सुई
​याँ 
 घड़ी की बनी तितलियाँ
संगणक के मेरे दृश्य पट पर प्रिये
चित्र केवल तुम्हारे उभरते रहे
और सप्याह-महिने मेरे दिन सभी
शाख से साल की टूट झरते रहे

ट्रेन में अपने कम्यूट में यों लगे
तुम मेरे पास ही सीट पर हो बसी
डालती जा रहीं मुझपे सम्मोहिनी
सांस में भर उगी भोर की ताजगी
यों समय तो निरंतर गति में रहा
पर मेरे सामने चित्र इक ही बना
तुम रहे टाँकते प्राण उस बिम्ब में
नैन के मेरे आकाश पर जो तना

जब हवा की चढ़ी पालकी से उतर
धूप आकर मेरा मुख लगे चूमती
तो लगे है तुम्हारी पंखुर उंगलियाँ
होंठ की भर छुअन गाल पर झूमती
नभ पे बादल की अठखेलियाँ देख कर
यों लगे जैसे तुम नृत्य हो कर रहीं
मेरे अस्तित्व पर डाल अभिमंत्रणा
एक अध्याय नव प्रीत का रच रही.

पहले जीवन की क्यारी में

मुरझाये सम्बन्धों को मैं फ़िर जीवन्त बना तो दूँगा
पहले विश्वासों की धरती को थोड़ा हमवार बनाओ

सम्क्बन्धों के बीज सींचती, जब अपनत्व भरी इक गागर
सहज अंकुरित हो बन जाते वटवृक्षों की गहरी छाया
लेकिन उगती हुई उपेक्षा उनको कीकर कर देती है
शेष नहीं रह्ता तब उनके पास एक् चुटकी भर साया

कर तो दूँ संचार ज़िन्दगी का मैं इस सूखे पल्लव में
पहले जीवन की क्यारी में कोमलता तो तनिक उगाओ

याचक बनी आंजुरी उठती नहीं कभी मुट्ठी बन ऊपर
ज्कड़ी ​ हुई अपेक्षाओं से, बन्दी बन रहती घेरे में
समय पृष्ठ की सीमाओं से बढ़ता हुआ अपरिचय उनका
रह जाता है एक शून्य बन, पुता हुआ उनके चेहरे में

खोई हुई अस्मिताओं को मैं शीर्षस्थ बना तो दूँगा
पहले तुम अपने अंत:स में संकल्पों के दीप जलाओ

बहती इस जीवन नदिया के इक तट पर तुम हो इक पर मैं
और हमें जो जोड़ रहा वह पुल है टिका भावनाओं पर
निस्पृहता के धागे उसके आधारों को सुदृढ़ करते
औ विध्वंस टिका है उसका चाहत भरी कामनाओं पर

मैं इस पुल को सबन्धों का शिलालेख कर ज​ड़ तो दूंगा
पहले तुम अभिलाषाओं पर अपनी पूर्ण विराम लगाओ

अब कोई यदि मेरे पथ पर

अब कोई यदि मेरे पथ पर बैठे चाहे पलक बिछाकर अब कोई यदि गहन निशा में रहे प्रतीक्षित दीप जला कर में उस पथ के पथ से भी अब इतनी दूर निकल आया हूँ...