वो तो

वो बुझे दियों की कतार थी जो कि मेरे आसपास थी
मैने समझा था जिसे चांदनी, वो तो झुटपुटे का कुहास थी

जिसे ढूँढ़ती रही नजर, फ़ंसी भटकनो में इधर उधर
मुझे ये मगर न हुई खबर, वो तो गुमशुदा ही तलाश थी

मेरी आरज़ुओं की हर थकन, सुकूं माँगती थी शबे सहर
मैने समझा जिसको कुमोदिनी वो तो एक दहका पलाश थी

भर भर घड़े उंड़ेलकर , दिये पनघटों ने पुकार कर
जो बुझी न पल के लिये मगर, वो मरुस्थली मेरी प्यास थी

जिसे नाम तुमने गज़ल दिया, जिसे मैने सोचा कि नज़्म है
वो जो माला शब्दों की एक थी, वो तो भावना का निकास थी

वो जो रात के प्रथम प्रहर मेरी ख्वाहिशो को समेटकर
मेरे ख्वाब में गई आ संवर, तेरे महके तन की सुवास थी

जो थी शब-बखैर की आरज़ू, जो बसी हमारे थी चार सू
जिसे सींचा है लम्हों में बांध कर, वो तेरे मिलन की ही आस थी.

वनपाखी

मन का आवारा वनपाखी अब गीत नहीं गा पाता है

कुछ रंग नहीं भर पाता है कोरे खाकों में चित्रकार
तूलिका कोशिशें करती है पर विवरण न पाती उभार
खूँटियां पकड़ ढीली करतीं रह रह सलवएं पड़ा करतीं
यूँ कैनवास यह जीवन का फिर से अपूर्ण रह जाता है

बन पाते बिम्ब अधूरे ही धुंधला धुन्धला मन का दत्पण
चिलमन की ओट छुपा लेती मनमोहक हर बांकी चितवन
पन्ने पलटे दिन रात मगर, अक्षर पुस्तक के फढ़े नहीं
यूँ ढाई आखर का लेखा, अनपढ़ा पुन: रह जाता है

नित ॠचा उचारा करी मगर मंत्रों से भाग्य नहीं जागे
सांसों की एक भिखारिन हर इक गली मोड़ रुकरुक मांगे
खाली झोली, पाथेय नहीं राहों का कुछ भी पता नहीं
यूँ उठ पाने से पहले ही हर बार कदम रुक जाता है

साधक सी लगन जगी लेकिन मिल पाया कोई साध्य नहीं
निर्जन हो गये सभी मंदिर है कोई भी आराध्य नहीं
पूजा की थाली सजी मगर हैं क्रूर थपेड़े आँधी के
यूँ ज्योतित होने से पहले हर बार दिया बुझ जाता है

सुधियों की डोर थामता है अक्सर मन का एकाकीपन
भूली भटकी स्मॄतियों की कुछ और अधिक बढ़ती तड़पन
पथ में हैं मोड़ बने इतने,दो कदम साथ न संव्हव हैं
यों परिचय होने से पहले हर कोई बिछड़ता जाता है

बस्ती के इकलौते पनघट पर गूँज नहीं पाती पायल
नर्तन करते हैं मोर किन्तु इक बून्द न बरसाता बादल
झूले पेड़ों पर पड़े नही कनकौए नभ में उड़े नहीं
यूँ सावन भादों से पहले हर बरस अगहन आ जाता है

हर रोज बिखेरी थाली भर भर धूप दुपहरी ने आकर
हर लहर लुटाती रही कोष जो संजो रखे था रत्नाकर
मधुवन ने सोंपे फूल और सरगम की तान कोयलों ने
पर मेरी खुली आंजुरि में कुछ भी न सिमटने पाता है

सूरज के रथ के घोड़ों को कोई उद्देश्य नहीं बाकी
टूटे टुकड़े ले मधुघट के बैठी है सुधियों की साकी
खाली आँजुरि क्या सूर्य नमन ? क्या कर पाये संध्या-वंदन
यूँ उग पाने से पहले ही हर रोज दिवस ढल जाता है

मन का आवारा वनपाखी अब गीत नहीं गा पाता है.

आप-निवेदन

काव्य मेरा सॄजित, य्रे सिमट कर कहीं बंद होकर किताबों में ही न रहे
आपके कंठ की रागिनी थाम कर, आपके होंठ पर ये मचलता रहे
कल्पना ने मेरी जिसमें गोते लगा, शब्द श्रन्गार को आपके हैं चुने
मेरी भाषा की भागीरथी आपके द्वार के सामने से निरंतर बहे

राकेश खंडेलवाल
नवंबर २००५

कविता पुरानी

धड़कनो< की ताल पर गाने लगी है ज़िन्दगानी
याद मुझको आ रही है फिर कोई कविता पुरानी

धूप में डूबे हुए कुछ तितलियो< के पंख कोमल
पर्वतों को ले रहीं आगोश में चंचल घटायें
झील को दर्पण बना कर खिलखिलाते चंद बादल
प्रीत की धुन पर थिरकती वादियों में आ हवायें

लिख रहे हैं भोज पत्रों पर नई फिर से कहानी
याद मुझको आ रही है फिर कोऊ कविता पुरानी

वॄक्ष पर आकर उतरते इन्द्रधनु्षों की कतारें
गुनगुनाती रागिनी से रंग सा भरती दुपहरी
लाज के सिन्दूर में डूबी हुई दुल्हन प्रतीची
और रजनी चाँदनी की ओढ़कर चूनर रुपहरी

भोर की अँगड़ाईयों से हो रहा नभ आसमानी
याद मुझको आ रही है फिर कोई कविता पुरानी

पतझड़ी संदेशवाहक बाँटता सा पत्र सबको
स्वर्ण में लिपटा हुआ संदेश का विस्तार सारा
खेलती पछुआ अकेली शाख की सूनी गली में
राह पर नजरें टिकाये भोर का अंतिम सितारा

कर रही ऊषा क्षितिज पर, रश्मियों संग बागवानी
याद मुझको आ रही है फिर कोई कविता पुरानी


आरिजों पर दूब के हैं प्रीत चुम्बन शबनमों के
फूल ने ओढ़ी हुई है धूप की चूनर सुनहरी
हंस मोती बीनते हैं ताल की गहराईयों से
पेड़ की फुनगी बिछाये एक गौरैया मसहरी

कह रही नव, नित्य गाथा प्रकॄति इनकी जुबानी
याद मुझको आ रही है फिर कोई कविता पुरानी

राकेश खंडेलवाल

नवंबर २००५

कोई भी गंध नहीं उमड़ी

  कोई भी गंध नहीं उमड़ी  साँसों की डोरमें हमने, नित गूँथे गजरे बेलकर लेकिन रजनी की बाहों में कोई भी गंध नहीं साँवरी नयनों में आंज गई सपने ज...