कितनी बार जलाए

 
कितनी बार जलाए हमने अपनी आशाओं के दीपक 
सोचे बिना तिमिर का खुद ही हमने ओढ़ा हुआ आवरण 

कल की धूप बनाएगी अपने आँगन में रांगोली
इंद्रधनुष की बंदनवारें लटकेंगीं द्वारे पर आकर
आन बुहारेंगी गलियों को सावन की मदमस्त फुहारें
मलयानिल बाँहों में भरना चाहेगी हमको अकुलाकर 

कितनी बार आँजते आए हम यूँ दिवास्वप्न आँखों में
ज्ञात भले थादिन के सपनों का हो पाता नहीं संवरण

कितनी बार जलाए हमने धूप अगरबत्ती मंदिर में
अभिलाषित हो उठा धूम्र यह नील गगन तक जा पहुँचेगा 
ले आएगा अपने संग मेंकल्प वृक्ष की कुछ शाखाएँ
पारिजात की गंधों से तन का मन का आँगन महकेगा 

कितनी बार कल्पना को निर्बाध उड़ाया किये व्योम में
कर्मक्षेत्र के नियमों का तो कर न पाये कभी अनुसरण 

कितनी बार जलाए टूटे हुए स्वप्न आलाव बिठाकर
और सुबह के होते होते गुल दस्तों में पुनः सजाया
रहा विदित परिणति क्या होगी डाली से टूटे फूलों की 
फिर भी हमने भ्रम के झूलों में ख़ुद को हर बार झुलाया

कितनी बार हुई है खंडित अपनी आराधित प्रतिमाएँ
और सोचते अगले पल हो, इनमें आकर ईश अवतरण

राकेश खंडेलवाल








ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे

शरद की पूर्णिमा से हो शुरू यह
सुधाये है टपकती व्योम पर से
जड़े है प्रीत के अनुराग चुम्बन
लपेटे गंध अनुपम,पाटलों पे
किरण खोलेगी पट जब भोर के आ
नई इक प्रेरणा ले हंस पड़ेंगे
नयी परिपाटियों की रोशनी ले
ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे

यही पल हैं कि जब धन्वन्तरि के
चषक से तृप्त हो लेंगी त्रशाए
“नरक” के बंधनों से मुक्त होकर
खिलेंगी रूप की अपरिमित विभागों
भारत की पूर्ण हो लेगी प्रतीक्षा
वियोगि पादुका से पग मिलेंगे
नए इतिहास के अब पृष्ठ लिखने
ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे

मिटाकर इंद्र के अभिमान को जब
हुआ गिरिराज फिर  स्थिर धरा पर
बना छत्तीस व्यंजन भोग छप्पन
लगाएँ भोग उसका  सिर झुकाकर
मिलेंगे भाई जाकर के बहन से
नदी यमुना का तट। शोभित करेंगे
मनाएँगे उमंगों के पलों को
ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे


घटता नहीं किन्तु सूनापन

संचारों के नए माध्ययम नित्य जुटा कर रखता है मन 
घटता नहीं किन्तु सूनापन 

ट्विटर फेसबुक वॉट्सऐप के साथ वायबर स्काइप है 
लेकिन अपनापन महकाए, वो ही इन सबसे गायब  है 
बढ़ा और भी एकाकीपन
 घटा नहीं घिरता सूनापन 

इंटरनेट उंगलियों पर है, जेब रखा ये स्मार्टफोन है 
जिसका स्वर कानों में मिस्री घोल सके बस वही मौन है 
गौरय्या   न फुदके   आँगन 
बढता और अधिक सूनापन 

मिलती बीस ट्वीट, मिल जाती सौ दोसौ रोजाना लाइक 
लेकिन रहता स्नेह संदेसा होकर एक तिलिस्मी, गायब 
महके नहीं हवा ला चन्दन
बढता है बस एकाकीपन 

तुम ही

तुम ही क्रिया तुम्ही संज्ञा हो,
सर्वनाम भी मीत तुम्ही
तुम ही भाषा तुम्ही व्याकरण
साज तुम्ही संगोत तुम्ही

खड़िया पट्टी, बुदकी तख्ती
आ ओलम सारे अक्षर
कंठ कंठ से मुखर गूंजता
शब्द शब्द व्यंजन औ स्वर 
बारहखाडियो की संरचना
का जो ध्येय तुम्ही तो हो
अधरों की कंपन में उतरा
जो वह तुम ही हो सत्वर+

चंद्रबिंदु तुम, तुम विराम हो 
शब्द संधि की रीत  तुम्हीं 

गुणा भाग के समीकरण का 
हासिल जो  परिणाम तुम्हीं
जोडा और घटा कर देखा 
शेष रहा जो नाम तुम्हीं 
बीजगणित के अंकगणित के
सूत्र तुम्हीं से प्रतिपादित
रेखाओं में बँधे सितारे
ग्रह तुम ही नक्षत्र तुम्हीं 

तुम ही इक कल आने वाला
और गया जो बीत तुम्हीं 

वर्णन सिर्फ तुम्हारा ही है
युग युग के इतिहासों में
तुम ही रहे साथ में प्रतिपल
मरुथल में, मधुमासों में
चेतन और अचेतन का हो
अवचेतन का केंद्र तुम्ही
 बंद पलक का तम हो तुम ही
मुदित तुम्ही उजियासों में

तुम ही मैं हो, मैं भी तुम हो
जीवन की हो प्रीत तुम्ही
तुम ही क्रिया, विशेषण तुम ही
सर्वनाम भी मीत तुम्ही




क्या करोगे अब बनाकर

क्या करोगे अब बनाकर स्वप्न के फिर से घरोंडे
रात के ढलते पलों तक जब कोई टिकता नही है

कब तलक दोगे दिलाए है अँधेरा रात भर का
एक युग बीता ,तिमिर जो घिर गया छंटता नहीं है
सुन रखा था दस बरस में भाग्य भी करवट बदलता
पर यहाँ का , ​अंगदी है पाँव जो टलता नहीं है


फायदा क्या बीज बो​ने ​का पठारी बंजरो में
जब यहां पर दूब का तिनका तलक  उगता नही है

वक्त की अंगड़ाइयाँ ने रख दिया सब कुछ बदलकर
पर तुम्हारी ही गली में समय थम कर रह गया है
उड़ चुके पाखी प्रवासी फिर पलट कर नीड अप​ने ​
तुम अभी भी सोचते हो कौन कल क्या कह गया है 

क्या करोगे तुम बनाकर एक वह इतिहास फिर से
पृष्ठ तिमिराये हुए जिसके कोई पढ़ता नही है

युग बदलता  जा रहा पर तुम खड़े अब तक वहीं हो 
जिस जगह पर कोई पाँखुर उड़ कहीं से आ गई थी 
सारिणी में ढल रहे दिन की अभी भी खोजते हो 
भोर में जिन सरगमों को सोन चिड़िया गा गई थी 

क्या करोगे अब बनाकर, चित्र झालर पर हवा की
कोई झोंका इक निमिष भी जब कहीं रुकता नहीं है 

राकेश खण्डेलवाल

याद की आज फिर से किताबे खुली

याद की आज फिर से किताबे खुली
सामने आ गई एक उजड़ी गली
जिसकी खिड़की के टूटे हुए कांच में
झाँकती चंद परछाइयां मनचली

हो परावर्तिता चित्र धुंधले दिखे
सामने खंडहर हो चुकी भीत पर
एक कंचा रहा धूल से झांकता
झुंड से गिर गया बाजियां जीत कर
सामने नीम पर शाख में झूलती
कुछ पतंगे लिए कट चुकी डोरियां
एक झोंका हवा का सु​नाता  हुआ
सरगमो में वो भूली हुई लोरियां

यों लगा झनझनाती हुई पैंजनी
फिर से पनघट से लौटी इधर को चली
सामने थी रही वो ही ​सूनी  गली

खेल का सामने वो ही मैदान था
जिसमे अक्सर कबड्डी के खेले हुए
गेंद की चोट खा बिखरी ​पंढरियाँ 
चूड़ियों और गुटको के मेले हुए
आज भी लग रहा उड़ रहीं गिल्लियां
छूके डंडे, किन्ही पाखियों की तरह
एक पल भी कभी होवे ​विश्राम  का
उन दिनों कोई इसकी नही थी वजह

जिस का सान्निध्य था बस समय के परे
चाहे राते घिरी या कि शामें ढली
सामने वस रही वो ही उजड़ी गली

नीम का पेड़ वो इक घनी छाँह का
जिसके नीचे कथाएँ गई थी बुनी
कोई आल्हा कहे छेड़ सारंगियाँ
कोई रामायणी के अधर से सुनी
आज भी उसके आँगन में दीपक रखा
और तुलसी के चौरे के अवशेष थे
पर सभी वे हुए गुम शहर में कहीं
इस तरफ़ आया करते जो दरवेश थे

कोशिशों में भुलाने की तल्लीन् है
आज के पल लुभाते हुए ये छली
भूलती ही नहीं आज भी वह गली


आज निकले गली के उसी मोड़ से
आ गए दूर कितने पता ना चला 
एक पल पार जो था किया एक दिन 
मार खा वक्त की शेष अब न रहा 
है शशोपंज क्या उसका सतीत्व भी 
है अभी तक बदलते हुए दौर में 
याद के पाखियों का बने नीड फिर 
लौट कर के कभी एक उस ठौर में 

जानते हैं असंभव है ये बात पर 
चाह तो उड़ती  फिर फिर वही को चली 
 भूलती ही नहीं  एक संकरी गली  ​

मैंने उसको छुपा के


मैंने उसको  छुपा के अपनी अनुभूति इक पत्र लिखा था
कुशल क्षेम के शब्दों तक ही सीमित करके बात कही थी

लेकिन पता नहीं था मुझको उसकी गहन परख की नज़रें
अक्षर की आकृति में गुँथ जाते भावों को यूँ पढ़ लेंगी
शब्द शब्द के मध्य बिछी है अर्थ लिए जो कतिपय दूरी
उसको सहज भूमिका कर के इक नूतन गाथा गढ़ लेंगी

सम्भव है उसकी स्मृतियों में शिलालेख होंगे वे पल जब
मेरी मूक दृष्टि ने चुपके चुपके उसकी बाँह गही थी

जितने भी संदर्भ पत्र की पृष्ठ भूमि में छुपे हुए थे
उसे विदित थे जाने कैसे, जोकि किसी ने नहीं बताए
उसके अधर गुनगुनाते थे सरगम पर उन ही गीतों को
एकाकी संध्या में मैंने पूरबा को इक रोज  सुनाए

सूनेपन की चादर ओढ़े था उस दिन वह तीर नदी का
जब कि किसी की गंध मलयजी छू मुझको चुपचाप गयी थी

ये  भी तो सोचा था मैंने उसे पत्र लिखने से पहले
क्या संबोधन देकर अपने संदेशे को शुरू करूं मैं
नाम लिखा था केवल उसने भांप लिया ये जाने कैसे
किन भावों का एक नाम की सीमितता में हुआ समन्वय


मैंने उसको छुपाके मन की बातों को सन्देश लिखा था 
लेकिन उसको छिपी हुई हर अनुभूति, अभिव्यक्त रही थी 


अब मैं ही थोड़ा चुप रह लूँ

सुबह घड़ी वाले अलार्म से ढली सांझ की न्यूजकास्ट तक 
पूरा दिन  ही घिरा शोर में ,अब मैं ही थोड़ा चुप रह लूँ 

देहरी से आगे बढ़ते ही डेसीबल बढ़ते लगता है 
चौराहों पर कार बसों की चिर परिचित घर घर आवाज़ें 
ट्रेफ़िक के हेलीकाप्टर का स्वर गूँजित करता सुबहा को
और कम्प्यूटिंग के प्लेन की शनै शनै बढ़ती परवाजे

घर से दफ़्तर की आधी दूरी में इतना कुछ हो जाता 
मन ख़ुद से ही प्रश्न पूछता कितने दिनों और ये सह लूँ

वेबिनार हैं, काँफ़्रेंस है, वाटर कूलर वाली गप शप
बिना रूके बजता रहता है शोर फ़ोन की घंटी का भी 
हाल  पूछते है कुलिग भी आते जाते रुक द्वारे पर 
आफिस। में रहती है हलचल जैसे सब्जी मंडी की सी 

आतुरता बढ़ती कैसे एकाग्र चित्तता के पल पाएँ
शांत सरोवर की लहरों सा  कुछ पल तो एकाकी बह लूँ 

ट्विटर फ़ेसबुक, वाटसेप्प के लगातार ही बढ़ते हेले
कविता, लेख, कहानी सब पर टिप्पणियों का है आवाहन
कहाँ कहाँ पर मिली प्रशंसा, कहाँ कहाँ पर गए छपे हैं
दिवस निशा के हर इक पल पर चीख़ा करता है विज्ञापन 

सोच रहा हूँ मैं ना ही क्यों इस सब से मुंह मोडू अपना 
और मौन स्वर रख कर अपना, जो कहना  खुद से कहलूँ 

अब कोई यदि मेरे पथ पर

अब कोई यदि मेरे पथ पर
बैठे चाहे पलक बिछाकर
अब कोई यदि गहन निशा में
रहे प्रतीक्षित दीप जला कर
में उस पथ के पथ से भी अब इतनी दूर निकल आया हूँ
सम्भव नहीं राह ले जाए मेरे क़दमों को लौटा कर

याद न बाक़ी उन मोड़ो की जहाँ किसी चितवन से बिंध कर
सम्भव है पग फिसले होंगे  या कि रहे हों ज़रा ठिठक कर
या संध्या की  अंगनाइ में  गिर,  घिरते सुरमाएपन ने
खोला होगा कुछ पृष्ठों को अनायास ही हिचक हिचक कर

अब कोई यदि मेरे पथ पर
खोले उस पुस्तक के पन्ने
अब कोई यदि मेरे पथ पर
फिर से लगे इबारत लिखने
सम्भव नहीं मुझे पढ़ पाना लिखा हुआ अब कोई अक्षर
सम्भव नहीं राह ले जाए मेरे कर्दमों को लौटा कर

कभी नदी की लहरों ने थी  छेडी जलतरंग तट पर आ
और वादियों में गूँजी थी किसी बाँसुरी की सुर लहरी
पेंजानियाँ झंकार उठी थी सरगम की उँगली को थामे
मन के इतिहासों में ये सब बातें कहीं खो चुकी गहरी

अब कोई यदि मेरे पथ पर
अपनी पायलिया खनकाये
अब कोई भी मेरे पथ पर
आ वंशी की तान सुनाए
सम्भव नहीं मुझे छू पाये जल तरंग का मद्धम भी स्वर
सम्भव नहीं राह ले जाए मेरे क़दमों को लौटा कर

बिखर चुकी है संजो रखी थी बरसों से जो जर्जर गठरी
परसों के अख़बार सरीखा उसका कुछ भी मोल न बाक़ी
अंधाधुँधी भागदौड़ में स्पर्धा प्रतिस्पर्धा ने  मिल कर
बीते दिवसों की मदिरा पी, रीती की सुधियों की साक़ी

अब कोई भी मेरे पथ पर
संस्कृतियों की बात सुनाए
अब कोई यदि मेरे पथ पर
मधुरिमा सम्बंन्धों को गाये
सम्भव नहीं विगत से लाए कोई पैमाना छलका कर
सम्भव नहीं राह ले जाए मेरे क़दमों को लौटा कर

अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ


दिन सप्ताह महीने बीते
घिरे हुए प्रश्नों में जीते
अपने बिम्बों में अब खुद मैं
प्रश्न चिन्ह जैसा दिखता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ

भावों की छलके गागरिया, पर न भरे शब्दों की आँजुर
होता नहीं अधर छूने को सरगम का कोई सुर आतुर
छन्दों की डोली पर आकर बैठ न पाये दुल्हन भाषा
बिलख बिलख कर रह जाती है सपनो की संजीवित आशा
टूटी परवाज़ें संगवा कर
पंखों के अबशेष उठाकर
नील गगन की पगडंडी को
सूनी नजरों से तकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
पीड़ा आकर पंथ पुकारे, जागे नहीं लेखनी सोई
खंडित अभिलाषा कह देती होता वही राम रचि सोई
मंत्रबद्ध संकल्प, शरों से बिंधे शायिका पर बिखरे हैं
नागफ़नी से संबंधों के विषधर तन मन को जकड़े हैं
बुझी हुई हाथों में तीली
और पास की समिधा गीली
उठते हुए धुंए को पीता
मैं अन्दर अन्दर रिसता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
धरना देती रहीं बहारें दरवाजे की चौखट थामे
अंगनाई में वनपुष्पों की गंध सांस का दामन थामे
हर आशीष मिला, तकता है एक अपेक्षा ले नयनों में
ढूँढ़ा करता है हर लम्हा छुपे हुए उत्तर प्रश्नों में
पन्ने बिखरा रहीं हवायें
हुईं खोखली सभी दुआयें
तिनके जैसा, उंगली थामे
बही धार में मैं तिरता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
मानस में असमंजस बढ़ता, चित्र सभी हैं धुंधले धुंधले
हीरकनी की परछाईं लेकर शीशे के टुकड़े निकले
जिस पद रज को मेंहदी करके कर ली थी रंगीन हथेली
निमिष मात्र न पलकें गीली करने आई याद अकेली
परिवेशों से कटा हुआ सा
समीकरण से घटा हुआ सा
जिस पथ की मंज़िल न कोई
अब मैं उस पथ पर मिलता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
भावुकता की आहुतियां दे विश्वासों के दावानल में
धूप उगा करती है सायों के अब लहराते आँचल में
अर्थहीन हो गये दुपहरी, सन्ध्या और चाँदनी रातें
पड़ती नहीं सुनाई होतीं जो अब दिल से दिल की बातें
कभी पुकारा पनिहारी ने
कभी संभाला मनिहारी ने
चूड़ी के टुकडों जैसा मैं
पानी के भावों बिकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
मन के बंधन कहाँ गीत के शब्दों में हैं बँधने पाये
व्यक्त कहां होती अनुभूति चाहे कोई कितना गाये
डाले हुए स्वयं को भ्रम में कब तक देता रहूँ दिलासा
नीड़ बना, बैठा पनघट पर, लेकिन मन प्यासा का प्यासा
बिखराये कर तिनके तिनके
भावों की माला के मनके
सीपी शंख बिन चुके जिससे
मैं तट की अब वह सिकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ

राकेश खंडेलवाल
__._,_.___

यह संघर्ष हमारा


रहा सदा अपने से ही तो
यह संघर्ष  हमारा 

किंससे करे शिकायत
जब हम सब ही अपराधी है
हल की जगह , दोष
रोपण करने के ही आदी हैं

कर लें क्यों स्वीकार
टूटता ओढ़ा दर्प हमारा 

जो हो गए विमुख
वे सब भी थे चुनाव अपना  ही
किरच किरच हो कर
बिखरा वह था सपना अपना ही 

बढा  चक्र वृद्धि, साँसों पर
प्रति पल क़र्ज़ हमारा

उँगली एक उठा, कब देखी
दिशा शेष चारों की
नजर रही सीमित, सुर्खी
तक केवल, अख़बारों की 

रहा पान की दूक़ानों पर
होता तर्क हमारा 

रहा सदा अपने से ही तो
यह संघर्ष हमारा 
©  राकेश खंडेलवाल 

मदिरा भरती है सुधियाँ की साकी

 कहने को तो सब कुछ ही है फिर भी मन रहता एकाकी
सुबह शाम पीड़ा की मदिरा भरती है सुधियाँ की साकी

आइना जो दिखे सामने उसके चित्र   मनोहर   सारे
पार्श्व पुता है किस कालिख से दिखता नहीं किसी को पूरा
कौन देखता सूख सूख कर प्रक्रिया दर्द सहन करने की
ध्यान रहा सरगम बिखराती धुन पर बजता हुआ तम्बूरा

कितनी है मरीचिका सन्मुख उपलब्धि का नाम ओढ़कर
लेकिन सच है स्थूल रूप में कोई एक नहीं है बाकी

सूखे हुए धतूरे पाये सुधा कलश का लिए आवरण
राजपथो से विस्तृत मन पर चिह्न नहीं कदमो का कोई
रही मुस्कुराती कलियां तो शोभा बनी वाटिकाओं  की
जान सका पर कौन पास की गंध कहाँ पर उनकी खोई

रिमझिम को आनंदित होकर रहे देखते देहरी अंगना
सोचा नहीं किसी ने प्राची से ना किरण अभी तक झांकी

इतिहासों में भी अतीत के अंकित नहीं शब्द कोई भी
जिसके लिए बना सीढ़ी मन, वो बढ़ चुका शीर्ष से आगे
संचित जितना रहा पास की छार छार होती गठरी में
दिन के हो गतिमान निमिष सब साथ उसे ले लेकर भागे

सूनी पगडंडी के जैसे बिखरी हुई उमर की डोरी  
कहीं नहीं है दूर दूर तक पगतालियों की छाप जरा भी
२६ अगस्त २०१८ 

हम बिल्कुल स्वच्छन्द नहीं है

कहने को तो लगा कहीं पर कोई भी प्रतिबन्ध नहीं है
लेकिन जाने क्यों लगता है हम बिल्कुल स्वच्छन्द नहीं है
 
घेरे हुए अदेखी जाने कितनी है लक्ष्मण रेखायें
पथ में पसरी पड़ी हुईं हैं पग पग पर अनगिन झंझायें
पंखुरियों की कोरों पर से फ़िसली हुई ओस की बून्दें
अकस्मात ही बन जाती हैं राह रोक उमड़ी धारायें
 
हँस देता है देख विवशता मनमानी करता सा मौसम
कहता सुखद पलों ने तुमसे किया कोई अनुबन्ध नहीं है
 
बोते बीज निरन्तर,नभ में सूरज चाँद नहीं उग पाते
यह तिमिराँगन बंजर ही है,रहे सितारे यह समझाते
मुट्ठी की झिरियों से निश्चय रिस रिस कर बहता जाता है
भग्न हो चुकी प्रतिमा वाले मंदिर जाते तो क्या पाते
 
जो पल रहे सफ़लता वाले, खड़े दूर ही कह देते हैं
पास तुम्हारे आयें क्योंकर,जब तुमसे सम्बन्ध नहीं है
 
परिभाषित शब्दों ने जोड़े नहीं तनिक परिचय के धागे
जो था विगत बदल कर चेहरे आकर खड़ा हो गया आगे
विद्रोही हो गये खिंचे 
थे 
 आयत में जो बारह खाने
और द्वार को रही खटखटा,सांस सांस मजदूरी मांगे

बगिया में रोपे थे हमने बेला जूही और चमेली
पर उग पाये फूल वही बस जिनमें कोई गंध नहीं है
 

ज्यों ज्यों होती जाती शाम

मन की कस्तूरी भटकाती तृष्णा को गति में आभिराम

सिसका करती किन्तु अपेक्षा ज्यों ज्यों  होती जाती शाम

चातक सी अभिलाषा हर दिन फैलाती है अपने डैने 
सावन के मेघों के जैसी छा जाती है दॄष्टि  गगन पर 
सहज नकारा करती अपने क्षमताओं की सीमित मुट्ठी 
दिवास्वप्न बुनती है, रखती पाँव एक भी  तो न भू पर 

इक मरीचिका में उलझे ही पूरा दिन तो कट जाता है 
मन मसोस अभिलाषा  रहती ज्यों ज्यों होती जाती शाम 

सम्बन्धो की छार छार चूनर के टुकड़े चुनते चुनते
सोचा करती  शायद फिर  से कल लहराये खुली हवा में
चित्र विगत की परछाई का नही उतरता दीवारों से
अटका रहता ध्यान उसी में धूमिल रेखाओं को थामे

तोड़ दम गिरी आशाओ को करता  नही कोई सम्मानित 
बुझने लगती सकल अपेक्षा ज्यो ज्यो होती जाती शाम 

हो अधीर अकुलाहट बढ़ती जाती दिन के चढ़ते चढ़ते
लेकिन चाहत के ख़ाकों में रंग नहीं भर पाता कोई 
चाहत तो बढ़ती है पर क्या चाहत है ये समझ न आता
बनती हुई रूपरेखाएँ रह जाती है ख़ुद में खोई 

कटते जाते जीवन के पल हर दिन ऐसे ही गुमनाम
और निराशा गहराती है ज्यों ज्यों होती जाती शाम 

आज का din

चलो आज का दिन भी बीता

कुछ परिवर्तन हुआ नही था
जैसा कल था आज वही था
चित्र बना इक टंगा हुआ था

कल जैसे
आशा का घट फिर रहा आज भी रीता

रही ताकती डगर राह को
भूली भटकी एक निगाह को
साथ लिये इक बुझी चाह को 

रही प्रतीक्षा 
लिए आज फिर से वनवासिन सीता

वही धूप बीमार अलसती
नीरवता रह रह कर हंसती
पत्ती तक भी एक न हिलती

इतिहासों का
अंकित घटनाक्रम था फिर से जीता
चलो आज का दिन भी बीता


कितने दीप जले सुधियों कर

कल संध्या जब पंडितजी ने अञ्जुरी में गंगाजल डाला
सच बतलाना उस पल मन में कितने दीप जले सुधियों के

सम्भव है लहराये होगे पलको के पर्दे पर कितने
चित्र एक ​अ​लसाई संध्या के जो कैनवास पर उभरे
और क​समसाये होंगे वे हिना रंगी उंगली के बूटे
जो उस पल पल्लू की गुत्थी के व्यूहों में जा थे ठहरे

और गुदगुदाई होंगी वे चुहलें जो की थी सखियों ने
सच बतलाना उस पल मन मे कितने दीप जले सुधियों के

यज्ञ कुंड की अग्नि शिखा के साथ साथ नर्तित होते वे
सपने जो थे परे कल्पना की सीमा के, उससे पहले
स्पर्श अजनबी सा आहुति के लिए ​थाम  कर​ उँगलियों  को
तारतम्य में रहा बांधता असमंजस के सब पल फैले

निश्चित मुझको खुलते ​होंगे  कोष तुम्हारी कुछ स्मृतियों के
सच बतलाना उस पल मन मे कितने दीप जले सुधियों के

मंत्रपूरिता जल से भीगी हुई हथेली सिहरी थी जब
कमल पखुरियों ने खीं​ची थी रेखाएं ​नूतन सपनों की
नयनो ने मद भरे पलो के आगत का आजा था काजल
सुरभि संजोई  सौगंधों ने अधरों पर थिरके वचनों की

नये पंथ पर पगतालियो को जब सहलाया था कलियों ने
सच बतलाना उस पल मन में कितने दीप जले सुधियों के

अनायास ही गीत बुन गये


मैने चाहा नहीं लिखूं मैं कभी गज़ल या कविता कोई
शब्द स्वयं ही मुझ तक आये, अनायास ही गीत बुन गये

मैं अनजान काव्य के नियमों से, छन्दों की परिभाषा से
बहर काफ़िये औ रदीफ़ की मेरे शब्द कोश से दूरी
नहीं व्याकरण की गलियों का पता मिला मुझको नक्शे मे
 दोहे,चौपाइ ​कवित्त से, मिली नहीं मुझको मंजूरी

फिर भी भाव भटकते आय्र अनजाने मेरी देहरी पर
और सफ़र में पग धरने को मेरा आकर साथ चुन गये

लय गति और मात्राओं की गिनती मुझको तनिक ना आई
छन्द भेद की सारिणियों का मुझको कोई ज्ञान नहीं है
कहां अन्तरा रुकता, होती कहाँ वाक्य की पुनरावृत्तियां
इनका भेद किस तरह जानूँ, ये मुझको अनुमान नहीं है

 जितनी बार कंठ की खिड़की से बाहर ​मेरे स्वर झांके
सरगम ने चूमा फ़िर लय के साथ सजा कत उन्हे सुन गये

मन अम्बर में भाव विचरते रहते बिना किसी अंकुश में
बांधा करती है शब्दों की डोरी कोई कलाकार की
मेरी झोली रही कृपण ही शब्दों से भी भावों से भी
और कभी संप्रेषणता सेहो न सकासाक्षात्कार भी

यों बस हुआ शब्द जितने भी चढ़े भाव के करघे पर आ
थे चाहे अनगढ़ लेकिन सब किसी छन्द की राह धुन गये

कितनी बार जलाए

  कितनी बार जलाए हमने अपनी आशाओं के दीपक   सोचे बिना तिमिर का खुद ही हमने ओढ़ा हुआ आवरण   कल की धूप बनाएगी अपने आँगन में रांगोली ...