अब कोई यदि मेरे पथ पर

अब कोई यदि मेरे पथ पर
बैठे चाहे पलक बिछाकर
अब कोई यदि गहन निशा में
रहे प्रतीक्षित दीप जला कर
में उस पथ के पथ से भी अब इतनी दूर निकल आया हूँ
सम्भव नहीं राह ले जाए मेरे क़दमों को लौटा कर

याद न बाक़ी उन मोड़ो की जहाँ किसी चितवन से बिंध कर
सम्भव है पग फिसले होंगे  या कि रहे हों ज़रा ठिठक कर
या संध्या की  अंगनाइ में  गिर,  घिरते सुरमाएपन ने
खोला होगा कुछ पृष्ठों को अनायास ही हिचक हिचक कर

अब कोई यदि मेरे पथ पर
खोले उस पुस्तक के पन्ने
अब कोई यदि मेरे पथ पर
फिर से लगे इबारत लिखने
सम्भव नहीं मुझे पढ़ पाना लिखा हुआ अब कोई अक्षर
सम्भव नहीं राह ले जाए मेरे कर्दमों को लौटा कर

कभी नदी की लहरों ने थी  छेडी जलतरंग तट पर आ
और वादियों में गूँजी थी किसी बाँसुरी की सुर लहरी
पेंजानियाँ झंकार उठी थी सरगम की उँगली को थामे
मन के इतिहासों में ये सब बातें कहीं खो चुकी गहरी

अब कोई यदि मेरे पथ पर
अपनी पायलिया खनकाये
अब कोई भी मेरे पथ पर
आ वंशी की तान सुनाए
सम्भव नहीं मुझे छू पाये जल तरंग का मद्धम भी स्वर
सम्भव नहीं राह ले जाए मेरे क़दमों को लौटा कर

बिखर चुकी है संजो रखी थी बरसों से जो जर्जर गठरी
परसों के अख़बार सरीखा उसका कुछ भी मोल न बाक़ी
अंधाधुँधी भागदौड़ में स्पर्धा प्रतिस्पर्धा ने  मिल कर
बीते दिवसों की मदिरा पी, रीती की सुधियों की साक़ी

अब कोई भी मेरे पथ पर
संस्कृतियों की बात सुनाए
अब कोई यदि मेरे पथ पर
मधुरिमा सम्बंन्धों को गाये
सम्भव नहीं विगत से लाए कोई पैमाना छलका कर
सम्भव नहीं राह ले जाए मेरे क़दमों को लौटा कर

अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ


दिन सप्ताह महीने बीते
घिरे हुए प्रश्नों में जीते
अपने बिम्बों में अब खुद मैं
प्रश्न चिन्ह जैसा दिखता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ

भावों की छलके गागरिया, पर न भरे शब्दों की आँजुर
होता नहीं अधर छूने को सरगम का कोई सुर आतुर
छन्दों की डोली पर आकर बैठ न पाये दुल्हन भाषा
बिलख बिलख कर रह जाती है सपनो की संजीवित आशा
टूटी परवाज़ें संगवा कर
पंखों के अबशेष उठाकर
नील गगन की पगडंडी को
सूनी नजरों से तकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
पीड़ा आकर पंथ पुकारे, जागे नहीं लेखनी सोई
खंडित अभिलाषा कह देती होता वही राम रचि सोई
मंत्रबद्ध संकल्प, शरों से बिंधे शायिका पर बिखरे हैं
नागफ़नी से संबंधों के विषधर तन मन को जकड़े हैं
बुझी हुई हाथों में तीली
और पास की समिधा गीली
उठते हुए धुंए को पीता
मैं अन्दर अन्दर रिसता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
धरना देती रहीं बहारें दरवाजे की चौखट थामे
अंगनाई में वनपुष्पों की गंध सांस का दामन थामे
हर आशीष मिला, तकता है एक अपेक्षा ले नयनों में
ढूँढ़ा करता है हर लम्हा छुपे हुए उत्तर प्रश्नों में
पन्ने बिखरा रहीं हवायें
हुईं खोखली सभी दुआयें
तिनके जैसा, उंगली थामे
बही धार में मैं तिरता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
मानस में असमंजस बढ़ता, चित्र सभी हैं धुंधले धुंधले
हीरकनी की परछाईं लेकर शीशे के टुकड़े निकले
जिस पद रज को मेंहदी करके कर ली थी रंगीन हथेली
निमिष मात्र न पलकें गीली करने आई याद अकेली
परिवेशों से कटा हुआ सा
समीकरण से घटा हुआ सा
जिस पथ की मंज़िल न कोई
अब मैं उस पथ पर मिलता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
भावुकता की आहुतियां दे विश्वासों के दावानल में
धूप उगा करती है सायों के अब लहराते आँचल में
अर्थहीन हो गये दुपहरी, सन्ध्या और चाँदनी रातें
पड़ती नहीं सुनाई होतीं जो अब दिल से दिल की बातें
कभी पुकारा पनिहारी ने
कभी संभाला मनिहारी ने
चूड़ी के टुकडों जैसा मैं
पानी के भावों बिकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
मन के बंधन कहाँ गीत के शब्दों में हैं बँधने पाये
व्यक्त कहां होती अनुभूति चाहे कोई कितना गाये
डाले हुए स्वयं को भ्रम में कब तक देता रहूँ दिलासा
नीड़ बना, बैठा पनघट पर, लेकिन मन प्यासा का प्यासा
बिखराये कर तिनके तिनके
भावों की माला के मनके
सीपी शंख बिन चुके जिससे
मैं तट की अब वह सिकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ

राकेश खंडेलवाल
__._,_.___

यह संघर्ष हमारा


रहा सदा अपने से ही तो
यह संघर्ष  हमारा 

किंससे करे शिकायत
जब हम सब ही अपराधी है
हल की जगह , दोष
रोपण करने के ही आदी हैं

कर लें क्यों स्वीकार
टूटता ओढ़ा दर्प हमारा 

जो हो गए विमुख
वे सब भी थे चुनाव अपना  ही
किरच किरच हो कर
बिखरा वह था सपना अपना ही 

बढा  चक्र वृद्धि, साँसों पर
प्रति पल क़र्ज़ हमारा

उँगली एक उठा, कब देखी
दिशा शेष चारों की
नजर रही सीमित, सुर्खी
तक केवल, अख़बारों की 

रहा पान की दूक़ानों पर
होता तर्क हमारा 

रहा सदा अपने से ही तो
यह संघर्ष हमारा 
©  राकेश खंडेलवाल 

मदिरा भरती है सुधियाँ की साकी

 कहने को तो सब कुछ ही है फिर भी मन रहता एकाकी
सुबह शाम पीड़ा की मदिरा भरती है सुधियाँ की साकी

आइना जो दिखे सामने उसके चित्र   मनोहर   सारे
पार्श्व पुता है किस कालिख से दिखता नहीं किसी को पूरा
कौन देखता सूख सूख कर प्रक्रिया दर्द सहन करने की
ध्यान रहा सरगम बिखराती धुन पर बजता हुआ तम्बूरा

कितनी है मरीचिका सन्मुख उपलब्धि का नाम ओढ़कर
लेकिन सच है स्थूल रूप में कोई एक नहीं है बाकी

सूखे हुए धतूरे पाये सुधा कलश का लिए आवरण
राजपथो से विस्तृत मन पर चिह्न नहीं कदमो का कोई
रही मुस्कुराती कलियां तो शोभा बनी वाटिकाओं  की
जान सका पर कौन पास की गंध कहाँ पर उनकी खोई

रिमझिम को आनंदित होकर रहे देखते देहरी अंगना
सोचा नहीं किसी ने प्राची से ना किरण अभी तक झांकी

इतिहासों में भी अतीत के अंकित नहीं शब्द कोई भी
जिसके लिए बना सीढ़ी मन, वो बढ़ चुका शीर्ष से आगे
संचित जितना रहा पास की छार छार होती गठरी में
दिन के हो गतिमान निमिष सब साथ उसे ले लेकर भागे

सूनी पगडंडी के जैसे बिखरी हुई उमर की डोरी  
कहीं नहीं है दूर दूर तक पगतालियों की छाप जरा भी
२६ अगस्त २०१८ 

हम बिल्कुल स्वच्छन्द नहीं है

कहने को तो लगा कहीं पर कोई भी प्रतिबन्ध नहीं है
लेकिन जाने क्यों लगता है हम बिल्कुल स्वच्छन्द नहीं है
 
घेरे हुए अदेखी जाने कितनी है लक्ष्मण रेखायें
पथ में पसरी पड़ी हुईं हैं पग पग पर अनगिन झंझायें
पंखुरियों की कोरों पर से फ़िसली हुई ओस की बून्दें
अकस्मात ही बन जाती हैं राह रोक उमड़ी धारायें
 
हँस देता है देख विवशता मनमानी करता सा मौसम
कहता सुखद पलों ने तुमसे किया कोई अनुबन्ध नहीं है
 
बोते बीज निरन्तर,नभ में सूरज चाँद नहीं उग पाते
यह तिमिराँगन बंजर ही है,रहे सितारे यह समझाते
मुट्ठी की झिरियों से निश्चय रिस रिस कर बहता जाता है
भग्न हो चुकी प्रतिमा वाले मंदिर जाते तो क्या पाते
 
जो पल रहे सफ़लता वाले, खड़े दूर ही कह देते हैं
पास तुम्हारे आयें क्योंकर,जब तुमसे सम्बन्ध नहीं है
 
परिभाषित शब्दों ने जोड़े नहीं तनिक परिचय के धागे
जो था विगत बदल कर चेहरे आकर खड़ा हो गया आगे
विद्रोही हो गये खिंचे 
थे 
 आयत में जो बारह खाने
और द्वार को रही खटखटा,सांस सांस मजदूरी मांगे

बगिया में रोपे थे हमने बेला जूही और चमेली
पर उग पाये फूल वही बस जिनमें कोई गंध नहीं है
 

ज्यों ज्यों होती जाती शाम

मन की कस्तूरी भटकाती तृष्णा को गति में आभिराम

सिसका करती किन्तु अपेक्षा ज्यों ज्यों  होती जाती शाम

चातक सी अभिलाषा हर दिन फैलाती है अपने डैने 
सावन के मेघों के जैसी छा जाती है दॄष्टि  गगन पर 
सहज नकारा करती अपने क्षमताओं की सीमित मुट्ठी 
दिवास्वप्न बुनती है, रखती पाँव एक भी  तो न भू पर 

इक मरीचिका में उलझे ही पूरा दिन तो कट जाता है 
मन मसोस अभिलाषा  रहती ज्यों ज्यों होती जाती शाम 

सम्बन्धो की छार छार चूनर के टुकड़े चुनते चुनते
सोचा करती  शायद फिर  से कल लहराये खुली हवा में
चित्र विगत की परछाई का नही उतरता दीवारों से
अटका रहता ध्यान उसी में धूमिल रेखाओं को थामे

तोड़ दम गिरी आशाओ को करता  नही कोई सम्मानित 
बुझने लगती सकल अपेक्षा ज्यो ज्यो होती जाती शाम 

हो अधीर अकुलाहट बढ़ती जाती दिन के चढ़ते चढ़ते
लेकिन चाहत के ख़ाकों में रंग नहीं भर पाता कोई 
चाहत तो बढ़ती है पर क्या चाहत है ये समझ न आता
बनती हुई रूपरेखाएँ रह जाती है ख़ुद में खोई 

कटते जाते जीवन के पल हर दिन ऐसे ही गुमनाम
और निराशा गहराती है ज्यों ज्यों होती जाती शाम 

आज का din

चलो आज का दिन भी बीता

कुछ परिवर्तन हुआ नही था
जैसा कल था आज वही था
चित्र बना इक टंगा हुआ था

कल जैसे
आशा का घट फिर रहा आज भी रीता

रही ताकती डगर राह को
भूली भटकी एक निगाह को
साथ लिये इक बुझी चाह को 

रही प्रतीक्षा 
लिए आज फिर से वनवासिन सीता

वही धूप बीमार अलसती
नीरवता रह रह कर हंसती
पत्ती तक भी एक न हिलती

इतिहासों का
अंकित घटनाक्रम था फिर से जीता
चलो आज का दिन भी बीता


कितने दीप जले सुधियों कर

कल संध्या जब पंडितजी ने अञ्जुरी में गंगाजल डाला
सच बतलाना उस पल मन में कितने दीप जले सुधियों के

सम्भव है लहराये होगे पलको के पर्दे पर कितने
चित्र एक ​अ​लसाई संध्या के जो कैनवास पर उभरे
और क​समसाये होंगे वे हिना रंगी उंगली के बूटे
जो उस पल पल्लू की गुत्थी के व्यूहों में जा थे ठहरे

और गुदगुदाई होंगी वे चुहलें जो की थी सखियों ने
सच बतलाना उस पल मन मे कितने दीप जले सुधियों के

यज्ञ कुंड की अग्नि शिखा के साथ साथ नर्तित होते वे
सपने जो थे परे कल्पना की सीमा के, उससे पहले
स्पर्श अजनबी सा आहुति के लिए ​थाम  कर​ उँगलियों  को
तारतम्य में रहा बांधता असमंजस के सब पल फैले

निश्चित मुझको खुलते ​होंगे  कोष तुम्हारी कुछ स्मृतियों के
सच बतलाना उस पल मन मे कितने दीप जले सुधियों के

मंत्रपूरिता जल से भीगी हुई हथेली सिहरी थी जब
कमल पखुरियों ने खीं​ची थी रेखाएं ​नूतन सपनों की
नयनो ने मद भरे पलो के आगत का आजा था काजल
सुरभि संजोई  सौगंधों ने अधरों पर थिरके वचनों की

नये पंथ पर पगतालियो को जब सहलाया था कलियों ने
सच बतलाना उस पल मन में कितने दीप जले सुधियों के

अनायास ही गीत बुन गये


मैने चाहा नहीं लिखूं मैं कभी गज़ल या कविता कोई
शब्द स्वयं ही मुझ तक आये, अनायास ही गीत बुन गये

मैं अनजान काव्य के नियमों से, छन्दों की परिभाषा से
बहर काफ़िये औ रदीफ़ की मेरे शब्द कोश से दूरी
नहीं व्याकरण की गलियों का पता मिला मुझको नक्शे मे
 दोहे,चौपाइ ​कवित्त से, मिली नहीं मुझको मंजूरी

फिर भी भाव भटकते आय्र अनजाने मेरी देहरी पर
और सफ़र में पग धरने को मेरा आकर साथ चुन गये

लय गति और मात्राओं की गिनती मुझको तनिक ना आई
छन्द भेद की सारिणियों का मुझको कोई ज्ञान नहीं है
कहां अन्तरा रुकता, होती कहाँ वाक्य की पुनरावृत्तियां
इनका भेद किस तरह जानूँ, ये मुझको अनुमान नहीं है

 जितनी बार कंठ की खिड़की से बाहर ​मेरे स्वर झांके
सरगम ने चूमा फ़िर लय के साथ सजा कत उन्हे सुन गये

मन अम्बर में भाव विचरते रहते बिना किसी अंकुश में
बांधा करती है शब्दों की डोरी कोई कलाकार की
मेरी झोली रही कृपण ही शब्दों से भी भावों से भी
और कभी संप्रेषणता सेहो न सकासाक्षात्कार भी

यों बस हुआ शब्द जितने भी चढ़े भाव के करघे पर आ
थे चाहे अनगढ़ लेकिन सब किसी छन्द की राह धुन गये

फूल सूखे किताबों में मिलते नहीं


शैल्फ में ही रखी पुस्तकें रह गईउंगलियां छू के अब पृष्ठ खुलते नहीं 
आज करने शिकायत लगी है हवाफूल सूखे किताबों में मिलते नहीं 

वे ज़माने हुए अजनबी आज जबसाँझ तन्हा  सितारों से बातें करे
 इत्र में भीगे रूमाल से गंध उड़ याद की वीथियों में निरंतर झरे 
दॄष्टि  की कूचियों से नयन कैनवस पर उकेरे कोई चित्र आकर नया 
मौन की स्याहियाँ ले कलम पगनखीभूमि पर अपने हस्ताक्षरों को करे 

ढूँढती है नजर भोर से सांझ तककोई चूनर कही भी लहरती नहीं
ना ही शाने से रह रह फ़िसलते हुयेउंगलियों पे वे पल्लू लिपटते नहीं

कुन्तलों की रहा अलगनी पे टँगा फूल मुस्का रहा था गई  शाम से
मोगरे का महकता हुआ बांकपन भेजता था निमंत्रण कोई नाम ले
कंगनों में उलझती रही वेणियां  आज की है नहींबात कल की रही
लग रहे चित्र सार ​महज  अजनबीदूर इतने हुये याद के गांव से

तोड़ कर रख लिए एक गुलदान मेंमेज की शोभा चाहे बने चार दिन
कल के टूटे हुए फूल वासी हुएदेव के शीश पर जाके सजते नहीं 

​दॄष्टि उठ कर झुके फिर से  गिर कर उठे और कहती रहे शब्द बिन बात को 
देह के नभ पे बिखरे हुए हों चिकुर, नित्य लज्जित करें मावसी रात को 
कितनी नदियों के उठ कर चले हों भंवर, चाह लेकर समाहित हों त्रिवली में आ 
गंध पूरबाइयों से झरे आतुरा थामने के लिए संदली हाथ को

चित्र नयनों के ये है दिवास्वप्न जो  भोर आने तलक 
​तो
 ठहरते नही
कल्पना के वि
​हग 
फड़फड़ाते हुए आज के 
​व्योम पर ​
आ विचरते नहीं 

दिये जलाकर ढूंढ रहे

तमस राह में
दिया जला कर
ढूंढ रहै तकदीर
जिन हाथो में
शेष न कोई
बाकी रही लकीर

कबिरा की 
​विकलांग ​ लुकाठी
 हाथों में थामें 
सांस भिखारिन उस
द्वारे पर
आ भिक्षा मांगे

जिस द्वारे पर
पंक्ति बना कर
सत्तर खड़े फ़कीर

बिना सुई की
घड़ियां पहने
इठलाती दीवार
टिका हुआ है
कैलेंडर सा
परसों का अखबार

​खबर छपी कल
​लुटने वाली
धड़कन की जागीर 

​रही रिक्त 
सन्देश बिना 
इक काँधे की झोली 
सूनी  छत पर
कोई चिरैय्या 
आकर न बोली 

लक्ष्मण रेखा 
खींच खड़ा खुद 
जमनाजी का तीर  ​


मंजिल

जीवन पथ पर पल पल उगती रही लालसा इक मंज़िल की
इस मंज़िल पर आकर पाया मन्ज़िल ढूंढ रही खुद मंज़िल

थी मरीचिकाओं में लिपटी इस मंज़िल पर आती राहें
 झंझाओ की भूलभुलैया पल पल पर डाले थी डेरे
यात्रा में पाथेय नीङ का कोई अंतर  शेष नही था
पता नही था सांझ ढली कब और किस घड़ी उगे सवेरे

इस मंज़िल पर आकर यह मन प्रश्न स्वयं से ये करता है
इस मअंजिल की बहॉग दौड़ में क्या कुछ तुझे हुआ है हासिल

मोड़  मोड़ पर झंझाओ से जूझा एकाकी यायावर
बोता रहा कदमतलियों  में लाकर सूरज चांद सितारे
पार  किये अनगिन कंटक  वन फूल सजाने को इस पथ पर
यज्ञ परीक्षा की आहुति में होम किये सब स्वप्न सँवारे

थी असाध्य जो और असंभव करते रहे तपस्याएं वे
किंतु एक बादल का टुकड़ा भी छाया को न पाया मिल

इस मंज़िल पर आकर जाना, हर इक मंज़िल दिवास्वप्न है
धुँधलाये दर्पण में तिरती किसी धुंये की परछाई सी
 करती है सम्मोहित  मन को सुखद सुनहरे सपने  दर्शा
मौन किसी निर्जन  में बजती हो प्रतीत एक शहनाई सी

मंज़िल की राहों पर चलकर पा जाता हर कोई मंज़िल
कोई पाए मनचाही तो बने किसे की भटकन मंज़िल

 

में इस मंज़िल पर




जीवन के पथ पर अनगिनती मंज़िल मिलती यायावर को
में इस मंज़िल पर आकर हूँ एक नई मन्ज़िल  तलाशता

मोड़ मोड़ पर मिली मन्ज़िलें स्वागत में बाँहें फ़ैलाये
आमंत्रण देती, सन्ध्या का नीड़ वहीं अंतिम बन जाये
पथ की बाधाओ को सहकर जो परिणाम अपेक्षित पाया
कर संतोष उसी में, यात्रा वहीं पूर्ण तय कर दी जाये

 पर मन का उतावलापन तो ​नये क्षितिज की खिड़की खोले
​ दूर नजर की सीमाओं  से रहे ध्येय को फिर पुकारता


संचय की प्रवृत्ति तो जीवन का प्राकृतिक ही स्वभाव है
पूर्ण पूर्णता पा लेने पर भी लगता कुछ तो अभाव है
इस मन्ज़िल पर आकर ऐसी ही अनुभूति जगी है मन में
यह मन्ज़िल है बस मरीचिका, दूर अभी मेरा पड़ाव है

रिक्त हो गई गठरी की  में खोल तहे सीधी कर लेता
और भोर में पाथेयों की निधियां फिर नूतन निखारता ​


मन्ज़िल की परिभाषाये टी हर मंज़िल पर आकर बदलीं  
नई भोर के साथ डगर के अम्बर पर छाई नव बदली
झंझाओ से पथचिह्नों को मील सदा आयाम नए ही
कदम कदम पर संकल्पो को देख देख बाधाएं सम्भली

इस मंज़िल पर, मंज़िल ही अब दिखा रही है दूजी मंज़िल
मैं नव मंज़िल का नूतन पथ मानचित्र में हूँ संवारता 

संस्कार तो बंदी लोक कथाओं मर


संस्कार तो बन्दी लोक कथाओं में
रिश्ते नातों का निभना लाचारी है

जन्मदिनों से वर्षगांठ तक सब उत्सव
वाट्सएप की एक पंक्ति में निपट गये
तीज और त्योहार, अमावस पूनम भी
एक शब्द "हैप्पी" में जाकर सिमट गये

सुनता कोई नही, लगी है सीडी पर
कथा सत्यनारायण कब से जारी है

तुलसी का चौरा अंगनाई नहीँ रहे
अब पहले से ब​हना भाई नहीं रहे
रिश्ते जिनकी छुअन छेड़ती थी मन में
मधुर भावना की शहनाई, नहीं रहै

दुआ सलाम रही है केवल शब्दो में
​और औपचारिकता सी  व्यवहारी हैं

जितने भी थे फेसबुकी संबंध हुए
कीकर से मन में छाए मकरंद हुये 
भाषा के सब शब्द अधर की गलियों से
फिसले, जाकर कुंजीपट में बंद हुए

बातचीत की डोर उलझ कर टूट गई
एक भयावह मौन हर तरफ तारी है 

Sent from my iPad

उम्र ढलते ही

छंट गई है गर्द सारी आइने से यकबयक ही
उम्र ढलते ही दिखा है सत्य हर परदा हटा कट

दम्भ अपने बाजुओं का कर समर्पण चुप खड़ा है
धुंध में डूबी नजर रह रह पलक को 
​मि​
​मि​
चाती
कान का 
​है 
ध्यान सारा द्वार की चुप सांकलों पर
डाकिया आ खटखटाये हाथ 
​में 
 
​ले 
 
​को
ई पाती

तोड़ परिचय राह चल दी उम्र के इस मोड़ से
​,​
 अब
दृष्टि  में उभरे नहीं है कोई चेहरा मुस्कुराकर 

​मंज़िलों की सीढ़ियां भी मांगती विश्राम प्रतिपल 
दिन निकलते पूछता है सांझ कितनी दूर है अब 
दोपहर रखकर हथेली आँख पर ताके दिशाएँ 
बादलों की पालकी ले छाँह को, आ पाएगी कब

हर कदम आगे बढा  है इक असीमित बोझ लेकर 
कोई शायद नाम ले ले  ​दूर से उसको बुलाकर 

उम्र ढलते ही हुये  हैं स्वप्न सारे पतझड़ी वे
जो सजे चढ़ती उमर के नयन में आ गुलमोहर से
प्रश्नचिह्नों की लगी है अनवरत लम्बी कतारें
औऱ उत्तर है तिरोहित जिंदगी की पुस्तको से

 ग्रीष्म के इक मरुथली नभ सा तिरा है शून्य केवल 
स्पर्श कुछ देती हैं हैं अब हवा भी गुनगुनाकर 

अब कोई यदि मेरे पथ पर

अब कोई यदि मेरे पथ पर बैठे चाहे पलक बिछाकर अब कोई यदि गहन निशा में रहे प्रतीक्षित दीप जला कर में उस पथ के पथ से भी अब इतनी दूर निकल आया हूँ...