नई अभिव्यक्तियों की भूमिकायें अब बनाओ

नैन की बीनाईयों पर धूल की परतें जमें जब
बादलों के चन्द टुकड़े केश में आकर घुलें जब
हाथ, शाखा इक तराशी का न पल भर हाथ छोड़ें
कोई रह रह भूलता सा याद में आने लगे जब
तब सुनो, यह मौन शब्दों में समय बतला रहा है
प्रीत की कविता नहीं अब नीति के कुछ गीत गाओ
गाओ वह जो एकतारे से कहे मीरा दिवानी
गाओ वह जो कुंज में वृन्दावनी हो सांझ गाये
छेड़ दो वह रागिनी जो सूर के स्वर में घुली है
गाऒ वह सुन कर जिसे खुद रागिनी भी गुनगुनाये
और यदि अक्षम तुम्हारा स्वर न गाने में सफ़ल हो
तो किनारे पर खड़े हो,धार के सपने सजाओ
प्रीत की अनुभूतियों को और कितने शब्द दोगे
और कितने दिन सपन के बीज बो निज को छलोगे
पीटते कब तक रहोगे जा चुके पग की लकीरें
कब तलक इक वृत्त में तुम बन्द कर पलकें चलोगे
ज़िन्दगी के पंथ के इस आखिरी विश्राम-स्थल पर
कुछ नई अभिव्यक्तियों की भूमिकायें अब बनाओ
हो गया ओझल नजर से उस दिवस में खोये क्यों तुम
शाख को क्या देखते हो, हो चुके नि:शेष विद्रुम
एक भ्रम की हो गईं धुन्धली घनी परछाईयों में
और कितनी देर तक तुम हो रहोगे इस तरह गुम
अब नये इक साज के निर्माण का आधार बन कर
सरगमों को इक नया ध्याय दे देकर सजाऒ

यह मुझको अनुमान नहीं था

सपनों की पगडंडी पर बस एक बार देखा था तुमको
बस जायेगा चित्र तुम्हारा आंखों में, अनुमान नहीं था
 
जीवन वन में रहा विचरता मर्यादा की ओढ़ दुशाला
संस्क्रुतियों के दीप जला कर किया पंथ में शुभ्र उजाला
गुरुकुल के सिद्धांत ईश का वचन मान कर शीष चढ़ाये
लेकर कच की परम्परायें, सम्बन्धों का अर्थ निकाला
 
लेकिन बरसों के प्रतिपादित नियम, निमिष में ढह जाते हैं
पुष्प शरों की सीमा कितनी है ये मुझको ज्ञान नहीं था
 
नारद का प्रण, तप की गरिमा, बन्धन सभी उम्र के टूटे
एक दॄश्य ही सत्य रह गया,बाकी चित्र हुए सब झूठे
याम,घड़ी पल, प्रहर समय की परिभाषायें शून्य हो गई
पलकें पत्थर हुईं,दृश्य जो एक बार बन गये, न टूटे
 
रात सौंप कर गई स्वप्न की जो इक स्वर्णिम रंगी चुनरिया
उसे छीन ले जाये ऐसा कोई भी दिनमान नहीं था
 
जाने क्यों परिचय अपना ही लगा अधूरा मुझको लगने
न जाने क्या आस संजोये, होंठ लगे रह रह कर कँपने
खुली हुई बाँहें अधीर हो उठीं पाश में भर लें कुछ तो
दूरी के मानक जितने थे सभी लगे मुट्ठी में बँधने
 
कब मरीचिकायें हो जाती हैं साकार इसे बतलाता
किसी कोश में किसी ग्रंथ में कोई भी प्रतिमान नहीं था

यह अब हमको नहीं गवारा

जो पगडंडी ह्रदय कुंज से ,बन्द हुये द्वारे तक जाती
उस पर चिह्न पड़ें कदमों के यह अब हमको नहीं गवारा
अजनबियत की गहन धुंध ने ओढ़ लिया है जिन चेहरों ने
उनके अक्स नहीं अब मन के आईने में बनें दुबारा
 
सम्बन्धों के वटवृक्षों की जड़ें खोखली ही निकलीं वे
रहे सींचते निशा दिवस हम जिनको प्रीत-नीर दे देकर
सूख चुकीं शाखाओं को पुष्पित करने को कलमें रोपीं
व्यर्थ भटकना हुआ रहे ज्यों मरुथल में नौकायें खे कर
 
पता नहीं था हमें बाग यह उन सब को पी चुप रहता है
भावों के जिन ओस कणों से हमने इसका रूप संवारा
 
छिली हथेली दस्तक देते देते बन्द पड़े द्वारे पर
देहरी पर जाकर के बैठी रहीं भावनायें बंजारी
झोली का सूनापन बढ़ता निगल गया फ़ैली आंजुरिया
और अपेक्षा, ओढ़ उपेक्षा रही मारती मन बेचारी
 
चाहे थी अनुभूति चाँदनी बन आगे बढ़ कंठ लगाये
किन्तु असंगति हठी ही रही उसने बार बार दुत्कारा
 
उचित नहीं है हुये समाधिस्थों को छेड़े जा कोई स्वर
जिसने अंगीकार किया है एकाकीपन, हो एकाकी
अपनी सुधियों के प्याले से हम वह मदिरा रिक्त कर चुके
भर कर गई जिसे अहसासों की गगरी ले कर के साकी
 
वह अनामिका की दोशाला, जिस पर कोई पता नहीं है
पहुँच कहो कैसे सकता अब उस तक कोई भी हरकारा.

संध्या का एकाकीपन

संजो रखे हैं पल स्मृतियों के मैंने मन की मंजूषा में
और संवारा करता हूँ उनसे संध्या का एकाकीपन

वे पल जिनमें दृष्टि साधना करते करते उलझे नयना
वे पल जिनमें रही नींद में सोई हुई कंठ की वाणी
वे पल जिनमें रहे अपरिचित शब्द अधर की अंगनाई से
रही छलकती जिनमें केवल रह रह कर भावों की हांडी

वे पल जब विपरीत दिशा में चले पंथ थे हम दोनों के
और घिरे नयनों के कोहरे में आकर बरसा था सावन

वे उद्वेग भरे पल जिनमें रह न सका था मन अनुशासित
वे रसभीने पल भाषाएँ कर न सकीं जिनको परिभाषित
जिनकी सुरभि गंध भर भर कर महका देती अनगिन कानन
वे पल जो उच्छ्रुंखल पल में,और हुए पल में मर्यादित

वे पल बाँध गए जो पल में जीवन का सम्पूर्ण कथानक
वे पल जिनमें शेस्ध नहीं है कर पाना कोई सम्पादन

पल.पलांश में त्याग अपरिचय, जो हो गये सहज थे अपने
पल जिनकी परछाईं करती है आंखों में चित्रित सपने
पल जिनकी क्षणभंगुरता की सीमाओं की व्यापकता में
कोटि कल्पनाऒं के नक्षत्री विस्तार लगे हैं नपने

हाँ वे ही पल आराधक से जो आराध्य जोड़ते आये
उन्हीं पलों में सिक्त ह्रदय को करता रहता हूँ आराधन

तुमसे दूर कटे कैसे दिन

तुमसे दूर कटे कैसे दिन तुमने पूछा बतलाता हूं
मन की बात उमड़ आती है जिन शब्दों को मैं गाता हूँ
 
झात तुम्हें मैने असत्य का थामा नहीं हाथ पल भर भी
किन्तु सत्य की अप्रियता पर अक्सर गया आवरण डाला
कह देता हूँ शान्तिमयी हूँ सकुशल कटते हैं दिन रातें
मन को भावों को ओढ़ाये रहा मौन की मैं दोशाला
 
केवल शब्दों का आडम्बर है यह भी तो ज्ञात मुझे है
गीत गज़ल के सांचे में मैं, जिन शब्दों को बुन गाता हूँ
 
कुछ बातों का अधरों पर आ पाना रहा असम्भव प्रियतम
और संकुचित सीमाओं में रही बँधी अनुभूति सदा ही
मन के जुड़े हुये तारों में आलोड़न से कहाँ अपरिचित
चाहे तुम स्वीकार न कर पाओ इसको मेरे अनुरागी
 
विषम परिस्थितियों में रहता चित्रलिखित होकर मेरा मन
सत्य यही है आज पूछते हो तुम तो मैं दोहराता हूँ
 
तुमने पूछा तो उग आये अनगिन प्रश्न अचानक मन में
तुम्हें किस तरह रही अपरिचित तुमसे दूर दशा क्या मेरी
दिन की बिछी हुई चादरिया कितनी है विस्तृत हो जाती
बिना सिरे के कितनी लम्बी हो जाती है रात अँधेरी
 
 
यद्यपि हुआ प्रकाशन दुष्कर मन की गहराई का प्रियतम
फिर भी उन्हें शब्द देने की कोशिश मैं करता जाता हूँ.

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...