संध्या का एकाकीपन

संजो रखे हैं पल स्मृतियों के मैंने मन की मंजूषा में
और संवारा करता हूँ उनसे संध्या का एकाकीपन

वे पल जिनमें दृष्टि साधना करते करते उलझे नयना
वे पल जिनमें रही नींद में सोई हुई कंठ की वाणी
वे पल जिनमें रहे अपरिचित शब्द अधर की अंगनाई से
रही छलकती जिनमें केवल रह रह कर भावों की हांडी

वे पल जब विपरीत दिशा में चले पंथ थे हम दोनों के
और घिरे नयनों के कोहरे में आकर बरसा था सावन

वे उद्वेग भरे पल जिनमें रह न सका था मन अनुशासित
वे रसभीने पल भाषाएँ कर न सकीं जिनको परिभाषित
जिनकी सुरभि गंध भर भर कर महका देती अनगिन कानन
वे पल जो उच्छ्रुंखल पल में,और हुए पल में मर्यादित

वे पल बाँध गए जो पल में जीवन का सम्पूर्ण कथानक
वे पल जिनमें शेस्ध नहीं है कर पाना कोई सम्पादन

पल.पलांश में त्याग अपरिचय, जो हो गये सहज थे अपने
पल जिनकी परछाईं करती है आंखों में चित्रित सपने
पल जिनकी क्षणभंगुरता की सीमाओं की व्यापकता में
कोटि कल्पनाऒं के नक्षत्री विस्तार लगे हैं नपने

हाँ वे ही पल आराधक से जो आराध्य जोड़ते आये
उन्हीं पलों में सिक्त ह्रदय को करता रहता हूँ आराधन

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