कोई नाम तुम्हारा ले तो


एकाकी पतझर की संध्या
के अलसाए निर्जन पथ पर
अकस्मात् दीपक जलते हैं 

झाड़ी में जब जुगनू चमकें
होड़ लगा कर आसमान की कंदीलों से 
पिघले हुए स्वर्ण के टुकड़े
लहर लहर बन कर तेरा करते झीलों में

भटके हुए शब्द चुन चुन कर 
कोई नाम तुम्हारा ले तो 
हरसिंगार झरा करते हैं 

उतर रही रजनी डोली से
धीरे धीरे पग में बांधी चाँदी की पायल खनकाती
और नयन में आँजे सपने
पढ़ने लगें लिखी न अब तक प्रीत रंग में भीगी पाती 

तब मन  के तहख़ाने से आ
भाव अचानक शब्दों में ढल  कर
प्रस्फुटित हुआ करते हैं 

प्राची की खुलती खिड़की से 
पिघली हुई चाँदनी टपके कलियों के कोमल पाटल पर 
उषा के झीने आँचल से 
छनती हुई धूप छितराए इंद्रधनुष नभ के आँचल पर 

बीती हुई निशा के मसले 
हुये मोतिए की पाँखुर से 
संदल  मेघ उड़ा करते हैं 

जून २०२१ 








आख़िर क्या है मेरा परिचय

मेरा परिचय 

आज अचानक गूँज उठी है प्राणों में ​सुधि ​ की शहनाई
पूछ रही इस गहन शून्य में, आख़िर क्या है मेरा परिचय

एक नाम है जो केवल आधार रहा है सम्बोधन का
चेहरा एक चढ़े है जिस पर कई मुखौटे बीते दिन के
अपनी नज़रों के प्रश्नो से रहा चुराता अपनी नज़रें
रहा देखता मुट्ठी में से रहे फिसलते पल छन छन के

धड़कन की खूँटी पर टाँकी  सासों की डोरी बट बट कर
लेकिन जीवन की चादर में क्या कुछ कर लाया है संचय

रहा देखता पीछे मुड़ कर शेष न था पगचिह्न कहीं भी
और राह की भटकन का भी कहीं कोई उल्लेख नहीं है
आज यहाँ इस दोराहे पर हुआ दिग्भ्रमित सोच रहा मैं
प्रतिध्वनि बन कर आने वाल अब कोई संदेश नहीं है

यायावर बन कर राहों की मापी हैं दिन रात दूरियाँ
फिर भी क्या मेरे गतिक्रम से राहों का विस्तार हुआ क्षय

एक कथा जिसको दोहराते आये कवि, विक्षिप्त दोनों ही
मुझको भी तो व्यसन रहा उस सरगम को ही स्वर देने का
सुनता कौन? महज है टिक टिक टंगी हुई दीवार घड़ी की
आज सोचता अर्थ मिला क्या यूं ही जीवन भर रोने का

जीवन भर व्यापार चला है  फिर भी संचित हुआ शून्य ही
यहाँ तिमिर का उजलाहट से होता रहा नित्य क्रय विक्रय

सन्नाटे का शासन है

 


होठों पर ताले जड़ कर के बैठ रहो
केवल सुनो। स्वरों से कुछ भी नहीं कहो
आवाज़ों पर लगा हुआ प्रतिबंध यहाँ
इस नगरी में सन्नाटे का शासन है 

भोर यहां पर आती है लंगड़ा लंगड़ा 
दोपहरी आकर उबासियाँ लेती है 
संध्या का आना न आना, एक रहा 
आकर भी बस तान चदरिया सोती है

गालियां सड़कें पगडंडी, सब सूने है 
शाखाओं पर पत्ता एक नहीं हिलता 
दूर क्षितिज तक सिर्फ़ शून्य ही फ़ेला  है
गतिमयता का कोई चिह्न नहीं मिलता 

जलती धूप तलाशे कोई छाँव दिखे
सहमी हुई हवा जैसे अपराधी हो
यायावर के पगचिह्नो की दुर्लभता
जैसे इधर न आ पाने के आदी हो 

सारे चेहरे इक साँचे में ढले हुए
धुली पुंछी  जैसे स्लेट हो शब्द बिना
ख़ाली ख़ाली आँखें है अंतर तल तक
प्रश्नो की बुनियादों पर है प्रश्न चिना

दरबारी है टंगे चित्र दीवारों पर
राजा की नजरों में  हरियल सावन है
शब्द हो चुके बंदी सभी, किताबों में
इस नगरी पर सन्नाटे का शासन है 

पुराने ढंग से फिर पत्र कोई

 


मैं सोचता हूँ तुम्हें लिखूँ अब
पुराने ढंग से फिर पत्र कोई
औ जोड़ दूँ सब बिखरते धागे
तितर बितर हो गए समय में

वे भाव मन के जो पुनकेसरों के पराग कण में लिपट रहे हैं
जो गंध में डूबती हवा की मधुर धुनों में हुए हैं गुंजित
बुने हैं सपने हज़ार रंग के  निखारते शिल्प अक्षरों का
उतार रखते जिन्हें कलम से हुआ है हर एक रोम पुलकित।

गुलाब पाँखुर कलम बना कर
भिगो सुवासों की स्याहियों में
करूँ प्रकाशित वे भाव अपने
जो उमड़े अक्सर ही संधिवय में

गगन के विस्तृत पटल पे अंकित करूँ सितारों से शब्द अपने
या राजहंसों  के फैले पर पर लिखूँ निवेदन सतत प्रणय का
मैं चाहता हूँ सितार तारों की झनझनाहट अभिव्यक्त कर दूँ
उन्हें बना कर पर्याय अपने लगन में भीगे हुए हृदय  का

मैं गुलमोहर के ले पाटलों को
चितेरू मेंहदी की बूटियों में
औ फिर रंगूँ अल्पनाएँ पथ पर
जो साथ चल कर सका था तय मैं

कब टेक्स्ट में आ ह्रदय उमड़ता न फ़ेसटाइम में बात वो है
जो पत्र में ला उकेर देती है तूलिकाएँ रंग अक्षरों से
कब व्हाटसेप्प में हुआ तरंगित वह राग धड़कन की सरगमों का
जो नृत्य करता हुआ बजा है गुँथे शब्द के सहज स्वरों में

मैं सोनजूही के फूल लेकर
दूँ गूँथ वेणी के मोगरे में
औ सिक्त होकर विभोर हो लूँ
तुम्हारे तन से उड़ी मलय में

प्रार्थना के ये अधूरे गान



 प्राण की वट वर्तिकाएँ दीप तो निशि दिन जलाए

वाटिका से पुष्प चुन कर साथ श्रद्धा के चढ़ाए 

सर्व यामी मान कर आराधना करता रहा मैं 

द्वार पर आकर नमन में, शीष था अपना झुकाए


आज जाना वाक् हीना श्रव्य हीना मूर्तियाँ  है
प्रार्थना में फिर निरर्थक गान गाकर क्या करूँगा 

तुम कहे जाते रहे करुणानिधानी , तो बताओ
आर्त्त नादों से घिरे तुम, है कहाँ करुणा तुम्हारी
तुम बने थे कर्मयोगी और योगेश्वर कहाए
हो कहाँ तुम? आज कल योगी बने हैं बस मदारी 

व्यर्थ लगती हैं सभी सम्बोधनों की पदवियाँ तब
मैं तुम्हारे नाम को देकर विशेषण क्या करूँगा 

डिग रही है आस्था, बैसाखियों पर बोझ डाले 
और नैतिकता समूची टैंक रही है खूँटियों पर
स्याह काले कैनवस पर दृष्टि को अपनी टिकाए
मानवीयता है प्रतीक्षित रंग आए कूँचियों पर

मरुथली झंझाओं ने घेरे हुए हैं द्वार गालियाँ
बध रहे इस शोर में मल्हार गाकर क्या करूँगा 

जो थी शोणित में घुली निष्ठाएँ पहली धड़कनों  से
टूटती हर साँस के पथ पर तिरोहित हो रही हैं 
मान्यताओं की धरोहर जो विरासत में मिली थी
इस समय के मोड़ पर आ, मुट्ठियों से रिस रही हैं 

जब कसौटी कह रही है पास के। विश्वास खोटे
मैं अधूरी आस के प्रासाद रच कर क्या करूँगा












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कोई भी गंध नहीं उमड़ी

  कोई भी गंध नहीं उमड़ी  साँसों की डोरमें हमने, नित गूँथे गजरे बेलकर लेकिन रजनी की बाहों में कोई भी गंध नहीं साँवरी नयनों में आंज गई सपने ज...