पुराने ढंग से फिर पत्र कोई

 


मैं सोचता हूँ तुम्हें लिखूँ अब
पुराने ढंग से फिर पत्र कोई
औ जोड़ दूँ सब बिखरते धागे
तितर बितर हो गए समय में

वे भाव मन के जो पुनकेसरों के पराग कण में लिपट रहे हैं
जो गंध में डूबती हवा की मधुर धुनों में हुए हैं गुंजित
बुने हैं सपने हज़ार रंग के  निखारते शिल्प अक्षरों का
उतार रखते जिन्हें कलम से हुआ है हर एक रोम पुलकित।

गुलाब पाँखुर कलम बना कर
भिगो सुवासों की स्याहियों में
करूँ प्रकाशित वे भाव अपने
जो उमड़े अक्सर ही संधिवय में

गगन के विस्तृत पटल पे अंकित करूँ सितारों से शब्द अपने
या राजहंसों  के फैले पर पर लिखूँ निवेदन सतत प्रणय का
मैं चाहता हूँ सितार तारों की झनझनाहट अभिव्यक्त कर दूँ
उन्हें बना कर पर्याय अपने लगन में भीगे हुए हृदय  का

मैं गुलमोहर के ले पाटलों को
चितेरू मेंहदी की बूटियों में
औ फिर रंगूँ अल्पनाएँ पथ पर
जो साथ चल कर सका था तय मैं

कब टेक्स्ट में आ ह्रदय उमड़ता न फ़ेसटाइम में बात वो है
जो पत्र में ला उकेर देती है तूलिकाएँ रंग अक्षरों से
कब व्हाटसेप्प में हुआ तरंगित वह राग धड़कन की सरगमों का
जो नृत्य करता हुआ बजा है गुँथे शब्द के सहज स्वरों में

मैं सोनजूही के फूल लेकर
दूँ गूँथ वेणी के मोगरे में
औ सिक्त होकर विभोर हो लूँ
तुम्हारे तन से उड़ी मलय में

No comments:

सन्नाटे का शासन है

  होठों पर ताले जड़ कर के बैठ रहो केवल सुनो। स्वरों से कुछ भी नहीं कहो आवाज़ों पर लगा हुआ प्रतिबंध यहाँ इस नगरी में सन्नाटे का शासन है  भोर...