धूप छाँह हो जाने वाले



जुड़ते थे सम्बन्ध कभी जो बरसों साथ निभाने वाले,
नए दौर में बस दो  दिन में धूप  छाँह हो जाने वाले 

परिभाषाएँ बदल रही नित जुड़ते बिखरे संबंधो की
बदल रहे परिवेशों में अब बदली नित्य मान्यताएँ भी 
इतिहासों में बंद हो चुकी बीते कल की याद पुरानी
साँझ भुला देती हैं अब तो घटी भोर की घटनायें भी 

सूरज करता रहा नियंत्रित इतने वरसो दिन को निशी के 
निशी वासर अब एक थिरक पर अन्फ़्लिंचिंग की हो जाने वाले 

सात समंदर की दूरी को कर लेते हैं सात प्रहर जब
दूर देश के संदेशों के मानी सभी बदल जाते हैं
विरह वेदना क्षणिक, मिलन के पल सारे मुट्ठी में जकड़े 
एक निमिष में दृश्य पटल पर प्रीतम सम्मुख आ जाते हैं 

कल थे घिरे विरह के बादल, आज नहीं वे घिरने वाले 
असमंजस के पल भी अब हैं धूप छाँह हो जाने वाले 

आपस  की दूरी पल पल में होती रही संकुचित नित ही
लेकिन बढ़ती रही ह्रदय के संबँधो में गहरी खाई 
लेश मात्र भी चढ़ी सीढ़ियाँ नहीं भावना की डोरी की
भावों से सिंचित कर मन ने जितनी भी बेलें उपजाई

अनुबंधों के वटवृक्षों की जड़े खोखली ही थी शायद 
तभी दुपहरी की बेला में छांव नहीं वे देने वाले 

अमराई में बोले न पिकी,


हम जो भी देते प्रकृति को, वो ब्याज सहित है लौटाती 

हम बोते रहे कीकरों को, क्या निशिगंधा फिर उग पाती 

है दुष्प्रभाव ये अपनी ओढ़ी हुई सभ्यता का ही तो
जो नए मुखौटे निशा दिवस चहरों पर चढ़ते जाते है
नगरों में स्वच्छ हवा थिरके पानी का नहीं प्रदूषण हो
हर राज मार्ग पर ये केवल नारे दुहराए जाते हैं

अब फूल फलों के झुरमुट की संख्या नित नित घटती जाती
अमराई में बोले न पिकी, बुलबुल भी गीत नहीं गाती

कल दूर क्षितिज तक दृष्टि क्षेत्र था हरियाली  से भरा हुआ
चैती फगुआई और सावन-भादों मल्हार  सुनाते   थे
दीवाली के प्रज्ज्वल  दीपक तय करते फागुन की दूरी
बासंती रंगों की चादर रसिया चंगों पर गाते थे

अब मरु के विस्तृत साम्राज्य की सीमाएँ बढ़ती जारी
अमराई में बोले न पिकी, पाँखुर पाँखुर झरती जाती

हम भेजा करते आमंत्रण खुद अपने घर झंझाओं को
नित राह सजाते हम सब मिल कुछ चक्रवात, तूफ़ानों की
है ज्ञात हमें क्या करने से हम पृष्ठ समय के पलट सकें
पर व्याधि हमें ये घेरे है, कल पर सब टाले जाने की

हम नहीं देखते पर विपदा सुरसा मुख सी बढ़ती जाती
अमराई में बोले न पिकी, अब मौन मयूरी रह जाती

राकेश खंडेलवाल
१३ मार्च २०२०

होली -ब्रज की

होली की सज रही उमंगें 
जाड़ा  भाग गया 

सिलबट्टे पर भांग घुट रही 
मथुरा-जमाना तीरे 
चढ़े खुमारी की सीढ़ी   पर 
पंडा धीरे धीरे
 जिजमानी में चार किलो 
वो रबड़ी फांक गया 

नीली पीली हरी गुलाबी
हैं गुलाल की ढेरी
इंद्रधनुष सी छटा दिखाती
है अबीर चन्देरी
कोई टेसू के फूलों से
भर कर नाँद गया

चढ़ा रही है मात झाड़ पर
उपला-गूलरी माला
अभिलाषा ले बांध रही है
कते सूत का धागा
आलावों पर पुष्प हार ला
कोई टाँक गया 

नंद गाँव से बरसाने तक
उड़े रंग के बादल
ठंडाई से भरी हुई है
हर रसिये की छागल
मौसम भी अलमस्त धुनों में
गाता फाग गया 

राकेश खंडेलवाल 
९ मार्च  २०२० 

कोई भी गंध नहीं उमड़ी

  कोई भी गंध नहीं उमड़ी  साँसों की डोरमें हमने, नित गूँथे गजरे बेलकर लेकिन रजनी की बाहों में कोई भी गंध नहीं साँवरी नयनों में आंज गई सपने ज...