पीड़ा की मदिरा भर देती

सुधा बिन्दु की अभिलाषायें लेकर आंजुर जब फ़ैले
पीड़ा की मदिरा भर देती तब तब सुधियों की साकी


जीवन नहीं नियोजित होता किसी गीत के छन्दों सा
बिखरावा इतना है जितना आता नहीं सिमटने में
चढ़ते दिन की सीढ़ी पर यूँ जमीं काई की परतें हैं
संध्या तक पल बीतें रह रह गिरने और संभलने में


उत्सुक नजरों के प्यालों को लेकर प्रश्न खड़े रहते
उत्तर की भिक्षा देने को, नहीं कोष में कुछ बाकी


घुल जाते हैं रंग भोर के संध्या के अस्ताचल में
पिघली हुई रात बह बह कर दोपहरी तक आ जाती
जली धूप के उठे धुंये में रेखाचित्रों के जैसी
जो भी आकॄति बनती, पल के अंशों में ही खो जाती

मार्गचिह्न का लिये सहारा खड़े रह गये पांवों को
डगर दिखा करती है केवल कांटो वाली विपदा की


अम्बर की खिड़की से झांका करता है एकाकीपन
देहलीजों के दीपक थक कर सो जाते राहें तकते
पीते टपकी हुई चाँदनी, पर रहते प्यासे तारे
फूल ढूँढ़ते ओस कणों को जगी भोर के सँग झरते


मछुआरा हो समय समेटे फ़ैंका हुआ जाल अपना
पर मरीचिका हो रह जाती नयनों की हर इक झांकी

ढाई अक्षर मैं नहीं वे पढ़ सका हूँ

वह अधर के कोर से फिसली हुई सी मुस्कराहट
वह दुपट्टे की सलों में छुप रही सी खिलखिलाहट
चित्र वे तिरते नयन में कुछ नए संभावना के
वह स्वरों की वीथि में अनजान सी कुछ थरथराहट

जानता हूँ दे रहे थे वह मुझे सन्देश कोई
किन्तु अब तक ढाई अक्षर मैं नहीं वे पढ़ सका हूँ

कह रही थी कुछ हवाओं की तरंगों में उलझ कर
साथ उड़ कर बून्द की चलती हुई इक गागरी के
थी लिखी उमड़ी घटाओं के परों पर भावना में
बात वह जो बज रही थी इक लहर पर ताल की के

एक उस अनबूझ सी मैं बात को समझा नहीं हूँ
यद्यपि वह सोचता हर रात चिन्तित हो जगा हूँ

था हिनाई बूटियों ने लिख दिया चुपके चिबुक पे
उंगलियों ने जो लिखा था कुन्तली बारादरी में
कंगनों ने खनखना कर रागिनी से कह दिया था
और था जो खुसपुसाता सांझ को आ बाखरी में

मैं उसी सन्देश के सन्दर्भ की डोरी पकड़ने
हाथ को फ़ैलाये अपने अलगनी पे जा टँगा हूँ

अर्थ को मैने तलाशा,पुस्तकों के पृष्ठ खोले
प्रश्न पूछे रात दिन सूरज किरण चन्दा विभा से
बादकों की पालकी वाले कहारों की गली में
पांखुरी पर ले रही अँगड़ाईयाँ चंचल हवा से

प्रश्न चिह्नों में उलझताधूँढ़ता उत्तर कहीं हो
मैं स्वयं को आप ही इक प्रश्न सा लगने लगा हूँ

एक ही साध मन में सँजोये

छन्द के फूल अर्पित किये जा रहा
तेरे चरणों में, मैं नित्य माँ शारदे
एक ही साध मन में सँजोये हुए
मुझको निर्बाध तू अपना अनुराग दे
भावना के उमड़ते हुए वेग को
कर नियंत्रित,दिशायें नई सौंप दे
मेरे अधरों को सरगम का आशीष दे
बीन के तार तू अपने झंकार के
तेरे शतदल कमल से छिटकती हुई
ज्ञान की ज्योति पथ को सुदीपित करे
तेरे वाहन के पर से तरंगित हुईं
थिरकनें, कल्पनायें असीमित करे
माल के मोतियों से अनुस्युत रहें
शब्द जो लेखनी के सिरे से झरें
अक्षरों को नये भाव के प्राण दे
तेरा आशीष उनको सँजीवित करे
तेरे स्नेहिल परस से निखरते हुए
शब्द घुँघरू बने झनझनाते रहें
आरुणी कर परस प्राप्त करते हुए
छंद तारक बने झिलमिलाते रहें
तेरी ममता की उमड़ी हुई बदलियाँ
शीश पर छत्र बन कर बरसती रहें
कामना है यही साँस की डोर से
हों बँधे गीत बस खिलखिलाते रहें.

याद मेरी कुछ आई थी क्या

दीप जलाकर जब तुम तीली फ़ूँक मार कर बुझा रहीं थी
सच बतलाना उस पल तुमको याद मेरी कुछ आई थी क्या


सुधि के पृष्ठों पर अंकित हैं दिवस अभी भी जब हम औ तुम
मनकामेश्वर के मन्दिर में जाकर दीप जलाया करते
गूँज रही आरति के घन्टों की मधुरिम ध्वनियों के सँग सँग
कंठ मिला कर पंचम सुर में हम तुम दोनों गाया करते

चन्द्रवार को शिव मन्दिर में विल्वपत्र जब चढ़ा रहीं थी
यह बतलाना आरतियाँ वे पुन: होंठ पर आईं थी क्या


गुलमोहर के फूलों पर जब प्रतिबिम्बित होती थी सन्ध्या
तब कपोल से रंग तुम्हारे लेकर सजती रही प्रतीची
प्राची की चूनर होने लग जाती स्वयं और कजरारी
जब भी तुमने दॄष्टि भंगिमा से कोई रेखा थी खींची


आज झुटपुटे में तुमने जब बादल पर परछाईं देखी
तो लाली की रंगत फ़िर से आ कपोल पर छाई थी क्या


रचे तीर पर कालिन्दी के, नदिया जल में मिश्रित कर के
श्यामल सिकता को, जो मैने तुमने मिल कर कई घरौंदे
रोपे थे, अनजानी अभिलाषाओं की कलमें ले लेकर
लिखी भूमिका के, वे दहलीजों पर रंग बिरंगे पौधे


आज वाटिका में कुटीर की ,तुम बटोर थीं जब महकें
तो उन सब ने मिल कर उन पौधों की याद दिलाई थी क्या

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...