याद मेरी कुछ आई थी क्या

दीप जलाकर जब तुम तीली फ़ूँक मार कर बुझा रहीं थी
सच बतलाना उस पल तुमको याद मेरी कुछ आई थी क्या


सुधि के पृष्ठों पर अंकित हैं दिवस अभी भी जब हम औ तुम
मनकामेश्वर के मन्दिर में जाकर दीप जलाया करते
गूँज रही आरति के घन्टों की मधुरिम ध्वनियों के सँग सँग
कंठ मिला कर पंचम सुर में हम तुम दोनों गाया करते

चन्द्रवार को शिव मन्दिर में विल्वपत्र जब चढ़ा रहीं थी
यह बतलाना आरतियाँ वे पुन: होंठ पर आईं थी क्या


गुलमोहर के फूलों पर जब प्रतिबिम्बित होती थी सन्ध्या
तब कपोल से रंग तुम्हारे लेकर सजती रही प्रतीची
प्राची की चूनर होने लग जाती स्वयं और कजरारी
जब भी तुमने दॄष्टि भंगिमा से कोई रेखा थी खींची


आज झुटपुटे में तुमने जब बादल पर परछाईं देखी
तो लाली की रंगत फ़िर से आ कपोल पर छाई थी क्या


रचे तीर पर कालिन्दी के, नदिया जल में मिश्रित कर के
श्यामल सिकता को, जो मैने तुमने मिल कर कई घरौंदे
रोपे थे, अनजानी अभिलाषाओं की कलमें ले लेकर
लिखी भूमिका के, वे दहलीजों पर रंग बिरंगे पौधे


आज वाटिका में कुटीर की ,तुम बटोर थीं जब महकें
तो उन सब ने मिल कर उन पौधों की याद दिलाई थी क्या

2 comments:

Udan Tashtari said...

क्या बात है, बहुत गज़ब!!


नव संवत की हार्दिक बधाइयाँ

प्रवीण पाण्डेय said...

स्मृति की छोटी छोटी भटकन, बहुत ही सुन्दर।

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...