फूट पड़े पतझड़ से

मौसम ने अंगड़ाई लेकर अपना रूप बदल डाला है
तुमने आज मीत लहराया जो अपना यह धानी आँचल 

फूट पड़े पतझड़ से सहसा गंधों के मदमाते झरने
जे मास में मरुभूमि में आकर के गदराया सावन
उगी करीलों की झाड़ी में सुरभित  पुष्पराज की कलियाँ 
सूखी  पड़ी नदी के तट पर  जैसे आ सरसा वृंदावन 

संदलबदने! रक्त अधर से बिखरी मृदमय स्मित की लड़ियाँ
उन्हें उठाने को आ पहुँचे धरती पर अम्बर से बादल 

जल तरंग ने छेड़ी सरगम होंठों पर रख कर बाँसुरिया
सोनजूही  ने गूँथी अपनी वेणी ले चम्पा और बेला
कचनारों की रंगत में आ घुली और कुछ हरी लाली 
सारंगी के सुर से चंगों  का बढ़ गया और गठमेला

कलसाधिके रंगे अलक्तक में पग उठे डगर पर ज्योही 
अस्ताचल  को जाता सूरज लौट पड़ा फिर से अरुणाचल 

उग आए पथ के चिह्नों में बल खाते नवरंग  धनक के
मनक़ामेश्वर मंदिर के सब भित्तिचित्र जीवंत हो गए 
तानसेन के आलापों से लगीं गूँजने सभी दिशायें
भग्न मंदिरों के प्रांगण  के सूनेपन रसवन्त हो गए 

शतरूपे कंगन की आरसि से प्रतिबिम्ब ज़रा जो छलके
लगी थिरकने धरा व्योम में बलखाती दामिनि की पायल 

कितनी बार जलाए

 
कितनी बार जलाए हमने अपनी आशाओं के दीपक 
सोचे बिना तिमिर का खुद ही हमने ओढ़ा हुआ आवरण 

कल की धूप बनाएगी अपने आँगन में रांगोली
इंद्रधनुष की बंदनवारें लटकेंगीं द्वारे पर आकर
आन बुहारेंगी गलियों को सावन की मदमस्त फुहारें
मलयानिल बाँहों में भरना चाहेगी हमको अकुलाकर 

कितनी बार आँजते आए हम यूँ दिवास्वप्न आँखों में
ज्ञात भले थादिन के सपनों का हो पाता नहीं संवरण

कितनी बार जलाए हमने धूप अगरबत्ती मंदिर में
अभिलाषित हो उठा धूम्र यह नील गगन तक जा पहुँचेगा 
ले आएगा अपने संग मेंकल्प वृक्ष की कुछ शाखाएँ
पारिजात की गंधों से तन का मन का आँगन महकेगा 

कितनी बार कल्पना को निर्बाध उड़ाया किये व्योम में
कर्मक्षेत्र के नियमों का तो कर न पाये कभी अनुसरण 

कितनी बार जलाए टूटे हुए स्वप्न आलाव बिठाकर
और सुबह के होते होते गुल दस्तों में पुनः सजाया
रहा विदित परिणति क्या होगी डाली से टूटे फूलों की 
फिर भी हमने भ्रम के झूलों में ख़ुद को हर बार झुलाया

कितनी बार हुई है खंडित अपनी आराधित प्रतिमाएँ
और सोचते अगले पल हो, इनमें आकर ईश अवतरण

राकेश खंडेलवाल








ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे

शरद की पूर्णिमा से हो शुरू यह
सुधाये है टपकती व्योम पर से
जड़े है प्रीत के अनुराग चुम्बन
लपेटे गंध अनुपम,पाटलों पे
किरण खोलेगी पट जब भोर के आ
नई इक प्रेरणा ले हंस पड़ेंगे
नयी परिपाटियों की रोशनी ले
ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे

यही पल हैं कि जब धन्वन्तरि के
चषक से तृप्त हो लेंगी त्रशाए
“नरक” के बंधनों से मुक्त होकर
खिलेंगी रूप की अपरिमित विभागों
भारत की पूर्ण हो लेगी प्रतीक्षा
वियोगि पादुका से पग मिलेंगे
नए इतिहास के अब पृष्ठ लिखने
ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे

मिटाकर इंद्र के अभिमान को जब
हुआ गिरिराज फिर  स्थिर धरा पर
बना छत्तीस व्यंजन भोग छप्पन
लगाएँ भोग उसका  सिर झुकाकर
मिलेंगे भाई जाकर के बहन से
नदी यमुना का तट। शोभित करेंगे
मनाएँगे उमंगों के पलों को
ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे


अनजाने ही संवर गया है

आवाज़ों के प्रतिबिम्बों में जब जब भाव घुल गए मेरे तब तब नया गीत  आ कोई अनजाने ही संवर गया है मन के बुककेसों में रक्खी हुई किताबों ने ख...